November 29, 2022

मुझमें राम, तुझमें राम,

सबमें राम समाया! 

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क्या राम के या किसी के भी मन्दिर को तोड़कर उस स्थान पर किसी और का मन्दिर या पूजागृह खड़ा किया जा सकता है? चूँकि सभी कुछ राम ही है इसलिए किसी मन्दिर को तोड़ने से राम को कोई अन्तर नहीं पड़ता। किन्तु जो इस मानसिकता से ग्रस्त है कि किसी मन्दिर को तोड़ने से उसका ईश्वर, अल्लाह या God उस पर प्रसन्न होगा वह राम, ईश्वर, अल्लाह और God को एक दूसरे से अलग मानता है। इससे भी राम, ईश्वर, अल्लाह या God को कोई अन्तर पड़ता होगा ऐसा नहीं लगता।

फिर दूसरे कुछ लोग भी हैं, जो कि एक मन्दिर को ढहाकर उस जगह पर बने किसी दूसरे धर्मस्थल को ढहाने को पवित्र पुण्य-कार्य समझते हैं।

क्या राम को जाने-समझे बिना ऐसे विचित्र कार्य से किसी का कुछ भला हो सकता है?

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November 25, 2022

खुशबू की तरह,

 ~~दृश्य-अदृश्य~~

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वैसे भी कहाँ जा सकता हूँ, 

वैसे भी कहाँ मैं जाऊँगा!

ये बात और है, तुमको मैं,

नजर आऊँ, या न आऊँगा!!

फ़लक सा निखर जाऊँगा, 

रौशनी और महक की तरह,

ताज़गी और रौनक की तरह,

खुशबू सा बिखर जाऊँगा!!

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सारगर्भित

कविता / 25-11-2022

1 / दो टूक!! 

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तुम्हें इस सबसे क्या मिलना, 

तुम्हें इस सबसे क्या मतलब!

मुझे इस सबसे क्या मिलना,

मुझे तुमसे भी क्या मतलब!!

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2 / यथार्थ 

सोचोगे तो चिन्ता होगी, 

चिन्ता होगी तो सोचोगे! 

सोचो मत, चिन्ता न करो!

चिन्ता न करो, तो सोचोगे!?

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November 23, 2022

जीवन का यह पथ दुर्गम!

कविता / 23-11-2022

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फिर भी इस पर चलना होगा!

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बीहड़ वन का जैसे दुर्गम!

जीवन का यह पथ निर्मम!!

क्यों कैसे यह, हुआ है निर्मम,

या है यह मनुष्य का भ्रम!

अवलोकन करना होगा! 

यद्यपि अखंडित है जीवन,

फिर भी खंडित हर तन-मन!

तन की है, अपनी प्रकृति तो,

मन का भी है अपना स्वभाव, 

प्राणों की अपनी ही गति है तो,

मति का भी है, अपना स्वभाव! 

समन्वय सबका ही मनुष्य,

यह वर्तमान, भूत-भविष्य!

तन को पता नहीं है मन का,

प्राणों को पता नहीं है तन का,

मन को पता नहीं है मति का,

जीवन कुछ ऐसा, इस गति का!

जीवन-पथ क्या निर्मम है!?

या यह केवल कोरा भ्रम है!?

जब तक लक्ष्य कहीं है दूर, 

चलते रहना होगा जरूर,

चलने से पथ निर्मित होगा,

स्नेहयुक्त, निर्मम या क्रूर! 

यह पथ तो है ममता-विहीन,

यह इसीलिए तो है निर्मम,

यद्यपि इसमें शून्य ममत्व,

किन्तु भरा, अथाह अपनत्व!

अपनापन ही इसका है स्वरूप,

यद्यपि असंख्य हैं इसके रूप! 

किसी एक में भी यह जब जब,

कुंठित होकर रह जाता रुद्ध,

उसको ही अपनत्व बाँटकर,

उसमें ही रह जाता अवरुद्ध! 

जीवन का स्वतंत्र व्यवहार,

ऐसा ही इसका सर्वत्र संचार,

कुंठित यह अपनापन ही,

रहता अतृप्त, बन अहंकार!

जब तक पथ यह कुंठित है,

यह अहंकार भू-लुंठित है,

तब तक इससे मुक्ति नहीं, 

तब तक इसकी मुक्ति नहीं!

अहंकार हो या निरहंता,

कुंठा, पीड़ा हो, या निर्ममता,

तब तक तो चलते रहना होगा,

फिर भी इस पर चलना होगा! 

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November 22, 2022

अन्तर्द्वन्द्व.. !

विरोधाभास!

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यह क्या आख़िर तुमने किया?

मिले हुए को गँवा दिया! 

लेकिन यह तुमने ठीक किया, 

मिटे हुए को मिटा दिया!

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सुबह सुबह क्यों!

कविता 22-11-2022

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November 20, 2022

जीवन का यह प्रवाह!

जीवन : एक खेल 

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हर दम सुख ही क्यों चाहो! 

थोड़ा सा दुःख भी झेलो! 

सुख-दुःख का है जीवन खेल,

जीवन के संग संग खेलो!

क्यों ऐसे उदास रहते हो,

गुमसुम से क्यों रहते हो,

रोओ, चिल्लाओ, या गाओ!

खुलकर, हँसकर कुछ बोलो!

लगता है जीवन छोटा है, 

फिर लगता है इतना लंबा भी,

युग युग भी छोटा लगता है, 

लेकिन पल पल भी लंबा भी!

पल पल में भी युग जी लो,

युग युग में भी पल पल! 

बीते कल में, भावी कल में भी,  

जीवन-प्रवाह, बहता कल कल!

जीवन-प्रवाह की धारा में, 

डूबो, उतराओ, बह जाओ, 

या तैरो भी, जितना जी चाहे,

या फिर पार उतर जाओ!

हर दम ही जीना क्यों चाहो, 

थोड़ा सा मिटना भी झेलो!

मरना-मिटना भी जीवन है, 

जीवन के संग संग खेलो!

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भव और अनुभव

यह जो है मन!

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कविता / 20-11-2023

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लगता तो है, यह चंचल है,

कितना अस्थिर प्रतिफल है!

यह है सबसे पहला विभ्रम, 

जो चंचल है, वह अनुभव है!

अनुभव नित्य बदलता है, 

आता है, फिर जाता है, 

स्मृति बनकर रह जाता है, 

क्या मन कोई अनुभव है! 

स्मृति भी तो नित्य बदलती है,

बनती-मिटती है, चलती है! 

फिर क्या मन कोई स्मृति है?

स्मृति ही तो है जो चंचल है!

स्मृति है अतीत, अतीत अनुभव,

अनुभव स्मृति, अनियत अनुभव,

क्या मन कोई अनुभव है?

अनुभव है विचार प्रत्यय, 

प्रत्यय है, प्रतीति, विचार,

प्रतीति, विचार अस्थिर, अनित्य, 

क्या मन कोई प्रत्यय है!

सुख-दुःख, शान्ति-अशान्ति पुनः, 

तृप्ति-अतृप्ति, परितृप्ति पुनः, 

असंतोष संतोष सभी,

आते हैं, फिर जाते हैं,

बेचैनी आती जाती है, 

व्याकुलता आती जाती है,

चैन भी आता जाता है, 

नींद भी आती जाती है, 

भय भी आता जाता है, 

लोभ भी आता जाता है, 

ज्ञान भी आता जाता है, 

विस्मृति भी आती जाती है,

तो स्मृति भी आती जाती है, 

इच्छा, द्वेष के साथ साथ, 

तृष्णा भी आती जाती है!

सब आता जाता है किन्तु,

क्या मन आता जाता है?

यदि मन भी आता जाता है,

तो मन भी बस है प्रतीति, 

होती है आने जानेवाली,

नित्य बदलती अनुभूति!

क्या मन कोई अनुभूति है,

यदि है तो, किसको होती है?

वह कोई, जो कहता है "मैं",

क्या यह उसको होती है? 

जो कहता है, मुझको होती है,

जो कहता है, यह मैं, या मेरा,

क्या वह भी आता जाता है, 

क्या मन, यह 'मैं', या 'मेरा' है?

यह 'मैं'-'मेरा' हैं आते जाते, 

मन में ही तो आते जाते, 

जिस मन में वे आते जाते, 

क्या मन वह आता, जाता है! 

मन ही क्या वह नित्य नहीं,

मन ही क्या, नहीं वह भूमि, 

जिस पर दृश्य उभरते हैं, 

जो आते हैं, फिर जाते हैं! 

उन दृश्यों का दृष्टा कोई,

क्या वह भी आता जाता है? 

क्या मन, दृश्य या दृष्टा है? 

क्या मन आता या जाता है? 

आते या जाते हैं ये देवता,

वैसे तो बहुविध होते हैं,

गिनती में बस होते तैंतीस,

इतनी ही कोटि के होते हैं!

नाट्य-शास्त्र में, मुनि भरत,

कहते हैं इन्हें भाव संचारी,

मन-भूमि में रमा करते है,

क्या मन संचारी होता है?

मन तो वह व्यापक आकाश, 

जिसमें व्याप्त ऐसा प्रकाश,

जिसका उद्गम भी मन है, 

क्या उद्गम आता जाता है? 

सबमें है व्याप्त, है यत्र-तत्र, 

यहाँ वहाँ भी सदा सर्वत्र,

कहाँ नहीं इसका अस्तित्व,

समष्टि, समूह, या व्यक्तित्व!

क्या ये सब आते जाते हैं?

तो मन को चंचल क्यों कहते हो? 

क्यों इतना व्याकुल रहते हो? 

मन को सबसे पहले जानो !

फिर चाहो तो, कुछ भी मानो! 

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November 18, 2022

राजनैतिक इच्छा-शक्ति

धर्मान्तरण और गीता

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भारतवर्ष पर विदेशी शासन के समय से ही सनातन-धर्म को पूरी तरह से मिटा देने के लिए ईसाई, मुस्लिम, नास्तिक और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग मिलजुलकर कार्यरत हैं। सर्वधर्म-सम-भाव की आड़ में अपने धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता का अधिकार भारत के संविधान द्वारा दिया गया है। किन्तु यह अधिकार अपने-आप में श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा में स्थापित सिद्धांत का उल्लंघन है और उससे अत्यन्त विपरीत है, जिसके अनुसार, अपना धर्म दूसरे किसी भी धर्म से निकृष्ट होने पर भी मनुष्य को अपने धर्म को त्यागकर अन्य धर्म को कदापि नहीं  स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि अपने धर्म का आचरण करते हुए हो जानेवाली मृत्यु भी अत्यन्त श्रेष्ठ है, जबकि परधर्म को स्वीकार कर, उस पर आचरण करना अत्यन्त भयावह है।

जब श्रीमद्भगवद्गीता में ही यह मार्गदर्शक सिद्धांत इतनी स्पष्टता से व्यक्त किया गया है तो इसे हमारे संविधान में एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में स्वीकार करने में क्या समस्या है।

यदि अपने धर्म का प्रचार करने के अधिकार को संविधान में ही निषिद्ध कर दिया जाए, तब भय या दबाव, लोभ आदि से भी धर्मान्तरण किए जाने प्रश्न ही पैदा नहीं होगा, क्योंकि तब किसी के लिए भी अपने धर्म को त्यागने का अधिकार ही नहीं होगा।

सन्दर्भ के लिए गीता के निम्नलिखित श्लोक द्रष्टव्य हैं :

अध्याय ३

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।३५।।

अध्याय १८

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।।

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।४७।।

यहाँ यह स्पष्ट किया जाना भी महत्वपूर्ण है कि गीता के अनुसार वर्णाश्रम व्यवस्था प्रकृति-प्रदत्त है और वर्ण का आधार मनुष्य के गुणों और उसके द्वारा किए जानेवाला कर्म से तय होता है, न कि जन्म या जाति, वंश या माता-पिता के आधार पर। इसलिए मनुष्य अपने वर्ण का चुनाव स्वयं ही तय कर सकता है। और उस आधार पर वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र होता है, न कि केवल किसी वर्ण-विशेष में जन्म ले लेने से।

अध्याय ४

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।१३।।

यदि हममें राजनीतिक इच्छा-शक्ति है तो, धर्मान्तरण को पूर्णतः एक अपराध और अवैध भी घोषित किया जा सकता है। और तब किसी को धर्मान्तरित किए जाने के कार्य को भी वैसा ही एक दंडनीय अपराध माना जाएगा। 

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November 17, 2022

To Follow...!

Poetry and Commentary

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The Question Is:

To Follow Or Not? 

Or To Follow A Lot!

To Follow Knot,

Or To Follow Nought!

But Exactly Who Follow?

Do You Really Follow? 

The Fallow Land of Mind, 

Inevitably Follows, 

Where Conflicts Grow, 

Into Confusion, Doubt,

More And  More!

Is There A Way,

So That Someone,

Doesn't Need To Follow, 

But Rather Discovers,

The Path Of Wisdom, 

In The Pathless Land, 

That Is Life Of Its Own!

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This was meant to be posted in my another blog :

(vinaykvaidya.blogspot.com),

I ultimately did a blunder so it is here!

A silly mistake indeed. 

Sorry!! 

Now The Commentary :








वाल्मीकि रामायण

उत्तरकाण्ड की रचना किसने की?

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यहाँ इसका कोई प्रमाण नहीं दिया जा रहा है, केवल यह दर्शाने के लिए इस पोस्ट को लिखा जा रहा है कि विकास दिव्य कीर्ति जैसे अनेक बुद्धिजीवी हम जैसे लोगों को भ्रमित कर सनातन धर्म का विनाश करने में संलग्न हैं, और हम कैसे उपद्रवकारी तत्वों का शिकार हो रहे हैं। वाल्मीकि रामायण के अनेक तथ्यों को मेंने विस्तार से अपने स्वाध्याय ब्लॉग में लिखा है जिनसे भी आप इसकी पुष्टि कर सकते हैं कि वाल्मीकि रामायण जैसे ग्रन्थ की रचना किसी साधारण मनुष्य के द्वारा किया जानेवाला कार्य नहीं हो सकता।

यहाँ केवल एक स्क्रीनशॉट प्रस्तुत है जिसके संदर्भ में इस पोस्ट का मूल्यांकन कृपया करें!

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November 15, 2022

कहाँ है वक्त मेरे पास!

दासतान-ए-वक्त!!

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कहाँ है वक्त मेरे पास जिसे, 

जिसे बिताऊँ या कि काटूँ मैं?

ये वक्त किसको दूँ या लूँ मैं, 

किसके साथ बोलो, बाँटूँ मैं!!

वो जिनके पास होता होगा वक्त,

उन्हें ही शायद बेहतर पता होगा,

कि कैसा सुलूक बेहतर कोई,

वक्त के साथ किया जाना होगा! 

वक्त को काटना या बिताना भी,

कभी आसान, मुश्किल होता है! !

काटने या बिताने के अलावा,

वक्त लिया-दिया भी तो जाता है,

कभी बचा भी लिया जाता है, 

कभी फिजूल किया जाता है!

खींच-तानकर, कभी चुराकर भी,  

इसको बड़ा-छोटा किया जाता है,

फिर भी कुछ भी तय नहीं है,

कहाँ से आता, और कहाँ जाता है!

हर कोई ही खिलौना है इसका,

इसके हाथों में खेला करता है!

किसी को कुछ भी बना देता है,

बनाकर फिर मिटा भी देता है!

क्या कभी कोई समझ भी पाया है,

ये हकीकत है या कि बस माया है!

इसलिए मैं इसे काटता भी नहीं,

मैं इसे बचाता-बिताता भी नहीं!

जानता हूँ वक्त खयाल ही तो है

खयाल है लेकिन सवाल भी तो है!

जैसे दौलत या शोहरत होती है, 

जैसे इज्जत या ताकत होती है,

जैसे बीता या नया कल होता है,

जो कभी आज नहीं होता है!

फिर भी लगता है था, या होगा, 

ये सपना शायद सच कभी होगा!

बस इसी तरह से वक्त भी चलता है, 

कल आज में, आज, कल में ढलता है!

फिर भी ठहरा रहता है वो हमेशा ही! , 

बीतता या आता-जाता नहीं फिर भी!

ये सपना कभी झूटा या सच होता है,

वक्त हकीकत या ख्वाब होता है! 

कितना भी हकीकत हो लेकिन,

कभी नाकामयाब भी तो होता है!

ये सब खयाल नहीं, तो और फिर क्या है?

खयाल ही न करो, तो फिर क्या है?

हाँ पूछा करता हूँ, सभी से मैं!

कोई बोले तो वक्त फिर क्या है? 

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November 14, 2022

मैं सोचता हूँ,

कि सोचना क्या है?!

कविता 14-11-2022

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चूँकि मैं हूँ इसीलिए क्या मैं सोचता हूँ?

या कि मैं सोचता हूँ, इसीलिए क्या मैं हूँ?

चूँकि मैं हूँ इसीलिए क्या मैं चाहता हूँ?

या कि मैं चाहता हूँ, इसीलिए क्या मैं हूँ? 

मै सोचता हूँ कि ये, 'सोचना' क्या होता है? 

मैं सोचता हूँ या कि ये 'सोचना' ही होता है?

ये 'सोचना', -जो कि होता है बेखयाली में,

ये 'सोचना', -जो कभी इरादतन भी होता है, 

'सोचना' जिस पर होता हूँ कभी तो मैं ही हावी,

'सोचना' जो कभी तो मुझ पर भी हावी होता है!

कभी तो चाहते हुए भी तो सोच नहीं पाता, 

कभी न चाहते हुए भी तो 'सोचना' होता है,

मैं सोचता हूँ कि यह 'चाहना' क्या होता है?

'चाहना' जिस पर होता हूँ कभी तो मैं हावी,

'चाहना' जो कभी मुझ पर भी हावी होता है! 

जो होता है बनकर कभी उम्मीद या डर कोई, 

जो कभी अफ़सोस कोई या कि ग़म भी होता है!

मैं चाहता हूँ कि इस सोचने पर और नहीं सोचूँ,

मैं सोचता हूँ इस चाहने पर और नहीं सोचूँ,

पता नहीं है मुझे, मैं कुछ समझ नहीं पाता,

ये 'सोचना', ये 'चाहना', मुझे नहीं आता!

बस कि ठिठक के रह जाता हूँ ये सोचकर,

कि क्या बिना सोचे, या कि बिना चाहकर,

क्या सफ़र ज़िंदगी का चलता ही नहीं, 

क्यों परेशान हुआ जाए, सोचकर या, चाहकर!

नहीं मैं चाहता हूँ, हैरान या परेशान होना,

अच्छा है इस चाहने, सोचने से अनजान होना!

***


ऐसा कुछ वाकया हुआ होगा!

कविता / 14-11-2022

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तुम्हारी ज़िन्दगी में...

अफ़सोस! 

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तुम्हारी ज़िन्दगी में छाया क्यूँ है इतना अन्धेरा!

क्या कभी इस रात का होगा सवेरा!

ग़मों ने क्यूँ बना ली है जगह दिल में,

ख़ुशी ने बसा लिया क्यों कहीं और डेरा!

क्या कभी ख़त्म भी होगा सिलसिला,

आशियाना अपना भी होगा कभी बसेरा!

हर रात के बाद हर रात क्या गुजरेगी यूँ ही,

क्या हर रोज घना ही होता रहेगा अन्धेरा!

तुम्हारी ज़िन्दगी में इतनी उदासी क्यों है, 

कौन से दुश्मनों ने रची है साज़िश इसकी, 

क्या उन दुश्मनों को डर नहीं है खुदा का,

या खुदा को नहीं है पता उनकी साजिश का!

अगर पता है तो कैसे उसको है ये गवारा!

तुम्हारी इस ज़िन्दगी में है क्यूँ इतना अँधेरा?

काश मैं मिटा सकता तुम्हारे इस अँधेरे को, 

कहीं से खींचकर ला सकता नये सवेरे को,

तो जरूर किसी भी क़ीमत पर मैं ला देता, 

पर हूँ मजबूर मैं, इस पर कहाँ है बस मेरा!

तुम्हारी ज़िन्दगी में छाया क्यूँ है इतना अन्धेरा!!

***

कविता / 14/11/2022





November 13, 2022

12 नवंबर 2022,

स्मरणीय और बहुत रोचक भी था। 

सुबह किसी आध्यात्मिक विभूति का वचन पढ़ा :

"प्रत्येक ही मनुष्य की मृत्यु की घड़ी पूरी तरह से सुनिश्चित होती है, यद्यपि यह आवश्यक नहीं कि उस समय के उपस्थित होने से पहले तक भी किसी को शायद ही इसका अनुमान हो सके। वह घड़ी शान्तिपूर्वक स्वीकार हो सके इसके लिए मनुष्य को चाहिए कि अपने पूरे हृदय से उन सभी ज्ञात-अज्ञात लोगों से और सभी प्रकृतियों, जड-चेतन वस्तुओं से जाने-अनजाने भी अपने द्वारा किए गए ऐसे उन समस्त कार्यों के लिए बिना अपेक्षा किए क्षमा माँग ले और यदि उन्होंने भी जाने-अनजाने कोई अपराध उसके प्रति या अन्याय उस पर किया हो, तो उन्हें भी उसके लिए अपने पूरे हृदय से वह उन्हें क्षमा कर दे। और यह कार्य जितने शीघ्र हो सके, उसे कर लेना चाहिए। यह आवश्यक और / या संभव भी नहीं है कि इसकी घोषणा की जा सके। किन्तु अपने मन में ऐसी भावना यदि जागृत हो उठे तो इतना ही पर्याप्त है। अपनी उम्र के अंतिम वर्षों में तो ऐसा कर ही लिया ही जाना चाहिए।"

फिर एक और वचन याद आया :

"भूल सभी से हो सकती है, किन्तु मनुष्य को पहले अपनी भूलों पर ध्यान देना और उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यदि आवश्यक और संभव हो तो ही इसके बाद, दूसरों की भूलों के बारे में, अधिकार होने पर ही, कोई टिप्पणी करना उचित है।"

इसलिए इस पोस्ट के माध्यम से मैं उन सभी ज्ञात-अज्ञात लोगों से किसी अपेक्षा के बिना ही क्षमा याचना करता हूँ, जिनके प्रति मैंने जाने-अनजाने भी कोई अन्याय किया हो। और यह भी, कि यदि किसी ने मुझ पर जानते-बूझते हुए या अनजाने में भी कोई अन्याय किया हो तो मैं इसके लिए उन्हें क्षमा करता हूँ। अर्थात् मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। 

दूसरी रोचक बात यह हुई कि मनोयान ब्लॉग में अष्टावक्र गीता के अध्याय १ से १७ और १८ वाँ श्लोक पोस्ट किया। शाम को यूँ ही फुरसत में बैठे हुए मेरे अंग्रेजी ब्लॉग में एक कविता पोस्ट की, जिसका शीर्षक था :

"It's True!".

इन दोनों पोस्ट्स को अपने Whatsapp  group के

"Truth is Pathless land."

में शेयर किया, जिन पर एक मित्र ने "श्रीदक्षिणामूर्ति-स्तोत्रम्" से एक श्लोक उद्धृत करते हुए टिप्पणी की। अर्थात् उन श्लोकों तथा उस कविता पर भी, दोनों को एक साथ संबद्ध करते हुए।टिप्पणी को पढ़कर मन-हृदय रोमांचित और गद्-गद् हो उठा।

***