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September 10, 2021

चातुर्वर्ण्यं

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४ में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं :

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।।३।।

तब अर्जुन ने शंका व्यक्त करते हुए पूछा  :

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ।।४।।

अर्जुन की इस शंका का निवारण करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ।।५।।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ।।६।।

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इसी 30/31 अगस्त 2021 के दिन अपने 'प्रसंगवश' ब्लॉग में एक पोस्ट लिखा था :

विषय, विचार, भावना

(संभवतः अभी तक उस पोस्ट पर किसी पाठक की कृपादृष्टि नहीं पड़ी है। किन्तु मुझे वह पोस्ट महत्वपूर्ण प्रतीत हो रहा है, इसलिए उसे थोड़े से संशोधन सहित अगली पोस्ट में यथावत पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ।) 

उपरोक्त श्लोकों के सन्दर्भ में जहाँ 'अहं' का अर्थ आत्मा, जीव और परमात्मा तीनों ही दृष्टियों से ग्रहण किया गया है और तीनों ही अर्थ व्याकरण की दृष्टि से भी ग्राह्य हैं, संस्कृत व्याकरण के ज्ञाता इसकी परीक्षा अच्छी तरह कर सकते हैं। 

यदि 'अहं' पद को आत्मा (अन्य-पुरुष एक-वचन) या 'मैं' (उत्तम-पुरुष एक-वचन) के अर्थ में ग्रहण किया जाए, तो 'तान्यहं वेद' में प्रयुक्त 'वेद' शब्द को 'विद्' (जानना) धातु के अन्य-पुरुष लट् - लकार, एक वचन, तथा उत्तम-पुरुष एकवचन दोनों ही रूपों में ग्रहण किया जा सकता है ।

बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार आत्मा / परमात्मा का प्रथम नाम 'अहम्' ही हुआ :

'अहं नामाभवत् ...'

वैसे भी संस्कृत भाषा में उत्तम-पुरुष एकवचन सर्वनाम (मैं) को आत्मा शब्द से ही व्यक्त किया जाता है।

इसी प्रकार, 'बहूनि मे व्यतीतानि' का अर्थ भी आत्मा, परमात्मा या व्यक्ति के रूप में स्वयं के अर्थ का द्योतक हो सकता है। 

किन्तु जब भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा इस प्रकार से कहा जाता है, तो स्पष्ट है कि परमात्मा के जन्म का तो प्रश्न ही नहीं उठता, किन्तु किसी विशिष्ट प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए परमात्मा मनुष्य देह में अवतरित होता है, तो यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार के अनेक अवतार या जन्म परमात्मा के भी हो सकते हैं । किन्तु मनुष्य के लिए यह जान पाना लगभग असंभव ही है कि इस जन्म से पूर्व क्या मेरे और भी जन्म हुए होंगे!

उपरोक्त सन्दर्भ में उल्लिखित पोस्ट को यहाँ पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है। 

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चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।१३।।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।

इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बद्ध्यते ।।१४।।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।

कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं  पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ।।१५।।

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताःक्ष। 

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।१६।।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ।।१७।।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।

स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ।।१८।।

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मनुष्यमात्र में इस 'मैं' सर्वनाम के वास्तविक तात्पर्य के विषय में न केवल अज्ञान और संशय बल्कि अनेक प्रकार की भ्रान्तियाँ भी होती हैं। किन्तु शायद ही कभी किसी का ध्यान इस सच्चाई पर जाता होगा। यहाँ तक कि इस बारे में सोचते ही बुद्धि कुंठित और अवरुद्ध होने लगती है। 

यह भी कहा जाता है कि अहंकार नहीं करना चाहिए। 

या फिर, 'अहंकार को त्याग दो।'

प्रश्न है कि अहंकार को त्यागने, या न त्यागने का कार्य कौन करेगा?

इसे क्या किसी और तरह से नहीं कहा जा सकता?

अहंकार वैसे तो एक विशिष्ट, दूसरी समस्त भावनाओं से भिन्न एक विलक्षण भावना ही है, किन्तु जैसे अन्य सभी भावनाएँ अपने अपने समय पर व्यक्त और विलुप्त होती रहती हैं, यह भावना उन सभी के साथ यद्यपि सदैव संलग्न होती है, किन्तु इसे उन सारी भावनाओं की तरह स्वतंत्र रूप में कभी नहीं पाया जाता। 

अपरोक्षतः इसे कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व और स्वामित्व इन चार रूपों में अवश्य पहचाना जा सकता है।

कैसे? 

ज्ञातृत्व :

कोई विषय हमें आकर्षित करता है । कोई विचार हमें आकर्षित करता है। कोई विषय हमें विकर्षित करता है। कोई विचार हमें विकर्षित करता है। कोई विषय / विचार हममें कोई भावना जाग्रत करता है। कोई विषय / विचार तो हमें छूता तक नहीं।

इस प्रकार हममें अनायास ही ज्ञातृत्व की, अर्थात् जानने की जो स्वाभाविक क्षमता, या भावना होती है । जानकारी के संग्रह के रूप में जिसे 'ज्ञान' (information) कहा जाता है, उससे बहुत अलग और भिन्न होती है। यह 'ज्ञान' (information) सदैव शाब्दिक या स्मृतिरूप में होता है और वेदान्त की भाषा में उसे 'प्रत्यय' कहा जाता है। इसी प्रकार शब्दरहित विषयग्रहण को ज्ञातृत्व कहा जा सकता है। 

'प्रत्यय' और 'वृत्ति' के भेद का वर्णन पातञ्जल योग-सूत्र में अच्छी तरह स्पष्ट किया गया है। 

भोक्तृत्व :

अर्थात् अनुभव होना, अच्छा लगना, अच्छा न लगना, सुख-दुःख होना । 

कर्तृत्व :

किसी कार्य को करने / न करने का संकल्प होना, 

और उस कार्य के अच्छे या बुरे फल का भोग करने या न करने का विचार / भावना।

स्वामित्व :

संपत्ति, संबंधों, वस्तुओं, अपने अधिकार के अन्तर्गत आनेवाले लोगों पर अपना स्वामित्व होने की भावना।

ये ही चार वर्ण 'मन' के होते हैं । 

क्या 'मन' इन चारों वर्णों से रहित हो सकता है? 

प्रसंगवश ब्लॉग में 30 / 31 अगस्त 2021 को लिखी पोस्ट :

विषय, विचार, भावना

में इसी बारे में विवेचना की गई है। 

***


 






July 29, 2021

रघुवंशम्

सर्ग ३

हरिर्यथैक: पुरुषोत्तमः स्मृतो

महेश्वरस्त्र्यम्बक एव नापरः।

तथा विदुर्मां मुनयः शतक्रतुं 

द्वितीयगामी नहि शब्द एष नः।।४९।।

***

इन्द्र ने कहा :

जिस प्रकार "हरि" शब्द का प्रयोग केवल पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के ही लिए, "महेश्वर" शब्द का प्रयोग केवल त्र्यम्बकेश्वर भगवान् शिव के लिए ही किया जाता है, वैसे ही "शतक्रतु" शब्द का प्रयोग केवल मेरे ही लिए किया जाता है। 

(इसलिए जब कोई मनुष्य एक सौ अश्वमेध यज्ञ कर लेता है तो वह दूसरा इन्द्र हो जाता है। और यह मुझे स्वीकार नहीं है। इसीलिए मैं ऐसे मनुष्य के यज्ञ का अश्व चुरा लेता हूँ। इसीलिए मुझे हरिताश्व भी कहते हैं। किन्तु हरिताश्व होने का एक अर्थ यह भी हुआ कि मेरे रथ में जोते जानेवाले अश्व हरे रंग के हैं।)

पिछला पोस्ट लिखते समय उपरोक्त कहानी मुझे याद आई।

आज ही अपने swaadhyaaya blog  में उसी प्रश्न :

Can Science ever explain the mystery of the consciousness?

का उत्तर देने का प्रयास किया। 

एक कहानी और याद आ रही है,  जो उस चोर के बारे में है जिसने किसी विवाहोत्सव में चोरी की, और जब चोरी होने का पता चला और लोग चोर को ढूँढने की कोशिश कर रहे थे तो वह उनकी इस कोशिश में कुछ और अधिक उत्साह से शामिल हो गया, और मौका मिलते ही रफू-चक्कर हो गया। 

आज के विज्ञान की भूमिका इसी प्रकार की है। विज्ञान 'चेतना क्या है?', इस बारे में बहुत जोर-शोर से खोजबीन करने का नाटक कर रहा है जबकि विज्ञान स्वयं ही बुद्धि का परिणाम है, और बुद्धि स्वयं भी, चेतना का ही परिणाम मात्र है। क्या कोई परिणाम अपने कारण (के उद्गम) को जान सकता है? क्या कोई पुत्र अपने पिता के जन्म को जान सकता है?

इस कहानी को मैंने पहली बार श्री रमण महर्षि के साहित्य में पढा़ था। जहाँ इसका उल्लेख मन अर्थात् अहंकार के संदर्भ में किया गया था।  आशय यह कि क्या मन / अहंकार कभी अपने-आप को जान सकता है? हाँ, वह ऐसा प्रयास करने का नाटक अवश्य कर सकता है, और इस प्रकार से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करता रह सकता है। किन्तु जब कोई मनुष्य, मन / अहंकार का उद्भव जहाँ से होता है, उस स्रोत का अनुसंधान करता है, तो मन / अहंकार बस विलीन हो जाता है।

इसी प्रकार विज्ञान अर्थात् वैज्ञानिक जब अपने हृदय में ही उस स्रोत की खोज करेगा जहाँ से बुद्धि का आगमन होता है, तब वह जान पाएगा कि चेतना क्या है!

इसे इस प्रकार से भी समझा जा सकता है :

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। 

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।।४२।।

(गीता, अध्याय३)

विज्ञान बुद्धि की उपज है और बुद्धि तक ही उसकी मर्यादा है। चेतना बुद्धि की पकड़ से परे की वास्तविकता / सत्य है। 

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July 16, 2021

शरीर, मन और आत्मा

अहं, त्वं, तत्, इदम्

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तव तत्त्वं न जानामि, कीदृशोऽसि महेश्वर।

यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।।

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अस्मद्, युष्मद्, और तत् तीन ही सर्वनाम एकमेव 'अहं' सर्वनाम के विस्तार हैं।  इसी का एक पर्याय है 'इदम्' ।

इन्हें 'प्रत्यय' भी कहा जाता है। 

जो प्रतीत होता है, जिसे प्रतीति की तरह ग्रहण कर लिया जाता है और व्यवहार में जिसे प्रयोग में लाया जाता है उसे प्रत्यय कहा जाता है।

'अस्मद्' अर्थात् 'मैं' या 'हम' प्रत्यय ऐसा ही सर्वनाम है, जिसे 'अपने लिए' के अर्थ में प्रयोग किया जाता है।

अपना अस्तित्व और अपने अस्तित्व का भान, परस्पर अभिन्न, अनन्य, और अविभाज्य (त्रि)कालरहित सत्य हैं ।

इसके बाद ही किसी अन्य तत्व के विषय में कुछ भी कहा जा सकता है। यहाँ तक कि 'काल' को यद्यपि अनादि समझा जाता है, किन्तु उस काल की अवधारणा का जन्म या सत्यता की प्रतीति भी अपने अस्तित्व और उस अपने अस्तित्व के भान के बाद ही हो सकती है।  इसलिए 'काल' प्रतीति और प्रत्यय मात्र है। 

अपने को (अर्थात् आत्मा को)  शरीर मात्र समझना उपयोगी है, किन्तु वह एक व्यक्त विचार की तरह ही सत्य है, अपनी निजता या वास्तविकता नहीं है। इसी प्रकार काल और स्थान (Time & Space) प्रत्यय या विचार मात्र हैं, न कि अस्तित्व की तरह विद्यमान सत्यता। 

जबकि 'निजता' काल-स्थान से स्वतन्त्र अपनी वास्तविकता है, न कि कोई विचार या अवधारणा । 'निजता' को शब्द न दिया जाए, तो भी वह अस्तित्व और उस अस्तित्व का भान है, उसे 'अपना' का विशेषण दिए बिना भी, वह नित्य, चिरंतन, स्वतः-सिद्ध वास्तविकता (reality) और सत्य है। 

यह भान ही चेतना है, जो अपने-पराये के भेद से रहित स्थिति है। इसी भान के अन्तर्गत 'अस्मद्', विचार की तरह प्रकट और अप्रकट होता रहता है, और एक आभासी (छद्म) प्रतीति का उद्भव होता है। व्यवहार में इसे ही 'व्यक्ति' की तरह, दूसरों से अलग, अपना स्वतंत्र अस्तित्व मान लिया जाता है, जो काल-स्थान-सापेक्ष होने से अवास्तविक (unreal) है। 

इस प्रकार 'अहं' से 'अहंकार' रूपी कृत्रिम सत्ता का उद्भव होने के बाद ही, 'त्वं' के रूप में अपने जैसे किसी दूसरे चेतन को 'तुम' कहकर संबोधित किया जा सकता है। 

अपनी सीमित क्षमता, सामर्थ्य और शक्ति को अनुभव करते हुए अपनी अपेक्षा अधिक क्षमता, सामर्थ्य और शक्ति से युक्त किसी चेतन 'दूसरे' अस्तित्व (ईश्वर या महेश्वर) की कल्पना की जाती है और उसे ही, संसार की समस्त गतिविधियों का एकमात्र नियन्ता तथा संचालनकर्ता मान लिया जाता है। 

तब उसे 'त्वं' पद से संबोधित कर उसकी प्रार्थना की जाती है। 

उस 'त्वं' से कहा जाता है :

तव तत्त्वं न जानाति कीदृशोऽसि महेश्वर ।

यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।।

अस्तित्व और अस्तित्व के भान में अपने और उसके अस्तित्व की परस्पर अभिन्नता और अनन्यता तो असंदिग्ध ही है।

इसी प्रकार 'तत्' अर्थात् 'वह' पद से इंगित और 'अहं' तथा 'त्वं' से भिन्न, तीसरा सर्वनाम 'सः', 'सा' 'तत्' प्रत्यय किसी तीसरे जड या चेतन अस्तित्व के द्योतक के अर्थ में  क्रमशः प्रयुक्त होता है। 

'तत्' की ही तरह 'इदम्' 'इयम्' और 'एतत्' पदों (शब्दों) को 'यह' के अर्थ में क्रमशः पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग रूपों में प्रयोग किया जाता है।

उस महेश्वर को शिव, शक्ति या परब्रह्म की तरह व्यक्त करने के लिए इस प्रकार अपनी भावना के अनुसार ज्ञेय या अज्ञेय मान लिया जाता है। 

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संसार की दृष्टि से, शरीर, मन और आत्मा (स्व / स्वयं) यही तीन मौलिक तत्त्व हैं, और इनका पारस्परिक संबंध ही जीवन अर्थात् 'चेतनता' है।  ये चारों अन्योन्याश्रित एकमेव, अभिन्न, अविभाज्य वास्तविकता हैं ।

इस प्रकार 'चेतनता', जीवन या 'भान' निर्वैयक्तिक तत्व है, किन्तु उसे शरीर-विशेष व्यक्ति से संबद्ध मानकर अपना एक आभासी और स्वतंत्र अस्तित्व, बुद्धि में वास्तविक के स्थान पर स्थापित हो जाता है। बुद्धि वैयक्तिक होती है, जबकि जिस 'चेतनता' में व्यक्त और अव्यक्त होती है, वह 'चेतना' अर्थात् 'जीवन' नितान्त निर्वैयक्तिक है।

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June 06, 2021

किन्तु

चिन्ता का आध्यात्मिक पक्ष :

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चिन्ता के दो पहलुओं पर पिछले दो पोस्ट में लिखा। 

लेकिन चिन्ता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और जिस पर एकाएक ध्यान ही नहीं जा पाता वह तीसरा पहलू है यह प्रश्न :

चिन्ता "किसे" होती है?

जिसे चिन्ता होती है, वह क्या है?

क्या वह शरीर, मन, या बुद्धि है?

चिन्ता की ही तरह क्या शरीर, मन और बुद्धि भी संवेदनशीलता के ही कारण, और संवेदनशीलता में ही नहीं प्रतीत  होते?

फिर वह कौन / क्या है, जो संवेदनशील है?

क्या वह, सिर्फ संवेदनशीलता, बोधगम्यता और बोध-मात्र नहीं है? क्या इस संवेदनशीलता या बोधगम्यता में, ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की तरह, अनुभव (विषय-संवेदन), अनुभवकर्ता (विषयी) और अनुभव किए जानेवाले विषय की तरह तीन भिन्न भिन्न आयाम होते हैं?

अतः यह संवेदनशीलता, जिसमें संसार (और शरीर), तथा मन, बुद्धि, भावनाएँ तथा स्मृति / पहचान आते जाते हैं, क्या कोई व्यक्ति है? क्या यह संवेदनशीलता / बोध और बोधगम्यता स्वयं ही अपना अचल अविकारी (immutable) अधिष्ठान नहीं है?

तो चिन्ता किसे होती है? 

तो चिन्ता क्या मन की एक वृत्ति ही नहीं है?

जैसे अस्मिता अर्थात् "मैं" का विचार, भावना या बुद्धि एक वृत्ति (mode of mind) है!

इस प्रकार चिन्ता जो कि वृत्ति-मात्र (mode of mind) है, और जहाँ से उठती है, जहाँ विलीन होती है, वह अन्तःकरण, हृदय या अन्तर्हृदय ही तो अस्तित्व की आत्मा है।

इस प्रकार अस्तित्व की अर्थात् अपनी और जगत की भी आत्मा यह अन्तर्हृदय ही है, जहाँ अहंकार (ego)  के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता।

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May 13, 2021

अहंकार

संवेदनशीलता 

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(feature@jagran.com) 

पर, आज के नई दुनिया (इन्दौर) में पढा़ :

"अपनी राय से हमें अवश्य अवगत करायें।"

अनायास मन हुआ, तो यह लिखा :

अहंकार को बनाए रखकर संसार की सेवा करना अर्थात् कोई मिशन आदि लेकर कार्य करना, और कंदराओं में जाकर सत्य या भगवान की खोज करना, समान है। 

अनायास प्राप्त हुए आवश्यक कर्तव्य-कर्म को निष्काम भाव से करते रहना ही सदैव रहनेवाली मानसिक शान्ति का एकमात्र मार्ग है। 

तो प्रश्न यह नहीं है कि अहंकार को कैसे दूर अथवा कम किया जा सकता है, या कैसे मिटाया जा सकता है! मजेदार बात यह है कि ऐसा प्रयास भी स्वयं इस अहंकार की ही गतिविधि होता है, और इस प्रकार से अहंकार छिपा रहकर भी लगातार अस्तित्व-मान रहता है। 

असंवेदनशीलता ही अहंकार है। 

संवेदनशीलता होना ही अहंकार का निवारण है। संवेदनशीलता अभ्यास से नहीं, जागरूकता से अस्तित्व में आती है।

यदि संवेदनशीलता है, तो जीवन जैसा भी हमारे समक्ष है, उसे अनायास ही यथोचित प्रत्युत्तर दिया जाता है। 

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