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September 01, 2024

Social Ethics.

Question प्रश्न 106

What Is Social Ethics?

Dharma or Religion / Sect? 

सामाजिक नैतिकता क्या है?

धर्म या रिलीजन/ पंथ/मजहब/संप्रदाय/समुदाय

Answer  उत्तर :

जैसा कि सरलता से समझा जा सकता है -

सामाजिक नैतिकता 

प्रत्येक ही प्राणी की वह सामूहिक चेतना;  (Collective consciousness)

होती है जिससे प्रेरित होकर वह अपने सामूहिक हितों के लिए अपना सहज नैसर्गिक व्यवहार करता है और अपने समूह के हितों को सर्वोपरि महत्व देता है। उदाहरण के लिए चींटी जैसे क्षुद्र प्राणी से लेकर हाथी जैसे बड़े और  विशालकाय प्राणी तक इसी प्रेरणा के अनुसार व्यवहार करते हैं, जो उनमें जन्मजात ही विद्यमान होती है और यही उनका :

स्वाभाविक धर्म  / प्रकृति / प्रवृत्ति  - (Natural Instinct 

होता है, और इससे भी अधिक शक्तिशाली एक प्रवृत्ति और होती है जो है आत्मरक्षा की प्रवृत्ति, जो उसमें भूख, प्यास और भय के रूप में अभिव्यक्त होती है। इसलिए भोजन न मिलने पर भूख से व्याकुल कोई प्राणी कभी कभी अपनी ही संतान को भी मारकर खा जाता है।

इसी अर्थ को व्यक्त करने के लिए कहा जाता है :

अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च।।

यह तो हुआ पशु-धर्म।

पशुओं में ही एक विशिष्ट कोटि मनुष्यों की है, जो समूह में रहते हैं और अपने अपने समूह विशेष की सामाजिक नैतिकता से बँधे होते हैं। इनके द्वारा विभिन्न वस्तुओं को ध्वन्यात्मक अर्थ दिए जाने से प्राकृत भाषाओं का उद्भव हुआ। मनुष्यों की पुनः तीन कोटियाँ हैं। पहली जो वैसे तो शारीरिक संरचना की दृष्टि से मनुष्यों जैसे जान पड़ते हैं किन्तु सामाजिक और सामूहिक दृष्टि से वे मनुष्यों से बहुत भिन्न हैं। एक रोचक अनुमान यह भी है कि सांख्य दर्शन के संस्थापक आचार्य कपिल का संबंध इसी वर्ग से रहा होगा। "कबीला" शब्द इसी कपिल का  cognate / अपभ्रंश / सजात / सज्ञात हो सकता है।

अब पुनः हम मनुष्यों और मनुष्य धर्म की बात पर आएँ। कबीलों की उत्पत्ति के बाद धर्म के वैदिक और अवैदिक परम्परागत प्रकार अस्तित्व में आए। दोनों ऋषि-प्रणीत ही थे। जैसे भृगु, अगस्त्य, गर्ग और जाबाल / जाबालि ऋषियों द्वारा प्रणीत शैव परम्परा और वेदव्यास प्रणीत शुद्धतः वैदिक आर्य परम्परा। भृगु, अगस्त्य, गर्ग (गार्ग्य), अङ्गिरा और जाबाल के सजात / सज्ञात  / cognate / अपभ्रंश ही क्रमशः :

Briggit,  Augustus, George,  Angel  Gabriel  हैं, यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

तात्पर्य यह कि इन्हीं ऋषियों ने :

सामाजिक नैतिकता 

के इन आधारभूत तत्वों को परिभाषित किया जिसे कि  धर्म  कहा गया। इसी धर्म को मनुष्य मात्र के लिए :

महर्षि पतञ्जलि  ने पाँच सार्वभौम महाव्रतों के रूप में "यम" की संज्ञा प्रदान की। 

मनुष्य :- मनुप्रणीत वैदिक धर्म को पुनः मनुष्यमात्र ने अपनी अपनी पात्रता के अनुसार "यति-धर्म" का रूप दिया, जिसमें पाँच महाव्रत :

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह 

पाँच आधारभूत और अपरिहार्य स्तम्भ हैं। जिनका उल्लंघन ही अधर्म या विधर्म है।

इनका पालन करना सभी आश्रमों और वर्णों के मनुष्यों के लिए आवश्यक है।

अहिंसा का अर्थ है प्राणिमात्र से अवैर।

हिंसा का अर्थ है : द्वेष या भय के कारण किसी प्राणी को कष्ट देना। क्योंकि हिंसा को पहचानना सरल है, इसलिए हिंसा के निषेध को इंगित करने के लिए "अहिंसा" शब्द का प्रयोग किया गया।  

सत्य का अर्थ इसी प्रकार असत्य के निषेध का सूचक है क्योंकि "सत्य" को सीधे जानना सिद्ध करना अपेक्षाकृत अत्यन्त ही कठिन कार्य है जबकि असत्य की पहचान करना सरल है। हर मनुष्य अपनी अंतःप्रज्ञा से स्वयं ही जानता है कि वह जो कह या सुन रहा है वह सत्य है या नहीं, और स्वयं ही मन, वाणी और कर्म से असत्य-युक्त आचरण करने से बच सकता है।

अस्तेय का तात्पर्य है अ-स्तेय - अर्थात् जिस पर अपना अधिकार नहीं है उस पर आधिपत्य कर लेना, जो चोरी छिपे या धृष्टता और छल-कपट से बलप्रयोग द्वारा किया जाता है। अंग्रेजी भाषा का : "steal"  इसी से व्युत्पन्न है। इस पर यहाँ और विस्तार से नहीं।

ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म जैसी चर्या, आचार विचार और व्यवहार। "ब्रह्म" और "सर्व" समानार्थी शब्द हैं -

अयमात्मा ब्रह्म।।

तथा, 

सर्वं खल्विदं ब्रह्म।।

से स्पष्ट है कि "ब्रह्म" संज्ञा कम और सर्वनाम अधिक है। वैसे भी 

"तत्त्वमसि"

महावाक्य में "तत्" का प्रयोग "ब्रह्म" के ही अर्थ में है और व्याकरण की दृष्टि से भी "तत्" सर्वनाम पद है।

इन पाँच महाव्रतों में अंतिम है - अपरिग्रह 

जिसका अर्थ हुआ अनावश्यक संग्रह का परित्याग और जिसे आवश्यकता हो उसे उस वस्तु का दान कर देना।

ये सभी पाँच महाव्रत यम कहे जाते हैं। और इन्हीं पाँच को धर्मस्तम्भ / धर्मस्कन्ध भी कहा जाता है।

इस विवेचना से यह समझना सरल होगा कि धर्म शब्द मनुष्यमात्र की 

सामूहिक सामाजिक नैतिकता

Human collective social and ethical consciousness.

का ही पर्याय है न कि मजहब, संप्रदाय, पन्थ या रिलीजन। और जो भी धर्म से भिन्न या विपरीत है वह और कुछ भी क्यों न हो,  धर्म / virtue, कदापि नहीं हो सकता।

एक रोचक सन्दर्भ यह भी हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा का human शब्द संस्कृत भाषा के 

मनुः / manuH  का ही अपभ्रंश है! 

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April 16, 2019

हिन्दुत्व-समग्र

बॉलीवुड से -
"क्या हिन्दू हिंसक होते हैं?"
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बॉलीवुड की एक नर्त्तकी ने अभी दो-तीन दिन पहले कहा था :
"हिन्दू हिंसक होते हैं ।"
अभी-अभी राजनीति में उसने प्रवेश किया हैं ।
मोदी-लहर हो या मोदी-विरोध की लहर, क्या पता कौन सी काम आ जाए ! 
एक बुद्ध-कथा याद आती है ।
कोई गणिका एक युवा भिक्षु पर आसक्त थी ।
वह बार-बार उसे चुनौती देती थी कि अगर उसमें पौरुष है तो वह इसे सिद्ध करे । संकेत स्पष्ट था कि वह उसके प्रेमजाल में फँसकर इसे सिद्ध करे । तात्पर्य यह भी था कि गणिका को उससे वैसा ही ’प्रेम’ था जिसका उल्लेख और प्रदर्शन बॉलीवुड की फ़िल्मों में किया जाता है ।
और इसमें शायद कोई भी ’चैनॆल’ पीछे नहीं है, वो ’चैनॆल’ भी जो ’हिन्दुत्व’ की संस्कृति और परंपरा के स्वघोषित संरक्षक बन-बैठे हैं ।
कथा कहती है, उस नर्त्तकी से भिक्षु ने कहा :
"उचित समय आने पर मैं इसका उत्तर अवश्य दूँगा, प्रतीक्षा करो ।"
वर्षों बीत गए ।
वह गणिका अब युवा न रही, केशों में सफ़ेदी झाँकने लगी, दूसरे भी ऐसे लक्षण प्रकट होने लगे जिसे छिपाना उसके लिए संभव न रहा । तब उन सभी ने, जो उसके रूप और यौवन के आकर्षण से मोहित होकर उससे प्रेम-याचना करते थे, उसे छोड़ दिया और उसे भूल ही गए । तब अत्यन्त विपन्न, निर्धनता की अवस्था में एक बार पुनः उस भिक्षु से उसका सामना होने पर उसने देखा कि वह भिक्षु भी बहुत वृद्ध हो चुका था ।
तब भिक्षु ने उससे पूछा : "क्या तुम्हें याद है कि तुम्हें मैंने एक वचन दिया था?"
"नहीं तो!"
"कुछ समय पहले तुम मेरे पौरुष पर शंका प्रकट किया करती थी । तब तुम बस रूप-यौवन से संपन्न स्त्री ही थी, और मैं युवा था। तब तुमसे मैंने कहा था कि उचित समय आने पर मैं इसका उत्तर अवश्य दूँगा ।
सुनो ! तब मैं युवा था और उस समय वासना में न बह जाना ही मेरे लिए, मेरे पौरुष के समक्ष अत्यन्त प्रबल चुनौती थी, और इसका प्रत्युत्तर मैंने मन पर संयम रखकर सफलता से दिया । अब मैं वृद्ध हो रहा हूँ । अब वह चुनौती भी न रही । यही मेरा पौरुष है । यदि मैं तुम्हारे या किसी दूसरी स्त्री से आकर्षित होकर संयम खो देता तो इस परीक्षा में सफल कैसे हो सकता था ?"
बॉलीवुड या अन्य तथाकथित ’कला-क्षेत्र’ में ’सफल’ या ’विफल’ हो जाने के बाद कुछ कलाकार / बुद्धिजीवी / खिलाड़ी राजनीति और पत्रकारिता में नई संभावनाएँ तलाशने लगते हैं ।
तब तक उन्हें इतनी ’प्रसिद्धि’ मिल चुकी होती है जिसे भुनाकर वे नए मंच पर अवतरित हो सकें ।
फिर वे ’हिन्दू’ और ’हिन्दुत्व’ के पक्ष (या विरोध) में खड़े होकर समाज के विभिन्न वर्गों को आकर्षित करने की क़ोशिश करते हैं । (चित भी मेरी पट भी मेरी अंटी मेरे बाप की !)
यहाँ उनका गणित कभी तो काम आ जाता है, लेकिन कभी-कभी फ़ेल भी हो जाता है ।
पहला सवाल यह है कि ’हिन्दू’ या ’हिन्दुत्व’ क्या है? -इस बारे में क्या ऐसा कोई सुनिश्चित उत्तर दिया जा सकता है, जिस पर सब राज़ी हो सकें?
जबकि ’हिन्दू’ या ’हिन्दुत्व’ क्या नहीं है? - इस बारे में शायद ऐसा स्पष्ट उत्तर अवश्य ही दिया जा सकता है ।
फ़िर भी ’हिन्दू’ या ’हिन्दुत्व’, राजनीति, संस्कृति और सामाजिक धर्म और 'राष्ट्र' की कसौटी पर इतना व्यापक अर्थ रखता है कि यही ’हिन्दू’ या ’हिन्दुत्व’ की ताक़त और कमज़ोरी भी है ।
और इसी को पेशेवर राजनीति करनेवाले, ’हिन्दू’ या ’हिन्दुत्व’ के पक्षधर और विरोधी भी अपने औज़ार की तरह इस्तेमाल करते हैं ।
"क्या हिन्दू हिंसक होते हैं ?" -यह प्रश्न इन्हीं पेशेवर राजनीतिज्ञों के लिए एक ऐसा खिलौना है जिससे वे अनंत काल तक (या उम्र भर) खेलते रह सकते हैं ।
सवाल यहाँ यह भी है कि ’हिन्दू’ या ’हिन्दुत्व’ को समग्रतः समझने के लिए :
'हिन्दू / हिंदुत्व क्या है ?
और
'हिन्दू / हिंदुत्व क्या नहीं है?
इन दोनों प्रश्नों पर साथ-साथ सोचा जाना क्या बहुत ज़रूरी नहीं है ?
इसके बावज़ूद, ऐसी समझ अंततः बस आपकी अपनी ही होगी।
ज़रूरी नहीं कि जिससे आप दूसरों को भी राज़ी कर ही सकें ।
इसे दुर्भाग्य कहें या लापरवाही यह हमें ही तय करना है ।  
चुनाव और राजनीति का चोली-दामन का साथ तो होता ही है!
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