Showing posts with label विचार-विधान. Show all posts
Showing posts with label विचार-विधान. Show all posts

July 02, 2021

सोचना क्या है!?

एक और पहलू 
-----------©--------
यदि तुम किसी (के) बारे में नहीं सोचते, तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन तुम्हारे बारे में (क्या) सोचता है! 
पर सवाल यह भी नहीं है। 
सवाल यह है कि तुम किसी (के) बारे में क्यों सोचते हो! 
क्या इसीलिए नहीं कि किसी और या दूसरे से तुम्हें कोई अपेक्षा, डर है, -कोई कौतूहल, आकर्षण या आसक्ति है? 
आसक्ति अर्थात् मोह और अज्ञान से पैदा हुई भ्रान्ति। 
मोह अर्थात् अनित्य और नित्य में भेद न कर पाना।
अज्ञान अर्थात् पता नहीं है, यह भी न पता होना। 
मोह और अज्ञान परस्पर आश्रित होते हैं।
शायद तुम्हें दूसरे की आवश्यकता होती हो।
पर सवाल यह भी है कि तुम आवश्यकता का भी विचार ही क्यों करते हो?
तुम अतीत या भविष्य का विचार ही क्यों करते हो!
और, सवाल यह भी है कि क्या वर्तमान के बारे में विचार किया भी जा सकता है?
क्या विचार (के) आते ही तुम इस वर्तमान से कटकर तत्काल ही किसी काल्पनिक समय (जो अतीत या भविष्य होता है) में नहीं चले जाते?
किन्तु अपने बारे में सोचने पर भी क्या ऐसा ही नहीं होता?
सवाल यह भी है कि क्या वाकई तुम सोचते हो, या विचार ही आते-जाते हैं और तुम्हें लगता है कि तुम सोचते हो!
क्या सोच-विचार से पृथक् उनका कोई ऐसा नियंत्रणकर्ता होता भी है, जिसे तुम अपने-आप या स्वयं की तरह जान सको?
***

July 13, 2019

Thought-Process

विचार-विधान / विचार-प्रवाह
--
अभिनेत्री पायल रोहतगी अपने विडिओ में 'Thought-Process' शब्द का प्रयोग अक्सर करती हैं।
ज़ाहिर है कि इस दौरान 'Thought-Process' का सहारा और इस्तेमाल तब भी ज़रूरी होता है, जब कोई  बिना इस शब्द को बोले भी अपनी बात कहता है ।
जिन विषयों पर वे अपने विचार व्यक्त करती हैं उनमें से अधिकाँश में मेरी दिलचस्पी नहीं है क्योंकि फिल्मों या फ़िल्म-टीवी आदि से मेरा संबंध बरसों से टूट चुका है। फ़िल्म-टीवी आदि जिन मुद्दों को अपनी गतिविधियों में महत्व देते हैं उनमें मेरी दिलचस्पी उतनी ही होती है जितनी सुबह के अख़बार में हो सकती है।
अख़बार में जैसे केवल हेड-लाइन्स, 'उठावना' / शोक-समाचार और editorials ही देखता हूँ, और लगभग सभी विज्ञापनों को नज़र-अंदाज़ कर देता हूँ मेरा वैसा ही व्यवहार नेट पर देखे जानेवाले न्यूज़-चैनल्स के साथ भी होता है। मेरी रुचि ब्लॉग लिखने / पढ़ने में, debates देखने-सुनने में अधिक है। ऐसा करना शायद मेरे लिए मेरे  मनोरंजन का ज़रिया भी हो सकता है। यद्यपि स्वयं मुझे किसी debate में भाग लेना पसंद नहीं।         
हर कोई वैसे तो केवल अपनी रुचि, ज़रूरत और काम की वेब-साइट्स गम्भीरतापूर्वक देखता है लेकिन कभी-कभी केवल कौतूहलवश भी ऐसी साइट्स चेक कर लेता है जहाँ उसे सीखने या जानने के लिए कुछ नया मिलने की संभावना दिखाई दे जाती है। इसीलिए कभी-कभी कुछ अलग भी देख लेता हूँ।
यही विचार-प्रक्रिया (Thought-Process) प्रायः आदतन हर किसी की होती है।
लेकिन इससे अधिक रोचक यह है कि हर किसी की विचार-प्रक्रिया (Thought-Process) किन्हीं सुनिश्चित विश्वासों, मान्यताओं, प्रयोजनों और आग्रहों की लीक से बँधे होते है। वे विश्वास, मान्यताएँ, आग्रह जिन पर वह और समाज भी 'धर्म' शब्द की मुहर लगाता है, 'धर्म' शब्द का आवरण चढ़ाता या लेबल लगाता है।    
यह भी कुछ कम आश्चर्यजनक नहीं है।
और इसी के चलते जहाँ लब्धप्रतिष्ठ या लुब्ध-प्रतिष्ठा बुद्धिजीवी / राजनीतिक पत्रकार अनेक विषयों पर न केवल भिन्न-भिन्न विषयों पर भिन्न-भिन्न विचार-विधानों, विचार-प्रवाहों और विचार-प्रक्रियाओं की एक-दूसरे से बहुत अलग अलग नदियों में नौकायन (navigation) करते हैं, वहीं उनके व्यक्तित्व की जटिलता, विषमता, रूढ़ता और दुरूहता स्वयं उन्हें ही, इस प्रकार दूसरों से अधिक भ्रमित किए रखती है ।
विचार-विधान (thought-structure) अपनी अपनी जानकारी, भाषा, और तर्कबुद्धि की मर्यादा से तय होता है, तो विचार-प्रवाह की दिशा अपने हितों, आशंकाओं, आकांक्षाओं और आशा-निराशाओं से तय होती है।
विचार-प्रवाह की नदी इन्हीं दो तटों के बीच बहती है जिसकी धारा में अनेक द्वीप ही नहीं अनेक दलदल या भँवर भी होते हैं। और एक ही नदी में परस्पर विरोधी, समानान्तर या विसंगत अनेक प्रवाह भी होते हैं।
जब तक दूसरों से किसी विषय पर विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है तब तक वस्तुतः कोई संवाद घटित ही नहीं हो पाता। और हमें कभी ख़ुशी कभी ग़म वाली स्थिति का सामना करना पड़ता है।  कभी तसल्ली या आशा-निराशा भी हाथ लगती है, कभी-कभी मन उचट या ऊब जाता है लेकिन नौकायन (navigation) का मोह हमें अपनी पकड़ से छोड़ता नहीं।
--