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June 05, 2022

विवेक का फल

विवेकवान और अविवेकी का वर्णन करने के उपरांत यमराज नचिकेता से उनकी गति के बारे में कहते हैं :

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः।।

सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्।।९।।

विज्ञान-सारथिः यः तु मनःप्रग्रहवान् नरः।। 

सो अध्वनः पारं आप्नोति तत् विष्णोः परमं पदम्।।  

जिस मनुष्य का बुद्धिरूपी सारथी, मन-रूपी वल्गा से (इन्द्रियों रूपी अश्वों को नियंत्रण में रखता हुआ) युक्त होता है, वह संसार (और जन्म-मृत्यु) से पार हो जाता है, और उस मार्ग को पा लेता है, जिससे भगवान् विष्णु के परम पद की प्राप्ति कर लेता है।

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः।।१०।।

इन्द्रियेभ्यः पराः हि अर्थाः अर्थेभ्यः च परं मनः।  मनसः तु परा बुद्धिः बुद्धेः आत्मा परं महान्।।

इन्द्रियों से भी विलक्षण और सूक्ष्म उनके विषय हैं, जो कि पञ्च महाभूत, सूक्ष्म भूत, तन्मात्र, और प्राण आदि हैं। उन भिन्न भिन्न सूक्ष्म विषयों से भी विलक्षण और उच्चतर, महान होता है - मन, क्योंकि समस्त विषय जड होते हैं, जबकि मन उनकी तुलना में चेतन होता है। और चूँकि मन को भी बुद्धि से ही जाना जाता है, अतः बुद्धि तो मन से भी विलक्षण और महान है। और बुद्धि के स्वामी (आत्मा) के ही चेतन-प्रकाश से आलोकित होने पर ही बुद्धि का सारा कार्य हो सकता है, अतः आत्मा तो बुद्धि से भी अधिक बलवान् और महान है। तात्पर्य यह कि बुद्धि 'मेरी है', कहनेवाला उसका स्वामी, आत्मा उससे भी बढ़कर महान है।

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः।।

पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः।।११।।

महतः परं अव्यक्तं अव्यक्तात् पुरुषः परम्। पुरुषात् न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः।।  

महत् के प्रसंग विशेष के अनुसार अनेक भिन्न भिन्न अर्थ होते हैं, जैसे कि प्रकृति, बुद्धि, लोक, अव्यक्त, काल, -आदि।

आत्मा तो सर्वाधिक महान है, किन्तु आत्मा को पुनः 'अहंकार' या 'अहं' के रूप में भी जाना जा सकता है। 'अहं' रूपी आत्मा ही नित्य, शाश्वत, चिरंतन और सनातन है, जबकि अहंकार रूपी आत्मा अनित्य, किन्तु व्यावहारिक सत्य। अहंकार रूपी तत्व को ही भूत कहा जाता है, जो पुनः जड या चेतन, चर या अचर होता है। व्यावहारिक रूप से प्रतीयमान जगत् को व्यक्त कहा जाता है, जो सतत परिवर्तित होता रहता है। परिवर्तन के आधार पर काल को भी परिवर्तनशील मान लिया जाता है और काल के साथ साथ व्यक्त भी। काल का अस्तित्व काल्पनिक ही है, न कि किसी इन्द्रिय-बुद्धि ग्राह्य भौतिक वस्तु जैसा ठोस। निष्कर्ष और अनुमान पर आधारित इस काल को परिवर्तन के सन्दर्भ में चल तथा अपरिवर्तन के सन्दर्भ में अचल की तरह जाना जाता है। इस प्रकार काल, वर्तमान के अर्थ में नित्य है, किन्तु अतीत और भविष्य के सन्दर्भ में अनित्य।

इसी आधार पर :

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।। 

अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।२८।।

(गीता, अध्याय २)

में काल को और काल के सन्दर्भ में भूत-समष्टि को भी व्यक्त तथा अव्यक्त कहा जाता है।

काल को महत् भी कहा जाता है, जैसा कि गीता के अध्याय ४ में कहा गया है :

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।। 

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।।

अतः महत् से भी महान अव्यक्त और अव्यक्त से भी महान है पुरुष अर्थात् 'चेतन'। प्रकृति और अव्यक्त, महत् होते हुए भी जड हैं जिनका प्रमाण वे स्वयं नहीं, बल्कि 'चेतन' पुरुष ही है, जबकि यह चेतन / पुरुष स्वयं ही स्वयं का प्रमाण है। इस चेतन पुरुष से महान और या अन्य कुछ नहीं है। इसे ही आत्मा, अहं, ब्रह्म आदि कहा जाता है। 

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May 24, 2022

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं

आत्मा के स्वरूप का निरूपण

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नचिकेता को यमराज द्वारा इस प्रकार से ॐ के आलम्बन का तरीका और महत्व बतलाए जाने के पश्चात् वे उससे आत्मा के तत्त्व का वर्णन करते हैं :

न जायते म्रियते वा विपश्चि-

न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।। 

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।१८।।

न जायते म्रियते वा विपश्चित् न अयं कुतश्चित् न बभूव कश्चित्। अजः नित्यः शाश्वतः अयं पुराणः न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

यह आत्मा न तो उत्पन्न होताहै, न ही इसकी मृत्यु होती है। न ही किसी अन्य स्रोत से इसका आगमन होता है, और न यह कुछ से अन्य कुछ होता है। जन्म से रहित, नित्य, सनातन, शाश्वत यह पुरातन से भी पुरातन है, और शरीर के मारे अर्थात् नष्ट हो जाने  पर भी इसका नाश अर्थात् मृत्यु नहीं होती।

गीता अध्याय २ के निम्न श्लोक में इसी तात्पर्य को इंगित किया गया है :

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वाऽभविता वा न भूयः।।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।२०।।

"भूत्वा भविता" का तात्पर्य है : होकर फिर न-हो जानेवाला, जैसे कि रात्रि या दिवस, मनुष्य आदि चराचर वस्तुएँ 'होने' के बाद 'नहीं' हो जाती हैं, क्योंकि समस्त व्यक्त अस्तित्व ही आवा-गमन के इस चक्र में विवशतापूर्वक परिभ्रमण करता रहता है।

आत्मा इस चक्र से मुक्त है।

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हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्।।

उभौ तौ न विजानीतो नाय्ँहन्ति न हन्यते।।१९।।

हन्ता चेत् मन्यते हन्तुम् हतः चेत् मन्यते कथम्। उभौ तौ न विजानीतः न अयं हन्ति न हन्यते।।

हत्या करनेवाला यदि सोचता है कि वह आत्मा का वध करेगा, और जिसकी हत्या की जाती है, यदि वह सोचता है कि आत्मा की मृत्यु हो जाएगी, तो दोनों ही इस सत्य को नहीं जानते कि आत्मा न तो मिलता है, न आत्मा को मारा जा सकता है। 

गीता अध्याय २ में ही पुनः इसी भाव को निम्न श्लोक से व्यक्त किया गया है :

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।।

उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।१९।।

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अणोरणीयान्महतोमहीया-

नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।।

तमक्रतुः पश्यति वीतशोको

धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः।।२०।।

अणोः अणीयान् महतः महीयान् आत्मा अस्य जन्तोः निहितः गुहायाम्। तं अक्रतुः पश्यति वीतशोकः धातु-प्रसादात् महिमानं आत्मनः।।

अणु जैसी सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और विशाल से भी विशाल, यह आत्मा इस जन्म-मृत्यु से बद्ध शरीर से अत्यन्त गहराई से संबद्ध है। उस आत्मा को कोई निष्काम, वीतशोक पुरुष ही आत्मा के तेज के प्रसाद से देख पाता है।

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आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः।।

कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति।।२१।।

आसीनः दूरं व्रजति शयानः याति सर्वतः। कः तं मद-अमदं देवं मत्-अन्यः ज्ञातुम् अर्हति।।

यह आत्मा अचल अटल होते हुए भी दूर से दूर तक भी है। उस मुझ आत्म-स्वरूप अभिमानशून्य आत्मा को जाननेवाला मुझसे अन्य और कौन है?

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अशरीर्ँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्।।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति।।२२।।

अशरीरं शरीरेषु अनवस्थेषु अवस्थितम्। महान्तं विभुं आत्मानं मत्वा धीरः न शोचति।। 

समस्त शरीरों में अशरीरी, समस्त अवस्था-भेदों में अवस्थाओं (जागृत-स्वप्न-सुषुप्ति) आदि के भेदों से रहित, उस महान् विभु आत्मा को विद्यमान जानकर धीर पुरुष शोक से रहित हो जाता है।

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नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो

न मेधया न बहुना श्रुतेन।। 

यमेवैष वृणुते तेन लभ्य-

स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम्।।२३।।

न अयं आत्मा प्रवचनेन लभ्यः न मेधया न बहुना श्रुतेन। यं एव एषः वृणुते तेन लभ्यः तस्य एषः आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।।

इस आत्मा को व्याख्या आदि सुनकर नहीं पाया जा सकता है, न अत्यन्त मेधावी होने से, और न उसके संबंध में अनेक प्रकार की जानकारियों को सुनकर ही। मनुष्य आत्मा का जिस किसी भी प्रकार से वरण करता है, उसका वह आत्मा उसके लिए उसी रूप में अपने स्वरूप को प्रकट करता है।

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नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।। 

नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्।।२४।।

न अविरतः दुश्चरितात् न अशान्तः न असमाहितः।  न अशान्तमनसः वा अपि प्रज्ञानेन एनम् आप्नुयात्।। 

जो कुटिल आचरण से विरत नहीं है, जिसका चित्त अशान्त है, जिसका मन अशान्त है और जिसे समाधान / सन्तोष नहीं है उसे इस आत्मा की प्राप्ति नहीं होती। केवल वही इसकी प्राप्ति  करता है जो इसे प्रज्ञान अर्थात् -प्रज्ञानं ब्रह्म- के माध्यम से इसे जानने का यत्न करता है।

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यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः।। 

मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र यः।।२५।।

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवतः ओदनः।  मृत्युः यस्य उपसेचनं कः इत्था वेद यत्र यः।। 

जिस आत्मा के लिए ब्राह्मण और क्षत्रिय मुख्य अन्न हैं, जिन्हें वह आत्मा अपना आहार बनाता है और जैसे कि अन्न को शाक आदि के साथ खाया जाता है, उसी प्रकार से स्वयं मृत्यु अर्थात् यमराज जिसके लिए शाक की तरह हैं, उस आत्मा को कौन उस प्रकार से जान सकता है जैसा कि आत्मा स्वरूपतः है? 

आत्मा से ही जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहार आदि होते हैं, और इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि द्विज तथा यम जैसे देवता भी इसी आत्मा की अभिव्यक्ति है, जिन्हें वह आत्मा पुनः अपने में आत्मसात कर लेता है। 

"रुद्रः संहार्यते प्रजाः"

(शिव-अथर्वशीर्ष)

इसी सत्य का द्योतक है।

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