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February 05, 2022

जब सब कुछ है!

कविता 05-01-2022

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जब सब कुछ होगा, 

तो सुख भी तो होगा ही! 

जब सब कुछ होगा, 

तो दुःख भी तो होगा ही! 

जब सब कुछ होगा, 

तो सुख-दुःख भी होगा ही! 

जब सुख-दुःख होगा,

तो बेचैनी भी होगी ही!

फिर क्यों यह मन कहता है, 

यह बेचैनी क्यों होती है! 

फिर क्यों यह मन सोचता है, 

यह बेचैनी क्यों होती है! 

यह सुख किसको होता है?

यह दुःख किसको होता है?

यह सुख-दुःख किसको होता है? 

यह सुख-दुःख जिसको होता है, 

जब तक वह है तब तक तो,

सुख-दुःख, बेचैनी, होगी ही!

जब तक ऐसा, कोई जो भी है,

उसको बेचैनी होगी ही! 

फिर वह कोई भी, जो भी है, 

कैसे बेचैनी दूर करे? 

क्या वह खुद ही फिर मिट जाए, 

क्या तब ही उसको चैन मिले! 

लेकिन यदि वह ही मिट जाए,

तो फिर कैसे 'वह' रह पाये!

कैसे 'वह' तब फिर यह जाने,

बेचैनी फिर कैसे जाये!

***


तो सवाल यह है :

जो मन सुखी-दुःखी होता है,

जो "मैं" सुखी-दुःखी होता है, 

जो मन "मैं" कहता है,

जो "मैं" मन को जानता है,

क्या "मैं" ही, 'वह' मन है? 

क्या मन ही, 'वह' मैं है? 

फिर किसको कौन मिटाता है,

कौन बचा रह जाता है?

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March 12, 2015

'समय', 'ऊब' और 'अकेलापन'

'समय', 'ऊब' और 'अकेलापन'
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© Vinay Kumar Vaidya,
(vinayvaidya111@gmail.com)
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मुझे आश्चर्य होता है कि शायद प्रत्येक ही मनुष्य इन तीन शब्दों का इस्तेमाल अनेक बार और लगभग रोज़ ही करता है, और फिर भी इन शब्दों का  उसके  लिए क्या तात्पर्य है, इस पर गंभीरता से सोचता हो. अगर आप बीमार हैं तो आपको यह  समझने में अधिक समय नहीं लगता कि अब  आपको  क्या करना चाहिए . शायद आप इसे छोटी-मोटी बात समझकर छोटे-मोटे तरीके से इसका उपाय  कर  लें, या अधिक कष्ट अनुभव होने पर डॉक्टर और हॉस्पिटल जाने के बारे में सोचें. इसका सीधा कारण यह है कि आप बीमारी से होनेवाली तकलीफ़ और  असुविधा  को 'महसूस' करते हैं. 'समय', 'ऊब', और 'अकेलापन' ऐसी स्थितियाँ होती हैं, जिन्हें हम उस तरह महसूस नहीं करते जैसे कि बीमारी से होनेवाली तकलीफ़ को सीधे महसूस किया करते हैं.  बीमार होने से  होनेवाली तकलीफ़ पहले महसूस की जाती है और फ़िर उसके अस्तित्व के बारे में विचार  या निर्णय होता है. इस दृष्टि  से जिसे 'समय', 'ऊब', और 'अकेलापन' कहा जाता है, उसके 'महसूस' किए जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि वे 'विचार-जनित निष्कर्ष' होते हैं, न कि 'अनुभवगम्य तथ्य'. और 'विचार जनित निष्कर्ष' / 'विचार-जनित प्रश्न' का कोई वास्तविक और प्रत्यक्ष 'हल' या  'समाधान' कैसे  हो सकता है? हाँ, यह हो सकता है कि कोई ऐसा भाषागत उपाय हो जिससे उस  प्रश्न को अप्रासंगिक और निष्क्रिय बना दिया जाए. और  प्रायः ऐसा ही होता भी है.
'समय' की समस्या के भी दो प्रकार हैं, एक तो 'समायोजन' की, जिसे 'परमाणु-घड़ी' से लेकर यांत्रिक घड़ी या 'सौर-घड़ी' तक से साधा जाता है, और वह निश्चित ही 'समय' की एक ऐसी 'शुद्धतः भौतिक' सत्ता का 'वैज्ञानिक प्रमाण' भी है, जिसे 'विचार' की सहायता से अनुमानित किया  जा सकता है और उन अनुमानों से ऐसे 'निष्कर्षों' को  पाया जा सकता है, जिन्हें 'प्रयोग', 'अवलोकन' और पुनरावृत्ति द्वारा 'नियमों' के रूप  में उनकी पुष्टि भी गणितीय सटीकता के साथ 'तय' की जा सकती है. और निश्चित ही इससे जीवन अत्यंत सुचारू और  व्यवस्थित भी किया जा सकता है (वैसे हम शायद ही कभी इस बारे में  सोचते हों).
'समय' का दूसरा प्रकार वह है जिसमें 'समय' की गति उपरोक्त अनुमानों से तय की गई हमारी अपेक्षा से धीमी या तेज हो जाती है. जैसे बस या ट्रेन के इंतज़ार के समय, या किसी ज़रूरत के पूरे होने के  इंतज़ार में. वह ज़रूरत 'सुख' का होना, या 'दुःख' / 'चिंता' / 'भय' का दूर होना आदि भिन्न भिन्न रूपों में हो सकता है.
कभी कभी 'समय' कम उपलब्ध होता है, कभी इतना अधिक कि हमारा मन स्थिति से सामंजस्य नहीं कर पाता. जैसे नल में पानी का बहुत तेज़ी से या बहुत धीरे धीरे आना. ऐसे कितने ही उदाहरण हर कोई दिखला सकता है.
यह ठीक है कि 'समय' उसकी अपनी 'वैश्विक-घड़ी' के अनुसार चलता है, लेकिन 'बीतता' हमारी अपनी अपनी वैयक्तिक घड़ी के कम या अधिक अनुकूल या प्रतिकूल है.
'समय', 'ऊब' और 'अकेलापन' इन तीनों की एक रोचक सच्चाई यह भी है कि जब हम सो जाते हैं, उस समय हमारे लिए इनमें से कोई भी समस्या नहीं होता. शायद इसीलिए मनुष्य किसी 'माध्यम' की सहायता से 'समय', 'ऊब' और 'अकेलापन' से छुटकारा पाने की कोशिश करता है, और उसका 'आदी' भी  हो जाता है. इस 'माध्यम' को किसी समाज में स्वीकृति / सम्मान प्राप्त हो सकता है, किसी में ऐसा नहीं भी हो सकता. तम्बाकू, शराब सामान्यतः अनुचित समझे जाते हैं, किन्तु उन्हें भी गौरव प्रदान किया जाता है, उनमें भी 'शान' महसूस की जाती है. दूसरे 'ड्रग्स' जिन्हें डॉक्टर की सलाह से लिया जाता है, भी ऐसे 'माध्यम' हो  सकते हैं, जीवन में कोई 'लक्ष्य' तय  कर लेना, महान और सफल होना भी ऐसी 'प्रेरणा' हो सकता है जो जीवन को 'सार्थकता' देता प्रतीत होता हो, 'आध्यात्म' और 'धर्म' कोई राजनीतिक विचारधारा, कोई कल्पित या स्मृति में आरोपित 'ईश्वर' भी हमारे लिए ऐसे माध्यम का कार्य  बखूबी  करते  हैं, क्योंकि यह सबसे सरल है. किसी 'विचार' / 'सिद्धान्त' के अनुयायी होना 'आत्म-गौरव' प्रदान करता है, भले ही कुछ समय बाद हम खुद ही उस 'विचार'/ 'सिद्धान्त' से ऊब जाएँ ! कभी कभी तो उसके बाद भी वह 'प्रतिष्ठा' का प्रश्न बन जाने से मनुष्य न चाहते हुए भी उसे  नहीं छोड़ पाता.
दूसरी ओर शरीर कुछ कार्य तो किसी सीमा तक सरलता से और स्वाभाविक रूप  से कर सकता है, किन्तु उस सीमा के बाद थक जाने पर या रुचि / बाध्यता न होने पर उसी कार्य  से ऊब होने  लगती है. यह ऊब भी स्वाभाविक ही है, किन्तु जीवन-यापन के लिए, आजीविका के लिए मनुष्य इसे जीवन कि अपरिहार्य ज़रूरत समझने लगता है. और तब उसे  अपने कार्य के लिए आवश्यक ऊर्जा अपने ही भीतर मिल जाती है.
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August 16, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास - 14

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -14
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बचपन में कभी कभी जब मैं कहता था, :
'मुझे भूख लगी है, लेकिन कुछ खाने का मन नहीं है,'
या,
'मुझे भूख नहीं लगी है, लेकिन कुछ खाने का मन हो रहा है,'
तो लोग मुझे पागल समझने लगते थे।
अब 55 साल बाद जब मैं कहता हूँ,
'मुझे आत्महत्या करने का मन हो रहा है, लेकिन मैं मरना नहीं चाहता,'
या,
'मैं मरना तो चाहता हूँ लेकिन मेरा आत्महत्या करने  का मन नहीं हो रहा,'
तो भी लोग मुझे पागल समझने लगते हैं,
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इस छोटी सी समझ ने मुझे समझाया कि मन और शरीर की जरूरतें कभी तो एक जैसी होती हैं और कभी कभी ऐसा नहीं भी होता। और जब ऐसा नहीं होता तो जीवन में द्वंद्व / दुविधा पैदा होती है।
लेकिन क्या मन की और शरीर की जरूरतें अक्सर ही अलग-अलग नहीं होती हैं?
हम मन की जरूरतों को 'इच्छा' कहते हैं, और जब शरीर की जरूरतों को इस इच्छा की तुलना में कम महत्व देते हैं, तब शरीर मन का, और मन भी शरीर का ध्वंस करने लगते हैं।
और इस ध्वंस से उबरने का न तो कोई रास्ता होता है, न रास्ते की जरूरत,  यह तो जीवन की जरूरत है, रीत भी, और उल्लास भी है ।
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बचपन में ही एक गाना सुना था,
आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है, … '
दोनों बातें एक ही सिक्के के दो पहलू ही तो हैं !
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March 04, 2011

~~~~~~~ताउम्र~~~~~~~~


~~~~~~~ताउम्र~~~~~~~~
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© Vinay Vaidya 



पहचान भूल जाने से,
रिश्ते ख़त्म नहीं होते,
रिश्ते टूट जाने से,
पहचान ख़त्म नहीं होती,
किसी नाम से रू-ब-रू होते ही,
लगता है वह जाना-पहचाना सा,
लेकिन उसका चेहरा याद नहीं आता ।
और किसी चेहरे को देखकर,
नाम जुबाँ तक आते-आते,
कहीं फ़िसल सा जाता है ।
फ़िर किसी दिन अचानक ही,
नाम और चेहरे जाने-पहचाने से लगते हुए भी,
बस अपने से लगने लगते हैं,
जिनके बारे में हमें ’कुछ’ तो पता होता है,
लेकिन क्या पता है,
यह ठीक से याद नहीं आता ।
ढूँढते रहते हैं हम ताउम्र उन अपनों को,
कभी दूर, कभी आस-पास कही,
और कभी जागी  कभी सोई या फ़िर
कभी-कभी उनींदी आँख़ों के सपनों में ।


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December 12, 2009

प्रतीक्षा .

~~~~~~~~~~~~~~~~~ प्रतीक्षा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~
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~~मैं अगर ख़ुद हूँ एक बेचैनी,
~~क्या ये बेचैनी मिट सकेगी कभी !
~~हाँ, ऐसा भी हुआ है अक्सर,
~~वो लम्हे जो तेरे साथ कभी गुज़रे हैं,
~~किसी बेखयाली में, और किसी बेखुदी में,
~~जहाँ ख़बर भी नहीं आती है मेरे वजूद की कोई,
~~जो मुझे अपने-आपसे बहुत दूर लिये जाते हैं,
~~और उस वक्त यही लगता है,
~~कि वक्त का वह लम्हा कितना छोटा है !
~~कि पलक झपकते बीत जाता है,
~~और छोड़ जाता है मुझको सहरा में,
~~मेरी बेचैनी की गर्म रेत और लू के गर्म थपेड़ों में,
~~और वक्त फ़ैल जाता है,
~~-बेहिसाब, दरिया सा,
~~एक अंतहीन सहरा सा ।
~~और बेचैनी भटकती रहती है,
~~क़दम-दर-क़दम,
~~क्या ये बेचैनी मिट सकेगी कभी ?
~~क्या मैं मिट सकूँगा अभी ?
~~मुझे मालूम है, तेरी 'याद' तू नहीं,
~~और न तेरे साथ गुज़रे वक्त की बेखुदी की याद ही है तू,
~~मुझे मालूम है,
~~बेखुदी की, बेखयाली की वह याद बस एक तसव्वुर भर है,
~~फ़िर भी वह तस्वीर कुछ तो सुकून देती है,
~~जैसे तीखी धूप में अपना ही साया,
~~एक झूठा सुकून देता है ।
~~फ़िर भी न जाने क्यूँ लगा करता है,
~~मैं पा सकूँगा,
~~किसी दिन उसको ।
~~इंतज़ार है तब तक ,
~~प्रतीक्षा करूँगा मैं तब तक,
~~इस अंतहीन सहरा में,
~~जिसे 'हयात' कहा जाता है ।

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