January 31, 2022

कृत्रिम साहित्य

'लिहाफ', ... और 'खोल दो'! 

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अगर मेरी याददाश्त ठीक है, तो क़रीब 45-46 साल पहले मैंने इस्मत चुग़ताई की कहानी 'लिहाफ़', और सआदत हसन मन्टो की कहानी 'खोल दो' को हिन्दी कहानियों की पत्रिका 'सारिका' में पढ़ा था, वर्ष 1979 के आसपास कमलेश्वर जी ने 'कथावार्ता' पत्रिका शुरू की थी। लगभग उसी समय संजीव नामक किसी नये कथाकार की भी कोई रचना पढ़ी थी, जिसे "प्रथम पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। मैंने उन्हें एक विस्तृत पत्र भी लिखा था, जिसका उससे भी बहुत अधिक विस्तृत जवाब उनसे मुझे मिला भी था।

'लिहाफ़' नामक कहानी संभवतः स्त्री-समलैंगिकता के बारे में है, जबकि 'खोल दो' कहानी, भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय किसी लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के बारे में है।

चौंकानेवाली स्थितियों, प्रसंगों, घटनाओं को अपनी कहानी के लिए आधार की तरह इस्तेमाल कर साहित्य-सृजन करनेवाले ये तथाकथित प्रगतिशील, साहित्यकार उन घटनाओं के शिकार लोगों या समाज की कौन सी मदद करना चाहते हैं!

यह चलन वैसे तो पश्चिम से ही आया है और वामपंथी उग्रवादी, जो क्रान्ति के नाम पर कच्ची उम्र के किशोर, नवयुवा पाठकों के लिए पता नहीं क्या संदेश देने का प्रयास करते हैं! 

क्या यह वस्तुतः साहित्य है भी? 

याद आता है श्रीलाल शुक्ल का 'राग- दरबारी'! 

जब मैं कक्षा नौ में पढ़ रहा था तो मेरे विद्यालय की लायब्रेरी से यह पुस्तक पिताजी ले आए थे। मेरे पिताजी ही उस विद्यालय के प्राचार्य थे, शायद इसलिए भी उन्हें यह किताब आसानी से मिल गई थी। 

मेरे घर में न किसी को इसकी फिक्र थी, न फुरसत, कि मैं क्या पढ़ता हूँ, मैंने क्या पढ़ना, क्या नहीं पढ़ना चाहिए। पिताजी तो स्कूल के कार्य में ही व्यस्त भी रहते थे। इसलिए आर्य-समाज के सत्यार्थ-प्रकाश और गीता-प्रेस, गोरखपुर के कल्याण जैसे ग्रन्थों के साथ-साथ मुझे हिन्दी साहित्य की रचनाएं पढ़ने का मौका भी अनायास मिलता रहता था। टाइम्स ऑफ इंडिया की सारिका, धर्मयुग के साथ मुझे कादम्बिनी, सरिता, मुक्ता आदि भी पढ़ने को मिल जाते थे। मुझे यह कहने में जरा भी हिचक नहीं कि इस सब "साहित्य" ने अवश्य ही,  तबीयत से मेरे बाल-मन / किशोर-मन को बर्बाद किया ।

वैसे 'नवनीत' और 'भवन्स जर्नल' जैसी किताबों से मुझे :

"All that glitters ain't gold"

भी समझ में आने लगा लेकिन कक्षा 11 तक आने के बाद मेरा परिचय उस जमाने के ऐसे ही एक महामानव के "साहित्य" से भी हुआ जिनका कि सामाजिक-धार्मिक और आध्यात्मिक मंच पर अभी पदार्पण ही हुआ था।

कॉलेज में पढ़ते समय मैंने महर्षि अरविन्द के बारे में जाना, और ख़लील ज़िब्रान जैसे विचारकों की सस्ता साहित्य भंडार के द्वारा प्रकाशित किताबें पढ़ने लगा।

तो यह रही मेरी साहित्य-उपासना (न कि साधना!)

आज जब मोबाइल और इन्टरनेट, फेसबुक और दूसरी साइट्स का दौर देखता हूँ तो कभी कभी लगता है कि क्या विकास और प्रगति की चकाचौंध से मोहित होकर हम आनेवाली आज की अपनी नई पीढ़ी को वाकई किसी सुनहरे और उज्ज्वल भविष्य की दिशा में जाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं!

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January 26, 2022

इन पलों में,

गणतंत्र दिवस, 26-01-2022,

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भारत आज 73 वाँ गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है।

भारत राष्ट्र को गणतंत्र के रूप में भारतवर्ष के संविधान के द्वारा मान्य किया गया है। गणतंत्र शब्द संभवतः अंग्रेजी के  :

"Republic"

का हिन्दी अनुवाद है, और  "Republic" शब्द संभवतः ग्रीक विद्वान्  Plato / अफ़लातून की एक रचना का शीर्षक है। 

फिर इस शब्द को संस्कृत भाषा से, 

"परि प्र अव लक्त" 

से भी संबंधित करना / माना जाना अनुचित नहीं होगा। 

सरल भावार्थ की दृष्टि से अंग्रेजी / ग्रीक भाषा का शब्द :

"Public"

भी संस्कृत भाषा के प्र-लौकिक / परिलौकिक / पारलौकिक से आया जान पड़ता है, क्योंकि इसकी व्युत्पत्ति कहाँ से हुई है, इस विषय में कोई संतोषजनक अन्य संकेत नहीं मिलता।

अफ़लातून के द्वारा रचित ग्रन्थ प्राकृतिक न्याय के आदर्श को आधार बनाकर मनुष्य के संदर्भ में समता, और विशेषतः स्त्री और पुरुष की समानता के विचार को महत्व देता है। 

ग्रीक दर्शनशास्त्र के दो प्रमुख पक्ष हैं तर्क और न्याय :

Logic and Justice.

यहाँ यह देखा जा सकता है, कि तर्क और न्याय की अवधारणा ग्रीक विद्वानों को भारतीय वैदिक षड्दर्शन के एक अंग न्याय-दर्शन से ही प्राप्त हुई है। 

इस न्याय-दर्शन का संबंध अवश्य ही ऋषि कणाद के वैशेषिक और ऋषि कौशिक के उलूक या औलूक्य दर्शन से है।

ग्रीक परंपरा में ही उलूक (owl) को बुद्धिमत्ता का प्रतीक माना जाता है। इसका भी यही कारण है ।

वैशेषिक दर्शन पदार्थवाद (material-aspect) के आधार पर भौतिक जगत् की विवेचना करता है, जबकि औलूक्य या उलूक दर्शन न्याय अर्थात् तर्क के आधार पर। ऋषि कौशिक (कुश, कुशा, कौशिक) उलूक का ही पर्याय है। 

संपूर्ण ग्रीक संस्कृति कला, विज्ञान, गणित, राजनीति, वैचारिक और सामाजिक ताना-बाना इसी तर्क और न्याय की दो पटरियों पर गतिशील रही है। इस प्रकार, ग्रीक परंपरा का आधारभूत तत्व तर्क और न्याय ही था। किन्तु औलूक्य दर्शन में न्याय और तर्क के गुण-दोषों, त्रुटियों, विशेषताओं, और मर्यादाओं की भी विवेचना की गई है, जिसका उल्लेख ग्रीक परंपरा में शायद नहीं मिलता। 

तर्क और न्याय के वैदिक ऋषि हैं "गणक" जो कि पुनः बुद्धि के देवता गणेश, गणपति का ही पर्याय है क्योंकि गणक ऋषि का उल्लेख प्रधानतः गणपति अथर्वशीर्ष में ही पाया जाता है।

यहाँ यह कहना प्रासंगिक है कि ऋषि किसी ज्ञान की धारा का रूप-विशेष है, और ज्ञान जिस विषय का होता है, वह विषय भी  पुनः भौतिक, आधि-दैविक या आध्यात्मिक हो सकता है।

इस प्रकार  "Republic"   शब्द का यह अनुवाद भारतवर्ष के पुरातन, चिरंतन ज्ञान के अनुरूप समीचीन ही है। 

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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January 20, 2022

उन पलों में,

कविता / 20-01-2022

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अवसाद के उन पलों में जब, 

कहीं कोई राहत नहीं होती,

संबंधों के उन लमहों में जब,

रिश्तों की पहचान नहीं होती,

दिल ढूँढता है, तसल्ली लेकिन,

झूठे-सच्चे दग़ा भरे धोखे-छल,

दिल को बहला लें, है मुमकिन,

और उन पलों के झपकते ही,

जब पता चलती है, साजिश,

और गहरा हो जाता है, अवसाद,

और खुद पर ही आता है तरस,

और भी आता है गुस्सा खुद पर,

जब कोई झूठी तसल्ली फिर से,

रचती है साजिश नए सिरे से,

और दिल ये भी भूल जाता है,

है ये सिलसिला, पुराना वही!

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January 19, 2022

भारत की विदेश-नीति

श्रीलंका 

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तमाम प्रयासों के बाद अफ़गानिस्तान में तालिबान की सरकार बन ही गई । विश्व राजनीति में यूरोप हो, अमरीका या अरब देश, यहाँ तक कि कम्यूनिस्ट और चीन सभी भारत विरोधी दृष्टिकोण पर सहमत हैं। शायद इसरायल भी । भारत फिर भी तय नहीं कर पा रहा कि इसरायल-फ़िलस्तीन मामले में क्या किया जाना चाहिए ।

पाकिस्तान और चीन, यहाँ तक कि मालदीव, भूटान और नेपाल जैसे राष्ट्र भी भारत को ब्लैकमेल करते रहे हैं। चीन इस अवसर का नाजायज़ फायदा उठाने में पीछे नहीं है।

भारत अफ़गानिस्तान के लिए मानवीय सहायता के नाम पर गेहूँ भेज सकता है, तो श्रीलंका की सहायता के लिए क्यों नहीं आगे आता? वहाँ की अर्थव्यवस्था बरबादी की कगार पर है, ऐसे में क्या यह नहीं हो सकता कि भारत उसका पड़ोसी होने के नाते पहल करे और उसे इतनी मदद दे कि वह चीन के प्रभाव से हमेशा के लिए मुक्त होकर अपने पैरों पर खड़ा हो सके। शायद भविष्य में श्रीलंका का विलय भी भारतीय संघ में किया जा सकता है। इससे उसके सार्वभौम स्वतंत्र होने के स्वरूप पर वैसे ही कोई आँच तक नहीं आती, जैसे 1947 में जो राजे-रजवाडे भारतीय संघ में शामिल हुए थे, उनकी स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई। यह चीन के जैसा विस्तारवाद तो कदापि नहीं है। श्रीलंका के भारत में विलय से तमिष़ ईलम् के प्रश्न के समाधान का रास्ता भी निकल आएगा। 

यह इसलिए भी अत्यन्त ज़रूरी है, ताकि नेपाल तथा भूटान जैसे राष्ट्र भी कहीं चीन के चंगुल में न आ जाएँ।

पता नहीं कि भारत सरकार की इस पूरे मामले में क्या दृष्टि और क्या भूमिका है!

तिब्बत और बांग्लादेश तो हम गँवा चुके हैं। तिब्बत और नेपाल, भूटान और श्रीलंका भी सांस्कृतिक, धार्मिक व भाषाई पृष्ठभूमि की दृष्टि से चीन की तुलना में, भारत के ही अधिक निकट और समान भी हैं, और यदि हम सोते ही रहे तो इससे हमारी जो क्षति होगी, वह ऐसी एक अपूरणीय क्षति होगी, जो कि भारत के लिए एक बहुत गहरा आघात ही सिद्ध होगा। 

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January 17, 2022

अश्वत्थः / अश्विनौ

The Solstice and The Equinox.

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( नासदीयसूक्तम् पढ़ते हुए कल अचानक मेरे एक पुराने पोस्ट पर दृष्टि पड़ी तो मैंने एक नवीनतम पोस्ट उस ब्लॉग  :

vinaykvaidya.blogspot.com

में,

Roger Penrose, 

शीर्षक से लिखा। 

प्रस्तुत संलग्न कविता का सन्दर्भ मेरी वही पोस्ट है।

इसी ब्लॉग में अश्वत्थः और अश्विनौ के सम्बन्ध में :

"Silent Dialogues"

की शृंखला में नासदीय सूक्तम्

का उल्लेख है। ) 

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Landmark-milestones.

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Now, after a while in retrospect,

Having completed a long walk,

Every step looks like a milestone,

Every single moment a pilgrimage,

That I embarked upon in the decade.

The turns and twists were all the help, 

That I was endowed with in my journey, 

During which, I was never exasperated.

I just wonder, exactly Who took up this,

The way that passed through the woods, 

Dark, with no future, nor a goal any, 

Still I walked on blindfold in my vein. 

Now I see Who exactly saved me from, 

The imminent dangers and pitfalls, 

That were there on my path, to help me.

This was how I found out the fountain, 

That finally quenched my thirst timeless. 

The ashvattha that kept looking upon me,

The ashwinau that stood a guard to me.

All those steps now look like the milestones.

That served and saved me all the time.

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January 16, 2022

विवाह और आर्य

विधवा-विवाह

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सुबह 8:00 बजे आकाशवाणी से हिन्दी समाचारों में आजकल भारत की आजादी के 75 वर्ष पूरे होने, आजादी का महोत्सव मनाए जाने, और स्वाधीनता-सेनानियों के बारे में बतलाया जा रहा है।

आज महादेव गोविन्द रानाडे तथा शरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय के बारे में सुना। गोपालकृष्ण गोखले का भी उल्लेख किया गया जो कि श्री रानाडे से प्रभावित थे। श्री गोखले ही शायद महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु भी थे।

विधवा-विवाह और इस प्रकार नारी-उत्थान के कार्यों के समर्थन में इन महानुभावों का जो प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान रहा उस बारे में भी ज्ञात हुआ। 

एक प्रश्न मन में उठा कि क्या वैदिक / आर्य धर्म, और परंपरा में विधवा के विवाह का निषेध है? 

स्वामी दयानन्द सरस्वती के मतानुसार 'देवर' शब्द 'दूसरे पति' का पर्याय है, और किसी कारणवश पति की मृत्यु हो जाए, तो स्त्री अपने देवर से विवाह कर सकती है । यहाँ तक कि विवाह किए बिना भी, वंश को बनाए रखने के लिए 'नियोग' के माध्यम से देवर से संतान प्राप्त कर सकती है।

महाभारत की कथा में पाण्डवों-कौरवों के वंश का विस्तार इसी माध्यम से हुआ था। तात्पर्य यह कि वैदिक और आर्य धर्म तथा  परंपरा में विवाह का विधान, प्रयोजन और औचित्य वर्ण / वंश की शुद्धता को ध्यान में रखकर किया गया है न कि कामोपभोग के उद्देश्य से । गीता में तो यहाँ तक भी कहा गया है कि धर्म से अविरुद्ध, अर्थात् धर्म के अनुकूल काम-व्यवहार भी ईश्वर का ही कार्य है :

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्  ।।

धर्माविरुद्धेषु भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।।११।।

(अध्याय ७)

यह तो स्पष्ट ही है कि प्रजा की सृष्टि के कार्य में काम का महत्व अपरिहार्यतः आवश्यक है।

और वाल्मीकि रामायण के सन्दर्भ में देखें, तो एक ओर, वानर-राज बालि के वध के बाद उसकी पत्नी तारा सुग्रीव की पत्नी हो गई, वहीं भगवान् श्रीराम द्वारा राक्षस-जातीय ब्राह्मण, रावण का वध किए जाने के बाद, रावण की पत्नी मंदोदरी यद्यपि सती हो जाना या मृत्यु को पाना चाहती थी, तो भी उसे ऐसा न करने के लिए ही प्रेरित किया गया। द्रौपदी यद्यपि अर्जुन की ही पत्नी थी, न कि पाँचों भाइयों की, किन्तु पर्यायतः उसे पाँचों भाइयों की पत्नी की तरह समझा जाने लगा। इन्द्र ने अहल्या का शीलभङ्ग किया, और इसलिए उसे पति गौतम के द्वारा शाप दिया गया।

फिर भी इन पाँच स्त्रियों के प्रातःस्मरण किए जाने को शुभ माना जाता है।

अहल्या द्रौपदी तारा कुन्ती मन्दोदरी तथा । 

पञ्चकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ।।

की उक्ति से भी यही प्रमाणित होता है कि पति की मृत्यु हो जाने पर किसी स्त्री के लिए पति की चिता में उसके शव के साथ स्वयं भी जलकर मर जाना न तो वेद-सम्मत है, न धर्म-सम्मत है। और सामाजिक रूप से दबाव डालकर किसी भी स्त्री को इसके लिए बाध्य करना तो निश्चय ही घोर अधर्म है।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि वाल्मीकि रामायण में, रावण की मृत्यु हो जाने पर मन्दोदरी किस प्रकार शोक से ग्रस्त होकर और उसके शव से लिपटकर उसे "आर्यपुत्र" कहकर संबोधित करती है। तात्पर्य यह कि रावण "आर्य" और राक्षस-जातीय ब्राह्मण भी था। जो लोग रावण को द्रविड़ मानते हैं उन्हें भी यह तो मानना ही होगा कि रावण द्रविड़ भी था और आर्य भी, -न कि अनार्य, क्योंकि "आर्य" शब्द कुलीन, सभ्य, वंश, चरित्र के अर्थ में "श्रेष्ठ" (noble) का द्योतक है, -न कि किसी जाति-विशेष का।

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यहाँ एक जिज्ञासा यह भी है कि वैदिक / आर्य धर्म से अन्य, दूसरी विभिन्न परंपराओं में 'विवाह' के विधान का आधार क्या है, और इसे किस प्रकार से परिभाषित किया जाता है।

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January 15, 2022

न कुछ हो सकता है!

कविता / 14-01-2022

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न कुछ किया जा सकता है, न कोई कर सकता है, 

जो हुआ, होगा, या हो सकता है, ख़याल ही तो है,

न कुछ भी होता है, न कोई कभी भी कुछ करता है,

हाँ तो ये सवाल है कि क्या ख़याल नहीं उठता है!

हाँ ख़यालों का तो दरिया है, तूफान है, बवंडर है,

ख़याल ही तो है पानी, हवा भी, वही समन्दर है!

जो सोचो अगर तो सभी कुछ ख़याल ही तो है,

बदलता जा रहा है लगातार, हमेशा ही ये मंजर है!

क्या ये 'हमेशा', ये 'कभी कभी', 'अभी' या 'अक्सर',

क्या ये भी अलग, कुछ और है, अगर ख़याल न हो,

सवाल यह है कि क्या है, जब कोई ख़याल न हो!

जब किसी वक्त, किसी पल, साँझ डूबता है सूरज,

या किसी सुबह, भोर के होते ही फैलती है लाली,

उस समय जबकि हम नींद से जागे हुए ही होते हैं,

जब अपनी खिड़की से देखते हैं, आसमान की ओर,

जब न सोये हुए, और न खोये हुए से हम होते हैं,

क्या उस पल, समय भी वह, ठहरा हुआ नहीं होता!

ये भी हम बाद में ही ख़याल आने से ही तो कहते हैं,

उस घड़ी तो अपने होने, न-होने का ख़याल भी नहीं होता!

तो वक्त भी क्या सिर्फ वहम ही नहीं है, ख़याल ही एक,

और उस बेख़याली का भी क्या, अपना वजूद नहीं होता!

वो बेख़याली भी क्या कभी कुछ करती है, या बस होती है,

जिसे महसूस करनेवाला भी, उससे अलग कोई नहीं होता!

और उस बेख़याली को क्या याद भी रखा जा सकता है,

याद रखना, करना, या आना भी तो ख़याल ही तो है!

कैसे याद रखे, कौन रखे, यह भी तो ख़याल ही तो है,

न कुछ किया जा सकता है, न कोई भी कर सकता है,

जो हुआ है, होगा, या हो सकता है, ख़याल ही तो है!

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January 11, 2022

जानना और बदलना

तथ्य और परिवर्तन 

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किसी चीज़ को जानना और बदलना बहुत अलग अलग बात है।

अगर आप अपने को जानते हैं, तो आप अपने को कदापि बदल नहीं सकते। क्योंकि आप स्वयं ही अपने आपको जानते हैं, और इस तरह से, जाननेवाले के रूप में आप जो भी हैं, वह अवश्य ही ऐसा एक आधारभूत तथ्य है, जिसे बदला जाना असंभव है। इसी तरह से, अगर आप भविष्य को जानते हैं तो उसे बदल नहीं सकते, क्योंकि अगर आप उसे बदल सकते हैं, तो स्पष्ट ही है कि उसे आप नहीं जानते। हाँ एक संभावना के रूप में आप भविष्य को शायद जान सकते हैं और फिर भी वह संभावना भी असंख्य दूसरी उन संभावनाओं में से केवल एक होगी, जिनकी कल्पना तक आप नहीं कर सकते। 

इसी तरह, आप अतीत (past) या भूतकाल में घटित हुई किसी घटना को भी नहीं बदल सकते हैं। हाँ, उसके वर्तमान स्वरूप को आप अभी, इसी क्षण किसी हद तक शायद बदल सकते हों । वैसे भी, जो बीत चुका है, और जो आपकी स्मृति में जिस रूप में आपको स्मरण है, उसका वह रूप भी, यूँ भी भले ही आप चाहें या कि न चाहें, तो भी सतत बदलता ही तो रहता है ! जब अतीत की स्मृति तक को बदल सकना आपके लिए संभव नहीं है, तो फिर अतीत को बदलने की कल्पना तक करना क्या हास्यास्पद नहीं है!

जब यह तथ्य सरलता-पूर्वक, और स्पष्टतः देख लिया जाता है, तो फिर इसे बदल पाने की या बदलने की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है!

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January 09, 2022

अफ़साना!

गीत / 09-01-2022

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मैं ना, पूछूँगा,

तुम ना, बतलाना!

मैं ना! पूछूँगा,

तुम ना! बतलाना।

राज ये लेकिन अपना, 

फिर भी खुल जायेगा!

मैं ना, बूझूँगा,

तुम ना, जतलाना।

मैं ना! बूझूँगा,

तुम ना! जतलाना।

राज ये खुद ही कह देगा,

इसका अफ़साना!

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January 07, 2022

सुदूर संचार

रिमोट इफेक्ट्स

Remote Effects.

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वैसे तो गूगल सर्च से अपेक्षित परिणाम कभी जल्दी मिल जाते हैं और कभी कभी प्रश्न की रचना में ही कोई त्रुटि होने से नहीं भी मिलते हैं, लेकिन कभी कभी इतनी आसानी से सटीक उत्तर मिल जाता है कि आश्चर्य ही होता है।

ऐसा ही एक प्रश्न मेरे मन में था कि मोबाइल की बैटरी रिमोट से कैसे चार्ज की जाती है?

वैसे मेरा जो अनुमान था बिलकुल वही उत्तर मुझे मिला, कि यह कार्य इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन के प्रयोग से संपन्न किया जाता है। किन्तु स्वयं मुझे ही अपने अनुमान की सत्यता पर संदेह था, इसलिए मैंने इस अनुमान की सच्चाई की पुष्टि करने के लिए यह प्रश्न गूगल सर्च से पूछा। क्योंकि मुझे विश्वास नहीं था कि क्या रिमोट (सुदूर संचार) से इतने तीव्र / प्रबल विद्युत्-चुम्बकीय-क्षेत्र (strong electro-magnetic fields) पैदा किए जा सकते हैं, जिनके माध्यम से विद्युत्-चुम्बकीय-उपपादन सक्रिय किया जा सके।

इसके अवश्य ही बहुत ही दूरगामी परिणाम हो सकते हैं क्योंकि इस प्रकार वाई-फाई / ब्ल्यू-टुथ तकनीक से मोबाइल को सीधे ही करप्ट भी किया जा सकता है ।

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वत्स! सत्यं द्विधा गम्यं लक्षणेन च वस्तुतः ।।

लक्षणेनोच्यते सत्यं वस्तुतस्त्वनुभूयते ।।२९।।

(श्री रमणगीता, अध्याय १२)

अक्षरशः क्या यही आत्मा / परमात्मा / ईश्वरीय कार्य-प्रणाली भी नहीं है, जो सर्वत्र और प्रत्येक जीव के हृदय में होते हुए भी संपूर्ण अस्तित्व को ही अपनी शक्ति से परिचालित करता है? 

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January 05, 2022

लेकिन पहले

कविता / 05-01-2021

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मेरी आँखों से दुनिया देखो, 

लेकिन पहले मुझको देखो!

अपनी आँखों से दुनिया देखो, 

लेकन पहले खुद को देखो!

वह, जो यह दुनिया दिखती है,

जिसको यह दुनिया दिखती है,

दोनों हैं एक या अलग अलग, 

जो देखे, जिसको दिखती है?!

यह प्रश्न है बड़ा ही पेंचीदा,

लेकिन पहले इसको समझो,

फिर बोलो, है क्या यह दुनिया,

फिर बोलो, किसको दिखती है!

यह मन जो कहता है, दुनिया,

यह दुनिया जो मन कहती है, 

क्या यह है कुछ, अलग तुमसे,

जो दुनिया, मन को दिखती है!

मन दुनिया है, या दुनिया मन, 

तुम दुनिया हो, या तुम हो मन,

यह प्रश्न बड़ा ही उलझा है,

पहले सुलझाओ, यह उलझन!

जब यह मन नहीं होता है, 

क्या दुनिया तब होती है!

क्या तब यह मन भी होता है, 

दुनिया जब कहीं नहीं होती है!

तो क्या मन ही दुनिया है,

तो क्या दुनिया ही मन है,

फिर से देखो, तुम खुद को, 

दुनिया है, या कि मन है! 

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January 01, 2022

जश्ने-अहसास!

स्त्री धर्म क्या है? 

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वैदिक सनातन धर्म में धर्म शब्द प्रकृति और स्वभाव का द्योतक है। स्त्री स्वयं ही प्रकृति की सन्निकट अभिव्यक्ति है और स्त्री का स्वभाव अर्थात् धर्म है, सहज अस्तित्व से प्रेरित होकर समष्टि के सामंजस्य में रहते हुए अपना जीवन जीना। उसे कुछ करने और जीने के लिए किसी अन्य प्रेरणा, उद्देश्य, लक्ष्य आदि को खोजने की आवश्यकता ही नहीं होती। किन्तु बाहरी परिस्थितियाँ और  सामाजिक दबाव उसके अपने इस स्वाभाविक जीवन को जीने के उसके रास्ते पर बाधाएँ अवश्य ही खड़ी कर देते हैं और तब वह उन बाधाओं से अवरुद्ध, प्रभावित या कुंठित भी हो सकती है, या हो भी जाती है! 

'जश्न' शब्द मूलतः फ़ारसी 'जशन' का ही अपभ्रंश है और 'जशन' -यह शब्द भी मूलतः संस्कृत शब्द यजन / यज्ञ का अपभ्रंश है।उसके तात्पर्य से भी यही प्रतीत होता है। 

यज्ञ का अर्थ है यजन, उल्लास, उत्सव, और जश्न / जशन का भी यही अर्थ है। 

ब, ह, स, ज, म, अ, आदि वर्ण अरबी भाषा के उपसर्ग हैं, उनका अपना अपना स्वतंत्र अस्तित्व और प्रयोजन भी है ही।  

जमा शब्द संस्कृत भाषा के उपसर्गों 'स' / सम् / सन् / सं आदि से व्युत्पन्न है। 'मजमा', 'मजमून', 'जामा', 'जुमा' आदि शब्दों के बारे में भी ऐसा ही प्रतीत होता है।

ह और स के संयोग से बना शब्द संस्कृत भाषा में हस् तथा सह् धातुओं का जनक समझा जा सकता है, जबकि अरबी-फा़रसी में ब से जुड़कर यह बहस हो जाता है। इसी प्रकार से अहसास / एहसास और महसूस भी हमें प्राप्त होते हैं। 

अब हम बात करें जश्ने-अहसास की तो स्त्री के संबंध में यही कहा जा सकता है, कि स्त्री अनायास ही अपने स्वाभाविक धर्म से परिचालित होती है और जैसे किसी लता या बेल को सहारे की आवश्यकता होती है, उसी तरह से स्त्री को भी किसी सहारे व आश्रय, संरक्षण की आवश्यकता होती है। स्त्री का स्वाभाविक कार्य है संतान को जन्म देना, और इसलिए भी आक्रामकता स्त्री का धर्म नहीं है। आक्रामकता पुरुष में अवश्य ही अन्तर्निहित ही होती है, और यही वह शक्ति है, जिससे वह स्त्री और संतान की रक्षा भी करता है। संतान की उत्पत्ति इस प्रकार मनुष्य-मात्र का स्वाभाविक प्राकृतिक धर्म ही है, और काम, कामना, या संतान की उत्पत्ति की चाह, उसी धर्म का विकसित रूप है। किन्तु इस क्रम में भोग की बुद्धि इस काम-भावना को दूषित कर देती है, और काम-कृत्य संतान की उत्पत्ति और प्रजा की वृद्धि का साधन न रहकर बल की अभिव्यक्ति और बलप्रयोग होकर रह जाता है।

विवाह वह वैदिक विधान है जो मनुष्य को अपने धर्म के अनुसार अपनी वंशवृद्धि करने की शिक्षा देता है। गीता के अध्याय ७ के अनुसार :

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।।

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।।११।।

इस श्लोक से भी यही निष्कर्ष प्राप्त होता है कि विवाह का यह  विधान इसीलिए स्थापित किया गया है ताकि सामाजिक सौहार्द को बनाए रखकर सभी अपने अपने श्रेयस् की प्राप्ति कर सकें। 

पुरुष ही नहीं, नारी या स्त्री को भी इस प्रकार से अपनी जीवन-शैली का चुनाव करने का अधिकार प्रकृति से ही प्राप्त है।

इसीलिए वैदिक परंपरा (न कि धर्म) में, 'घटस्फोट' (divorce, तलाक का समानार्थी मराठी शब्द) के लिए कोई संकेत, व्यवस्था या शब्द तक नहीं है। पता नहीं, हिन्दू विवाह कानून (Hindu Marriage Act) में इस बारे में क्या कहा गया है! 

वैदिक सामाजिक व्यवस्था और वैदिक सामाजिक वर्णाश्रम धर्म के बीच यद्यपि पारस्परिक सामंजस्य है, किन्तु वैदिक धर्म किसी भी मनुष्य स्त्री, पुरुष या समुदाय पर इस धर्म का पालन करने के लिए कोई आग्रह नहीं करता। इस संबंध में यदि हम आज तक के वैज्ञानिक विकास के सन्दर्भ में भी देखें तो भी यही स्पष्ट होता है कि वंश की पहचान पिता से ही हो सकती है न कि माता से। क्योंकि गुण-सूत्रों (genes / chromosomes) के सन्दर्भ में विचार करें, तो भी यही प्रतीत होता है कि शिशु का स्त्री या पुरुष होना x-x और x-y गुणसूत्रों से ही तय होता है। चूँकि y गुणसूत्र  / क्रोमोसोम या जीन, पिता से ही प्राप्त होता है, इसलिए पुत्र ही वंश के निर्धारण का तर्कसंगत आधार हो सकता है। किन्तु यदि इस तथ्य की ही अवहेलना कर दी जाए, तो समस्त वंश-श्रंखला अस्त-व्यस्त हो जाती है।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि समाज के सन्दर्भ में स्त्री-पुरुष के अधिकारों की समानता संभव ही नहीं है। स्त्री या पुरुष, कोई भी हो, हर किसी को अपनी मर्यादा के द्वारा ही अनुशासित होना होगा। यदि इस मर्यादा का पालन नहीं किया जाता है तो समाज और परिवार का विघटन अवश्यंभावी है।

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01-01-2022

स्वागत नववर्ष! 

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तो, आज नववर्ष भी आ गया है, 

या, हम ही आ गये हैं, नववर्ष में!

न हमें पता है कि वर्ष क्या है,

न हमें पता है कि हम क्या हैं!

एक अज्ञात से दूसरे अज्ञात को,

जोड़कर लगता है, कुछ नया है!

जैसे बीत गया है, वह वर्ष पिछला,

यह नववर्ष भी बीत जाएगा अगला!

हम क्या हैं, यदि हमें न भी हो पता,

पर ये तय है कि हम न बीतेंगे कभी!

फिर हमारे होने का मतलब क्या है, 

क्यों न यह पता लगा लें हम अभी ही,

क्योंकि नववर्ष आएँगे, चले जाएँगे, 

रोज ही कोई नया एक दिन आएगा, 

मगर रोज ही वह बीत भी तो जाएगा,

पर ये तय है कि हम न बीतेंगे कभी!

तो जब तक कि यह न लगा लें पता,

कि हमारे होने का मक़सद क्या है,

तो जब तक कि यह न लगा लें पता, 

कि हमारे होने का मतलब क्या है,

कि हम अकेले हैं, या हैं भीड़ बेतरतीब,

कितने हैं दूर हम अपने से या कि हैं क़रीब!

क्या हम एक हैं अनेक हैं, या हैं बेवजूद,

क्यों न हम लगा लें सच्चाई का पता! 

वरना हर साल दोहराया करेगा खुद को, 

हम कभी भी न जान सकेंगे खुद को!

तमाम दुनिया जानने की ज़रूरत क्या है?

दुनिया दुरुस्त करने की ज़रूरत क्या है? 

न जान सके, कर सके दुरुस्त खुद को,

फिर आखिर को भी कभी मिलना क्या है?

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नववर्ष की शुभकामनाएँ!