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February 11, 2026

The Agnostic.

स ही वा!

+-

"भारत में हर तीसरा व्यक्ति ज्ञानी है!"

"आप तीसरे हैं?"

"जी नहीं, मैं चौथे किस्म का हूँ।"

"मतलब?"

"मैं अज्ञेयवादी हूँ।"

"मतलब?"

"Atheist, Anti-theist, Acateleptic, Pyrrhonian, Pyrrhonist, Secular, Skeptic, Godless, Doubting Thomas, Intellectual!" 

"सही.. वा?!"

***



November 27, 2025

FROM GOD UNTO GOD.

"क्या ईश्वर है?"

से

"ईश्वर क्या है?"

तक।

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प्रयत्न, अभ्यास, संकल्प, निश्चय, प्रारब्ध और समय

चिन्तन का रथ भाषा की भूमि पर, भाषा की सीमा के भीतर ही, विचार के भिन्न भिन्न मार्गों पर विचरण किया करता है। इस रथ को चलानेवाला सारथी विचार ही है, और यही विचारकर्ता भी है। तात्पर्य यह कि इस रथ को चलानेवाला सारथी स्वयं ही रथ के मार्ग का निर्माण भी करता है और अज्ञात से अज्ञात के क्षेत्र में विचरण करता हुआ अनुभव करता है कि वह विचार कर रहा है।

भाषा की भूमि पर हो रही विचार की गतिविधि में अभी हो रहा यह

असाधारण उत्परिवर्तन

 (extra-ordinary mutation)

समय की अवधारणा को जन्म देता है और अतीत तथा भविष्य के अस्तित्व को भी अभी ही सत्यता भी प्रदान कर देता है, जबकि अभी की इस नित्य सनातन शाश्वत और चिरन्तन भूमि पर न तो किसी अतीत का ओर न ही किसी भविष्य का अस्तित्व हो सकता है।

विचार की यह प्रमादयुक्त गतिविधि ही अनुभव नामक  आभास को जन्म देती है। अतीत और भविष्य की ही तरह अनुभव भी केवल चेतना में होनेवाली एक प्रतीति (perception) भर होता है न कि कोई अस्तित्वमान वस्तु। चेतना की पृष्ठभूमि में अनुभव का आभास और इस आभास की परिवर्तनशीलता और इसकी पृष्ठभूमि की नित्य सनातन शाश्वत चिरन्तनता भी स्वयंसिद्ध ही है। यही वह माया है जो कि विचार और उससे पृथक् और भिन्न एक स्वतंत्र विचारकर्ता के होने का भ्रम उत्पन्न कर देता है। यही आभास उस नित्य, सनातन, शाश्वत और चिरन्तन अद्वैत अस्तित्व पर द्वैत की सत्यता आरोपित करता है। विचार और विचारकर्ता के बीच पैदा हुए इस काल्पनिक द्वैत के सन्दर्भ में विचारकर्ता के लिए

प्रयत्न, अभ्यास, संकल्प, निश्चय प्रारब्ध और समय

नामक इन अपेक्षतया नई कल्पनाओं के उत्पन्न होने पर उस माध्यम से उसमें उसके अपने आदिरहित और साथ ही अपना स्वयं के अन्तरहित, अपने-आप से भिन्न और स्वतंत्र एक अस्तित्व होने की मान्यता भी जन्म लेती है,  जिसमें अन्तर्निहित विरोधाभास पर उसका ध्यान नहीं जाता, और इसलिए वह इस संपूर्ण अस्तित्व के किसी ऐसे स्वामी के अस्तित्व की कल्पना कर लेता है जिसे वह ईश्वर कहता है या कोई और नाम देता है।

फिर चूँकि वह ईश्वर उसके लिए सर्वथा एक अनिश्चित और नितान्त ही अज्ञात वस्तु होता है, इसलिए विचार के क्षेत्र में ही

"क्या ईश्वर है? "

यह प्रश्न उत्पन्न होता है और तब विचार के उसी सीमित परिप्रेक्ष्य में उसका ध्यान -

"ईश्वर क्या है?

"वह वस्तु क्या है",

जिसे कि ईश्वर का नाम दिया जा रहा है। 

इस मौलिक प्रश्न पर नहीं जा पाता।

सारा ध्यान और विवाद

"क्या ईश्वर है?

"क्या ईश्वर नामक कोई वस्तु कहीं और कुछ नहीं है?" 

इस प्रश्न पर केन्द्रित हो जाता है।

तब सारी शक्ति और बल और आग्रह इनमें से किसी एक पर स्थिर हो जाता है और ईश्वर का अस्तित्व माननेवाले और न माननेवाले दो विपरीत मतों तक ही सिमटकर रह जाता है।

ईश्वर के अस्तित्व को माननेवाले को आस्तिक तथा न माननेवाले को नास्तिक कहा जाता है। जबकि "ईश्वर है या नहीं, उसे ज्ञात नहीं है", जो ऐसा कहता है कि उसे अज्ञेयवादी कहा जाता है। मजेदार बात यह है कि ये सभी :

" क्या ईश्वर है? क्या ईश्वर नहीं है"

इसी प्रश्न के परिप्रेक्ष्य में वैचारिक ऊहापोह करते हैं और शायद ही कभी इस प्रश्न पर आते हैं कि :

"ईश्वर क्या है?"

***

जब मुझे एक  assignment 

इस बारे में श्री जे कृष्णमूर्ति की शिक्षाओं के अंतर्गत :

"ईश्वर क्या है?"

शीर्षक से प्रकाशित होनेवाली मूलतः अंग्रजी भाषा में प्रस्तुत सामग्री का हिन्दी अनुवाद करने के कार्य के रूप में दिया गया था।

बाद में यही पुस्तक इसी शीर्षक से राजपाल ऐन्ड सन्स से प्रकाशित हुई।

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