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October 24, 2015

हे शंकर त्रिपुरारी!

आज की कविता
हे शंकर त्रिपुरारी!
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तुम बिन मेरी कौन खबर ले हे शंकर त्रिपुरारी!
तात मात नहि तुम बिन कोऊ, भ्रात-भगिनी, नहि नारी,
नहि घर-बार नहीं धन-संपति, नहि कोऊ मीत हितैषी!
तीन ताप त्रिशूल भये हैं, हे त्रिनेत्र त्रिशूलधारी !
षड्-रिपु मोहे त्रस्त किए हैं, हे प्रिय-शैलदुलारी!
अब तो मुझ पर किरपा कीजे, गंगाधर डमरूधारी!
बिनती है चरनन में लीजे, मोहे हे मदनारी!
तुम बिन मेरी कौन खबर ले हे शंकर त्रिपुरारी!
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©

June 06, 2015

प्रार्थना !

प्रार्थना !
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शिव तुम कितने भक्तपरायण,
उमा को तुमने हृदय लगाया,
गंगा और शशि को भी तुमने
हँसकर अपने शीश बिठाया,
सुर-असुरों मनुजों राक्षस पर
रहती सदा तुम्हारी करुणा,
कालकूट विष को भी तुमने,
इसी तरह से गले लगाया!
मुझ पर भी तुम कृपा करो ना,
प्रियतम करो न मेरी वञ्चना
मुझको नहीं लगाते पर क्यों,
हे शिव अपने पावन चरणा?
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December 01, 2014

॥ अज्ञातपथगामिन् कोऽपि ॥ -2

॥ अज्ञातपथगामिन्  कोऽपि  ॥ -2
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स विहरति वने कान्तारे पथान् दुर्गमाञ्च  ।
अपि दूरे अंतरिक्षम् आत्मनि स्वेन स्वया ॥1
सर्वम् हि इह तस्य बहिः तस्य अंतरेव ।
सर्वम् तु अपि तस्य न तस्य अंतरेण ॥2
नादयति स्वरै: ढक्काम् नटराज शिवो ।
प्रसारयति नादम् त्रिलोकेषु अथ अन्तरे ॥3
देवाः ऋषयः गन्धर्वाः मनुजाः यक्षरक्षांसि ।
प्रार्थयन्ति तम् कमप्यज्ञातपथगामिनम्  ॥4
प्रसीदयन्ति तम् दिव्यस्तुवनैः तस्मै तदापि ।
न शक्नुवन्ति द्रष्टुम् तमज्ञातपथगामिनम् ॥5
उद्धर्त्तुकामः सनकादि सिद्धान्
एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ।
नृत्तावसाने नटराजराजो
ननाद ढक्काम् नवपञ्चवारम् ॥6
कटाक्षेण दृष्ट्वा तान् एकदा सः विहसित्वा ।
ननाद ढक्काम् मुदितो शिवो नवपञ्चवारम् ॥7
इति ।
अक्षर समाम्नाये  अइउण् च प्रथमाः स्युः ।
ऋलृक् द्वितीयास्तथा एओङ् तृतीयाः अपि  ॥8
ऐऔच् चतुर्थाः सन्ति पञ्चमाः हयवरट् तथा ।
लण् च  ञमङणम्  एतानि षष्ठसप्तमाः  ॥9
ततः झभञ् घढधष् इति अष्टमा तथा नवमाः ।
एताः प्रदर्शिताः ताभ्यः ऋषिभ्यः  समाम्नायाः ॥10    
तदनन्तरे जबगडदश्दशमा खफछठथचटतवाः इति ।
कपय् शषसर् हलाः एताः पञ्चाभिः शिवेन ॥11
एतमक्षरसमाम्नायम् श्रुत्वा ऋषिभिः अन्तरे ।
अज्ञातपथगामिनम् नत्वा ससर्जुः संस्कृतामिमाम् ॥12
--
फलश्रुतिः
चतुर्दशसमाम्नाये यो पठेदिदमक्षरम्  ।
चतुर्दशभुवनेषु सः प्राप्नुयात्  शारदाकृपाम् ॥
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भावार्थ :
स विहरति वने कान्तारे पथान् दुर्गमाञ्च  ।
अपि दूरे अंतरिक्षम् आत्मनि स्वेन स्वया ॥1
भावार्थ :
वह अज्ञात पथ पर चलनेवाला (भगवान शिव) वनों और बीहड़ों के दुर्गम रास्तों पर भ्रमण करता है । वह सुदूर अंतरिक्ष में भी अपनी ही आत्मा से अपने ही भीतर विचरता है । ॥ 1.
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सर्वम् हि इह तस्य बहिः तस्य अंतरेव ।
सर्वम् तु अपि तस्य न तस्य अंतरेण ॥2. 
भावार्थ :
यह सम्पूर्ण जगत उससे बाहर और उसके ही भीतर है । सब उसी का उसी से है, उसके बिना कुछ नहीं । ॥ 2.
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नादयति स्वरै: ढक्काम् नटराज शिवो ।
प्रसारयति नादम् त्रिलोकेषु अथ अन्तरे ॥3.
भावार्थ :
(वे) नटराज शिव अपने डमरू से स्वरों को निनादित करते हैं  । वे स्वर तीनों  लोकों तथा अपने हृदय में गूँजते हैं । ॥ 3.
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देवाः ऋषयः गन्धर्वाः मनुजाः यक्षरक्षांसि ।
प्रार्थयन्ति तम् कमप्यज्ञातपथगामिनम्  ॥4.
भावार्थ :
देव, ऋषि, गन्धर्व, मनुष्य, यक्ष तथा राक्षस सभी उस अज्ञातपथगामी (भगवान शिव) की प्रार्थना करते हैं । ॥ 4.
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प्रसीदयन्ति तम् दिव्यस्तुवनैः तस्मै तदापि ।
न शक्नुवन्ति द्रष्टुम् तमज्ञातपथगामिनम् ॥5.
भावार्थ :
यद्यपि अनेक दिव्य स्तोत्रों से उन्हें प्रसन्न करते हैं, तथापि उस अज्ञातपथगामी (भगवान शिव)  को कोई नहीं देख पाता । ॥ 5.
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उद्धर्त्तुकामः सनकादि सिद्धान्
एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ।
नृत्तावसाने नटराजराजो
ननाद ढक्काम् नवपञ्चवारम् ॥6.
भावार्थ :
(ऐसे ही किसी समय) सनक सनन्दन आदि सिद्धू का उद्धार करने हेतु  उस अज्ञातपथगामी (नटराज भगवान शिव) ने उनकी कामना की पूर्ति के लिए नृत्य करते हुए अंत में अपने डमरू को मुदित होकर नौ तथा पाँच, अर्थात चौदह बार बजाया । ॥ 6.
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कटाक्षेण दृष्ट्वा तान् एकदा सः विहसित्वा ।
ननाद ढक्काम् मुदितो शिवो नवपञ्चवारम् ॥7.
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भावार्थ :
एक बार स्मितपूर्वक उन्हें कटाक्ष से देखते हुए भगवान शिव ने नौ तथा पाँच संकेतों से उन्हें अक्षर समाम्नाय की दीक्षा प्रदान की।  ॥ 7.   
इति  ।
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अक्षर समाम्नाये  अइउण् च प्रथमाः स्युः ।
ऋलृक् द्वितीयास्तथा एओङ् तृतीयाः अपि  ॥8.
भावार्थ :
(शिवोक्त इस) अक्षर समाम्नाय में  अइउण् प्रथम हैं । ऋलृक् द्वितीय तथा एओङ् तृतीय हैं  ॥8.
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ऐऔच् चतुर्थाः सन्ति पञ्चमाः हयवरट् तथा ।
लण् च  ञमङणम्  एतानि षष्ठसप्तमाः  ॥9.
भावार्थ :
ऐऔच् चतुर्थ  तथा हयवरट् पञ्चम । लण् तथा ञमङणम् क्रमशः छठे और सातवें हैं ॥9
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ततः झभञ् घढधष् इति अष्टमा तथा नवमाः ।
एताः प्रदर्शिताः ताभ्यः ऋषिभ्यः  समाम्नायाः ॥10.
भावार्थ :
इसके बाद झभञ् तथा घढधष् ये क्रमशः आठवें तथा नवें हैं । इस प्रकार से उन भगवान शिव ने उन ऋषियों के लिए इस अक्षरसमाम्नाय प्रदान किया  ॥10.
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तदनन्तरे जबगडदश्दशमा खफछठथचटतवाः इति ।
कपय् शषसर् हलाः एताः पञ्चाभिः शिवेन ॥11. 
इसके पश्चात जबगडदश् दसवें खफछठथचटतव् ग्यारहवें आदि हैं ।
कपय् शषसर् तथा हल् ये बारहवें तेरहवें तथा चौदहवें हैं, इस प्रकार शेष पाँच का स्वरूप  भगवान शिव ने उन्हें स्पष्ट किया । ॥11.
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एतमक्षरसमाम्नायम् श्रुत्वा ऋषिभिः अन्तरे ।
अज्ञातपथगामिनम् नत्वा ससर्जुः संस्कृतामिमाम् ॥12.
भावार्थ :

अपने ही अन्तर्हृदय में ऋषियों ने इसे सुना, सुनकर उस अज्ञातपथगामी (भगवान शिव) को प्रणाम किया और संस्कृत भाषा के वैखरी स्वरूप को लोक के लिए उद्घाटित किया।
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फलश्रुतिः
चतुर्दशसमाम्नाये यो पठेदिदमक्षरम्  ।
चतुर्दशभुवनेषु सः प्राप्नुयात्  शारदाकृपाम् ॥
भावार्थ :
भगवान शिवप्रदत्त इस चौदह सूत्रयुक्त अक्षरसमाम्नाय का जो मनुष्य पाठ करता है, उस पर चौदह भुवनों में माँ शारदा के कृपा रहती है।    
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॥ ॐ शिवार्पणमस्तु ॥
   
                

November 28, 2014

॥ उल्लूक दर्शनम् ॥

॥ उल्लूक दर्शनम् ॥
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कुशयनम् रात्रौ तस्य निवसति अगेहे कुशासु ।
कुशासनस्थो स्वपत्यपि उल्लूको मुनि कौशिको ।।
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अर्थ :
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रात्रि में सोना उसके लिए वर्ज्य है। कुशयुक्त उजाड़ स्थान में वह किसी स्थायी घर की चिंता से रहित निवास करता है।  कुशा (घास) आसन पर बैठकर निद्रा (समाधि) सुख पाता है, उल्लूक को इसलिए कौशिक भी कहा जाता है।     
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November 26, 2014

॥ अज्ञातपथगामिन् कोऽपि ॥


A Hindi Poem by Anuj Agrawal and its Sanskrit rendering by me :
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समय की डुगडुगी बजाते बढ़ता जाता है
अज्ञात पगडंडियों से गुज़रता
अपने चिन्ह छोड़ जाता है
पर वो नज़र नहीं आता
देखने वालों को बस रास्ता नज़र आता है ।
सारे चिन्ह उसका पीछा करते हैं
वो हमेशा आगे चलता है
पर कहीं नहीं पहुंचता
कहीं नहीं जाता
उस तक पहुँचने वालों का इंतज़ार करता है ।
उसकी छोड़ी गयी मुस्कुराहट संसार है भूल भुलैया
हर कोई उस में खोया रहता है
वो कोई वजह नहीं बताता
गम्भीर मुद्रा में सोया रहता है
वो समझ नहीं आता
उसकी मुस्कान का रहस्य
कोई उस सा मुस्कुराने वाला ही जान पाता है !
अ से
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॥ अज्ञातपथगामिन्  कोऽपि  ॥
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डमड्डमड्डमड्डमयन् महाकालो
अग्रे सरति नादयन् काल-ढक्काम्
गच्छति अज्ञातचरणपथैः
स्थापयन् त्यक्त्वा निज पद चिह्नान्।
न दृश्यते अपि अन्यान्
अवलोकयन्ति  ते पथमेव तस्य।
येन अनुगच्छति कोऽपि सः.
चिह्नान् सर्वान् अनुसरन्ति  ते तदपि
सैव गच्छति अग्रे सर्वेषाम्।
न पर्याप्नोति लक्ष्यम् कमपि
न च गच्छति कुत्रापि
अपि ईक्षते-प्रति पथमागन्तुकानाम्
ये प्रपद्यन्ते पथम् तस्य।
तस्य स्मितम् हि  लोको
स्मृतिविस्मृतिविभ्रमो
जनाः विस्मृताः तस्मिन्
न वदति सः किमर्थम्।
स्वपिति गभीरामुद्रया ध्यानस्थ सः
न कोऽपि अभिजानाति
गूढ़ो हि तस्य  मर्मम्।
तदपि कोऽपि विरलो
विहसिते तस्य सदृशः
विजानाति सः अवश्यः
कोऽपि एव तस्य तुल्यः ॥
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November 02, 2014

आज की कविता /02 /11 /2014 अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः ॥

आज की कविता /02 /11 /2014 
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अद्यरचिता संस्कृता रचना 
अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....
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अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....
अतिदुर्लभं खलु नरजन्म,
ततो हि विप्रत्वम् द्विजत्वमपि ।
ततो दुःखदर्शनम् जगति
अस्मिनशाश्वति दुःखालये ॥

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

तदपि ईशानुग्रहेण कोऽपि
भवति समर्थोऽस्मिन् ।
विचिन्तयति तत्त्वम् 
स्वरूपमात्मनः जगतश्च ॥

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

केचिदिच्छन्ति रूपम्
केचिदिच्छन्ति शक्तिम् ।
केचिद्धनमपि सुखञ्च
विरलो हि कोऽपि भक्तिम् ॥

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

त्यजति नरो गृहम् 
निजपरिवारम् धनञ्च ।
स्वमित्वमपि जगति 
न  कोऽपि त्यजति व्यक्तिम् ॥ 

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

सत्यम् न त्यज्यमानः 
कुटिलो अहं-सङ्कल्पो ।
न  कोऽपि जानाति कथं वा 
सङ्कल्पमिमम् त्यक्तम्  ॥
अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

परं तु यदा जानाति 
सङ्कल्पदू:ख मूलम् ।
अयि पतत्यहं तूर्तम्
क्षिप्रम् हि भजेदीशम् ॥

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

अर्पयनात्मनम् स्वाम् 
प्राप्नोति तस्य भक्तिम् ।
विन्दति स्वात्मनिष्ठाम् 
विन्दति श्रीहरिम् सः  

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....
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October 18, 2014

आज की कविता : क्यूँ?

क्यूँ?
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एकता के लिए,
नारायण को समर्पित यह रचना,
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दिल के तारों को छू गया कोई,
छेड़कर दर्द क्यों गया कोई,
लौटकर यादें ही आया करती हैं,
याद में क्यों उभर आया कोई,
दोस्त हाँ दोस्त हैं सभी अपने,
फिर भी होता है क्यों बिरला कोई,
जिसका मिलना था सिर्फ़ इक सपना,
मिल के वो क्यूँ बिछड़ गया कोई,
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