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January 17, 2023

तो मैं क्या करूँ?

श्रेयस्, कर्मनिष्ठा और ज्ञाननिष्ठा

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शास्त्रों और तथाकथित धर्मों, दर्शनों और परंपराओं के बीच में फँसे हुए मनुष्य के सामने प्रायः यह प्रश्न :

"तो मैं क्या करूँ?"

प्रायः आता ही रहता है।

और सामान्य मनुष्य का ध्यान इस तथ्य पर कभी जाता ही नहीं कि कर्म किसके द्वारा किए जाते हैं!

जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है :

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।।

विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।१६।।

(अध्याय १८)

और यह समझना वास्तव में बहुत कठिन भी है कि "मैं" किसी भी कर्म का कर्ता नहीं हो सकता। किन्तु फिर भी, अत्यन्त अल्प बुद्धि मनुष्य के लिए भी सरल तरीका यही है कि नित्य-अनित्य के भेद पर वह ध्यान दे, और इसे समझने का प्रयत्न करे। इस प्रकार उसे करने के लिए एक कार्य भी मिल जाता है। वेदान्त के शास्त्रों में सर्वप्रथम इसकी ही शिक्षा पर बल दिया जाता है :

आदौ नित्यानित्यवस्तुविवेकः परिगण्यते।

इहामुत्रफलभोगविरागस्तदनन्तरम्।

शमादिषट्कसम्पत्तिर्मुमुक्षत्वमिति स्फुटम्।।१९।।

(श्री शङ्कराचार्य कृत विवेकचूडामणि)

इस अभ्यास से :

"मैं क्या करूँ?"

यह प्रश्न स्वयं ही अनावश्यक और अप्रासंगिक हो जाता है। जैसे जैसे समस्त दृश्य देखे सुने गए विषयों की अनित्यता पर अपना ध्यान जाने लगता है वैसे वैसे मन / चित्त का उन विषयों के प्रति लगाव भी क्रमशः कम होने लगता है। विशेष बात यह है कि यह अभ्यास किसी भी परिस्थिति में किया जा सकता है। अभ्यास के दृढ हो जाने पर अपने विचार, स्मृतियाँ, भावनाएँ, चिन्ताएँ आदि भी क्रमशः अनित्य प्रतीत होने लगते हैं, जो कि सर्वाधिक वाँछित है।

अन्ततः मनुष्य का ध्यान इस पर जाता है कि चेतना ही एकमात्र नित्य वस्तु है और चेतना ही उसका स्वरूप अर्थात् निज आत्मा भी है।

किन्तु यह कोई वैचारिक प्रक्रिया या बौद्धिक निष्कर्ष न होकर उसका प्रत्यक्ष बोध होता है।

सत्य की उपलब्धि का यह सरल उपाय है। 

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January 12, 2023

किंकर्तव्यविमूढ!

अर्जुन विषाद-योग / मैं क्या करूँ!

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किंकर्तव्यविमूढो यो जानाति न कर्तव्यम् ।।

ईश्वरो हि प्रेरयिता तं प्रेरयति तेन यत्कुरुते।।

(-इसे संशोधित किया जा सकता है।)

यह प्रश्न जो कि पुराने से भी पुराना है, उतना ही नित्य-प्रति और प्रायः नये से नया भी है, जो हर मनुष्य के मन में अवश्य ही उठा करता है।

"मैं क्या करूँ!"

सर्वत्र, सर्वव्याप्त और सार्वकालिक प्रश्न है, और अपनी बुद्धि से, परिस्थिति या किसी और के आदेश से मनुष्य कुछ तय कर लेता है जिससे वह किसी न किसी कार्य में प्रवृत्त हो जाता है। यद्यपि  तात्कालिक रूप से यह प्रश्न हल हो गया, ऐसा भी प्रतीत होता है, किन्तु परिस्थिति के बदलते ही यह पुनः पुनः उभरकर सामने आता रहता है। विषाद ही इसका स्थायी भाव है और असंतोष इसका स्थायी चरित्र।

इसलिए अर्जुन विषाद योग केवल अर्जुन के लिए नहीं, प्रत्येक ही मनुष्य के मन की स्थिति है, जिसमें कि हर कोई फँसा रहता है। इसमें जाति, समुदाय, स्त्री -पुरुष आदि का भी प्रश्न नहीं है।

इस प्रश्न का मूल है कर्तृत्व की भावना, जो कभी भोक्तृत्व, कभी स्वामित्व तथा कभी ज्ञातृत्व की भावना में परिवर्तित हो जाया करती है। और इनमें से किसी भी रूप में कोई इंगित प्राप्त होते ही मनुष्य किसी न किसी कार्य में संलग्न हो जाता है। विचार या चिन्ता भी ऐसा ही एक कार्य है। भोग, कुछ प्राप्त होने का लोभ और कुछ खो जाने का भय भी मनुष्य को किसी कार्य को करने के लिए बाध्य कर देता है। किन्तु यह प्रश्न कभी पूरी तरह से हल नहीं हो पाता और पुनः पुनः सिर उठाता रहता है। किन्तु मनुष्य के मन में जैसे ही :

"नित्य क्या है और अनित्य क्या है?"

यह प्रश्न उठता है, तो उसके चिन्तन और सोच-विचार उसे एक नितान्त भिन्न दिशा में ले जाते हैं, और उसके लिए :

"मैं क्या करूँ?"

यह प्रश्न अप्रासंगिक और व्यर्थ भी हो जाता है।

यही सांख्यनिष्ठा है, जबकि

"मैं क्या करूँ?"

यह प्रश्न मनुष्य की कर्मनिष्ठा का द्योतक है।

श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में सांख्यनिष्ठा के पात्र जिज्ञासु के लिए तथा बाद के सभी अध्यायों में कर्मनिष्ठा के पात्र जिज्ञासु के लिए उसके अनुरूप तदनुसार शिक्षा दी गई है, किन्तु अध्याय १८ में दोनों निष्ठाओं का एक ही फल होने से दोनों को समन्वित कर दिया गया है। 

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