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February 11, 2023

समय की सृष्टि

बुद्धि  और काल / समय

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किसी पोस्ट में मैंने वह कथा लिखी है कि किस प्रकार एक बार बुद्धि और काल के बीच विवाद हुआ। बुद्धि का नाम ही परिधि और काल का नाम क्षितिज था, जो दोनों ही भगवान्  वेदव्यास और उनकी पत्नी क्षिति की पुत्री और पुत्र थे। 

दोनों भाई-बहन के बीच हमेशा ही स्वयं को बड़ा साबित करने की होड़ होती रहती थी।

ऐसा ही एक प्रसंग था, जिसमें बुद्धि का दावा था कि वह काल से बड़ी है और उसके जन्म के बाद ही काल का जन्म हुआ था, जबकि काल का तर्क था कि बुद्धि का जन्म जिस समय हुआ, वह समय बुद्धि के जन्म से पहले भी था। दोनों अपना विवाद लेकर पिता के पास जा पहुँचे तब पिता ने कहा - बेटा, तुम दोनों जुड़वाँ भाई बहन हो, एक यम है दूसरा यमुना। यम अचल और अटल है, जबकि यमुना जगत्, रूपी यह प्रवाह है।

इसलिए समय की सृष्टि कब हुई, यह प्रश्न ही मूलतः भ्रामक है, और बुद्धि में ही इसका जन्म होता है, जबकि दूसरी ओर, यह भी सत्य है कि बुद्धि भी भिन्न भिन्न समय पर भिन्न भिन्न प्रकार से प्रकट और विलुप्त होती रहती है।

प्रख्यात भौतिकशास्त्री अलबर्ट आइनस्टाइन का भी यही मत था कि "समय" मनुष्य के मन या बुद्धि का विभ्रम मात्र है :

"Time Is Illusion."

इस प्रकार से जगत् की सृष्टि (रचना / Creation) का प्रश्न भी असंगत है, जिस समय को हम और भौतिकशास्त्री मानते और उस मान्यता के आधार पर मापते और उसका मूल्यांकन करते हैं, जिसे शास्त्रों में अनादि और अनन्त कहा जाता है, वह समय इस रूप में अनादि है कि कभी उसका आरंभ हुआ ही नहीं था, -न कि इस रूप में कि उसका आरंभ सुदूर और किसी अत्यन्त प्राचीन समय पर हुआ था। 

कल का पोस्ट लिखते समय उल्लिखित पोस्ट याद आया लेकिन वह कहाँ है, इसे खोजने का उत्साह न होने से खोज न सका।

समय के वैदिक, औपनिषदिक और पौराणिक वर्णन में समय /  काल के दो रूपों को स्वीकार किया जाता है जो नित्य, सनातन और शाश्वत तथा चिरंतन होते हुए भी अचल, अटल तथा सतत प्रवाहशील भी है। इसी विचार (थीम) पर ईशावास्योपनिषद् को इस दृष्टि से समझने और स्पष्ट करने का प्रयास मेरे :

"Thus Spake The Rishi"

ब्लॉग में मैंने किया है।

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January 22, 2023

क्या संसार कविता / काव्य है?

कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू ...

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ईशावास्योपनिषद्  मंत्र ८

Truth can not be exact.

Krishnamurti's Notebook

(Gstaad,  Switzerland July 15 1961)

श्री जे. कृष्णमूर्ति की नोटबुक का अनुवाद करते समय उपरोक्त पंक्ति में 'exact' के लिए हिन्दी में कौन सा शब्द उपयुक्त होगा यह सोचते हुए मन में एक शब्द कौंधा :

'याथातथ्यतः'

इस शब्द का प्रयोग उस अनुवाद में शायद मैंने किया भी होगा, किन्तु वह शब्द उन लोगों की दृष्टि में 'गरिष्ठ' था जो मेरे अनुवाद के कार्य को प्रकाशित करने से पहले सरल भाषा प्रयोग करने पर जोर देते थे। चूँकि उनके इस मत से मैं पूरी तरह सहमत था कि श्री कृष्णमूर्ति के साहित्य के अनुवाद का कार्य अत्यन्त ही और पूरी सावधानी से किया जाना चाहिए, इसलिए मैंने अपना कार्य पूर्ण कर उन्हें पाण्डुलिपि सौंप दी ताकि वे उनके विवेक के अनुसार उसे संशोधित, स्वीकृत, अस्वीकृत प्रकाशित करें या न करें, या अनिश्चित समय के लिए विचाराधीन बनाए रखें। मेरा न तो कोई आग्रह था न आग्रह करने का मेरा कोई अधिकार ही था क्योंकि यह कार्य मैंने स्वयं ही करना चाहा था, और इसे करने के लिए किसी ने मुझसे कहा भी नहीं था।

अब, "याथातथ्यतः" :

इस पोस्ट के उप-शीर्षक का प्रयोग ईशावास्योपनिषद् के मंत्र ८ में इस प्रकार से किया गया है :

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण-

मस्नाविर्ँ शुद्धमपापविद्धम्। 

कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतो-

ऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।।८।।

सः परि-अगात् शुक्रं अकायं अव्रणं अस्नाविरं शुद्धं-अपापविद्धं। कविः मनीषी परिभूः स्वयंभूः याथातथ्यतः अर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः।। 

One Who alone pervades within and also the without, Self-Resplendent, is not organism like a living body, has no blemish, abscess, hurt, defect, sore, injury or hurt, is without nervous activity, is Pure, ever so untouched by the sin.

Poet (कवि - सर्वत्र व्याप्त) Intelligent (मनीषा - मनसः ईश:) - is the Lord of the mind, is everywhere and beyond, An Expression of  Himself and on His own, One Who holds for all the times the Exact meaning / essence.

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January 07, 2023

संकल्प और संशय

चेतना, विचार और बुद्धि

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चेतना (ज्ञातृत्व) की दृष्टि से प्रत्येक ही प्राणवान और चेतन वस्तु / पुरुष में अपने होने का जो भान अनायास विद्यमान होता है, उसकी सत्यता का खंडन किसी भी तर्क, अनुभव या उदाहरण से नहीं किया जा सकता। यह भान स्वयं-भू, स्व-आश्रित होता है न कि कोई वैचारिक, अनुभवपरक या बौद्धिक निष्कर्ष जो कि सदा इस आधारभूत भान पर ही अवलंबित होते हैं और उनका उद्भव इसी भान से होता है। किन्तु यह भान कर्तृत्व, भोक्तृत्व, और स्वामित्व की भावना में रूपान्तरित हो जाता है, जो पुनः अज्ञान अर्थात् संकल्प और संशय  का रूप ग्रहण कर लेते हैं। यह एक नितान्त ही स्वाभाविक क्रम है और यही व्यक्तिगत 'स्व' या अहंकार (ego or individual) है। विशुद्ध चेतना पर ही इस प्रकार से चार वर्ण आरोपित हो जाते हैं। ब्राह्मण अर्थात् वह जो - "मैं जानता हूँ" ऐसा अभिमान करता है। क्षत्रिय अर्थात् वह जो - "मैं कर्म करता हूँ" ऐसा अभिमान करता है। वैश्य अर्थात् वह जो - "मैं भोग करता हूँ" ऐसा अभिमान करता है और शूद्र अर्थात् वह जो - "मैं स्वामी हूँ" ऐसा अभिमान करता है। ये सभी वर्ण अपने अस्तित्व के विशुद्ध भान-मात्र पर आरोपित हो जाते हैं और यह कार्य प्रकृति के द्वारा होता है। इसे और अच्छी तरह समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के निम्न कुछ श्लोक सहायक हैं --

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवता।।

क्षिप्रं हि मानषे लोक सिद्धिर्भवति कर्मज।।१२।।

चतुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।१३।।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।।

इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।१४।।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।।

कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वतः पूर्वतरं कृतम्।।१५।।

(अध्याय ४)

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।४८।।

(अध्याय १८)

किन्तु कर्म मोक्ष का गौण उपाय / साधन है, जबकि बुद्धि-योग मोक्ष का प्रधान उपाय / साधन है। 

इसे ही इस प्रकार से स्पष्ट किया जाता है --

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।४९।।

(अध्याय२)

क्योंकि,

न कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।।

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।५।।

(अध्याय ३)

ईशावास्योपनिषद् के प्रथम दोनों मंत्र भी क्रमशः बुद्धियोग और कर्म-योग के महत्व के सूचक हैं --

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्।।१।।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत्ँसमाः।।

एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।२।।

तथा "विवेकचूडामणि" के अनुसार :

चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये।।

वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किञ्चित्कर्मकोटिभिः।।११।।

कर्म की प्रेरणा ही संकल्प के रूप में व्यक्त होती है और उससे ही मनुष्य किसी फल-विशेष की आकाङ्क्षा करता हुआ संकल्प और संशय सहित कर्म-विशेष में संलग्न होता है। अपनी अपनी निष्ठा के अनुसार कोई भी मनुष्य बुध्दि-योग (साँख्यनिष्ठा) या / और निष्काम कर्म-योग का साधन लेते हुए श्रेयस् को प्राप्त कर लेता है।

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May 12, 2022

द्वितीया वल्ली

चौथा वर

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नचिकेता की प्रशंसा -- यमराज के उद्गार :

नचिकेता के विवेक, वैराग्य और परिपक्वता की परीक्षा करने के बाद उसके लिए चौथा वर प्रदान करने से पहले आत्म-ज्ञान की दुर्लभता और योग्य सुपात्र तथा अधिकारी मुमुक्षु का वर्णन इस प्रकार से किया :

नचिकेता! सुनो!!

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय-

स्ते उभे नानार्थे पुरुष्ँसिनीतः।। 

तयोः श्रेय आददानस्य साधु 

भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेय वृणीते।।१।।

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत-

स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।। 

श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते

प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते।।२।।

स त्वं प्रियान्प्रियरूपान्श्च कामा-

नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्स्राक्षीः।।

नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो

यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः।।३।।

दूरमेते विपरीते विषूची 

अविद्या या च विद्येति ज्ञाता।। 

विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये

न त्वं कामा बहवोऽलोलुपन्त।।४।।

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः

स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः।। 

दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा

अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः।।५।।

न साम्परायः प्रतिभाति बालं

प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्।। 

अयं लोको नास्ति पर इति मानी

पुनः पुनर्वशमापद्यते मे।।६।।

यमराज के द्वारा कहे जानेवाले उपरोक्त छः मंत्रों में, संक्षेप में तीन प्रकार के मनुष्यों की ओर संकेत किया जा रहा है :

पहले प्रकार के मनुष्य वे हैं, जो अपनी इच्छाओं के वश में होते हैं -- अर्थात् उनका मन अनेक इच्छाओं से परिचालित होकर विभिन्न प्रिय (प्रेय) विषयों की प्राप्ति और उनके उपभोग करते रहने में संलग्न रहता है।

दूसरे प्रकार के मनुष्य वे हैं, जिनकी इच्छाएँ उनके वश में होती हैं -- अर्थात् उनकी इच्छाओं पर उनके विवेक का नियंत्रण होता है, वे प्रेय को नहीं, श्रेय को चुनते हैं और श्रेय की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार उनका मन विवेक से परिचालित होता है। वास्तव में ऐसे ही मनुष्यों को धीर कहा जाता है। किन्तु तीसरे प्रकार के मनुष्य वे होते हैं जो अपने आपके धीर-गम्भीर पण्डित होने के अभिमान में डूबे होते हैं क्योंकि उन्होंने शास्त्रों का अध्ययन किया होता है। उनका सारा ज्ञान बौद्धिक ही होता है और उनका मन साँसारिक विषयों और उन विषयों में प्रतीत होने वाले आभासी और अनित्य सुखों को प्राप्त करने के लिए ही लालायित रहता है। ईशावास्योपनिषद् में उपरोक्त दो प्रकार के मनुष्यों के लिए क्रमशः यह कहा गया है :

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।।

ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः।।९।।

प्रेय को सभी जानते ही है, प्रेय की प्राप्ति के लिए ही हर मनुष्य प्रयास करता रहता है। किन्तु श्रेय की ओर ध्यान तो नित्य और अनित्य के सतत चिन्तन के फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाले विवेक, और संसार के प्रति वैराग्य के पैदा होने का ही परिणाम होता है। इस प्रकार नचिकेता विवेक और वैराग्य की परिपक्वता होने के ही कारण वह उस नित्य तत्त्व के विषय में जानना चाहता है, जो कि मृत्यु से परे है। मनुष्य के लिए यही श्रेयस्कर है।

यमराज कहते हैं कि प्रेय और श्रेय जीवन के ये दोनों लक्ष्य एक दूसरे से अत्यन्त विपरीत हैं और श्रेय को जीवन लक्ष्य की तरह ग्रहण करने से पहले आवश्यक है कि विवेक और वैराग्य प्राप्त कर लिए जाएँ।

नचिकेता! यह विवेक और वैराग्य रूपी जो दैवी संपत्ति है, तुम्हें पहले से ही प्राप्त है (जैसा कि गीता में अध्याय १६ में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था : 

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मति।। 

मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।५।।

जैसा कि इस उपनिषद् पर पोस्ट के प्रारंभ में ही उल्लेख किया जा चुका है, कि यह कथा प्रतीकात्मक रूप से आत्मानुसन्धान में संलग्न उस व्यक्ति की कथा भी हो सकती है जिसे कि उशना नाम दिया गया है, और नचिकेता जिसका आत्मज अर्थात् पुत्र है। चूँकि मन की उत्पत्ति आत्मा से होती है और आत्मानुसंधान किए जाने पर अहंकार- रूपी 'मन' को मृत्यु प्राप्त हो जाती है :

मृत्युञ्जयं मृत्युभियाश्रिताना-

महंमतिर्मृत्युमुपैति पूर्वम्।।

अथ स्वभावादमृतेषु तेषु

कथं पुनर्मृत्युधियोऽवकाशः।।२।।

(सद्दर्शनम्)

अन्य दृष्टि से देखें तो इस कथा को एक वास्तविक घटना के रूप में भी यद्यपि सत्य माना जा सकता है, किन्तु ऊपर उल्लिखित मंत्र ६ में जैसा कहा गया है, और वे लोग जो केवल इस लोक (और जन्म) को ही सत्य मानते हैं और मृत्यु के बाद की किसी संभावना पर सन्देह  करते हैं, उन्हें इस पर आपत्ति हो सकती है। इस दृष्टि से भी नचिकेता मनुष्य का अहंकार अथवा 'मन' है, ऐसा समझा जा सकता है।

इस प्रकार द्वितीया वल्ली के ६ मंत्रों की विवेचना की गई। 

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April 24, 2022

यथातथ्यता / Exactitude.

The Exact and Precise.

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किसी समय जे. कृष्णमूर्ति की पुस्तक :

J. Krishnamurti's Note-book 

का महत्व और भूमिका मेरे लिए vade-mecum जैसी थी।जब मैंने इसे पढ़ना प्रारंभ किया था यद्यपि उस समय मैं केवल इसकी भाषा-शैली से आकर्षित हुआ था, किन्तु धीरे धीरे इसकी भाषा मेरे लिए गौण होती चली गई और उससे जो भाव मैं ग्रहण करने लगा वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण होने लगा।

वह 1982 का साल था। 

मैंने जे. कृष्णमूर्ति की अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवादित दूसरी कुछ पुस्तकों जैसे कि जीवन-भाष्य, ज्ञात से मुक्ति, प्रथम और अंतिम मुक्ति, आदि को भी पढ़ा था पर मैंने उसमें व्यक्त उन विचारों का अर्थ समझने तक की चेष्टा तक कभी नहीं की, क्योंकि हमेशा से मुझे यही लगता रहा है कि किसी ग्रन्थ को पढ़ते समय अपनी बुद्धि से उसके तात्पर्य को समझने का प्रयास हमें उसके उस तात्पर्य से अत्यन्त दूर कर देता है जिसे ग्रन्थकर्ता व्यक्त करता, या करना चाहता है। 

मैं बस उन शब्दों को पढ़ता था और बिना कोई व्याख्या किए ही लेखक क्या कहना चाहता है, इसका अनुमान लगाने का प्रयास करता था।

बिलकुल इसी तरीके से मैंने :

श्री रमण महर्षि से बातचीत

को भी पढ़ा था।

बाद में श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषद् आदि को पढ़ते समय भी मैंने इसी तरीके का सहारा लिया।

वर्ष 2002 में मुझे :

J. Krishnamurti's Note-book

का हिन्दी अनुवाद करने की उत्सुकता हुई, और मैं उस कार्य में संलग्न हो गया। मेरे पास इस पुस्तक की जो प्रति थी उसके पृष्ठ 25 पर एक वाक्य मैंने पढ़ा :

"Truth cannot be exact."

(Gstaad, Switzerland, 16th July 1961)

इसे पढ़ते ही जो शब्द मेरे मन में आया वह था :

"यथातथ्यतः"

मुझे पता था कि यह शब्द अवश्य ही मेरी स्मृति से ही आया है, किन्तु मेरी स्मृति में वह कहाँ से आया होगा, मैं इसका अनुमान नहीं कर सका।

अभी कुछ दिनों पहले ईशावास्योपनिषद् की कक्षा में पढ़ाते हुए जब यह शब्द एकाएक मेरे सामने आया, तो मुझे वह प्रसंग याद आया।

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण-

मस्नाविर्ँ शुद्धमपापविद्धम्।।

कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतो-

ऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।।८।।

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