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May 26, 2025

26-05-2025 / POETRY

व्यथा-कथा, कथा-व्यथा!

कुछ भी!! 

कथा कह कह कर थका वाचक, 

तथा कह कह कर कथावाचक!

पुनः पुनः मांग कर यथा याचक,

व्यथा सह सह कर तथा याचक!

दौड़ दौड़ कर थका यथा धावक,

हाँफता हुआ रुका यथा धावक! 

कथा कह कह कर यथा श्रावक, 

अग्नि सा जलता रहा यथा पावक!

तान भरता रहा यूँ यथा गायक,

अभिनय करता रहा यथा नायक!

सतत सुख देता रहा सुखदायक,

सतत दुःख देता रहा दुःखदायक!

जिसने जो चाहा, उसे वो मिल गया,

जो कभी भी बन पाया इस लायक! 

***

March 11, 2025

11032025 / Poetry

कौन लेता है साँस?

--

अब तक कभी खयाल न था, 

दो दिनों पहले ही खयाल आया,

कौन लेता है साँस?

क्योंकि मैं तो नहीं लेता खुद!!

क्योंकि अगर मैं ही लेता,

तो भूल भी सकता था!

और अगर तय कर लेता, 

साँस को रोक भी नहीं सकता, 

इसलिए कोई और ही है जो, 

साँस लेता है, या नहीं लेता, 

वो मन या शरीर भी नहीं,

प्राण या संकल्प भी नहीं, 

इच्छा, भय या चिन्ता भी नहीं,

हाँ वही है यह तो कोई,

जो मेरे जागने सोने में,

जीने मरने, हँसने रोने में,

कुछ भी होने,  न-होने में, 

जो साँस लेता है, या नहीं लेता, 

हाँ जब वह साँस नहीं लेता, 

मुझको पता तो जरूर चलता है,

और फिर चाहकर भी मैं,

साँस को शुरू भी नहीं कर सकता!

तय है वही है, जो लेता है, 

या वही है, जो नहीं लेता, 

जिससे जीवन ही है यह,

जिससे ही शरीर भी है,

जिससे ही मन प्राण भी हैं,

जिससे इच्छा, भय संकल्प भी हैं,

जिससे संसार भी है, 

जिससे यह "जानना" भी है,

और यह "न-जानना" भी है!

और यह प्रश्न, जिज्ञासा भी है, 

कौन लेता है साँस, 

क्योंकि मैं तो नहीं लेता खुद! 

वह जो साँस लिया करता है,

या कभी कभी नहीं भी लेता, 

वह मैं तो नहीं हो सकता, 

तो वही तो कहीं ईश्वर ही नहीं?

और मैं उसको भूलकर खुद को, 

समझा करता था कि मैं ही हूँ,

जो साँस लेता है या नहीं लेता!

***


February 13, 2025

Truth Is Pathless Land.

प्रयागराज 

--

कठिन कुमारग पथ कुरंग को,

संग कुसंग विसंग असंग को, 

नहि पदचिह्न नभ विहंग को,

चिह्नविहीन तरंग उमंग को!

चित्रविचित्र रूपरंग को,

निराकार साकार अनंग को, 

अखंड अनंत कवि अभंग को, 

पावन सरल पवित्र गंग को! 

***





 

February 12, 2024

64. What Survives?

The Outliers.

Question  प्रश्न  64.

P O E T R Y

Did You Ever Wonder, 

What Survives In The End?

The Fear Of The Death,

Or The Death Of The Fear? 

Did You Ever Wonder, 

What Survives In The End? 

At The End of The Life,

In the Life Of The End, 

At The End Of The Time,

At The Time of The End?

What Survives, 

What Outlives,

Did You Ever Wonder?

Just That No One Knows,

Or No One Is There To Know?

***

November 14, 2022

ऐसा कुछ वाकया हुआ होगा!

कविता / 14-11-2022

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तुम्हारी ज़िन्दगी में...

अफ़सोस! 

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तुम्हारी ज़िन्दगी में छाया क्यूँ है इतना अन्धेरा!

क्या कभी इस रात का होगा सवेरा!

ग़मों ने क्यूँ बना ली है जगह दिल में,

ख़ुशी ने बसा लिया क्यों कहीं और डेरा!

क्या कभी ख़त्म भी होगा सिलसिला,

आशियाना अपना भी होगा कभी बसेरा!

हर रात के बाद हर रात क्या गुजरेगी यूँ ही,

क्या हर रोज घना ही होता रहेगा अन्धेरा!

तुम्हारी ज़िन्दगी में इतनी उदासी क्यों है, 

कौन से दुश्मनों ने रची है साज़िश इसकी, 

क्या उन दुश्मनों को डर नहीं है खुदा का,

या खुदा को नहीं है पता उनकी साजिश का!

अगर पता है तो कैसे उसको है ये गवारा!

तुम्हारी इस ज़िन्दगी में है क्यूँ इतना अँधेरा?

काश मैं मिटा सकता तुम्हारे इस अँधेरे को, 

कहीं से खींचकर ला सकता नये सवेरे को,

तो जरूर किसी भी क़ीमत पर मैं ला देता, 

पर हूँ मजबूर मैं, इस पर कहाँ है बस मेरा!

तुम्हारी ज़िन्दगी में छाया क्यूँ है इतना अन्धेरा!!

***

कविता / 14/11/2022





August 19, 2022

बहुत दिनों बाद...

प्रेरणा :

स्व. दुष्यन्त कुमार :

"ये रौशनी हकीकत में है एक छल लोगों!

कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों!"

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कविता : एक मायावी नदी यह!

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इस नदी में तैरना मुमकिन नहीं है, 

और तुम कहते हो नौकायन करें!

इस नदी में जो झलकती है दुनिया,

दर्पण में जैसे प्रतिबिम्बित है दुनिया,

इतनी सच जैसी ये, लगती है दुनिया,

पर है आभासी, नहीं है सच ये दुनिया!

पर है सच यह, चमत्कार हो सकता है,

कोई इसकी सतह पर, चल भी सकता है!

जल की जैसे मायावी, सतह है एक यह नदी,

संचार और संपर्क करने की हमारी यह सदी!

स्नेह नहीं, न सही, संबंध तो हो सकता है,

यहाँ संचार तथा संपर्क भी हो सकता है,

जो सिर्फ वहम, विचार भी हो सकता है,

व्यापार व्यवसाय का प्रचार भी हो सकता है!

इस नदी के जल से पर न बुझ सकेगी प्यास, 

करते रहो चाहे निरंतर, सतत कितना ही प्रयास!

संचार-युग की मृग-मरीचिका, मायावी नदी,

ज्ञान की तकनीक की, इक्कीसवीं यह सदी!

इससे अच्छा यही है, कि बैठ रामायण पढ़ें,

न कि उथली इस नदी में नौकायन करें!

***




 


July 28, 2022

वह, जो बाहर है!

कविता : 27-07-2022

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वह जो यहाँ है, वही वहाँ है, 

यहाँ और वहाँ के बीच का फ़ासला, 

चाहे जितना भी कम या ज़्यादा हो!

वह जो भीतर है, वही बाहर है,

वह जो बाहर है, वही भीतर है।

भीतर और बाहर के बीच का फ़ासला,

चाहे जितना भी कम या ज़्यादा हो!

वह जो बाहर है, वही भीतर है,

वह जो भीतर है, वही बाहर है।

कोई किसी को बदल नहीं सकता!

बाहर बिम्ब है, भीतर प्रतिबिम्ब है,

बाहर प्रतिबिम्ब है, भीतर बिम्ब है।

भीतर बिम्ब है, बाहर प्रतिबिम्ब है, 

भीतर प्रतिबिम्ब है, बाहर बिम्ब है।

बाहर, जो भीतर प्रतिबिम्बित है, 

भीतर, जो बाहर प्रतिबिम्बित है।

एक चुम्बित है, एक प्रति-चुम्बित है!

एक स्तंभित है, एक प्रति-स्तंभित है! 

एक अवलंबन है, एक अवलंबित है!

कौन क्या है!, क्या कौन है!

क्या कौन है?, कौन क्या है?

शब्द मौन है,  मौन शब्द है,

स्तब्ध निःस्तब्ध है, निःस्तब्ध स्तब्ध है!!

***

 




July 11, 2022

ख़बरें ही ख़बरें!

कविता 11-06-2022

दावतें-अदावतें 

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ख़बरें ही ख़बरें हैं काफी, दिल दहलानेवाली,

ऐसी भी हैं, और बहुत सी, दिल बहलानेवाली!

अंदेशे, भरोसे, उम्मीदें, तसल्लियाँ, मायूसियाँ,

संदेशे, शक-शुबहे, ग़ुस्ताखि़याँ, ख़ामोशियाँ,

राहतें, उलफ़तें, नफ़रतें, मुसीबतें, मासूमियाँ,

चाहतें, ग़फ़लतें, हसरतें, और गलतफ़हमियाँ!

बार बार पटरी से उतरती जा रही है जिन्दगी,

एक ही पटरी पर यूँ, चली जा रही है जिन्दगी!

***






ख़बरें  

April 04, 2022

मतलब / बेमतलब

 कविता / 03-03-2022

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यह भी एक राज़ / रहस्य है!

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मरने का क्या मतलब है,

जीते-जी किसने जाना!

जीने का क्या मतलब है,

मर-कर भी किसने जाना!

अगर किसी ने जाना भी,  

तो कैसे किससे, कह पाए,

और अगर न कह पाए,

बिन बोले कैसे रह पाए!

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April 01, 2022

जब मुझे कुछ नहीं करना होता!

कविता : एक अप्रैल 2022

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तब मुझे कुछ नहीं करना होता,

पंछी भोर होते ही, चहचहाते हैं,

और होती है, ताज़गी, ठंडी हवा में,

अभी सूरज भी तो उगा नहीं होता, 

सैर करने के लिए बाहर, रास्ते भी, 

सुनसान, स्तब्ध, और शान्त होते हैं,

मन प्रसन्न, उत्साह से भरा होता है,

और चल सकता हूँ मैं, मीलों तक, 

सतत-लगातार, अथक, -अनथक भी,

किन्तु फिर, लौटना भी तो होता है!

जब तक कि बढ़ जाता है कोलाहल,

सड़क पर भीड़, वाहनों की क़तार,

इससे पहले कि हवा में धूल-धुँआ, 

और शोर-शराबा दबोच लें मुझको,

खींच लेता हूँ कुछ गहरी साँसें भीतर, 

भर लेता हूँ हृदय, सीने में ताज़ा हवा, 

लौट आता हूँ करके सैर, घर वापस,

तब मुझे कुछ नहीं करना होता! 

***






March 31, 2021

ज़रूरत / उम्मीद,

आज की कविता 

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पूरी हो जाए अगर, 

आज की ज़रूरत,

तो यही काफी है,

कल का भरोसा,

उम्मीद होना तो,

है दूर की बात!

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March 09, 2021

नए सिरे से!

आज की कविता 

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कोई भी साज़ उठाओ,  सुर छेडो़ नए सिरे से,

पुरानी धुनें ही न फिर फिर दुहराओ, नए सिरे से!

हाँ ये मेहनत, मशक्कत और है मिज़ाज अगर,

कर लो इसका भी रियाज कुछ, नए सिरे से! 

किसी भी और की रचना, गीत या ग़ज़ल कोई,

ये ठीक नहीं है बिलकुल, अपनी रचो, नए सिरे से!

फूटती है हर नई कविता, नए ही किसी अंकुर सी,

बीज बोकर के फिर उसे उगने दो,  नए सिरे से! 

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हाय रे! सोच के दायरे!

आज की कविता 

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"सोचता है कौन?" - यूँ भी क्या सोचा कभी! 

"सोचता है मौन, क्या?" -यूँ भी क्या सोचा कभी! 

'सोच' खुद ही सोचता है,  जाल बुनता और बनता है,

कारागार खुद ही खुद के लिए अपना खुद का बनता है।

अपने बनाए कारागृह में  खुद ही रहता है, 

नित ही धरकर नए रूप, ढलता बदलता है। 

कौन उसको समझाए,  -यूँ भी क्या सोचा कभी!

"सोचता है मौन, क्या?" -यूँ भी क्या सोचा कभी! 

"सोचता हूँ", -सोचना यह, नहीं है क्या कोरा वहम? 

'सोच' है, पर क्या हैं कोई, 'सोचनेवाले' 'मैं' या हम? 

यह वहम, बुनियाद भी तो नींव बिलकुल खोखली, 

'सोच' में ढल, 'सोच' सी बन, 'ठोस' लगती है भली!

है 'किसे' पर यह वहम,  -यूँ भी क्या सोचा कभी!

सोचता है मौन 'क्या',  -यूँ भी क्या सोचा कभी! 

दीए तले, नीचे अन्धेरा, थरथराना लौ के साथ,

ढूँढता है चैन, व्याकुल, पर न आए, उसके हाथ!

देखता है रौशनी, हर तरफ बिखरी हुई, 

पर न पाए देख लौ जो, जल रही निखरी हुई!

देख भी पाएगा, लेकिन, -यूँ भी क्या सोचा कभी!

दीप है क्या सोचता, -यूँ भी क्या सोचा कभी! 

'सोच' की अपनी रिहाई, कैसे खुद की कैद से! 

उसके बनाए, जिसमें कैदी, उसके ही संसार से!

उम्र-कैद ऐसी कि जिससे, मरने से ही होगी रिहाई,

मृत्यु क्या वह मुक्ति है, किसने कब ऐसी मुक्ति पाई!

मुक्त है क्या, सोचता, -यूँ भी क्या सोचा कभी!

सोचती है, मुक्ति क्या,  -यूँ भी क्या सोचा कभी? 

--







August 24, 2019

हेडलेस चिकन्स .... / Headless chickens .

एक कविता / आज की कविता
हेडलेस चिकन्स ....
(शीर्षक-रहित)
--
रोजी-रोटी के लिए ज़रूरी,
सही-गलत, फिर धन्धा क्या?
सरपट दौड़े, सुस्त कभी,
तेज कभी, या मन्दा क्या?
करने की जब ठान ही ली,
अच्छा या फिर, गन्दा क्या ?
मज़बूरी के मारे हैं सब,
अल्ला क्या, और बन्दा क्या,
कभी तेज, कम रौशनी,
सूरज क्या, और चन्दा क्या ?
जब मरने की ठान ही ली,
फिर फ़ाँसी का फ़न्दा क्या ?
जिसके पर ही टूट गए,
उड़ता वह, परिन्दा क्या?
बीत गए दिन जिस डाली के,
आए वक़्त, आइन्दा क्या?
--
24 अगस्त 2019,

June 16, 2019

अजनबी हर दिल अज़ीज़

आज की कविता 
दौरे-मोबाइल
--
हर मरीज़ अब चाराग़र हो गया है,
लगाकर 'आला' सुनता है कानों से,
दिल की धड़कनें, दूसरे मरीज़ों की,
हर हकीम अब मरीज़ हो गया है !
जाँचता है सपने, बाँटता है तसव्वुर,
ख़याल, तस्वीरें, ग़म, मुस्कुराहटें, 
देखता है पर्दे पे चेहरे, मरीज़ों के,
सुना करता है शिकवे, शिकायतें, ग़िला,
अजनबी हर दिल अज़ीज़ अब हो गया है !
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देवास, 16 / 06 / 2019  

June 08, 2019

हसरतों का हश्र

आठ पंक्तियाँ 
--
हसरतों का हश्र ये होगा नहीं मालूम था,
क़सरतों की क़सर कहाँ कम पड़ गयी,
आरज़ूओं की देते रहे हम अर्ज़ियाँ,
ख़्वाहिशें सब ख़्वाब बनकर रह गईं।
मर्ज़ की इस तर्ज़ की तरज़ीह थी,
हर्ज़ का हर्ज़ाना भी हम देते रहे,
देना न देना था मगर मर्ज़ी उसकी,
रेत पर कुछ नाव यूँ खेते रहे।
--


November 06, 2018

आज की कविता / खुशबू

मैं हवा की तरह आया था,
मैं हवा सा लौट जाऊंगा,
तेरी साँसों से तेरे दिल में,
मैं चुपके से उतर जाऊंगा।
नज़र आऊंगा मैं हर तरफ,
लेकिन न देख पाओगे,
हर तरफ क्योंकि मैं तब,
खुशबू सा बिखर जाऊंगा। 
--




October 13, 2018

कब होगी?

इस रात की सुबह ....
--
पूरब में 'तितली' पंख फड़फड़ाती है,
सागर से बीस-बीस फुट ऊँची लहरें,
कर देती हैं, 'नई' सभ्यता को तबाह,
ध्वंस का उल्लास नहीं बख्शता है,
किसी ऊँची इमारत को, टॉवर को,
'तितली' जानती है, कब बदला लेना,
बड़े-बड़े होर्डिंग्स, झूलते गिरते हैं,
और हवा का ताण्डव, उलट देता है,
सजावटी चेहरों पर चढ़ी नक़ाब ,
मी टू, यू टू, दे टू, ही टू, वी ऑल,
दौड़ते हैं ढूँढते हैं, छिपने की जगह,
तितली नहीं पता कितनी नाज़ुक है,
उसके पंखों के वार कितने कातिल हैं,
उड़ते उड़ते ही बिखेर देगी टुकड़े टुकड़े,
उड़ा देगी धज्जियाँ, लिपे पुते चेहरों की,
कुछ इस तरह कि न पहचान सकेंगे,
और न दिखा सकेंगे, किसी को भी,   
मी टू, यू टू, दे टू, ही टू, वी ऑल,
--
'ध्वंस का उल्लास' 

August 03, 2018

आज की कविता 'प्यास'

आज की कविता
 'प्यास'
--
डगर बहुत कठिन पनघट की,
प्यास बड़ी गहरी पर घट की,
एक घड़ा मिट्टी का बना,
मन-प्राणों का दूजा बना,
बाहर की प्यास पानी से बुझे,
भीतर की कौन बुझाए, बूझे?
रह रह उठती-बुझती प्यास,
या पानी की झूठी आस,
पानी धरती पर चारों ओर,
जिसका कहीं ओर ना छोर,
भीतर शुष्क हृदय मन गात,
मृत्यु जीवन को देती मात !
--