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January 19, 2025

Mohini.

FICTION

--

नानी का घर

यह कथा कब शुरू हुई और कब समाप्त होगी कुछ नहीं कहा जा सकता है। इस कथा को समझने के लिए एक उदाहरण उपयोग में लाया जा सकता है। जैसे कि कोई वृत्तीय समतल (a flat circular disc) जो अपने केन्द्र पर घूम रहा है। जैसे कि एक स्थान पर स्थित कोई पहिया। जैसे यांत्रिक घड़ी (mechanical clock)  में अनेक छोटे-बड़े दाँतेदार गियरनुमा पहिए हुआ करते हैं, जो कि स्प्रिंग व्हील या बैलेंस व्हील से नियंत्रित होकर घड़ी के 'समय' को निर्धारित और परिभाषित करते हैं।  स्पष्ट है कि 'समय' का आभास भी, स्थान की ही तरह कल्पना पर आधारित एक धारणा / विचारमात्र होता है न कि आदि अन्त से रहित वास्तविकता। 

अपने केन्द्र के चारों ओर घूमते हुए इस वृत्तीय समतल  के अनेक बिन्दुओं में से प्रत्येक की अपनी कोणीय गति और रैखिक गति का अनुपात स्थिरांक (constant) नहीं होता है? केन्द्र से उसकी दूरी के अनुसार चूँकि एक ही समय अन्तराल में वह केन्द्र का एक परिभ्रमण पूर्ण कर लेता है, अतः उसकी रैखिक और कोणीय गति का अनुपात स्थिर होगा जिसे कि अतिपरवलीय समीकरण (hyperbolic equation) :

x.y = c.c

से व्यक्त किया जा सकता है, जहाँ  x और y रैखिक और कोणीय गति तथा c एक नियतांक (constant)  हैं।

यह उदाहरण द्वि आयामी तल पर गणितीय आकलन हुआ।  इसे ही त्रि आयामी तल पर प्रयुक्त करें तो इस आधार पर  ग्रहों और आकाशीय पिण्डों के बारे में भी कोई आकलन किया जा सकता है।

इस प्रकार समस्त स्थान बिन्दु में ही समाहित है और उस का ही विस्तार तथा संकुचन मात्र है।

रेवा तट पर घूमते हुए यही विषय चित्त में चल रहा था। यूँ कहें कि "मैं" ही वह चेतन बिन्दु है जो अत्यन्त सूक्ष्म होकर संकुचित और स्थूल होकर विस्तारित हो जाता है।

अपने इस चित्तरूपी बिन्दु के भीतर ही  काल और स्थान का आभास उत्पन्न होता है और एक संसार स्थूल शरीर के बाहर और एक स्थूल शरीर के भीतर विद्यमान है ऐसा प्रतीत होता है। क्या वस्तुतः ऐसे परस्पर भिन्न चित्त हैं या वे तात्कालिक और आभासी रूप से प्रतीत होते हैं?

कैवल्यपाद का :

निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात्।।४।। 

सूत्र यहाँ प्रासंगिक है।

योगदर्शन के इस पूरे चौथे अध्याय कैवल्यपाद में इसी विषय पर विवेचना की गई है।

अस्मिता क्या है?

साधनपाद में उल्लिखित सूत्र ५ के अनुसार -

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः।।

।।५।।

अस्मिता क्लेश है।

संक्षेप में, आभासी संसार में अस्मिता की मात्रा के साथ संलग्न चित्त असंख्य हैं।

दो तीन माह से सुविधा उपलब्ध न होने से, आलस्य या अन्य कुछ ज्ञात अज्ञात कारणों से सिर और दाढ़ी मूँछों के बाल अव्यवस्थित ढंग से बढ़ गए हैं।

नर्मदा तट पर मेरे जैसे अनेक ग्रामीण और पर्यटक आते जाते रहते हैं और प्रायः कोई किसी से इस बारे में कोई बातचीत नहीं करता।

दो दिन पहले यहाँ स्थित दुकानों में से एक पर गया तो दुकानदार से एक दो ग्राहक सामान ले रहे थे। ये सभी आसपास ऐसी ही छोटी बड़ी दुकानें चलाते हैं।

वे लोग मेरे बारे में बातें कर रहे थे, हालाँकि उन्हें मैं नहीं पहचाना। मेरा ध्यान सब्जी पर था। तब दुकानदार ने प्रश्न किया :

"कुम्भ स्नान में नहीं जा रहे हैं?"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। 

फिर उसने पूछा :

"जाना नहीं चाहिए?"

मैंने कहा :

"(चाहिए) यह शब्द मेरी किताब में नहीं है। जा सकता हूँ या शायद न भी जा पाऊँ! मैं इस बारे में कुछ नहीं सोच सकता। जो होता है वह होता है, जो नहीं होता वह नहीं होता। और फिर यहाँ माई (नर्मदा) है न! जैसी भी उसकी मरजी!"

सामान लेकर घर / आश्रम लौटा तो ध्यान आया -

कल ही माई से पूछा था तो बोली थी -

"चले जाओ बेटा!  हो आओ नानी के यहाँ कुछ दिन!"

"नानी?"

मैं सोच में पड़ गया। फिर समझ में आया गंगा को वह "नानी" कह रही थी। ठीक ही तो है! वह (नर्मदा माई)  शिवजी की बेटी है और मैं उसका बेटा! तो गंगाजी मेरी "नानी" ही तो हुई!

पर अब संकल्पपूर्वक कुछ कर पाना मेरे लिए असंभव सा हो गया है। एक समय था जब मैं संकल्पों को उठने से रोक नहीं पाता था। फिर लगातार ऐसा होता रहा और अब भी अकसर होता है कि मन में संकल्प आते ही और उसे पूरा करने के बारे में सोचते हुए ही कोई न कोई ऐसा विघ्न आ जाता है कि संकल्प करना तक व्यर्थ अनुभव होने लगता है, उसे पूरा करना तो और भी अधिक। 

फिर भी 'समय' निरन्तर अपनी रैखिक और कोणीय गति के साथ "बीत" रहा है।

घर / आश्रम पर आकर यू-ट्यूब पर कोई न्यूज़ चैनल देख रहा था तो वहाँ रिपोर्टर "हैप्पी हैप्पी" नाम की एक बन्जारन से बातें कर रहा था। उसकी भाभी भी वहाँ आ गई जिसका नाम "रूपरेखा" है। ये लोग महेश्वर नामक स्थान में और उसके आसपास रहते हैं और रुद्राक्ष तथा दूसरे रत्नों आदि की मालाएँ बेचने का व्यवसाय करते हैं। इसलिए कुंभ मेले में उनका जाना स्वाभाविक ही है। और फिर इन बन्जारों और उनके समुदाय के लोगों की बातें होने लगीं। उनके नैन नक्श और सौन्दर्य की भी। पता चला कि बहुत से मनचले और फिल्मी हस्तियाँ भी इन पर मुग्ध हैं। फिर सलमान खान का भी जिक्र हुआ। 

याद आया कि राजस्थान में कहीं कृष्णमृग का शिकार करने का आरोप भी सलमान खान पर लगा और शायद इसलिए भी बिश्नोई समुदाय के कुछ लोग उसके शत्रु हो गए। ये बन्जारिनें भी मृगनयना हैं और विष्णु का मोहिनी रूप भी शायद यही हैं।

एक ओर तो एक वह बन्जारिन थी जो भगवान् राम की प्रतीक्षा में जैसे तैसे जीवन बिता रही थी और फिर उन्हें  जूठे बेर खिलाकर धन्य हो गई, तो दूसरी ओर ये भी हैं - बन्जारिनें, कृष्णमृग और शबरी!

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते!! 

*** 







August 28, 2024

चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः

Question / प्रश्न 105

चित्तभूमि और चित्त की विभिन्न भूमिकाओं के मध्य क्या संबंध है?

अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच क्या संबंध और भेद है?

Answer /  उत्तर :

चित्  (चैतन्य) / Awareness, 

चित्त (mind, consciousness),

और चेतना ( Consciousness)

इन शब्दों का तात्पर्य जानने के बाद ही पातञ्जल योगसूत्र के अध्याय ४, कैवल्यपाद के निम्न सूत्रों को ठीक से समझा जा सकता है :

--

जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजा सिद्धयः।।१।।

जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्।।२।।

निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्।।३।।

निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात्।।४।।

प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्।।५।।

तत्र  ध्यानजमनाशयम्।।६।।

कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्।।७।।

(भाष्य -

चतुष्पदी खल्वियं कर्मजातिः।

कृष्णा शुक्लकृष्णा शुक्लाऽशुक्लाकृष्णा चेति।

तत्र कृष्णा दुरात्मनाम्।

शुक्लकृष्णा बहिःसाधनसाध्या।

तत्र परपीडानुग्रहद्वारेणैव कर्माशय प्रचयः।

शुक्ला स्वाध्यायध्यानवताम्।

सा हि केवल मनस्यायत्तत्वादबहिः साधनाधीना न परान्पीडयित्वा भवति।

अशुक्लाकृष्णा संन्यासिनाम् क्षीणक्लेशानां चरमदेहानामिति। 

तत्राशुक्लं योगिन एव फलसंयन्सादकृष्णं चानुपादानात्।

इतरेषां तु भूतानां पूर्वमेव त्रिविधमिति।)

ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम्।।८।।

जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरकरूपत्वात्।।९।।

तासामनादित्वं चाऽऽशिषो नित्यत्वात्।।१०।।

हेतुफलाश्रयलम्बनैः सङ्ग्रहीतत्वादेषामभावे तदभावः।।११।।

अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम्।।१२।।

ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः।।१३।।

परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्वम्।।१४।।

वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः।।१५।। 

(पातञ्जल योगसूत्र अध्याय ४ कैवल्यपाद)

उपरोक्त सूत्रों में क्रमांक ५ और ६ को रेखांकित किया जा रहा है ताकि यह स्मरण रहे कि चेतना यद्यपि एक है फिर भी वह अनेक रूपों में चित्त के रूप में अभिव्यक्त होती है। सूत्र १५ तक इसे ही स्पष्ट किया गया है।

चित्त की भूमि तो एक ही है, और जैसे भिन्न भिन्न स्थानों की मिट्टी अलग अलग प्रकार की होती है, उसी तरह से चित्त में उठनेवाली वृत्तियाँ भिन्न भिन्न प्रकार की होती हैं। 

विभिन्न वृत्तियाँ ही चित्त की भूमिकाएँ हैं। जिनमें से पाँच प्रमुख हैं -

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।।

जैसा कि योग की परिभाषा (योगानुशासनम्) में प्रारम्भ में ही समाधिपाद में कहा जा चुका है :

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।।२।।

और अगले ही सूत्र में परिणाम अर्थात् निरोध-परिणाम  के बारे में भी :

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।।३।।

तब द्रष्टा स्वरूप में अवस्थित (किन्तु आवश्यक नहीं कि अधिष्ठित) होता है। और इसके बाद ही -

वृत्तिसारूप्यमितरत्र।।४।।

का उल्लेख है, जिससे यह स्पष्ट है कि चित्तवृत्ति पर से निरोध-परिणाम के समाप्त होते ही चित्त पुनः शेष चार प्रकार मूढ, क्षिप्त, एकाग्र या सुषुप्ति में से किसी भी एक से तादात्म्ययुक्त (identified) हो जाती है। वृत्तिमात्र से यह विचलन ही तादात्म्य (identification) है, जिसमें विषय और विषयी के रूप में वृत्ति की पहचान स्थापित हो जाती है। पहचान, स्मृति और तादात्म्य एक ही वस्तु के भिन्न भिन्न नाम हैं। यही अनुभव और अनुभव की स्मृति काल्पनिक और एक स्वतंत्र अनुभवकर्ता के आभासी विभाजन को जन्म देती है। कल्पना वृत्ति है।  वैचारिक चिन्तन, वृत्ति है। और जैसा कहा जा चुका है,  वृत्ति का उद्भव और लय, प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति इन पाँच रूपों में होता है। इसलिए अनुभव और अनुभवकर्ता दोनों स्वरूपतः वृत्ति ही है। विचार और विचारकर्ता भी वृत्ति ही है। चूँकि वृत्ति को निरुद्ध करने पर भी "मैं" रूपी विचार पृष्ठभूमि में बना ही रहता है, अतः वह द्रष्टा / स्वरूपतः आत्मा नहीं होता। इसीलिए महर्षि पतञ्जलि बाद में सविचार / सवितर्क, सविकल्प और निर्विकल्प, निर्विचार, सबीज तथा निर्बीज समाधि का उल्लेख भी करते हैं।

जब तक कोई -

"Control" / निरोध किसका और कैसे?,

और आत्मज्ञान / आत्म-साक्षात्कार को "beyond experience" कहता है तब तक उसे " आरुरुक्षु" कहते हैं। और जब उसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अनुभव और अनुभवकर्ता एक ही वस्तु (वृत्तिमात्र) हैं, तो उसे "योगारूढ" कहते हैं।

साँख्य दर्शन यहाँ से प्रारम्भ होता है।

योगाभ्यास करते समय चित्तवृत्ति पर जो तीन प्रकार के प्रभाव होते हैं उन्हें क्रमशः एकाग्रता- परिणाम, निरोध-परिणाम और समाधि-परिणाम कहा जाता है। जब तीनों प्रभाव संयुक्त होते हैं तो उसे संयम  कहा जाता है। 

त्रयमेकत्रः संयमः

सूत्र में संयम को परिभाषित किया गया है।

प्रायः भूल या प्रमादवश संयम और निरोध दोनों को ही "Control"  कह दिया जाता है, और उन्हें एक दूसरे के समान समझ लिया जाता है।

किन्तु जब तक "नियंत्रण / संयम  / control  किसका और कैसे?" यह प्रश्न है, और जिसे भी यह प्रश्न है वह "संशयकर्ता" ही अहं-प्रत्यय / अहं-संकल्प / अहं-वृत्ति है। उसका निवारण होना ही निर्बीज समाधि है। उसके बने रहने तक जो समाधि होती है उसे सबीज समाधि  कहते हैं। सबीज समाधि भी सविकल्प और निर्विकल्प प्रकार की हो सकती है। निर्विकल्प भी योगाभ्यास का परिणाम हो सकती है। तब उसे केवल निर्विकल्प कहा जाता है। और योगारूढ के लिए अब भी संस्कार-रूपी बाधाएँ विद्यमान होती हैं, और उनका शमन किया जाना होता है -

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।

इसलिए आत्मज्ञान /आत्मसाक्षत्कार हो जाने के बाद भी (जो योगाभ्यास की चौथी भूमिका / तुरीय में हो जाता है), उपासना / साधना समाप्त नहीं होती, और अनायास होती है। इसे ही "तप" कहते हैं स्वयमेव होती है इसलिए इस स्थिति में आलस्य का कोई स्थान नहीं होता।

इसीलिए सात लोकों -

भूः - material existence, 

भुवः - consciousness / mind, Life, 

स्वः - sense of individuality,

जनः - Life-forms,

महः - greatness and spiritual, occult powers,

तपः

और,

सत्यं Ultimate Reality

में

तप - austerities

का स्थान सत्य से पूर्व है।

यह तप प्रतिरोध (resistance), प्रयास (effort)  नहीं बल्कि आत्मा ही है।

और महर्षि पतञ्जलि ने पाँच सार्वभौम व्रतों / यमों में सत्य से भी प्रथम स्थान अहिंसा रूपी  तप  को दिया है:

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः यमाः।।

यमलोक में कोई यमराज के अनुशासन का उल्लंघन नहीं कर सकता।

***






August 09, 2024

ज्योति दिन रैना जागे!!

अस्ति भाति  प्रीति

अस्तित्व तो प्रत्यक्ष कालनिरपेक्ष अकाट्य सत्य है।

और अस्तित्व का भान भी वैसा ही कालनिरपेक्ष और अकाट्य सत्य है। 

यह भान जिसे है, वह है बोध अर्थात्  चेतना ।

बोध या चेतना भी कालनिरपेक्ष है, जिसमें जिसका भान होता है उसे जगत् कहा जाता है और जिसे इस जगत् का भान है वह है स्वयं कोई। ये दोनों साथ साथ ही दृष्टिगत होते हैं और इसी प्रकार दोनों साथ साथ ही दृष्टि से ओझल भी होते रहते हैं।

कस्मिन् सति?

सत्ब्रह्मणि। यत् तत् सत् तदेव ब्रह्म सत्पर्यायम्। अतो हि सति वा ब्रह्मणि। यद्भानं वर्तते तत्र, तस्मिन् ब्रह्मणि एव स्वस्य भानम्। अपि च, तद्भानं न तु जायते, न लीयते वा। यज्जायते, वर्तते, लीयते वा तद् बुद्धिः। बोधाद्धि सा बुद्धिः। सतो वा ब्रह्मणः न जन्म न च अवसानम्। एतद्धि ब्रह्मज्ञानम्।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः।।१६।।

(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय २)

अपि बुद्धेः जन्मनि तद्ब्रह्मज्ञानं व्यष्टिबोधं भवति। अस्मिन् व्यष्टिबोधे हि ब्रह्मणि वा सति जायते स्वस्य जन्मबोधम् व्यष्टिबोधे व्यष्टिरूपेण च।।

एतस्मिन् व्यष्टिबोधे हि भवतः स्व-जगती। यत्र स्व इति शरीरविशेषः वा अहं, अपि जगत् इति च इदम्।।

एवं ब्रह्मज्ञानं भवति व्यष्टिज्ञानमस्मिन् भासमाने जगति।

तस्मात् अस्मिञ्जगत्येव कालस्थानौ कल्प्येते।।

न तौ सति वा ब्रह्मणि कथं वा कदाचन्।।

अपि व्यष्टिबोधे तौ प्रतीयेते एवं तयोः स्मृतिः च जायते।।

स्मृतिः इति वृत्तिः।।

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः।।११।।

(समाधिपाद)

एवं हि जायते स्वस्य प्रतिमा अस्मिन् शरीरे।

वृत्तिर्हि चित्तम्।। 

चित्तमेव चित्तं,

प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्।।५।।

उपरोक्त

(कैवल्यपाद)

तस्मात् न व्यष्टेः स्वतन्त्रसत्ता।।

व्यष्टिभावापन्नंं चित्तं हि अज्ञानम् स्वरूपस्य द्रष्टुः।।

द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् चेद्योगः।।

चेतनो हि चेतना व्यष्टिरूपेण समष्टिरूपेण वापि।

तयोर्द्वयोरेकरूपतया।।

अतः अस्ति भाति प्रीति ही पर्याय से सत् चित् प्रेम है।

चेतनारूपी यही ज्योति नित्य, सनातन और शाश्वत जीवन है और यही आत्मज्ञान भी है।

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।।

न च कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

नादत्ते कस्यचित्पापं सुकृतं चैव न विभुः।।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।१५।।

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितं आत्मनः।।

तेषां आदित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम्।।१६।।

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १५)

आशा है कि यदि उपरोक्त विवेचना में संस्कृत व्याकरण की कोई संभावित त्रुटियाँ हों तो उनका शोधन सुधी और विद्वज्जन स्वयं ही कर लेंगे। 

***











July 04, 2023

Question 30

Question  30.

प्रश्न 30.

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Lasting Relationships :

Why Relationships don't last? 

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रिश्ते वास्ते कब, कैसे और क्यों ख़त्म हो जाते हैं? 

उत्तर / Answer :

पहले कभी मैंने "अर्थ और प्रयोजन" शीर्षक से एक पोस्ट लिखा था। यहाँ उसी विषय को पुनः

" अर्थ या प्रयोजन"

के सन्दर्भ में लिख रहा हूँ।

प्रयोजन और अर्थ का परस्पर संतुलन और सामञ्जस्य हो तो दोनों एक दूसरे के पर्याय हो जाते हैं। और यदि ऐसा न हो तो दोनों एक दूसरे के विपर्याय हो जाते हैं। परिवर्तनशीलता जीवन का नित्य सत्य है। जीवन इस दृष्टि से सतत द्वैत है। फिर यही द्वन्द्व, दुविधा हो जाता है। कुछ पंक्तियों में :

जीवन से लंबे हैं बन्धू!

ये जीवन के रस्ते!

इक पल रोना होगा, बन्धू, 

इक पल चलना हृषीकेशं, 

ये जीवन के रस्ते!  

राहों से राही का रिश्ता,

कितने जनम पुराना!

एक को आगे जाना होगा, 

एक को पीछे आना!

मोड़ पे रुक मत जाना, 

(बन्धूऽऽऽऽ)

दोराहे पे फँस के!

ये जीवन के रस्ते! 

जीवन से लंबे हैं बन्धू,

ये जीवन के रस्ते! 

जैसे ही जीवन में किसी लक्ष्य, आदर्श या गन्तव्य कक विचार या कल्पना कर ली जाती है, मन अतीत की स्मृति के आधार पर ही ऐसा कर पाता है। इस लक्ष्य, आदर्श या गन्तव्य आदि का विचार उस स्मृति के ही परिप्रेक्ष्य में होता है। अर्थात् यह वर्तमान से सर्वथा विच्छिन्न किसी कल्पित भविष्य का सपना होता है, न कि जीवन का नित्य और वर्तमान सत्य। 

फिर ऐसा ही मन संबंधों के अर्थ और प्रयोजन का चिन्तन करने लगता है। पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार स्मृति भी (मन की) अन्य वृत्तियों की तरह मन की एक वृत्ति ही है। स्मृति अतीत है, अर्थात् अतीत का विचार, इसी तरह इस स्मृति के ही प्रारूप में किसी भविष्य का विचार या कल्पना उसी अतीत में लौटना है, जिसकी अति इति हो चुकी है। इस इंद्रियगम्य भौतिक जगत में स्मृति के आधार पर कुछ अकाट्य, अचल नियमों की स्थापना और आविष्कार किया जा सकता है और बौद्धिक दृष्टि से वह सब के लिए सत्य और तर्कसंगत भी है ही, इस पर संदेह नहीं, किन्तु मन नामक वस्तु, जो कि वैयक्तिक जीवन है, जो अनेक भावनाओं और भावदशाओं की सम्मिलित अनुभूति है, उसके बारे में भौतिक विज्ञान कोई तय नियम नहीं खोज सका है।

अतीत ही मन के संदर्भ में समस्त ज्ञात (known) है। अतीत ही संस्कारित मन (conditioned mind) है। संस्कारित मन अभ्यास habit या आदत, पुनरावृत्ति है, जो कि किसी यंत्र के लिए तो आवश्यक है, किन्तु जीवन जो सजगता है, इस जीवन और मन की सजगता, अभ्यास की पुनरावृत्ति से कुंठित होने लगती है, इसलिये मनुष्य जितना अधिक अभ्यस्त (संस्कारित / conditioned) होने लगता है, उतना ही अधिक यांत्रिक भी हो जाता है। खेल खेलना, कार, कंप्यूटर या मोबाइल चलाना तो अवश्य ही अभ्यास पर निर्भर है, किन्तु जैसे जैसे आप इसमें कुशल, दक्ष और प्रवीण हो जाते हैं जीवन से उतने ही अधिक दूर होने लगते हैं। "नयापन" का जो आकर्षण प्रारंभ में होता है वह आगे जाकर बोझिल, निरर्थक और ऊबाऊ लगने लगता है। "तो हम क्या करें" का प्रश्न मन में आते ही हम पुनः उसी दिशा में, और भी अधिक प्रगति, "विकास" या "उन्नति" करने के बारे में सोचने लगते हैं। यह सब एक यांत्रिक चक्र में घूमते रहने की तरह है, और भले ही यह चक्र वृत्तीय (circular) से बदलकर कुन्डली (spiral) की तरह ही क्यों न हो जाए, हम इसे देख या समझ पाने में विफल हो जाते हैं और यह तक नहीं जान पाते हैं  कि त्रुटि कहाँ हुई!

पातञ्जल योगदर्शन इस दृष्टि से अनूठा है कि उसमें अभ्यास के महत्व को रेखांकित किया गया है, और श्रीमद्भगवद्गीता की ही तरह "कर्म"और "कर्ता" की अवधारणा को सत्य "मानकर" उस आधार पर वृत्ति के निरोध, एकाग्रता और समाधि के प्रयोग से "संयम" के द्वारा सिद्धियों की प्राप्ति और व्यर्थता की ओर भी संकेत किया गया है। अन्ततः कैवल्यपाद के अंतिम योग-सूत्र में

"पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति।।"

के माध्यम से पुरुषार्थ (कर्म) तथा गुणों के प्रतिप्रसव को ही कैवल्य अर्थात् चितिशक्ति की स्वरूप में प्रतिष्ठा का पर्याय कहा गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता में इसे ही अध्याय ५ में :

यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।।

एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।५।।

स्पष्ट किया गया है।

अब हम इस प्रश्न पर आएँ, कि रिश्ते कब कैसे और क्यों ख़त्म हो जाते हैं?

स्पष्ट है कि सभी रिश्ते या संबंध द्वैत-मूलक होते हैं और केवल "मान्यता" ही होते हैं। उनकी सत्यता संदिग्ध ही होती है। किन्तु  विचार और विचारकर्ता के संबंध पर ध्यान दें तो यह स्पष्ट होगा कि यह संबंध यद्यपि अत्यन्त घनिष्ठ और स्थायी भी जान पड़ता है, मूलतः एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह एक दूसरे से अभिन्न होता है। विचारकर्ता विचार का छायाचित्र होता है। जैसा कि सूरज की धूप में हवा से इधर उधर दौड़ते मेघों का धरती पर पड़ती उनकी छाया से होता है।

छाया का अस्तित्व मेघों और सूरज दोनों पर ही निर्भर होता है, ठीक उसी तरह "विचारकर्ता" का अस्तित्व विचार-रूपी मेघों और चेतना रूपी सूर्य के प्रकाश पर आश्रित होता है। छाया की तुलना में मेघ स्थायी होते हैं और मेघों की तुलना में सूरज नित्य। इसलिए सूरज, मेघों और छायाओं का परस्पर संबंध अस्थायी और क्षणिक होता है। यह क्षणिकता कितनी ही अल्प या दीर्घ प्रतीत हो, इसका अन्त अवश्यंभावी है।

यह है समस्त संबंधों की अस्थिरता और अनिश्चितता का रहस्य।

***