July 28, 2022

वह, जो बाहर है!

कविता : 27-07-2022

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वह जो यहाँ है, वही वहाँ है, 

यहाँ और वहाँ के बीच का फ़ासला, 

चाहे जितना भी कम या ज़्यादा हो!

वह जो भीतर है, वही बाहर है,

वह जो बाहर है, वही भीतर है।

भीतर और बाहर के बीच का फ़ासला,

चाहे जितना भी कम या ज़्यादा हो!

वह जो बाहर है, वही भीतर है,

वह जो भीतर है, वही बाहर है।

कोई किसी को बदल नहीं सकता!

बाहर बिम्ब है, भीतर प्रतिबिम्ब है,

बाहर प्रतिबिम्ब है, भीतर बिम्ब है।

भीतर बिम्ब है, बाहर प्रतिबिम्ब है, 

भीतर प्रतिबिम्ब है, बाहर बिम्ब है।

बाहर, जो भीतर प्रतिबिम्बित है, 

भीतर, जो बाहर प्रतिबिम्बित है।

एक चुम्बित है, एक प्रति-चुम्बित है!

एक स्तंभित है, एक प्रति-स्तंभित है! 

एक अवलंबन है, एक अवलंबित है!

कौन क्या है!, क्या कौन है!

क्या कौन है?, कौन क्या है?

शब्द मौन है,  मौन शब्द है,

स्तब्ध निःस्तब्ध है, निःस्तब्ध स्तब्ध है!!

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July 17, 2022

तीन शिक्षाएँ

I AM THAT / अहं ब्रह्मास्मि

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फरवरी-मार्च 1991 में, अज्ञात प्रेरणा से श्री निसर्गदत्त महाराज के विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ "I AM THAT" का अनुवाद हिन्दी भाषा में करने की उत्कंठा मन में जाग्रत हुई। वैसे इसके मूल में और एक कल्पना यह भी थी, कि इस माध्यम से ग्रन्थ का अध्ययन संतोषजनक रूप से हो जाएगा। कहना न होगा कि इसके लिए मैंने मूल मराठी ग्रन्थ "सुखसंवाद" का भी अवलोकन किया। चूँकि सौभाग्य से मराठी भाषा मेरी मातृ-भाषा ही है, इसलिए इसका भी मुझे असीम लाभ अनायास मिला। मूल मराठी ग्रन्थ "सुखसंवाद", अंग्रेजी "I AM THAT" प्रकाशित होने के बाद प्रकाशित हुआ, किन्तु ध्वनिमुद्रण (tape-recording) पहले हुआ था, जिसे मॉरिस फ्रीडमॅन ने अंग्रेजी में अनुवादित किया, और अंग्रेजी का वही प्रथम संस्करण "I AM THAT"  - इस शीर्षक से उस समय अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुआ। इसकी भी अपनी अलग एक कहानी है। अस्तु। 

मेरा हिन्दी अनुवाद का यह कार्य पूर्ण हो जाने के बाद और एक यह प्रश्न भी मन में उठना भी बिलकुल ही स्वाभाविक भी था कि क्या यह प्रकाशित किए जाने के योग्य है भी या नहीं?

अतः इस बारे में आगे कुछ सोचना तक मेरे लिए संभव न रहा, तो इस बारे में मन में इच्छा भी कैसे उठती? हाँ यह जानने की उत्सुकता तो मन में अवश्य ही थी कि क्या यह संभव है!

इस ग्रन्थ के परिशीलन से मुझे यह तो स्पष्ट हो गया कि जो कुछ भी होता है, या नहीं होता है, यद्यपि उसके असंख्य कारण तय किए जा सकते हैं, फिर भी यह तय नहीं किया जा सकता है कि जो भी होता है या नहीं होता है, उसके वे कौन से विशिष्ट कारण हो सकते जिन्हें हम जान या नियंत्रित कर सकते हैं। हमें तो यह भी नहीं पता होता है कि हम कब कौन सी इच्छा, भय, चिन्ता आदि से अनायास नियंत्रित और परिचालित हो जाया करते हैं!

इसलिए यह कहना कि यह कार्य किस शक्ति के अनुग्रह से और कैसे हो पाया मेरे लिए संभव नहीं है, और न मेरी इतनी योग्यता ही है कि मैं इस बारे में कोई अनुमान भी व्यक्त कर सकूँ।

इसी दौरान मेरा परिचय श्री निसर्गदत्त महाराज के एक महान भक्त और शिष्य से हुआ, जिन्होंने इस कार्य का संपूर्ण दायित्व सहर्ष अपने कंधों पर उठा लिया ।

उनसे प्रायः फ़ोन पर बात होती थी और उन्होंने अनायास इतनी ही सहृदयता से श्री निसर्गदत्त महाराज की शिक्षाओं के सार का उपदेश मुझे दिया।

उनके अनुसार :

1. पाहातेपण्याच्या आत पाहात्याला पहावें।

2. तुझ्या आत्मज्ञाना वेगळा कोणता ही गुरू अथवा ग्रन्थ मानू नकोस। 

3. कोणता ही ग्रन्थ वाचा पण हे विसरू नका कि त्यात तुमच्या आत्म-स्वरूपा ची ख्याति वर्णिली आहे। 

इसका हिन्दी अनुवाद कुछ इस प्रकार से हो सकता है :

1. देखने (की गतिविधि) में विद्यमान और अन्तर्निहित दृष्टा को देखो।

2. किसी भी देवता, गुरु या ग्रन्थ आदि को अपने आत्म-ज्ञान से भिन्न / पृथक् मत मानो।

3. किसी भी ग्रन्थ का पठन करो, किन्तु यह मत भूलो कि उसमें तुम्हारे अपने ही निज आत्म-स्वरूप का ही वर्णन किया गया है।

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बिन ताले की चाबी

पिछले दिनों - अब और आज,

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दो बेचारे, बिना सहारे, देखो पूछ पूछ कर हारे! 

यू-ट्यूब पर एक राजनीतिक समीक्षक हैं : भाऊ तोरसेकर

(नाम लिखने में कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा चाहूँगा।)

महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ दिनों पहले जो भूचाल आया था, उस प्रसंग उसके बारे में उन्होंने विक्टोरिया नं. 203 फ़िल्म के इस गीत का उल्लेख किया था।

लेकिन मुझे लगता है, यह समस्या उस फ़िल्म के दो पात्रों, राजा और राणा के ही साथ नहीं है, हम सभी के साथ अकसर होती है। सौभाग्य या दुर्भाग्य से हमारे पास चाबी ही नहीं, चाबियों का पूरा एक गुच्छा ही होता है और कौन सी चाबी किस ताले की है, इसका भी हमें पता होता है, किन्तु उम्र और समय के बीतने के साथ साथ चाबियों के बारे में हम भूलते चले जाते हैं।

हर मनुष्य, और हर स्थिति और हमारे सामने उपस्थित हर प्रश्न ही एक ताला बनकर रह जाता है और वह कौन सा ताला है, जिसकी चाबी हमारे पास होगी, इसका पता न तो उसे होता है और न ही हमें।

सिर्फ़ हमारे आपसी संबंधों में ही नहीं, राष्ट्र, जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, समाज, परंपरा, ऐसे अनेक क्षेत्रों में यही होता है। और व्यक्ति के पास चाबियों के एक नहीं, अनेक गुच्छे होते हैं लेकिन समय पर कोई काम में नहीं लाया जा सकता, और समय बीत जाने पर सब कुछ नए सिरे से शुरू करना होता है! 

अन्त तक हम चाबियाँ टटोलते और जानने की कोशिश करते रहते हैं कि कौन सी चाबी किस ताले की है!

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July 15, 2022

बे-दरो-दीवार का,

कविता : 15-06-2022

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बे-दरो-दीवार का इक घर बनाया चाहिए!

आसमाँ का उस जमीं पर साया होना चाहिए!

रूह से हो रूह का रिश्ता गहरा कुछ ऐसा,

बीच में मैं, तुम, न कोई और होना चाहिए!!




July 11, 2022

ख़बरें ही ख़बरें!

कविता 11-06-2022

दावतें-अदावतें 

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ख़बरें ही ख़बरें हैं काफी, दिल दहलानेवाली,

ऐसी भी हैं, और बहुत सी, दिल बहलानेवाली!

अंदेशे, भरोसे, उम्मीदें, तसल्लियाँ, मायूसियाँ,

संदेशे, शक-शुबहे, ग़ुस्ताखि़याँ, ख़ामोशियाँ,

राहतें, उलफ़तें, नफ़रतें, मुसीबतें, मासूमियाँ,

चाहतें, ग़फ़लतें, हसरतें, और गलतफ़हमियाँ!

बार बार पटरी से उतरती जा रही है जिन्दगी,

एक ही पटरी पर यूँ, चली जा रही है जिन्दगी!

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ख़बरें  

July 09, 2022

यह सब क्यों हो रहा है?

इतिहास के आईने में

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हम सब स्तब्ध हैं। हम यह नहीं समझ पा रहे कि अब हम क्या करें! हम बस प्रतिक्रियाएँ कर रहे हैं। कोई भी समुदाय हो, सभी अपनी अपनी किताबों के ही एकमात्र, प्रामाणिक होने, उसके ही अन्य सभी, समस्त समुदायों की किताबों से उच्चतर होने का हठपूर्ण दावा करते हैं। 

इस सारे कोलाहल में इस सरल तथ्य और प्रश्न को जानते-बूझते हुए भुला दिया जाता है, कि हिंसा और बल-प्रयोग के माध्यम से किसी समुदाय या किन्हीं भी समुदायों को आतंकित कर, डरा धमका कर अपने मत का प्रचार करना, कहाँ तक नैतिक है? क्या मत मतान्तरों को धर्म कहा जा सकता है? 

फिर भी एक तथ्य अत्यन्त स्पष्ट है।

जो कुछ हो रहा है उसके लिए कोई, या कोई-न-कोई तो अवश्य ही जिम्मेदार है। शायद हम सभी।

यद्यपि कोई अपने आपमें अत्यन्त स्पष्टता से स्थिति को शान्ति से देखकर उसका आकलन भी कर सकता है, किन्तु वह दूसरों पर अपना मत नहीं थोप सकता है, और न ही थोपना चाहेगा । क्योंकि इस प्रकार से बलपूर्वक अपना मत दूसरों पर आरोपित करना ही तो वर्तमान समस्या की मूल जड़ है। ऐसे विचारशील मनुष्य यदि संगठित हो जाते हैं, तो भी दूसरे लोग अपने अपने आग्रह और विश्वास कदापि नहीं छोड़ सकते और ऐसी स्थिति में संघर्ष होना अवश्यंभावी है। इसलिए वर्ग-संघर्ष केवल एक राजनैतिक ही नहीं, बल्कि एक मानवीय प्रश्न ही अधिक है।

जब तक समुदाय और समुदाय-विशेष से संबद्ध मनुष्य-मात्र भी केवल अपने, अपने समुदाय, धर्म(!) के आधार पर समस्या का आकलन करता है, और किसी किताब-विशेष को प्रमाण मान, उसी आधार से सबको चलने के लिए बाध्य किए जाने को ही समस्या का एकमात्र समाधान मानकर चलता है तब तक वर्ग-संघर्ष समाप्त नहीं हो सकता। और उस स्थिति में किसी समय यद्यपि कोई अपने स्वयं को सुरक्षित और लाभदायक स्थिति में अनुभव भी कर सकता है, किन्तु अन्ततः कभी न कभी तो उसे भी मृत्यु अपना शिकार बना ही लेगी। अगर अभी नहीं, तो फिर कभी। यह सिर्फ 'कब' का प्रश्न है। 

तात्पर्य यह कि न तो कोई मनुष्य अकेला, न कोई समुदाय, और न ही पूरा मनुष्य-वर्ग मिलकर भी वर्तमान स्थिति से हमें मुक्ति दिला सकता है।

सामान्य और औसत बुद्धियुक्त कोई भी मनुष्य केवल प्रतिक्रिया ही कर सकता है, या शायद मौके का लाभ लेकर खुश भी हो सकता है। वह दुःखी, निराश, अवसादग्रस्त भी हो सकता है, या फिर किसी आदर्श के लिए या दूसरों से अपनी प्रतिरक्षा करने के लिए प्राण ले या दे भी सकता है। यह आदर्श धर्म, राष्ट्र आदि जैसी कोई कल्पना भी हो सकता है। उससे प्रेरणा तो मिलती ही है और शक्ति भी तो जागृत होती ही है न!

ऐसी कोई भी प्रेरणा हममें दुष्टता और दुस्साहस पैदा कर सकती है, या वह हममें जीवन को एक चुनौती की तरह मानकर उसका सामना करने, उसे समुचित प्रत्युत्तर देने की कर्तव्य-बुद्धि को भी पैदा कर सकती है। सवाल यह नहीं है कि क्या हम परिणाम को देख पाने के लिए जीवित रहते हैं या नहीं, सवाल सिर्फ यही है कि हम जीवित रहते हुए जीवन का सामना निर्भयतापूर्वक कर सकते हैं या नहीं।

हम सभी सिर्फ प्रतिक्रियाएँ कर रहे हैं, वास्तविकता को शायद ही कोई देखता हो, या देखना चाहता भी हो। 

तो, हमारे लिए अब क्या आशा शेष हो सकती है!

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July 06, 2022

यह सूखा तृण!

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।।

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।।१६।।

(गीता अध्याय ८)...

कविता / 06-06-2022

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यह सूखा तृण, अब तक हरा न हो पाया,

बारिश की बून्दोंं से भी तृप्त न हो पाया!

मेरे घर के ही आसपास रहता है कहीं,

मुझसे मिलने आ जाता है कभी यहीं, 

बाक़ी दिन यह कहाँ बिताया करता है,

अब तक मैं उससे यह पूछ नहीं पाया!

आज मिला तो उसकी कुछ तसवीरें खींची,

हँसकर ये तसवीरें, दीं उसने भी खुशी खुशी।

जीवन में मेरा हो या ब्रह्माजी का भी यह क्षण,

अज्ञान में ऐसा ही सूखा, है जैसा यह सूखा तृण!

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July 05, 2022

पानी में छप छप!

मौसम, आया है! मौसम आया है!! 

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हर साल ही तो यह ऋतु एक बार आती है, जैसे कि और दूसरी पाँच ऋतुएँ! धरती इससे पहले की कठोर ग्रीष्म की ऋतु में जैसे तपस्या में डूबी होती है। ग्रीष्म ऋतु से अप्रभावित रहकर, मानों उसे उसका पता ही न हो!

टिटहरियों की नई पीढ़ी आ चुकी है, और दूसरे भी बहुत से नए नए पक्षी दिखाई दे रहे हैं। गुलमोहर अपनी छटा के उत्कर्ष तक पहुँचकर यद्यपि रक्तस्नात तो नहीं, किन्तु रक्तरंजित तो अवश्य ही अब भी दिखलाई देता है।

नीम के फूल हरी निबौलियों से पीली निबौलियों में बदल गए हैं और अब रास्ते पर जहाँ पहले गुलमोहर के फूलों की चादर थी,  वहाँ अब ये निबौलियाँ बिछ रही हैं। मिनटों में आते जाते वाहन उन्हें कुचलकर चले जाते हैं, और एक विचित्र गंध वातावरण में फैल जाती है, जो न तो अच्छी लगती है, न खराब।

दिन भर, और रात्रि में भी, कभी लगातार बारिश होती रहती है, तो कभी मौसम एकदम बदल जाता है। कभी लगता है मौसम घर में नहीं बैठने देगा, तो कभी लगता है कि घर से बाहर ही न निकलने देगा। 

कुछ दिनों पहले तक शाम के समय लोग झिझकते हुए घर से बाहर निकलते थे, तो अब शाम होते होते अगर मौसम जरा भी ठीक हो तो, तुरंत ही निकल पड़ते हैं!

पार्क में पहले विदेशी बबूल के बहुत से छोटे बड़े पेड़ थे जो बड़े  अटपटे तरीके से फैले हुए थे। इन पेड़ों की पत्तियाँ पशु तो सूँघते तक नहीं, खाना तो बहुत दूर की बात है। बहरहाल, इनके घने फैलाव के तले सर्प आराम फ़रमाते रहते हैं। किन्तु अब लोगों ने इन पेड़ों को काटकर लकड़ी इकट्ठा कर ली है और पेड़ों को पूरी तरह जला दिया है। सर्प रात्रि में अब भी यहाँ आते जाते रहते हैं और कभी कभी उनसे सामना भी हो जाता है, किन्तु उनसे डर कर मनुष्य, और मनुष्यों से डर कर वे तुरंत ही दूर भाग खड़े हो जाते हैं। 

इन पेड़ों पर झुरमुटों के बीच अनेक छोटी छोटी चिड़ियाँ छोटे छोटे घोंसले बनाती हैं, जो काँटों के बीच बहुत सुरक्षित होते हैं। पेड़ों पर अनेक छोटे छोटे कीड़े पतंगे उनके लिए आहार होते हैं और जीवन, जीवन का आधार होता है। इन्हीं वृक्षों, झाड़ियों के सूख जाने पर रात्रि में मकड़ियाँ इन पर अपना जाल फैला लेती हैं । कुछ कीड़े, कुछ चींटियाँ उनका शिकार होकर उस जाल में फँसकर, उनका भोजन बन जाते हैं।

बारिश का मौसम ख़त्म होते होते इन पर रात्रि में गिरते ओस के कण, असंख्य मोतियों की एक झालर फैला लेते हैं, और सुबह की धूप के रंग उन्हें सिन्दूरी / केसरिया रंग में रंग देते हैं।

शरद भी एक और ऋतु है, शरद सुहावन ऋतु ।

अभी तो लगता है कि प्रकृति जैसे थक गई हो और सब अत्यंत शान्त और स्तब्ध सा हो जाता है। हालाँकि अभी पूरे दो महीने हैं शरद का आगमन होने के लिए। 

अभी तो पानी में छप छप करना अच्छा लग रहा है! 

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"कुछ भी!"

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अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः

कठोपनिषद्, अध्याय २,

वल्ली १

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अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति।।

ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते।।१२।।

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः मध्ये आत्मनि तिष्ठति। ईशानः भूतभव्यस्य न ततः विजुगुप्सते।।

अर्थ --

एकमेव आत्मा की ही सदा-सर्वदा सत्यता है। यह पुरुष अर्थात् विज्ञानात्मा जीव, इसी आत्मा में व्यक्त और अव्यक्त होता हुआ प्रकट और अप्रकट है। दोनों ही प्रकारों से यही चराचर जगत् में जो हुआ, और जो होने जा रहा है, उस सबका विधाता, नियन्ता और शासनकर्ता है।

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अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः।। 

ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः।। एतद्वै तत्।।१३।।

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः ज्योतिः इव अधूमकः। ईशानः भूतभव्यस्य सः एव अद्य सः उ श्वः।। एतत् वै तत्।। 

अर्थ --

जैसे बन्द मुट्ठी पर अँगूठा संकल्प का द्योतक होता है, और जैसे  दीपक पर उसकी ज्योतिरूपी धूमरहित लौ प्रकाशमान होती है, वैसे ही मनुष्य-मात्र के हृदय में यह पुरुष अपनी विद्यमानता का उद्घोष करता हुआ, इस संपूर्ण जगत् को चेतना-रूपी ज्योति से आलोकित करता है। 

यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति।। 

एवं धर्मान्पृथक्पश्यन्स्तानेवानुधावति ।।१४।।

यथा उदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति। एवं धर्मान् पृथक् पश्यन् तां एव अनुधावति।।

अर्थ --

जैसे दुर्गम (ऊँचे) स्थान से बरसता हुआ जल पर्वतों पर विभिन्न स्थानों पर एकत्र होकर धरती पर भिन्न भिन्न दिशाओं में दौड़ता है, उसी प्रकार भेद-दृष्टि से युक्त पुरुष अपनी अपनी प्रवृत्ति और संस्कारों से प्रेरित होकर भिन्न भिन्न धर्मों की ओर आकृष्ट होकर उन उन दिशाओं में जाता है।

यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति।।

एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम।।१५।।

यथा उदकं शुद्धे शुद्धं आसिक्तं तादृक् एव भवति। एवं मुनेः विजानतः आत्मा भवति गौतम।। 

अर्थ  --

और जैसे शुद्ध जल से युक्त किसी पात्र में शुद्ध जल उंडेले जाने पर वह उस जैसा ही शुद्ध हो रहता है, उसी प्रकार हे गौतम!* जो मुनि आत्मा की अभेदता से अभिज्ञ होता है, वह अपने ही भीतर विद्यमान उस अभेद आत्मा को जानकर और उसमें ही विलीन होकर उससे एकात्म हो जाता है।।

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*यहाँ 'गौतम' पद का प्रयोग संबोधन विभक्ति में किए जाने से यह स्पष्ट है कि इस श्लोक के माध्यम से यमराज द्वारा नचिकेता को ही उपदेश दिया जा रहा है। 

(तुलना करें -- अध्याय १, वल्ली १ के श्लोक में नचिकेता के पिता को गौतम कहकर संबोधित किया गया है।)

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July 04, 2022

य इह नानेव पश्यति

कठोपनिषद् अध्याय २,

वल्ली १, क्रमशः

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यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।। 

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।।१०।।

यत् एव इह तत् अमुत्र यत् अमुत्र तत् अनु-इह। मृत्योः सः मृत्युं  आप्नोति यः इह नाना-इव पश्यति।।

अर्थ --

यहाँ जो है, वही इसी प्रकार से अन्यत्र और सर्वत्र ही काल-स्थान की बाधा से सर्वदा रहित एकमेव है। यहाँ विद्यमान इस एकमेव अभेद सद्वस्तु  (परमात्मा) को भेद-दृष्टि से देखने वाला, अर्थात् जो इस जगत् में इसे अनेक भिन्न भिन्न वस्तुओं की तरह देखता है, वह मृत्यु से पुनः मृत्यु को ही प्राप्त करता है। इस प्रकार वह जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति का अतिक्रमण नहीं कर पाता, और इस अज्ञान के चक्र में ही फँसा रहता है।

मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन।। 

मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति।।११।।

मनसा एव इदं आप्तव्यं न इह नाना अस्ति किञ्चन। मृत्योः सः मृत्युं गच्छति यः इह नाना इव पश्यति।।

अर्थ --  

इस सत्य को, कि यह दृश्य जगत् यद्यपि अनेक रूपों में प्रतीत होते हुए भी, वस्तुतः यहाँ सभी कुछ परस्पर अभेद है, मन की ही सहायता से प्राप्त करना होता है। और जो यहाँ इस जगत् को भेद-दृष्टि से देखते हुए इसमें अनेक भेदों को ग्रहण करता है, वह मृत्यु से मृत्यु को ही प्राप्त करता है। इस प्रकार से वह जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति का अतिक्रमण नहीं कर पाता, और वह अज्ञान के चक्र में ही फँसा रहता है।।

इसलिए, मन की सहायता से ही यह अभेद-दर्शन प्राप्त करना है, कि यहाँ, इस दृश्य जगत् में, विभिन्न वस्तुओं के रंग-रूप में, आकृति, प्रकृति और गुणों आदि में यद्यपि भिन्नता प्रतीत होती है, यह  भिन्नता केवल आभासी है, वास्तविक नहीं है।

यहाँ एक कठिनाई यह है कि यह कोई बौद्धिक निश्चय न होकर प्रत्यक्ष बोध है, जिससे इस अभेद-दर्शन की प्राप्ति होती है।

कठिनाई इसलिए है, क्योंकि मन नामक वस्तु, एक ऐसा दुरूह तत्व / वस्तु है, जिसका वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १३ में इस श्लोक में किया गया है --

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः।।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।६।।

इसे पुनः श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय निम्न श्लोकों की सहायता से समझा जाना उपयोगी होगा :

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।।

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।।२३।।

(अध्याय ६)

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।८।।

(अध्याय ८)

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।२२।।

(अध्याय १०)

तथा,

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।५७।।

(अध्याय १८)

और अन्त में इसी अध्याय १८ का यह श्लोक :

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।।

कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय।।७२।।

इन सभी में, तथा विशेष रूप से उपरोक्त अध्याय १० के श्लोक २२ में मन (mind) क्या है, और चेतना (attention) क्या है इसे अच्छी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है। 

और उस आधार पर मन की सहायता से ही चेतना नामक वस्तु की अभेदता का दर्शन किया जाना व्यावहारिक दृष्टि से संभव है। यह चेतना ही वह है जिसे "एतद्वै तत्" के प्रयोग से पुनः पुनः कहा गया है ।

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गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तम्

कठोपनिषद्, अध्याय २,

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वल्ली १,

प्राणिमात्र के हृदय में विद्यमान परमेश्वर --

यः पूर्वं तपसो जातमद्भयः पूर्वमजायत।।

गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत।। एतद्वै तत्।।६।।

यः पूर्वं तपसः जातं अद्भयः पूर्वं अजायत। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यः भूतेभिः व्यपश्यत।। एतत् वै तत्।।

अर्थ --

जो सर्वप्रथम (परमात्मा) के तप से उत्पन्न हुआ, जो जल आदि पञ्चमहाभूतों से भी पूर्व उत्पन्न हुआ। जो अप्रकट और अदृश्य रहकर गुह्य होकर छिपा हुआ, भूतमात्र के भीतर अवस्थित है, और उन भूतों के माध्यम से इस जगत् को जिसने देखा। यही है वह (परमात्मा)।

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यतः।।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।।६।।

(ईशावास्योपनिषद्)

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या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी।।

गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत।। एतद्वै तत्।।७।।

या प्राणेन संभवति अदितिः देवतामयी। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिः व्यजायत।। एतत् वै तत्।।

प्रश्नोपनिषद् -- प्रश्न २,

देवानामसि वह्नितमः पितृ'णां* प्रथमा स्वधा।।

ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि।।८।।

(*जैसा कि यह शब्द गीता 10/29 में है, यहाँ उसे यथावत् शुद्ध रूप में मुद्रित करना मेरे लिए संभव नहीं है।) 

इन्द्रस्वत्वमसि प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता।।

त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः।।९।।

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि।।

या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः।।१२।।

प्रश्न ३ --

अथ हैनं कौसल्याश्चायनः पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीरे आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यं अभिधत्ते कथं अध्यात्ममिति।।१।।

तस्मै स ह्योवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि।।२।।

आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे।।३।।

अर्थ -- 

संदर्भ --

देवी-अथर्वशीर्षम् :

ते देवा अब्रुवन् -- नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।। 

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।८।।

तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम्।।

दुर्गां देवीं शरणं प्रपद्यामहेऽसुरान्नायित्र्यै ते नमः।।९।।

देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति।।

सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु।।१०।।

कालरात्रीं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम्।।

सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम्।।११।।

महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि।।

तन्नो देवी प्रचोदयात्।।१२।। 

अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव।।

तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः।।१३।।

दैवी, देवतामयी प्राणमयी यह जो अदिति है, और देवताओं द्वारा जिसका पुनः सृजन किया जाता है, वह अदिति जिसका प्रयोग पशुओं के द्वारा वाणी के रूप में किया जाता है (धेनुर्वाक्) और वही अदिति, जो पुनः देवताओं का संस्कार करती है, जिससे वे यज्ञ की आहुतियों को प्राप्त कर अपनी भूमिका का वे निर्वाह करते हुए अपना अपना कार्य करते हैं। वह अदिति ही भूतों में बसती हुई संचरती और विचरती है। 

यही वह (परमात्मा / परमेश्वरी) है।। 

पुनः कठोपनिषद् अध्याय २,

वल्ली १,

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः।।

दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः।।

एतद्वै तत्।।८।।

अरण्योः निहितः जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः। दिवे दिव ईड्यः जागृवद्भिः हविष्मद्भिः मनुष्येभिः अग्निः। एतत् वै तत्।।

अर्थ -- जिस प्रकार से गर्भिणी स्त्रियाँ अपनी भावी सन्तान को गर्भ में सुरक्षित रखते हुए उनका पोषण करती हैं, और वह गर्भ दिन प्रतिदिन अभिवृद्धि को प्राप्त करता है, वैसे ही जागृत और हवन सामग्रियों से उस अग्नि को मनुष्यों द्वारा अनुष्ठान-उपासना से क्रमशः परिपुष्ट और परितुष्ट किया जाता है, और जो मनुष्य में वैसे ही अन्तर्भूत है, जैसे कि वह अग्नि दो अरणियों के मध्य में भी अप्रकट रहते हुए विद्यमान होती है। यह (अग्नि) ही वह परमात्मा है। 

यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति।। 

तं देवाः सर्वे अर्पितास्तु नात्येति कश्चन।। एतद्वै तत्।।९।।

यतः च उदेति सूर्यः अस्तं यत्र च गच्छति। तं देवाः सर्वे अर्पिताः तु न-अत्येति कश्चन। एतत् वै तत्।। 

अर्थ --

जिस दिशा (स्थान) से सूर्य उदय होता है, और अस्त होते समय  जिस दिशा (स्थान) की ओर सूर्य जाता है, उसी स्थान (धाम) में समस्त देवता समर्पित हैं, और कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं करता। यही वह (परमात्मा) है।।

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July 01, 2022

बुद्धा इन ट्रैफिक जाम

Buddha in Traffic Jam. 

आई एम बुद्धा / I AM BUDDHA

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यह शायद पल्लवी जोशी के द्वारा बनाई गई फिल्म या यू-ट्यूब पर कोई वीडियो चैनल होगा! 

लेकिन अभी की सिचुएशन में मुझे याद आती है असरानी की फिल्म 'दो हवलदार', जिसमें असरानी ट्रैफिक-चौराहे पर ड्यूटी कर रहा है और चारों ओर से आते वाहनों को ट्रैफिक पोस्ट तक आने देकर रोक रखता है। फिर वह अपने पॉइन्ट पर तेजी से गोल घूमकर यह जानने की कोशिश करता है कि इस सबका क्या हल है। 

मुझे लगता है आज की सिचुएशन में बुद्ध ही नहीं, हर कोई ही ऐसे ही ट्रैफिक जाम में फँसा हुआ है!

पता नहीं इसके बाद फिल्म में क्या होता है! 

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एक दिन टूटा हुआ!

एक दिल टूटा हुआ! 

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रात भर था वो चमकता,

इस तरह से रूठ गया,

सुबह होने से ही पहले, 

अचानक वह टूट गया,

लाख तारे आसमान पर, 

एक टूटा भी तो क्या, 

वक्त में भी लाख दिन, 

एक दिन बीता तो क्या,

लाख दिल हैं, लाख इंसां,

एक इंसां मिट गया तो,

क्या कमी होगी जहाँ में,

एक दिल टूटा तो क्या!

लाख तारे आसमान में,

इक अगर टूटा तो क्या! 

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