July 04, 2022

य इह नानेव पश्यति

कठोपनिषद् अध्याय २,

वल्ली १, क्रमशः

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यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।। 

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।।१०।।

यत् एव इह तत् अमुत्र यत् अमुत्र तत् अनु-इह। मृत्योः सः मृत्युं  आप्नोति यः इह नाना-इव पश्यति।।

अर्थ --

यहाँ जो है, वही इसी प्रकार से अन्यत्र और सर्वत्र ही काल-स्थान की बाधा से सर्वदा रहित एकमेव है। यहाँ विद्यमान इस एकमेव अभेद सद्वस्तु  (परमात्मा) को भेद-दृष्टि से देखने वाला, अर्थात् जो इस जगत् में इसे अनेक भिन्न भिन्न वस्तुओं की तरह देखता है, वह मृत्यु से पुनः मृत्यु को ही प्राप्त करता है। इस प्रकार वह जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति का अतिक्रमण नहीं कर पाता, और इस अज्ञान के चक्र में ही फँसा रहता है।

मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन।। 

मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति।।११।।

मनसा एव इदं आप्तव्यं न इह नाना अस्ति किञ्चन। मृत्योः सः मृत्युं गच्छति यः इह नाना इव पश्यति।।

अर्थ --  

इस सत्य को, कि यह दृश्य जगत् यद्यपि अनेक रूपों में प्रतीत होते हुए भी, वस्तुतः यहाँ सभी कुछ परस्पर अभेद है, मन की ही सहायता से प्राप्त करना होता है। और जो यहाँ इस जगत् को भेद-दृष्टि से देखते हुए इसमें अनेक भेदों को ग्रहण करता है, वह मृत्यु से मृत्यु को ही प्राप्त करता है। इस प्रकार से वह जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति का अतिक्रमण नहीं कर पाता, और वह अज्ञान के चक्र में ही फँसा रहता है।।

इसलिए, मन की सहायता से ही यह अभेद-दर्शन प्राप्त करना है, कि यहाँ, इस दृश्य जगत् में, विभिन्न वस्तुओं के रंग-रूप में, आकृति, प्रकृति और गुणों आदि में यद्यपि भिन्नता प्रतीत होती है, यह  भिन्नता केवल आभासी है, वास्तविक नहीं है।

यहाँ एक कठिनाई यह है कि यह कोई बौद्धिक निश्चय न होकर प्रत्यक्ष बोध है, जिससे इस अभेद-दर्शन की प्राप्ति होती है।

कठिनाई इसलिए है, क्योंकि मन नामक वस्तु, एक ऐसा दुरूह तत्व / वस्तु है, जिसका वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १३ में इस श्लोक में किया गया है --

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः।।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।६।।

इसे पुनः श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय निम्न श्लोकों की सहायता से समझा जाना उपयोगी होगा :

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।।

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।।२३।।

(अध्याय ६)

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।८।।

(अध्याय ८)

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।२२।।

(अध्याय १०)

तथा,

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।५७।।

(अध्याय १८)

और अन्त में इसी अध्याय १८ का यह श्लोक :

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।।

कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय।।७२।।

इन सभी में, तथा विशेष रूप से उपरोक्त अध्याय १० के श्लोक २२ में मन (mind) क्या है, और चेतना (attention) क्या है इसे अच्छी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है। 

और उस आधार पर मन की सहायता से ही चेतना नामक वस्तु की अभेदता का दर्शन किया जाना व्यावहारिक दृष्टि से संभव है। यह चेतना ही वह है जिसे "एतद्वै तत्" के प्रयोग से पुनः पुनः कहा गया है ।

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