July 31, 2021

चेतना, विचार और अस्तित्व

पिछले पोस्ट का शीर्षक था :

विचार और अस्तित्व 

उसी क्रम में, 'चेतना' के सन्दर्भ में देखें तो अस्तित्व ही चेतना है, और चेतना ही अस्तित्व है। चेतना के लिए अन्य शब्द 'भान' का प्रयोग किया जाता है या किया जा सकता है। 

पातञ्जल योग सूत्र में तथा संस्कृत के व्याकरण शास्त्र में प्रत्यय शब्द का प्रयोग,

"प्रतीयते विधीयते इति प्रत्ययः" के अनुसार प्रयुक्त होता है। 

इस प्रकार किसी शब्द के साथ किसी प्रत्यय को संयुक्त करने पर उस शब्द के तात्पर्य के बदलने का कार्य प्रत्यय के माध्यम से होता है। अंग्रेजी भाषा में इसे suffix, prefix, infix कहा जाता है।  Arabic  भाषा में और उसी रीति से उर्दू में केवल प्रत्यय के ही प्रयोग से असंख्य शब्द बनाए जाते हैं जिनसे ऐसे व्युत्पन्न  शब्द के विशेष अर्थ को व्यक्त किया जाता है।

किन्तु पातञ्जल योग सूत्र में प्रत्यय का तात्पर्य है 'बोध', जो कि भावगत, विचारगत, बुद्धिगत हो सकता है। कोष के अनुसार इस शब्द का अर्थ है ज्ञान जो अंग्रेजी भाषा के perception शब्द का समानार्थी है। 

ज्ञान के तीन पक्ष हैं ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञात अर्थात्

Knower, whatever that one may try to know, and the known. 

ज्ञाता पुनः कोई चेतन सत्ता (entity) ही होता है जो किसी दूसरे को जानने या न जानने की स्थिति में भी अपने आप के बोध से युक्त होता है। यह बोध मूलतः न तो भावगत, न विचारगत और न ही बुद्धिगत हो सकता है क्योंकि यह भाव, विचार या बुद्धि के अभाव में भी विद्यमान होता ही है । जैसे ही इस सहज और स्वाभाविक बोध में अन्य अपने से भिन्न किसी दूसरे विषय का प्रवेश होता है तत्क्षण ही उस भिन्न विषय / वस्तु (object) को 'यह' 'वह' अथवा 'तुम' के रूप में अनुभव किया जाता है। इसी के साथ युगपत् (simultaneously) अपने आपको 'मैं' अर्थात् 'अहं' के रूप में स्वीकार किया जाता है। 

संस्कृत के व्याकरण के अन्तर्गत 'मैं', 'तुम' तथा 'यह', 'वह', 'जो', 'कौन' ही क्रमशः उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष तथा अन्य पुरुष के रूप में अस्मत् / अस्मद्, युष्मत् / युष्मद् और तत् / अदस् इत्यादि सर्वनाम प्रत्यय होते हैं ।

अस्मद् से अस्मि तथा  I AM,  युष्मद् से  YOU  तथा तत् से  THAT, इदम् से IT की समानता से यह कहा जा सकता है कि यह केवल संयोगजन्य (coincidental) नहीं है। एक और प्रत्यय है 'त्वं' जो 'त्व' की तरह GREEK / LATIN 'THOU' का मूल है। 'WE' का साम्य और अर्थ 'वयं' से दृष्टव्य है। 

बोध का अस्तित्व और अस्तित्व का बोध / ज्ञान / प्रत्यय, भाषा के उद्भव से भी पूर्व से ही स्वप्रमाणित ही है ।

यह बोध ही वह अधिष्ठान है जिसे चेतना कहा जाता है, जो कि अहं, त्वं, तत्, इदं आदि प्रत्ययों से युक्त होते ही अपने और अपने संसार का कारण होता है। 

गीता के अध्याय १० तथा अध्याय १३ में इस शब्द का प्रयोग इन दो श्लोकों में दृष्टव्य है, :

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः। 

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।२२।।

तथा, 

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतः।।६।।

इस प्रकार चेतना वस्तुतः शुद्ध बोधस्वरूप चैतन्य होते हुए भी, विकार से युक्त होने पर जीव-चेतना के रूप में उसे क्षेत्र कहा गया है, जबकि जीव-चेतना में प्रतिबिम्बित उस चैतन्य को क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। 

प्रसंगवश यहाँ अध्याय १३ के ही इन दोनों श्लोकों का उल्लेख किया जा सकता है :

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। 

एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।१।।

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।।२।।

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विचार और अस्तित्व

Freedom from the Thought

क्या विचार से मुक्ति, और विचार-स्वातंत्र्य एक ही तथ्य हैं या परस्पर भिन्न हैं?

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विचार ही विचारकर्ता है, और विचारकर्ता भी पुनः केवल विचार की तरह अस्तित्वमान हो सकता है!

किसी भी वस्तु, विषय, स्थान, समय,  व्यक्ति, अनुभव अर्थात् स्मृति, परिस्थिति, प्रश्न, समस्या, का विचार ही बंधन है । ऐसे ही असंख्य विचार परस्पर जुड़कर वैचारिक श्रृंखला और जाल का निर्माण करते हैं और उसका आधार भी मूलतः कोई विचार ही होता है। विचारक या विचारकर्ता वही रिक्त जाल है ।

फिर भी रोचक और आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु उसके किसी न किसी विचार के ही अन्तर्गत होती है, और वह परिप्रेक्ष्य अर्थात् चेतना, जो कि विचार का स्रोत है, अदृश्य ही  रह जाता है, और विचार उसे कभी जानता तक नहीं! विचार के अभाव में कैसे कहा जा सकता है कि कोई वस्तु, विषय, स्थान, अनुभव अर्थात् स्मृति, घटना, व्यक्ति, समय आदि (अस्तित्वमान) है या नहीं! फिर भी अस्तित्व की विद्यमानता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अस्तित्व ही विद्यमानता है, और विद्यमानता को ही अस्तित्व कहा जाता है। क्या विचार (की विद्यमानता) न होने पर अस्तित्व का अभाव हो जाता है? अस्तित्व का विचार, विचार के अस्तित्व पर अवलंबित होता है जबकि अस्तित्व स्वयं न तो किसी विचार पर निर्भर होता है,  न विचार का परिणाम है, न ही विचार पर अवलंबित कोई वस्तु है।

फिर अस्तित्व क्या है?

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जगत्-चित्र

कविता : 31-07-2021

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प्यास और प्रतीक्षा! 

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अघाते ही नहीं, लुब्ध नेत्र देखते हुए,

तृप्त होते हुए भी, पान करते हैं निरंतर, 

तृषित रहते हैं, पल भर भी जो अगर, न देखें,

चित्र अद्भुत, चितेरे को भूलकर!

मन मगन-मन सोचता भी है कभी, 

क्या चितेरे को मैं देखूँगा कभी! 

क्या मिलेगा देख भी लूँ यदि उसे, 

भूल जाऊँगा अगर मैं खुद को ही! 

इस पहेली को तो पहले बूझ लूँ,

बूझ लूँगा, अगर तो सोचूँगा फिर,

कहाँ रहता है चितेरा, जान लूँ तो, 

पता बतला सकूँगा, किसी को फिर!

उस घड़ी तक चित्र ही मेरे लिए, 

मेरे इस जीवन का प्राणाधार है,

इससे ही तो है जीवन, मेरा यह,

इससे ही तो यह सकल संसार है! 

करनी ही होगी प्रतीक्षा तब तक मुझे, 

उस घड़ी की पूरी ही उम्र भर,

देख पाऊँ जिस घड़ी चितेरे को,

देखता ही रहूँगा अपलक सतत!

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July 29, 2021

रघुवंशम्

सर्ग ३

हरिर्यथैक: पुरुषोत्तमः स्मृतो

महेश्वरस्त्र्यम्बक एव नापरः।

तथा विदुर्मां मुनयः शतक्रतुं 

द्वितीयगामी नहि शब्द एष नः।।४९।।

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इन्द्र ने कहा :

जिस प्रकार "हरि" शब्द का प्रयोग केवल पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के ही लिए, "महेश्वर" शब्द का प्रयोग केवल त्र्यम्बकेश्वर भगवान् शिव के लिए ही किया जाता है, वैसे ही "शतक्रतु" शब्द का प्रयोग केवल मेरे ही लिए किया जाता है। 

(इसलिए जब कोई मनुष्य एक सौ अश्वमेध यज्ञ कर लेता है तो वह दूसरा इन्द्र हो जाता है। और यह मुझे स्वीकार नहीं है। इसीलिए मैं ऐसे मनुष्य के यज्ञ का अश्व चुरा लेता हूँ। इसीलिए मुझे हरिताश्व भी कहते हैं। किन्तु हरिताश्व होने का एक अर्थ यह भी हुआ कि मेरे रथ में जोते जानेवाले अश्व हरे रंग के हैं।)

पिछला पोस्ट लिखते समय उपरोक्त कहानी मुझे याद आई।

आज ही अपने swaadhyaaya blog  में उसी प्रश्न :

Can Science ever explain the mystery of the consciousness?

का उत्तर देने का प्रयास किया। 

एक कहानी और याद आ रही है,  जो उस चोर के बारे में है जिसने किसी विवाहोत्सव में चोरी की, और जब चोरी होने का पता चला और लोग चोर को ढूँढने की कोशिश कर रहे थे तो वह उनकी इस कोशिश में कुछ और अधिक उत्साह से शामिल हो गया, और मौका मिलते ही रफू-चक्कर हो गया। 

आज के विज्ञान की भूमिका इसी प्रकार की है। विज्ञान 'चेतना क्या है?', इस बारे में बहुत जोर-शोर से खोजबीन करने का नाटक कर रहा है जबकि विज्ञान स्वयं ही बुद्धि का परिणाम है, और बुद्धि स्वयं भी, चेतना का ही परिणाम मात्र है। क्या कोई परिणाम अपने कारण (के उद्गम) को जान सकता है? क्या कोई पुत्र अपने पिता के जन्म को जान सकता है?

इस कहानी को मैंने पहली बार श्री रमण महर्षि के साहित्य में पढा़ था। जहाँ इसका उल्लेख मन अर्थात् अहंकार के संदर्भ में किया गया था।  आशय यह कि क्या मन / अहंकार कभी अपने-आप को जान सकता है? हाँ, वह ऐसा प्रयास करने का नाटक अवश्य कर सकता है, और इस प्रकार से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करता रह सकता है। किन्तु जब कोई मनुष्य, मन / अहंकार का उद्भव जहाँ से होता है, उस स्रोत का अनुसंधान करता है, तो मन / अहंकार बस विलीन हो जाता है।

इसी प्रकार विज्ञान अर्थात् वैज्ञानिक जब अपने हृदय में ही उस स्रोत की खोज करेगा जहाँ से बुद्धि का आगमन होता है, तब वह जान पाएगा कि चेतना क्या है!

इसे इस प्रकार से भी समझा जा सकता है :

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। 

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।।४२।।

(गीता, अध्याय३)

विज्ञान बुद्धि की उपज है और बुद्धि तक ही उसकी मर्यादा है। चेतना बुद्धि की पकड़ से परे की वास्तविकता / सत्य है। 

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July 28, 2021

वक्त वक्त की बात

Can Science explain the mystery of :

Consciousness / consciousness? 

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"क्या विज्ञान 'चेतना' के रहस्य को स्पष्ट कर सकता है?"

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उपरोक्त शीर्षक / caption है उस लेख का जिसे 

The Irish Times

ने अपने किसी पोस्ट में प्रकाशित किया है और गूगल ने उसे

अपने होम-पेज पर न्यूज़ प्रिव्यू के रूप में प्रस्तुत किया है। 

उस पोस्ट के लिए इस सूचना पर क्लिक करते ही वह साइट खुलती है जिसमें कहा जाता है :

This web-site uses 'cookies'. 

Please click 'accept' to enter.... 

स्पष्ट है कि मुझे इसकी ज़रूरत महसूस नहीं होती। 

न कोई मज़बूरी या किसी प्रकार की कोई बाध्यता है। 

किन्तु इन्हीं कारणों से मैं बहुत सी तथाकथित बौद्धिक विषयों से संबंधित जानकारियों से वंचित हो जाता हूँ। 

ऐसा नहीं है कि मैं किसी भी क्षेत्र का विशेषज्ञ हूँ, किन्तु जब ऐसे विषयों के बारे में कुछ पढ़ता हूँ तो मन में अनेक प्रश्न और संदेह पैदा होते हैं, जिनका निवारण करने में मुझे कहीं से कोई मदद मिलती दिखाई नहीं देती। 

पहला सवाल तो यही है कि कोई साइट पहले से ही मेरे या किसी व्यूअर के डिवाइस पर कैसे अपनी 'कुकीज़' का प्रयोग कर सकती है? क्या यह नैतिकता की दृष्टि से स्वीकार्य है?

दूसरा सवाल यह कि क्या यह व्यूअर की स्वतंत्रता में बाधा और हस्तक्षेप नहीं है? 

यद्यपि यह तो प्रशंसनीय है कि कोई साइट पहले ही उसकी इस नीति को व्यूअर के समक्ष स्पष्ट कर देती है, किन्तु इस प्रकार से  क्या वह स्वयं ही व्यूअर को आगे बढ़ने और स्वयं को अभिव्यक्त करने से हतोत्साहित नहीं कर देती? 

दुर्भाग्य से आज का पूरा मीडिया जिन शक्तियों से संचालित हो रहा है उनके अपने अपने निहित स्वार्थ और लक्ष्य हैं और उनकी पीठ के पीछे पुनः ऐसी और बड़ी तथा बहुत बड़ी शक्तियों की सहायता और प्रेरणा तो है ही। 

इस प्रकार की स्थिति में मेरे जैसा कोई साधनहीन, किसी मिशन विशेष के लिए कार्य न करनेवाला मनुष्य यही कर सकता है कि वह कहीं न कहीं मीडिया से कम्प्रोमाइज़ कर ले, या किसी न किसी खेमे (खेले?) में शामिल हो जाए।

हाँ वह केवल एन्टरटैनमेन्ट के लिए भी मीडिया का उपयोग (या दुरुपयोग) कर सकता है, और मीडिया अन्ततः यही तो चाहता भी है! ताकि उसका व्यापार व्यवसाय द्रुत-गति से चलता और फलता-फूलता रहे!

इस सबके परिणाम-स्वरूप संसार का क्या भला-बुरा हो रहा है, इस बारे में सोचने के लिए शायद ही किसी की कोई रुचि हो, और शायद ही किसी के लिए इसका कोई महत्व हो!

तो यह है यथास्थिति और यथास्थितिवाद! 

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5 सार्वभौम महाव्रत

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह 

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"क्या संग्रह ज़रूरी है?

-किसके लिए?"

"संसार के लिए"

"क्या संसार ज़रूरी है? 

-किसके लिए?"

"जीवन के लिए!"

"क्या जीवन ज़रूरी है? 

-किसके लिए?"

"मेरे लिए!"

"क्या 'मैं' ज़रूरी है?

-किसके लिए?"

"जीवन के लिए?"

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July 27, 2021

उपलब्धियाँ

कविता : 27-07-2021

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अनुपलब्धियाँ

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एक दिन फिर और ऐसा बीत गया,

सुबह से शाम तक की व्यस्तता,

शाम से रात तक की व्यर्थता, 

और फिर रात को सो जाना थककर,

सुबह होते ही नया ऐसा ही दिन, 

एक दिन फिर और बीत जाएगा, 

सुबह से शाम तक की व्यस्तता, 

शाम से रात तक की व्यर्थता,

और फिर रात को सो जाना थककर,

सुबह होते ही नया ऐसा ही दिन!

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सोच किसलिए!

कविता : 23-07-2021

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जानता है कौन तुमको, फ़िक्र क्यों करते हो तुम,

खो रहे किस सोच में, किन ख़यालों में हो गुम!

जानता है कौन किसको, सबको है बस यह वहम,

कोई मेरा है जिसे मैं जानता हूँ सबमें है यही भरम।

कौन तुमको क्या बताये, क्या है वो, हो कौन तुम, 

खुद तुम्हारी खोज ही पैमाना है यह जानो तुम,

दोष मत देना धरम को, गुरु को, या किसी किताब को, 

पहले परखो खुद को ही फिर परखना मुर्शीद को।

जैसे तुम हो वैसा ही तुमको मिलेगा कोई और, 

पहले तो खुद को ही जानो, ढूँढना फिर कोई ठौर।

जब तक न पहचानोगे खुद को, कैसे जान सकते हो? 

जब तक न समझ लोगे, खुद को, कैसे मान सकते हो?

और क्या खुद को भी लेकिन, तुम नहीं हो जानते?

बस यही मुश्किल है लेकिन, तुम नहीं पहचानते!

जान क्या, पहचान क्या, जान की पहचान क्या,

पहचान की भी जान क्या, सच है क्या, ईमान क्या?

पहचान सारी याद है,  याद ही पहचान है,

पहचान ही तो याद है,  याद ही पहचान है!

याद की यह पहचान, पहचान की और याद,

याददाश्त खयाल है, खयाल भी है याददाश्त!

याददाश्त, पहचान भी, बनती मिटती रहती है,

लेकिन तुम्हारी जान ना मिटती है ना ही बनती है।

बस कभी होती उजागर, तो कभी होती विलीन, 

हाँ कभी बेपर्दा तो, होती कभी पर्दानशीन!

बस तुम्हीं इस खेल में, भूल जाते हो ये फ़र्क़,

जो तुम्हारी जान और पहचान, दोनों के है बीच!

जान है, तो जहान है, यह जान ही ईमान है,

जान की पहचान नहीं,  पहचान सब बेजान है!

भेद लो इस भेद को, तो मसला हो जाएगा हल, 

इसके लिए लेकिन तुम्हें ही, खुद ही करना है पहल! 

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July 26, 2021

भविष्य का संकेत!

कविता : 26-07-2021

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यथा नाम तथा परिणाम

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'दूरदृष्टि' हो अगर शुतुरमुर्ग़ जैसी,

उपलब्धि होगी ही 'स्वर्ग' जैसी!

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July 24, 2021

~~कर्पूरगौरं~~

~~करुणावतारं~~

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एक समय भगवान् शिव अपने परिवार के बीच आसन पर विराजमान थे। माता पार्वती, श्रीगणेश, श्री कार्तिकेय, नन्दी, वृषभ, मूषक, मयूर, आदि के साथ उनके गण भी वहाँ थे, सर्प तो उनके आभूषणों की तरह उनके शरीर पर अलंकृत ही थे। 

तब माता पार्वती ने उन्हें प्रसन्न जान उनसे एक प्रश्न किया : "भगवन्! मेरी एक जिज्ञासा है,  कृपया समाधान करें!

आपकी शरण में आनेवाले सभी प्राणी पारस्परिक वैर भूलकर अत्यन्त शान्तिपूर्वक आनन्द में निमग्न हो जाते हैं। जैसे यहाँ सिंह और वृषभ, सर्प और मूषक, सर्प और मयूर, आदि। आपसे दूर होते ही वे अपने स्वभाव से बाध्य होकर पुनः परस्पर वैर करने लगते हैं। इनसे भिन्न प्रकार का जो एक प्राणी होता है वह है मनुष्य, जो कभी कभी तो आपके अस्तित्व पर ही संदेह करने लगता है । उसके मन में आपकी शरण में आने का प्रश्न ही कैसे उठ सकता है! मनुष्य के पास इतने शास्त्र होते हुए भी वह क्यों सदैव दुःखी होकर लोभ, भय, आशा, निराशा, चिन्ताऔर मोह से उत्पन्न राग तथा आसक्ति में डूबा रहकर मृत्युभय से काँपता रहता है?  व्याधियों और भूख-प्यास, शीत-ताप, से आश्रयहीन होते हुए भी क्या अन्य प्राणी भी मनुष्य की तरह दुःखग्रस्त होते हैं?"

भगवान् शिव ने किंचित स्मितपूर्वक कहा :

"देवी!  तुम जानती ही हो, कि यह तुम्हारी गुणमयी माया का ही विस्तार है, जिसके पार जाना बहुत बुद्धिमान के लिए भी दुष्कर होता है, तो साधारण मनुष्य का कहाँ ऐसा सामर्थ्य कि वह ऐसा कर सके। सारा संसार और संपूर्ण जगत ही इस माया के हाथों का खिलौना है । प्राणियों के समस्त दुःख, पीड़ा, शोक, क्लेश आदि स्वप्न की भाँति अनित्य हैं, किन्तु अपनी माया के ही द्वारा तुम उनकी निज-स्वरूपात्मक आनन्दमयी सत्यता पर आवरण, विक्षेप और अनुग्रह की शक्तियों का प्रयोग कर उन्हें इस लीला में सम्मिलित करती हो और वे इस लीला के प्रभाव से कभी हर्षित तो कभी शोकग्रस्त, कभी प्रसन्न तो कभी दुःखी होते रहते हैं। 

फिर भी तुम्हारी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए मैं जो कह रहा हूँ,  उस अत्यन्त गुह्य परम ज्ञान को धैर्य और ध्यानपूर्वक सुनो!

एकमात्र मनुष्य ही शास्त्रों की रचना करता है और उस शास्त्र-रूपी नौका पर चढ़कर इस विराट भवसागर को पार कर लेने का मिथ्या स्वप्न देखने लगता है। संसार में रहता हुआ वह निरंतर विविध भोगों और सुखों को प्राप्त करते रहना चाहता है। ये नौकाएँ जरा सी भी आँधी और वायुवेग से अस्थिर होकर डूब जाती हैं या नष्ट ही हो जाती हैं।  फिर मनुष्य करे भी तो क्या! 

मूढ मनुष्य यदि मेरे अस्तित्व पर ही शंका करता है तो भी मैं उस पर करुणा करते हुए,  उसके अपने ही अन्तर्हृदय में उसके अपने स्वयं के ही अस्तित्व के असंदिग्ध और निश्चययुक्त सहज भान के रूप में नित्य प्रत्यक्ष ही प्रकट हूँ। किन्तु उस सहज,  सरल, नित्य उपलब्ध तथ्य की अवहेलना कर अपने ज्ञान के मद में झूमता हुआ स्वयं अपना और अपने संसार का भी विनाश करता रहता है। 

मद और संशय ही अपने इस निज स्वरूप की अवहेलना का परिणाम है, जो क्रमशः तुम्हारी ही आवरण और विक्षेप रूपी शक्तियों का विलास है। इससे ही उत्पन्न होनेवाले छः विकराल विकार मनुष्य के षड्रिपु हैं जो उसे सतत व्याकुल, उद्विग्न और क्लेशयुक्त बनाए रखते हैं। तुम्हारी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए और मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए, इस परम गुह्य ज्ञान को मैं करुणावश पुनः उद्घाटित और प्रकाशित कर रहा हूँ। इसीलिए ऋषिगण मुझे करुणावतार कहते हैं।

ज्ञातृत्व, भोक्तृत्व, कर्तृत्व, स्वामित्व, तथा मद एवं मोह, मनुष्य के यही छः शत्रु उसे निरंतर अपनी आत्मा के नित्यस्फूर्त सहज और स्वाभाविक आनन्द से दूर रखते हैं ।

अपने इस स्वरूप,  'निजता' का यह बोध अत्यन्त प्रकट संकेत है जो अपने अस्तित्व के भान की तरह अनायास ही प्राणिमात्र में विद्यमान होता है। दुर्भाग्य या दुर्बुद्धि के कारण यदि कोई इस पर शंका भी करे, तो उसका यह अस्तित्व स्वयं ही इस शंका को दूर कर देता है। इसलिए, तर्क की दृष्टि से भी मनुष्य मेरे अस्तित्व की उपेक्षा नहीं कर सकता।

किन्तु ज्ञातृत्व,  भोक्तृत्व, कर्तृत्व और स्वामित्व,  मद और मोह के जाल में फँसा वह मूढ, इसे समझने की चेष्टा तक नहीं करता और भ्रमित तथा आशंकित हुआ संसार से लुब्ध, मोहित होकर असंख्य कष्टों में पड़ा रहता है। 

किसी भी प्रश्न के उत्पन्न होने के लिए ज्ञान ही एकमात्र आधार होता है। किसी भी वास्तविक या मिथ्या ज्ञान के बिना कोई प्रश्न उठ ही नहीं सकता। अपने अज्ञान का ज्ञान भी, एक प्रकार का ज्ञान ही तो होता है! इसलिए ज्ञातृत्व मूलतः तो मेरा / अपने निज स्वरूप का नित्य, सहज भानमात्र ही है, जो वैसे भी अविनाशी ही होता है। किन्तु यही भान, जब मद एवं मोह से दूषित बुद्धि से बँध जाता है, तो अस्मिता अर्थात् अहंबुद्धि, जीवभाव का रूप ग्रहण कर लेती है । 

बुद्धिरूपी नौका पर चढ़कर यही ज्ञातृत्व अर्थात् अस्मिता यदि विवेक और वैराग्य की पतवार से अभयरूपी निष्ठा को पाल की तरह तानकर इस भवसागर से पार होने, अर्थात् मुक्ति के लिए चेष्टा करता है, तो मेरी भक्तिरूपी नित्य विद्यमान और प्रवाहित वायु उसे तत्काल ही मेरी दिशा में अग्रसर कर देती है। किन्तु यदि वह शास्त्ररूपी टूटी, पुरानी और जर्जर नौका पर चढ़कर लोभ और भय की पतवार चलाता हुआ, इस सागर को पार करने की आशा करता है, तो यह उसकी निपट मूढता ही है। कामनारूपी वायु शीघ्र ही उसे विचलित कर उस भँवर में गिरा देती है, जहाँ जन्म-मृत्यु और पुनर्जन्म रूपी भूखे और भयंकर नक्र और ग्राह उसकी प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। 

हे सुमुखि! तुम्हारा आविर्भाव शैलजा (शैलपुत्री) के रूप में होने के बाद तुम्हीं दक्षकन्या, कात्यायनी, स्कन्दमाता आदि रूपों को धारण करती हो, और अन्ततः पुनः मुझमें ही लीन होकर मुझसे अनन्य और अभिन्न हो जाती हो । तुम ही कालरात्रि के रूप में अत्यन्त भयानक और अशुभ प्रतीत होते हुए भी परम मंगलमयी हो।  जैसे कि मैं स्वयं भी मुण्डमाल धारण कर, व्याघ्रचर्म लपेट, सर्पों से आवेष्टित हुआ, हलाहल पान कर, भयानक और अमंगल स्वरूप में दिखाई देता हुआ, श्मशानों में भ्रमण करता रहता हूँ ।

स्वरूपतः तुम्हारी मेरी अनन्यता ही मनुष्य की निज आत्मा है। 

दक्षिणामूर्ति के रूप में मैं ही अहंकार-रूपी मनुष्य-शिशु को पद-दलित कर, मौन संकेत से ही अपने तत्व का दर्शन ऋषियों को प्रदान करता हूँ।"

तब पार्वती ने पुनः प्रश्न किया :

"देव!  भक्ति के तत्व के विषय में विस्तार से कहें।"

"देवी!  भक्ति का तात्पर्य है भजन, अर्थात् परमेश्वर से अपनी अनन्यता को स्मरण रखना। जैसे तुम नित्य मुझसे अभिन्न और अनन्य हो, वैसे ही मैं भी सर्वभूतात्म-भूतात्मा, प्रिय और इष्ट, सब के अन्तर्हृदय में नित्य विद्यमान परमेश्वर हूँ। मेरी ही तरह मेरी भक्ति भी मुझ परमेश्वर से अविच्छिन्न है। अपने निज-भान से भी प्रत्येक ही जाने-अनजाने मुझे ही जानता है। यही है नित्य भक्ति। किन्तु जैसा मैंने पहले कहा,  ज्ञातृत्व के आविर्भाव के बाद ही भोक्तृत्व, कर्तृत्व और स्वामित्व उत्पन्न होते हैं, और बुद्धि के मलिन और मंद होने से अस्मिता-रूपी तुम्हारा तत्व भी प्राणियों के लिए अनवरत क्लेशों का कारण हो जाता है।"

तब माता पार्वती ने कहा :

"प्रभो, प्राणिमात्र की निज-आत्मा होते हुए भी आप ही प्रत्येक में निज-चेतना के रूप में उनके जन्म-पुनर्जन्म का मूल कारण हैं और मैं विद्या-अविद्यारूपी शक्ति से उनके जगत का।  

किन्तु, हे प्रभु!  मैं आपका ही अंश हूँ और मेरे अभाव में आप अपूर्ण हैं। 

जिस प्रकार आपने आज अपनी भूमिका के रूप में गुरुपद पर आसीन होकर मुझ पर कृपा की, और मुझे परम-ज्ञान का उपदेश दिया, वैसे ही सदैव अपनी सभी संतानों को भी यही उपदेश देकर उनका उद्धार करें।। 

ॐ शिवार्पणमस्तु 

***   





July 22, 2021

बिस्कुट और कुकीज़!

भाषा-विज्ञान 

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संस्कृत धातु 'डुपचष्' का व्यावहारिक रूप है 'पच्' जिसका अर्थ है -पकना, पकाना, पाक, पाचन,

अंग्रेजी में इसके अपभ्रंश हैं :

Bake, cook,

दूसरा शब्द है : 'पिष्' जिसका व्यावहारिक प्रयोग 'पीसने' के अर्थ में किया जाता है। अंग्रेजी का 'piece' इसी का अपभ्रंश है।

इसी प्रकार 'पिष्' से बना 'पिष्ट' अर्थात् 'पिसा हुआ' ।

'पिष्टपेषणम्' का प्रयोग मुहावरे की तरह होता है :

पिसे हुए को पीसना। 

जैसे, जब कहा जाता है, 

आटा पिसाना है, तो तात्पर्य होता है कि गेहूँ पिसाना है। 

गेहूँ को पीसने पर ही आटा प्राप्त होता है। आटे को पीसना तो बेमतलब ही है! 

इसी 'पिष्ट' से बनता है : paste,  pasta,  pizza.

'पच्' से होता है  bake,  bakery,

संस्कृत में रसोइये के लिए शब्द है, 'पाकुक' जो पाक-कर्म करता है। अंग्रेजी का 'कुक' इसी 'पाकुक' का सजात / सज्ञात / cognate है। 

इसी 'कुक' से बना है कोपर / खप्पर / खर्पर / कोको और कोकोनट अर्थात् नारियल।

और इसी 'कुक' से बना है 'कुकी' जिसका बहुवचन हो गया 'कुकीज़'! 

'पच्', 'पिष्ट' और 'कुक' से मिलकर बना 'बिस्कुट' !

डिस्क्लैमर : Disclaimer 

(ऐसा मुझे लगता है! इसकी सत्यता पाठक स्वयं ही तय करें!)

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July 20, 2021

अलग अलग!

कविता : 20-07-2021

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राहें जुदा जुदा थीं,

मंजिलें अलग अलग,

करते रहे बातें मगर,

मतलब अलग अलग,

जब चल चुके थे राह,

तो, पहुँचे मुक़ाम पर,

पहले भी थे अजनबी,

अब भी अलग अलग!

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एजेंडे

कविता : 20-07-2021

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निरर्थक-व्यर्थ !

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उसकी अपनी ही अहं-ता है, 

मेरी भी अपनी ही अहं-ता है, 

उसकी अपनी ही अजं -ता है, 

मेरी अपनी ही अजं-ता है, 

अपना-अपना कोई ऐजेंडा है, 

अपना-अपना ही कोई झंडा है, 

बहस करने का नहीं है मतलब, 

नतीजा सिफ़र, सिर्फ़ अंडा है!

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सतह

कविता : 20-07-2021

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ज़रूर बहुत ही, मुश्किल है, लेकिन,

सतह से उठता हुआ कोई आदमी, 

ज़ेहनी तौर पर ही सही, सचमुच,

क्या वाकई, सतही हो सकता है!

और क्या ये भी नहीं है मुमकिन,

आसाँ भी, कि सतह से गिरा कोई,

इरादा और कोशिश करे तो,

सतह तक, तो उठ ही सकता है,

फिर कोई क्यों वहीं ठहर जाए,

चाहे तो क्यूँ नहीं हो सकता है?

हर एक आदमी, खुद-ब-खुद ही,

क्यूँ नहीं, यह भी तय कर सकता है!

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तलाश.

कविता : 20-07-2021

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न ज़रूरत ही है, न कोई मतलब है,

तो आखिर, किस चीज़ की तलब है!

क्या हैं फिर मायने ज़िन्दगी के,

हरेक चीज़ अगर बेमतलब है! 

तलाश किसकी है, किसलिए है, 

तलाश करने का क्या सबब है!

वक्त गुज़ारना ही अगर मक़सद है,

तो मर जाना कहाँ, बेमक़सद है!

यही अंजाम है ज़िंदगी का अगर,

ज़िन्दगी किस निजाम के तहत है!

***

July 18, 2021

~~ पंक्तियाँ ~~

कविता : 18-07-2021

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मजबूरी 

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ज़िन्दगी जब बहुत ही, दुश्वार हो जाए,

हैरत नहीं, कोई अगर खूँखार हो जाए!

मौसम सियासत का, होता है आलूदा,

हैरत नहीं कि हर कोई, बीमार हो जाए!

थोड़ा सा खुली हवा में घूमिए तो सही, 

शक नहीं कि तबीयत, गुलज़ार हो जाए!

ज़रूर आँखें चुराते रहिए सच्चाई से,

भूल से इनसे न कहीं, इजहार हो जाए! 

हाँ वो नजर तो आता है, मासूम बहुत,

देखना दुश्मन से कहीं, न प्यार हो जाए!

*** 




 


***

अनुवाद की मर्यादा

संदर्भ : प्रत्यभिज्ञाहृदय 

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अपने स्वाध्याय ब्लॉग में क्षेमराज-विरचित प्रत्यभिज्ञाहृदयः नामक ग्रन्थ यथावत् पोस्ट कर रहा हूँ। 

वैसे भी संस्कृत भाषा को टाइप-सेट करने में कठिनाई और कोई दूसरी भूल होने की संभावना बनी रहती है, फिर ऐसे किसी मूल ग्रंथ का अभिप्राय दूसरी किसी भाषा में अनुवाद के माध्यम से सही सही व्यक्त कर पाना तो और भी अधिक शंकास्पद है।

आज सुबह 14 जुलाई को लिखा एक पोस्ट चेक किया तो ऐसी ही एक भूल पर ध्यान गया। 

मूलतः यह इस प्रकार से है :

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'अख्यातिर्यदि न ख्याति ख्यातिरेवावशिष्यते। 

ख्याति चेत् ख्यातिरूपत्वात् ख्यातिरेवावशिष्यते।।'

इति।  अनेनैव आशयेन श्रीस्पन्दशास्त्रेषु 

'यस्मात्सर्वमयो जीवः..............।'

इत्युपक्रम्य 

'तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः।।'

इत्यादिना शिवजीवयोरभेद एव उक्तः। एतत्तत्वपरिज्ञानमेव  मुक्तिः, एतत्तत्वापरिज्ञानमेव च बन्धः, --इति भविष्यति एव एतत् ।।४।।

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उस भूल को सुधार दिया। 

अब मेरा यह विचार दृढ हो चुका है कि किसी भी भाषा के किसी भी ग्रन्थ को उसके मूल रूप में ही पढ़ना उसके अभिप्राय से अवगत होने का सही तरीका है। शास्त्र के विषय में तो यह और भी अधिक आवश्यक प्रतीत होता है। 

अनुवाद की परंपरा से ही दर्शनशास्त्र की भूलभुलैया उत्पन्न हुई है, क्योंकि अनुवाद के माध्यम से बहुत से अनधिकारी भी शास्त्र के मूल अभिप्राय को जाने-अनजाने या जान-बूझकर भी, तोड़ -मरोड़ कर, अर्थ का अनर्थ करते हुए अपना विशिष्ट ध्येय सिद्ध कर लेते हैं । उनके अनुयायी भी उन पर अपनी अंधश्रद्धा होने के कारण उस विशिष्ट मत का आग्रह करने लगते हैं। 

किसी ग्रन्थ का जो अभिप्राय होता है, उसे सिद्धान्त अर्थात् मत मानकर उससे राजी होना या न होना एक बात है, और उसका यथावत् अनुवाद करना इससे बहुत भिन्न प्रकार की बात है।

उपरोक्त उदाहरण में :

"शिवजीवयोरभेद एव उक्तः।"

के सिद्धान्त से कोई राजी, या राजी न हो सकता हो, यह उसका अपना दृष्टिकोण है, किन्तु इसलिए उसके स्वाभाविक अर्थ की उपेक्षा कर उस पर कोई अन्य अर्थ आरोपित करना अवांछनीय ही है। 

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July 17, 2021

स्वार्थ-निःस्वार्थता

बाहर और परे! 

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बचपन से यही सोचा करता था :

जीवन का अर्थ और प्रयोजन क्या है? 

कहना न होगा कि यह प्रश्न (मन में) कहीं और से आया था। कौतूहल, और आश्चर्य! 

शायद उसी प्रश्न के इर्दगिर्द घूमते हुए पूरी उम्र बीत जाती, अगर उसे परे हटाकर :

"किसका जीवन?"

यह प्रश्न मन में न उठा होता! 

बुद्धि वहीं अटकी रहती, कि हम भी दूसरों की तरह ही इस दुनिया में आए हैं, और एक दिन दुनिया को छोड़ जाएँगे!

(जैसे "दूनी", "दुगुनी" का अपभ्रंश हो सकता है, उसी तरह शायद "दुनिया" भी, "दूनी" का अपभ्रंश हो सकता है!)

पर सवाल यह है कि क्या हम किसी ऐसी जगह से, और कहीं और से आते हैं, जो दुनिया से बाहर और परे है?

मतलब यह, कि शरीर की दृष्टि से, क्या हम उन्हीं तत्वों से नहीं बने हैं, जिनसे कि दुनिया बनी है! 

मतलब यह कि हम कहीं से भी आते हों, सबसे पहले तो हम शरीर में आते हैं (या अपने आपको अनुभव करते हैं), और 

"हम क्या हैं?"

इस बारे में कुछ सोचे बिना ही, हमारा ध्यान इस ओर गए बिना ही हम मान लेते हैं कि हम "कहीं" से आए हैं! 

सो फ़ॉर सो गुड! 

फिर हम यह कैसे कह सकते हैं कि शरीर मिटने पर हम "वहीं" लौट जाएँगे,  जहाँ से (हमें लगता है कि)  हम आए हैं!

तो,  

"जीवन किसका है?" 

या,

"Who's life is it, anyway?"

यह जानना ज्यादा ज़रूरी नहीं है?

हाँ मानता हूँ, कि यह सवाल कुछ बेढब ज़रूर हो सकता है,  लेकिन इसका जवाब जब तक नहीं खोजा जाता, तब तक हम "बोरियत" के प्रश्न से, "जीवन का प्रयोजन (या लक्ष्य) क्या है?", "ईश्वर क्या है?", "है या नहीं?" जैसे सवालों पर ही सिर पटकते रहते हैं, और अपने आपको किसी फिलासॉफी, परंपरा से जकड़ रखते हैं ।

तो सवाल यह है, कि क्या "मैं" अपने आपको जानता हूँ?

क्या यह प्रश्न कभी मन में उठता है? 

क्योंकि जीवन मेरे होने से ही है, न कि जीवन के होने से "मैं"!

क्या जीवन को "मेरा" कहा जा सकता है? 

कभी कभी यह भी कहा जाता है :

"वह प्रश्न / व्यक्ति / घटना / स्मृति / समय / अब मेरे जीवन में कहीं नहीं है!"

ऐसा कोई "जीवन", क्या याददाश्त से कोई अलग चीज़ हो सकता है?

क्या याददाश्त जीवन है? या जीवन सिर्फ याददाश्त भर है?

याददाश्त किसकी? 

याददाश्त से मेरा क्या रिश्ता है?

क्या हर रिश्ता सिर्फ याददाश्त ही नहीं होता? 

और, याददाश्त खो जाने पर क्या जीवन समाप्त हो जाता है?

***


 




July 16, 2021

एक बादल!



कविता : 16-07-2021

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आसमान में उमड़ रहा,  

वह बादल,

यूँ तो अभी अभी उभरा है, 

लगातार बदल भी रहा है, 

ज़ेहन में उठते, 

किसी ख़याल सा, 

न तो उसे रोक सकता हूँ,

न बदल ही सकता हूँ!

***



जब तुम पूछती हो,

कविता : 16-07-2021

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कितना मुश्किल होता है, 

कोई जवाब देना, 

जब तुम पूछती हो, 

कोई गलत सवाल! 

जैसे कि, 

"तुम नाराज क्यों हो?"

तुम राजनीति क्यों करती हो?

"इसमें कौन सी राजनीति हुई!?"

यही, 

कि तुम मुझ पर यह मान लेने के लिए,

दबाव डाल रही हो,

कि मैं नाराज हूँ!

"ओह! राजनीति मैं कर रही हूँ या तुम!?"

कितना मुश्किल है,

इस सवाल का जवाब देना!

-मैं सोचता हूँ, लेकिन कहता नहीं!

हाँ, अब मैं सचमुच नाराज हूँ,

लेकिन नाराज क्यों हूँ,

मुझे नहीं पता!

***

शरीर, मन और आत्मा

अहं, त्वं, तत्, इदम्

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तव तत्त्वं न जानामि, कीदृशोऽसि महेश्वर।

यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।।

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अस्मद्, युष्मद्, और तत् तीन ही सर्वनाम एकमेव 'अहं' सर्वनाम के विस्तार हैं।  इसी का एक पर्याय है 'इदम्' ।

इन्हें 'प्रत्यय' भी कहा जाता है। 

जो प्रतीत होता है, जिसे प्रतीति की तरह ग्रहण कर लिया जाता है और व्यवहार में जिसे प्रयोग में लाया जाता है उसे प्रत्यय कहा जाता है।

'अस्मद्' अर्थात् 'मैं' या 'हम' प्रत्यय ऐसा ही सर्वनाम है, जिसे 'अपने लिए' के अर्थ में प्रयोग किया जाता है।

अपना अस्तित्व और अपने अस्तित्व का भान, परस्पर अभिन्न, अनन्य, और अविभाज्य (त्रि)कालरहित सत्य हैं ।

इसके बाद ही किसी अन्य तत्व के विषय में कुछ भी कहा जा सकता है। यहाँ तक कि 'काल' को यद्यपि अनादि समझा जाता है, किन्तु उस काल की अवधारणा का जन्म या सत्यता की प्रतीति भी अपने अस्तित्व और उस अपने अस्तित्व के भान के बाद ही हो सकती है।  इसलिए 'काल' प्रतीति और प्रत्यय मात्र है। 

अपने को (अर्थात् आत्मा को)  शरीर मात्र समझना उपयोगी है, किन्तु वह एक व्यक्त विचार की तरह ही सत्य है, अपनी निजता या वास्तविकता नहीं है। इसी प्रकार काल और स्थान (Time & Space) प्रत्यय या विचार मात्र हैं, न कि अस्तित्व की तरह विद्यमान सत्यता। 

जबकि 'निजता' काल-स्थान से स्वतन्त्र अपनी वास्तविकता है, न कि कोई विचार या अवधारणा । 'निजता' को शब्द न दिया जाए, तो भी वह अस्तित्व और उस अस्तित्व का भान है, उसे 'अपना' का विशेषण दिए बिना भी, वह नित्य, चिरंतन, स्वतः-सिद्ध वास्तविकता (reality) और सत्य है। 

यह भान ही चेतना है, जो अपने-पराये के भेद से रहित स्थिति है। इसी भान के अन्तर्गत 'अस्मद्', विचार की तरह प्रकट और अप्रकट होता रहता है, और एक आभासी (छद्म) प्रतीति का उद्भव होता है। व्यवहार में इसे ही 'व्यक्ति' की तरह, दूसरों से अलग, अपना स्वतंत्र अस्तित्व मान लिया जाता है, जो काल-स्थान-सापेक्ष होने से अवास्तविक (unreal) है। 

इस प्रकार 'अहं' से 'अहंकार' रूपी कृत्रिम सत्ता का उद्भव होने के बाद ही, 'त्वं' के रूप में अपने जैसे किसी दूसरे चेतन को 'तुम' कहकर संबोधित किया जा सकता है। 

अपनी सीमित क्षमता, सामर्थ्य और शक्ति को अनुभव करते हुए अपनी अपेक्षा अधिक क्षमता, सामर्थ्य और शक्ति से युक्त किसी चेतन 'दूसरे' अस्तित्व (ईश्वर या महेश्वर) की कल्पना की जाती है और उसे ही, संसार की समस्त गतिविधियों का एकमात्र नियन्ता तथा संचालनकर्ता मान लिया जाता है। 

तब उसे 'त्वं' पद से संबोधित कर उसकी प्रार्थना की जाती है। 

उस 'त्वं' से कहा जाता है :

तव तत्त्वं न जानाति कीदृशोऽसि महेश्वर ।

यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।।

अस्तित्व और अस्तित्व के भान में अपने और उसके अस्तित्व की परस्पर अभिन्नता और अनन्यता तो असंदिग्ध ही है।

इसी प्रकार 'तत्' अर्थात् 'वह' पद से इंगित और 'अहं' तथा 'त्वं' से भिन्न, तीसरा सर्वनाम 'सः', 'सा' 'तत्' प्रत्यय किसी तीसरे जड या चेतन अस्तित्व के द्योतक के अर्थ में  क्रमशः प्रयुक्त होता है। 

'तत्' की ही तरह 'इदम्' 'इयम्' और 'एतत्' पदों (शब्दों) को 'यह' के अर्थ में क्रमशः पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग रूपों में प्रयोग किया जाता है।

उस महेश्वर को शिव, शक्ति या परब्रह्म की तरह व्यक्त करने के लिए इस प्रकार अपनी भावना के अनुसार ज्ञेय या अज्ञेय मान लिया जाता है। 

***

संसार की दृष्टि से, शरीर, मन और आत्मा (स्व / स्वयं) यही तीन मौलिक तत्त्व हैं, और इनका पारस्परिक संबंध ही जीवन अर्थात् 'चेतनता' है।  ये चारों अन्योन्याश्रित एकमेव, अभिन्न, अविभाज्य वास्तविकता हैं ।

इस प्रकार 'चेतनता', जीवन या 'भान' निर्वैयक्तिक तत्व है, किन्तु उसे शरीर-विशेष व्यक्ति से संबद्ध मानकर अपना एक आभासी और स्वतंत्र अस्तित्व, बुद्धि में वास्तविक के स्थान पर स्थापित हो जाता है। बुद्धि वैयक्तिक होती है, जबकि जिस 'चेतनता' में व्यक्त और अव्यक्त होती है, वह 'चेतना' अर्थात् 'जीवन' नितान्त निर्वैयक्तिक है।

***




July 14, 2021

जब भी!

कविता : 14-07-2021

असमंजस

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मैंने जब भी मरना चाहा,

मौत दग़ा दे गई मुझे!

मैंने जब भी जीना चाहा,

जीना रास न आया मुझे!

क्या खोना-पाना था मरकर,

क्या पाना-खोना था जीकर,

जीते जी भी, अब तक भी,

नहीं समझ में आया मुझे!

***


ॐ ऐं ह्रीं क्लीं

अन्नपूर्णा! 

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देवी का दैवी प्रभाव

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आपने रोटी बेलनेवाली, सब्ज़ी काटनेवाली लड़की का वीडियो अवश्य देखा होगा, जो आजकल वायरल हो रहा है! 

कितना सादा, भोला, सरल सौन्दर्य! 

शायद ही कोई समझ पाया हो, उसके आकर्षण का रहस्य!

एक संकेत मुझे उसके नाम से मिला!

आज जैसे ही उसका नाम पढ़ा, मुझे यह मंत्र याद आया!

शायद इसीलिए उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता!

***

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा-रूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

***

July 13, 2021

भारत का भविष्य

भारतीयता

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जैसे अभी कोरोना खत्म नहीं हुआ है, वैसे ही महाभारत भी अभी चल ही रहा है। महाभारत 18 दिनों तक चला था, कोरोना 18 माह से अधिक समय तक चल चुका है। 

यदि इस तुलना में कोई संकेत है, तो यही कि जैसे महाभारत के  समय में कुरुवंश या तत्कालीन सभ्यता अपने शिखर तक पहुँच चुकी थी, वैसे ही विगत बीस सदियों में हमारी सभ्यता अपने भौतिक विकास के शिखर तक पहुँच चुकी है।

गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को 18 से अधिक (22) बार 'भारत' कहा है :

अध्याय 1, श्लोक 24,

अध्याय 2, श्लोक 10, 14, 18, 28, 30,

अध्याय 3, श्लोक 25,

अध्याय 4, श्लोक 7, 42,

अध्याय 7, श्लोक 27,

अध्याय 11, श्लोक 6,

अध्याय 13, श्लोक 2, 33,

अध्याय 14, श्लोक 3, 8, 9, 10,

अध्याय 15, श्लोक 19, 20,

अध्याय 16, श्लोक 3,

अध्याय 17, श्लोक 3,

अध्याय 18, श्लोक 62,

इससे यदि संकेत ग्रहण करें तो यह कि अर्जुन अर्थात् भारत को अभी वर्ष 22 तक युद्ध करना है। 

वैसे तो अनेक देश अपनी संस्कृति को हिन्दुत्व से जोड़कर देखते हैं, किन्तु नेपाल एक राष्ट्र था जो हिन्दू राष्ट्र था। वह आज हिन्दू नहीं रह गया है। 

वैसे हिन्दू एक शब्द ही तो है, किन्तु नेपाल के लिए यह उसकी राष्ट्रीय पहचान भी थी। 1947 में अनेक हिन्दू रियासतों (स्टेटस) का भारत में विलय हुआ। (मेरा अनुमान है कि) नेपाल पहले भी अंगरेजी शासन के अधीन नहीं था, इसलिए भी शायद हमारे देश के निर्माताओं ने उससे भारत में विलय के लिए अनुरोध नहीं किया होगा, कि वह एक 'हिन्दू' राष्ट्र था। 

अब स्थितियाँ बदल गई हैं। न तो भारत और न ही नेपाल अब हिन्दू राष्ट्र रह गए हैं। किन्तु यदि भारत को संवैधानिक आधार पर हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाता है और नेपाल से इस संघ में शामिल होने का अनुरोध किया जाता है, तो यह सभी भारतीयों तथा नेपाल के नागरिकों के लिए भी गर्व और सम्मान की बात होगी। नेपाल की वर्तमान राजनीतिक स्थितियाँ भी अभी बहुत अनिश्चित हैं, चीन किसी न किसी बहाने से उस पर आधिपत्य करने तथा उसके घरेलू मामलों में टांग अड़ाने का प्रयास करता रहेगा। एक कमजोर नेपाल न तो स्वयं की रक्षा कर सकता है,  न भारत के हितों की। दूसरी ओर, चीन स्वयं ही, जैसे कि कभी सोवियत संघ था, वैसे ही अब टूटने की कगार पर है, इसलिए भी अगर हमारे देश के कर्णधार इन सारी स्थितियों का आकलन कर अपनी रणनीति तय करें, तो अवश्य ही एक नये शक्तिशाली राजनैतिक भारत का उद्भव विश्व के रंगमंच पर हो सकता है।

यह नेपाल और भारत दोनों के ही स्थायित्व और सुरक्षा के लिए भी अपरिहार्यतः आवश्यक है। 

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चलो, यही कर देखो!

कविता : 13-07-2021

संकल्प-विकल्प! 

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तुम जो चाहो, वह शायद, तुम कर सकते हो, 

लेकिन क्या चाहोगे, कैसे तय कर सकते हो! 

तुम जो सोचो, वह शायद, तुम कह सकते हो, 

लेकिन क्या सोचोगे, कैसे तुम, कह सकते हो!

कोई भी सोच तुम्हारी चाह बदल सकती है,

कोई भी चाह तुम्हारी सोच बदल सकती है!

हालात, वक्त, जरूरत, वगैरह बदल सकते हैं,

उनके ही जरिए, हालत भी, बदल सकती है!

तुम बोलोगे, मान लिया है, हमने, पहले से ही, 

करना क्या है, ठान लिया है, हमने, पहले से ही!

कोई नहीं रोक सकता है, हमको वह करने से,

कोई नहीं डिगा सकता है, हमको अब करने से!

चलो, यही कर देखो, शायद ऐसा ही होना होगा,

फिर आखिर में तुमको ही, हँसना या रोना होगा!

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July 11, 2021

छलनामयी!

 कविता : 11-07-2021

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कभी तुम पर उसका चेहरा, 

कभी उस पर तुम्हारा नाम,

आरोपित करती है!

स्मृति छलनामयी माया, 

कैसे कैसे प्रपञ्च,

किया करती है!

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July 10, 2021

भीगा धरती का तन-मन!

कविता : 10-07-2021

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तपती जलती सूखी धरती को, 

आकर आतुर मेघों ने सींचा,

कोई बिछा गया धरती पर,

धीरे धीरे हरा गलीचा!

कण कण तृप्त हुआ धरती का, 

सोते निर्झर चंचल होकर, 

दौड़ पड़े हर ओर भूमि पर,

भीगा धरती का तन-मन! 

***

 



July 09, 2021

शब्द-शक्ति

अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना 

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समीक्षा : "दर्द लेकर दर-ब-दर" कविता की। 

वैसे अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना और शब्द-शक्ति के बारे में मैं अधिकारपूर्वक कुछ नहीं कह सकता, किन्तु उपरोक्त शीर्षक से लिखी कविता की समीक्षा के बहाने मैं उनका उपयोग कर रहा हूँ। इस दृष्टि से देखें तो यह कविता लिखते हुए मुझे पुनः गीता के अध्याय ४ के श्लोक का स्मरण हुआ :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। 

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।। ५

जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण (या गीता के रचयिता) द्वारा किए गए 'अहं' शब्द के प्रयोग में श्लेष अलंकार दृष्टव्य है।

यदि क्रियापद 'वेद' पर ध्यान दें तो इसमें भी इसी प्रकार श्लेष अलंकार की सुसंगति दो प्रकार से दिखाई देती है।

संस्कृत भाषा की अदादिगण की धातु √विद् का प्रयोग 'जानने' के अर्थ में किया जाता है।

'वेद' शब्द का प्रयोग पुनः लिट् लकार (अनद्यतन भूत काल) में अन्य पुरुष एकवचन तथा उत्तम पुरुष एकवचन में समान अर्थ में किया जाता है, अर्थात् 'उसने जाना' और 'मैंने जाना' के अर्थ में। 

'अहं' पद, संज्ञा के रूप में 'आत्मा' के अर्थ में, तथा सर्वनाम के रूप में 'मैं' के अर्थ में भी प्रयुक्त किया जा सकता है।

भगवान् श्रीकृष्ण (या गीता के रचनाकार) ने जिस भी दृष्टि से ऐसा प्रयोग किया हो, उसकी दोनों ही अर्थों से सुसंगति है।

इसी दृष्टि से सन्दर्भित मेरी रचना में 'मैं' शब्द का प्रयोग दो अर्थों को दर्शाता है। एक है वास्तविक 'आत्मा' और दूसरा है मेरी वह लौकिक पहचान जो आभासी, व्यावहारिक प्रतीति और ज़रूरत है किन्तु वह मिथ्या है न कि मेरा यथार्थ ।

इसी सन्दर्भ में, 'अभिज्ञा' शब्द का प्रयोग 'भक्ति' के अर्थ में महर्षि शाण्डिल्य विरचित 'भक्तिदर्शनम्' में भी दृष्टव्य है। 

भक्ति को भी महर्षि ने दो प्रकार से वर्णित और वर्गीकृत भी किया है। एक है मुख्या और दूसरी है इतरा या गौणी। 

विशेष यह कि दोनों ही प्रकारों की भक्ति में भक्त को आत्मा का विस्मरण नहीं होता।

इसी 'अभिज्ञा' की प्रतिध्वनि "प्रत्यभिज्ञानात्" सूत्र में, तथा और शैवदर्शन के एक ग्रन्थ, 

आचार्य क्षेमराज-विरचित : "प्रत्यभिज्ञाहृदयम्"

में भी सुनाई देती है। 

***


दर्द लेकर दर-ब-दर

अहं, अहंकार, अभिज्ञा, अभिमान, 

अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना,

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कविता : 09-07-2021

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क्या मेरी अपनी कोई पहचान होना चाहिए!

क्या नहीं पहचानता (हूँ) असलियत भी मैं खुद की?

यूँ तो ये लगता है, सब पहचानते ही हैं खुद को ,

ये भी लेकिन सच नहीं, क्या जानते हैं वे खुद को!

मुमकिन है क्या, अनजान कभी, कोई होता हो खुद से?

हाँ जरूर हो सकता है, गा़फ़िल हो जाता हो खुद से!

अपने वजूद से क्या कभी इंकार कोई करता है?

फिर कभी होगा कोई, नावाकि़फ़ कैसे खुद से?

यही तो ग़फ़लत है अपनी, जान और पहचान में,

हकी़क़त में, जानने-पहचानने के, दरमियान में!

खुद को कोई जिस तरह से भी जाना करता है,

और अपने-आपको, जैसे कि पहचाना करता है,

'जान' पर 'पहचान' कोई, जब अपनी लाद लेता है,

अपने वजूद को भुलाकर ओढ़ लेता है जब ग़फ़लत,

खुद को, उसी तो भूल में, खुद ही तो बाँध लेता है!

लेकिन मगर उस भूल को जब वह जान लेता है,

खुद को, खुदी को भी तभी पहचान लेता है!

खुद से खुद की ही, जान-पहचान तक का सफ़र,

है बहुत दिलचस्प भी, इतना बहुत ही पुर-असर!

कोई मुसाफ़िर जब तलक करता नहीं है यह सफ़र,

तब तक भटकता रहता है, दर्द लेकर दर-ब-दर!

***




July 07, 2021

वह पूरा शहर!

विज्ञान कथा : 2027

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15 किमी गुणित 15 किमी में पूरा शहर बसा हुआ है। 

अफवाह फैलती है कि यह शहर जल्दी ही खाली कर दिया जाना है। कुछ ही दिनों बाद एक सरकारी आदेश जारी किया जाता है कि शहर छोड़कर जो भी जाना चाहे, जा सकता है।  अपनी इच्छा के अनुसार वह देश के किसी भी दूसरे शहर में जा सकता है जहाँ उसे रहने के लिए वैसा ही या उससे बेहतर घर दिया जाएगा। सभी को इस बारे में विस्तार से जानने की इच्छा थी। पर क्यों? 

कई लोग शहर छोड़ने को लेकर दुविधा में थे। 

सरकार ने फिर दूसरी चेतावनी जारी की। 

जल्दी ही किसी भी दिन किसी भी समय कोई सुप्त ज्वालामुखी अचानक सक्रिय हो सकता है, भूचाल आ सकता है, या ऐसा ही कुछ और भी हो सकता है, जिसके बाद शहर में रहना मतलब खतरों से सामना करने के लिए तैयार रहना होगा ।

फिर भी कुछ मुट्ठी भर साहसी लोग शहर को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। धीरे धीरे शहर की जनसंख्या 10% से भी कम रह गई । इनमें से 1% तो वे थे, जिनका बहुत अधिक राशि के लिए सरकार ने मुफ्त बीमा कर रखा था। शेष 9% में से भी कुछ लोग धीरे धीरे हिम्मत हारने लगे थे। 

शहर की जनसंख्या 2% रह गई, और एक सुबह जब लोगों की नींद खुली, तो उन्हें सब कुछ बड़ा अजीब सा लग रहा था। सुबह सुबह मॉर्निङ्ग वॉक पर जानेवालों ने देखा, क्षितिज उनके शहर की हद तक आ चुका था। उन्हें क्षितिज दिखाई तो देता था, और वे उसे छू भी सकते थे। लेकिन यह एक ठोस अपारदर्शी दीवार जैसा था, जिससे पार कुछ नहीं देख सकते थे। वे जब लौट कर घर आए तो उनके मोबाइल वैसे ही काम कर रहे थे जैसे पहले किया करते थे। पर वे शहर में बन्द होकर रह गए थे। 

वे दूसरे स्थानों के अपने मित्रों, परिचितों से वीडियो चैट भी कर सकते थे और उन्हें बता रहे थे कि क्या हुआ आज, और वे किस परेशानी में पड़ गए हैं। 

और लोगों की तरह ही उन्हें भी शीघ्र ही पता चल गया कि उनके शहर को 'स्कूप' कर लिया गया है और वे अब 6 माह से 1 साल  तक अंतरिक्ष में ही रहेंगे। लेकिन यह भी पूरी तरह सत्य नहीं था। उनका शहर जो एक आकाशीय पिंड हो चुका था, एक अजीब स्थिति से गुजर रहा था। कुछ दिनों तक तो उनके लिए कृत्रिम गुरुत्वाकर्षण की व्यवस्था की गई थी, फिर वह भी धीरे धीरे कभी कभी कुछ समय के लिए बंद रहने लगी। तब उन्हें समझ में आने लगा कि कृत्रिम गुरुत्वाकर्षण न होने पर भी कैसे अपने सारे कार्य कर सकें। तीन माह बाद तक तो उनमें से हरेक को अपनी आँखों पर भरोसा नहीं रह गया था।

किन्तु उनके भोजन, पानी आदि की व्यवस्था और देखरेख बहुत अच्छी तरह से हो रही थी। वे आराम से फ़िल्में देख सकते थे,  किसी भी शहर के किसी भी परिचित व्यक्ति से बातचीत भी कर सकते थे। लगता है कोई अदृश्य शक्ति उनकी देखभाल कर रही थी।  कभी कभी वह एक मनुष्य की तरह उनसे बातें भी करती थी, लेकिन उसकी ही मर्जी से, -न कि उन लोगों की मर्जी से। 

वह आवाज स्वयं को 'परमात्मा' कहती थी। शहर के बच्चे यही मानने भी लगे थे। बड़े लोगों को भी धीरे धीरे ऐसा विश्वास हो चला था। जब एक बूढ़े आदमी की मृत्यु होनेवाली थी, तो उस आवाज ने उससे कहा था : 

"तुम्हें नींद आनेवाली है, तुम सो जाओ, जब तुम्हारी नींद खुलेगी  तो तुम अपने आपको उसी पहले वाली धरती पर इस शहर से अलग किसी दूसरे शहर में पाओगे । वहाँ तुम फिर युवा हो जाओगे और जब तक चाहोगे जीवित रहोगे।"

फिर वह व्यक्ति सो गया, और एक एम्बुलेंस उसके घर आकर उसे ले गई ।

अन्ततः वह पूरा शहर किसी ग्रह पर इस तरह से उतर गया जैसे कोई उड़न-तश्तरी हो। वहाँ वह वैसा ही था जैसा धरती पर हुआ करता था। लेकिन अब वहाँ क्षितिज वैसा ही बहुत दूर दिखाई देता था जैसा कि धरती पर हुआ करता था। वे लोग अब अपनी कारों में बैठकर आसपास के दूसरे स्थानों पर भी जा सकते थे जहाँ के लोग इन्हें 'देवता' (Alien) समझने लगे थे। 

फिर एक दिन आवाज सुनाई दी :

"हमें कल तक ही यहाँ रहना है। कोई भी शहर छोड़कर न जाए! और सब लोग घबराकर लौट आए थे।"

रात्रि में किसी समय फिर उस शहर को 'स्कूप' कर लिया गया था, और सुबह वह धरती पर लौट आया था। जाते समय पूरे सात या आठ माह लगे थे, तीन चार महीने वे वहाँ रहे थे, और जब धरती पर किसी उड़न-तश्तरी की तरह से उनका शहर उतरा, तो ठीक उसी स्थान पर जहाँ से उन्हें उठाकर ले जाया गया था।

बहुत से लोगों को यह सब स्वप्न जैसा लग रहा था लेकिन धरती पर बहुत से लोगों को अफ़सोस  हो रहा था :

काश! वे शहर न छोड़ते!

शायद ही कोई इस कहानी को सच माने!

***

देर आयद दुरुस्त आयद!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ / R.S.S.

(Really Simplified Solutions) 

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अभी दो तीन दिनों पहले "सुबह का भूला" शीर्षक से एक पोस्ट इसी ब्लॉग में लिखा था। 

इसी सन्दर्भ में एक पोस्ट अंग्रेजी भाषा के मेरे ब्लॉग :

vinayvaidya 

में लिखा था किन्तु संतोष न होने से उसे डिस्कार्ड कर दिया था। संक्षेप में यही कि उसे लिखने का विचार राहुल रौशन के 'संघी' विषयक लेख : 

 (A Sanghi who never went to Shakha) 

को पढ़कर मन में आया था ।

सबसे पहले R.S.S. अर्थात् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अस्तित्व से मैं उस समय अवगत हुआ था, जब मेरे गाँव में शाखा के एक कार्यकर्ता ने मुझसे इसका आग्रह किया था। उस समय मैं कक्षा ९ या १० में पढ़नेवाला छात्र था।

एक दिन शाम शाखा में जाकर लौटा, और उस कार्यकर्ता ने मुझे R.S.S. संगठन के बारे में कुछ समझाया। 

हिन्दू एवं हिन्दुत्व क्या है, हिन्दू-राष्ट्र क्या है, राष्ट्रवाद क्या है, और हिन्दुओं को क्यों संगठित होना चाहिए, इस बारे में R.S.S. की क्या भूमिका और दृष्टि है, उसने मुझे समझाया। 

उसने पढ़ने के लिए मुझे दो पुस्तकें भी दीं, जिसमें R.S.S. के संस्थापक श्री हेडगेवार से संबंधित कुछ जानकारी और उनका जीवन-चरित्र भी था। 

उन पुस्तकों को पढ़कर मुझे यह लगा कि यह संस्था अवश्य ही हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य पैदा करने का प्रयास कर रही है। हालाँकि तब मेरी बुद्धि इतनी परिपक्व भी नहीं हुई थी (जैसी कि शायद आज है), और मैं सतर्कता एवं सावधानी से यह देख और सोच-समझ पाता कि हिन्दू या मुसलमान, भारतीय या ऐसे ही, कांग्रेसी, कम्युनिस्ट, या और कुछ भी होना केवल मान्यता और धारणा ही है न कि जीवन की वास्तविकता। और  किसी भी मान्यता में अपने आपको परिभाषित कर लेना तथा मानसिक दुराग्रह में जकड़ लेना तात्कालिक रूप से ज़रूरी और उपयोगी भी हो सकता है, किन्तु मूलतः भ्रान्तिपूर्ण ही है।

तब मैं स्कूल में प्राप्त हुई शिक्षा के वातावरण से प्रभावित होकर महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित था और इसलिए भी R.S.S. की रीति-नीति मुझे बिलकुल अच्छी नहीं लगी। 

बाद में कॉलेज और विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए भी, कुछ ऐसे लोगों के संपर्क में आया जो R.S.S. या ऐसी किसी राजनैतिक विचारधारा के समर्थक या विरोधी थे, और निरंतर एक दूसरे से बहस करते रहते थे।

बहुत बाद में जब श्री बलराज मधोक के भारतीय, भारतीयता और भारतीयकरण विषयक विचारों को पढ़ा तो मुझे लगा कि इस व्यक्ति ने हमारे समय की समस्या को न सिर्फ बेहतर ढंग से समझा है, बल्कि उसका व्यावहारिक हल व समाधान भी हमारे सामने रखा है।

हिन्दू, मुसलमान, यहूदी, कैथोलिक, ईसाई या पारसी, भारतीय,  अमरीकी, रूसी, चीनी इत्यादि होना हमारी भौतिक सत्यता नहीं हो सकता, न उसका भौतिक सत्यापन करना ही संभव है, और उसे एक कामचलाऊ और उपयोगी मान्यता भी ज़रूर समझा जा सकता है, क्योंकि वह हमारी सामाजिकता की पहचान मात्र है, मूलतः उसमें ऐसा कोई तत्व है ही नहीं जिसे दृढ़ और / या पुष्ट किया जा सके।

फिर भी देश के लोगों की यह सामाजिक व्यवस्था सुचारु रूप से चले इसके लिए आवश्यक है कि विभिन्न सामाजिक संरचनाओं  के बीच सामंजस्य रखते हुए ऐसा प्रबंध किया जा सके जिससे शासन (government) सबके कल्याण, प्रगति, सुख-समृद्धि को सुनिश्चित कर सके। अनेक दलों की व्यवस्था (प्रणाली) के होने से सत्ता और प्रतिपक्ष के बीच सतत टकराहट होती रहती है जिससे हमारी ऊर्जा का ह्रास ही होता है ।

यदि राजनीति और शासन, दलों और विचारधारा पर आधारित न होकर व्यक्ति और प्रतिनिधित्व-आधारित हो, सभी प्रतिनिधि मिलकर अपने बीच से अपने नेता का चुनाव करें और वह सदन का प्रमुख हो, तो भी हम बेहतर कार्य कर सकते हैं। 

महात्मा गांधी की पंचायती राज की कल्पना शायद यही रही होगी।

यह एकदलीय शासन (जैसा कि चीन में है,) से बहुत भिन्न है, और R.S.S. यदि हिन्दुत्व आधारित राजनीति को त्याग कर इस प्रकार के गांधीवाद पंचायती राज के स्वप्न को साकार करे तो वह अवश्य ही प्रशंसनीय होगा।

यदि हम ग्राम-पंचायत, जिला-पंचायत, नगर-पंचायत आदि के मॉडल पर सोच सकते हैं, तो राष्ट्रीय पंचायत के बारे में क्यों नहीं!

इतना ही नहीं, आगे चलकर शायद विश्व-पंचायत के बारे में भी! 

***



न जाने क्यों!

कविता : 07-07-2021

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घूम-फिर कर मैं, यहीं फिर लौट आता हूँ, 

किसलिए निकला था, यह भी भूल जाता हूँ!  

पर कभी ऐसा भी हो, कोई बुला ले यदि मुझे,

तो भटक जाता हूँ, यह भी भूल जाता हूँ!

नित भटकता रहता हूँ, पर याद आता ही नहीं,

किसकी तलाश है मुझे, यह भी भूल जाता हूँ!

यह भी हैरानी है मुझे, ऐसा क्यों है मेरे साथ,

कौन मेरा, किसका मैं, यह भी भूल जाता हूँ!

कोई लुभा लेता मुझे, कोई भुला देता मुझे,

अपना-पराया कौन है, यह भी भूल जाता हूँ!

कोई तो हँसता है मुझ पर, कोई है दग़ा देता,

कोई समझता है पागल, यह भी भूल जाता हूँ!

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July 06, 2021

भक्ति-सूत्र

अथातो भक्ति-जिज्ञासा! 

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महर्षि शाण्डिल्य कृत 

 "भक्तिदर्शनम्"

वर्ष 2004 में उज्जैन में सिंहस्थ पर्व के समय उपरोक्त ग्रन्थ प्राप्त हुआ था। उसका सरल अर्थ लिखने का मन था। उस समय न हो पाया। 

आज ही सुबह अचानक पुरानी पुस्तकों को व्यवस्थित करते हुए वह ग्रन्थ हाथ आया। 

सुबह 08:00 बजे उसे अपने 

swaadhyaaya blog 

में type-set करना शुरू किया और अभी दस मिनट पहले यह कार्य पूरा हुआ। 

अभी केवल सरल संधि-विग्रह किया है। 

शायद कुछ त्रुटियाँ भी होंगी। 

ऐसे ही जब कभी पुनः भगवत् प्रेरणा होगी तो उसका सरल अर्थ भी लिख पाऊँगा !

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July 05, 2021

सुबह का भूला

हिन्दू और हिन्दुत्व

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इस ब्लॉग में किसी बहुत पहले के पोस्ट में स्वर्गीय श्री बलराज मधोक के 'भारतीयता' और 'भारतीय-करण' के विचार पर कुछ लिखा था।

उस समय के एक राजनीतिक दल "जनसंघ" के नेतृत्व ने जिस डर और जिस लालच से प्रेरित होकर उन्हें हाशिए पर रख दिया इस बारे में यही कहना उचित होगा कि जनसंघ का वह नेतृत्व आर.एस.एस. के नियंत्रण में, उसके मार्गदर्शन के अनुसार राजनीतिक महत्व के तमाम निर्णय करता था। 

वह 'हिन्दू' और 'हिन्दुत्व' का प्रयोग राजनीति के औजार की तरह राजनैतिक 'ध्रुवीकरण' के लिए करना चाह रहा था, (और आज भी कर रहा है।) जो देश के लिए अन्ततः अत्यन्त घातक ही होगा। 

श्री बलराज मधोक ने उस नेतृत्व की परवाह नहीं की, और वे अपने भारतीयता एवं भारतीयकरण के उस विचार पर डटे रहे जिसकी कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी।

आज सुबह आर.एस.एस. के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के जो शब्द आकाशवाणी के प्रातःकालीन समाचार बुलेटिन में सुने, उनमें श्री बलराज मधोक जी के उसी विचार की प्रतिध्वनि जब सुनाई दी तो मुझे थोड़ा भी आश्चर्य नहीं हुआ। 

श्रोताओं के किसी समूह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा :

"हिन्दू-मुस्लिम को परस्पर जोड़ने से पहले तो हमें अपनी इस मान्यता को त्यागना होगा कि हम अलग अलग हैं। 

हमारे डी.एन.ए. एक ही हैं। हाँ, हमारी पूजा-पाठ की पद्धति एक-दूसरे से भिन्न भिन्न हो सकती है, किन्तु हमारे डी.एन.ए. से यही प्रमाणित होता है कि हमारी राष्ट्रीयता भारतीय ही है। और हम सभी सबसे पहले तो भारतीय हैं, और इसके बाद ही हिन्दू या मुसलमान आदि हैं।"

यहाँ जो शब्द मैंने उद्धृत किए हैं, वे लगभग वही हैं, जैसा कि मुझे याद है और जैसा उसका अभिप्राय मैंने समझा। 

किन्तु इससे जुड़ा एक विवादास्पद तथा विचारणीय प्रश्न और भी है जिसका उत्तर भी पुनः दो तरीकों से दिया जा सकता है। 

वह है "राष्ट्र" और "देश" इन शब्दों की वैदिक-सनातन-धर्म के अन्तर्गत पाई जानेवाली धारणा, तात्पर्य, तथा व्यवहारिक प्रयोग और, इसी प्रकार से "वतन" तथा "मुल्क" शब्दों के व्यावहारिक प्रयोग के परिप्रेक्ष्य के अनुसार इन दोनों शब्दों का तात्पर्य। 

संस्कृत में "राष्ट्र" शब्द संपूर्ण पृथिवी (earth, globe) के अर्थ में प्रयुक्त होता है और इसी संदर्भ में सनातन-धर्म सार्वभौम-धर्म है, न कि किसी देश-काल की सीमा से परिभाषित किसी स्थान से संबद्ध रीति रिवाज (ritual,  custom,  tradition) तक सीमित परंपरा आदि।

इस प्रकार जिसे religion कहा जाता है वह स्थान-विशेष और समाज के रीति रिवाजों आदि के अनुसार सर्वत्र भिन्न भिन्न होता है, जबकि धर्म पाँच सार्वभौम महाव्रत अर्थात् "यम" हैं जिनका उल्लंघन किसी भी स्थान, समय पर नहीं किया जा सकता। 

इस प्रकार "धर्म" या सनातन-धर्म सर्वत्र और सबके संबंध में एक ही है, जबकि religion अर्थात् रीति-रिवाज पूजा पाठ, उपासना इत्यादि जो "नियम" है,  उसका स्वरूप देश-काल-परिस्थिति के अनुसार सदैव और सर्वत्र ही बदलता रहता है ।

इसीलिए "अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह" इन पाँचों का पालन सर्वत्र और सबके लिए अनुल्लंघनीय है, और उनमें से भी प्रथम "अहिंसा" है, जिसका तात्पर्य है किसी भी वस्तु या किसी भी प्राणिमात्र से वैर न रखना।

अहिंसा परमो धर्मः।। 

इस प्रकार सनातन-धर्म की मूल प्रेरणा यही है कि हर मनुष्य को स्वयं ही अपने धर्म का आविष्कार करना होता है, और जानते या न जानते हुए भी किसी दूसरे के 'धर्म' का अभ्यास / अनुष्ठान करना, न सिर्फ अनिष्टकारी है, बल्कि मृत्यु की तरह भयावह भी है ।

(स्वधर्मे निधनं श्रेयो परधर्मे भयावहः)

इसलिए किसी पर भी लोभ या भय दिखाकर बलपूर्वक, अपनी धारणा को आरोपित करना मतान्तरण तो हो सकता है, किन्तु धर्मान्तरण कदापि नहीं हो सकता। 

इसलिए वास्तविक "धर्म" का प्रचार किया ही नहीं जा सकता, और उसकी खोज स्वयं ही करना होती है।

भौगोलिक तथा वैज्ञानिक आधार पर भी इसलिए हिन्दू हो या मुसलमान, भारत में जिसका भी जन्म हुआ है उसे भारतीय कहना सर्वथा उचित ही है।

देर आयद, दुरुस्त आयद!

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July 03, 2021

तीन पँखुड़ियाँ

मेरे ड्राइंग-रूम में दो सीलिंग फैन्स लगे हैं। पिछले दो साल का अधिकाँश समय इसी हॉल में बीता है। यह वास्तव में ऐसा हॉल है, जिसमें पार्टीशन कर लिया जाए, तो इसे ड्राइंग-कम-डाइनिंग रूम कहा जाता है। फ़ुरसत बहुत रहती है, जो काम कर सकता हूँ उन्हें करने में मन नहीं लगता, और जिनमें मन लगता है,  उन्हें कर पाने की सुविधा नहीं है। मोबाइल पर न्यूज़ देख लेता हूँ, वीडियो देखने में या म्यूजिक, संगीत सुनने में दिलचस्पी नहीं है। कुछ खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं और किसी से बातचीत करने के लिए न तो कोई विषय है, न ही कोई ऐसा परिचित, दोस्त, या अन्य व्यक्ति जिससे बातचीत हो सके। कहा जा सकता है कि मैं बहुत बोर होनेवाला और बोर करनेवाला आदमी हूँ। 

30 जून को अख़बार में श्री जे. कृष्णमूर्ति का लेख पढ़ रहा था। सवाल ऊब के बारे में था। 

"हम क्यों ऊबते हैं?" 

उन्होंने जो कहा उसे आप उनकी पुस्तकों में या उनके ऐसे लेखों आदि में जो अनेक स्थानों पर उपलब्ध हैं पढ़ सकते हैं । आप यदि इस प्रश्न को महत्वपूर्ण नहीं मानते तो आपके पास इससे बचने के लिए बहुत से तर्क भी होते हैं। सच तो यह है कि संसार में मन को बाँधे रखने के इतने साधन हैं कि उम्र ही कम प्रतीत होती है। किसी को दुनिया घूमनी है, किसी को पैसा कमाना है,  किसी को राष्ट्र, समाज, मानव, या पशु-पक्षियों की सेवा करना है, किसी को ईश्वर-प्राप्ति या ऐसा ही कोई दूसरा कार्य करना होता है। यह भी सच है कि कोई राउंड द क्लॉक अपने कार्य में लगा रहे यह भी संभव नहीं है। शारीरिक आवश्यकताएँ अपनी जगह होती हैं, स्वास्थ्य और आर्थिक समस्याएँ भी मनुष्य के लिए इतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं । और समय कभी अनुकूल तो कभी प्रतिकूल भी होता है। फिर भी यह प्रश्न कभी न कभी हर मनुष्य के सामने आता है। 

ऊब से बचने के लिए भी मनुष्य के पास कई उपाय और बहाने होते हैं। मनोरंजन की दुनिया उस पर लगातार आक्रमण करती रहती है, और वह भौतिक साधनों की चकाचौंध से अभिभूत होता रहता है। 

मेरे कमरे में लगे वो दोनों पंखे मानों दो समांतर हैं :

एक की पँखुड़ियाँ मानों कर्म, भोग और ज्ञान तथा दूसरे की मानों सफलता, विफलता और संघर्ष की कहानी कहती हैं। 

उन पंखुड़ियों की ही तरह कर्म, भोग और ज्ञान निरंतर एक के पीछे दूसरा, दूसरे के पीछे तीसरा और तीसरे के पीछे पहला, इस तरह घूमते रहते हैं। 

दूसरी ओर सफलता,  विफलता और संघर्ष भी। 

बोलो कितने तीतर! 

बिजली कभी भी आती और चली जाती है। 

तब वे पँखुड़ियाँ धीरे-धीरे रुककर ठहर जाती हैं ।

मनुष्य चेतन प्राणी है, जिसके पास मन नामक यंत्र है। 

मनुष्य स्वयं ही यह यंत्र है या इस यंत्र का स्वामी है, इस प्रश्न की ओर शायद ही किसी का ध्यान जा पाता है।

यंत्र स्वयं चेतन है या चेतनता ही यंत्र है यह भी पूछा जा सकता है। क्या यंत्र कभी ऊबता है?

मन जो कभी ऊबता है तो कभी बहुत व्यस्त होता है तो वह ज्ञान, कर्म और भोग की अति पर ही होता है।

सफलता या विफलता क्षणिक लेकिन संघर्ष छोटा या बड़ा हो सकता है।  समय की दृष्टि से भी। 

एक सवाल फिर और आता है :

ऊबता कौन है?

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July 02, 2021

मुझे नहीं पता,

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"Advertisement is the life-line of business."
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पहले किसी ने ऐसा कहा या नहीं, लेकिन अभी अभी जब अपने गीता-ब्लॉग के पोस्ट्स देख रहा था तो अचानक यह पंक्ति मन में कौंध उठी। 
पब्लिसिटी का समानार्थी शब्द है "एड्वर्टाइज़मेंट" ! 
और इसी तरह, 
"एड्वर्टाइज़मेंट" है डंके की चोट पर की जानेवाली पब्लिसिटी! 
मेरे गीता से संबंधित ब्लॉग में किसी किसी दिन अचानक और बिलकुल अनपेक्षित रूप से पेज-व्यूज़ की संख्या बढ़ जाती है। वैसे मेरे दूसरे ब्लॉग्स के बारे में भी यही होता है। 
मुझे इसकी खुशी या दुःख तो नहीं, थोड़ा सा अचरज तो होता ही है।
गीता पर जो ब्लॉग मैं लिखता हूँ, उसमें एक अप्रकाशित पोस्ट  का टाइटल है :
"Gita As It Is".
इसे लिखना शुरू किया था तब कुछ इस बारे में सोच रहा था।
फिर लगा कि इसे लिखने का अर्थ होगा -विवादास्पद होना।
आज के युग में विवादास्पद होने से भी कभी कभी रातों-रात पब्लिसिटी हो जाती है। 
इसलिए इसे अधूरा छोड़ दिया।
लेकिन यह अचरज / कौतूहल अब भी बाकी है कि अचानक किसी दिन पेज-व्यूज़ अकस्मात् इतने अधिक कैसे बढ़ जाते हैं।
मुझे नहीं मालूम कि इसका क्या रहस्य है, और मुझे क्या किसी दिन पता चलेगा !
***

सोचना क्या है!?

एक और पहलू 
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यदि तुम किसी (के) बारे में नहीं सोचते, तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन तुम्हारे बारे में (क्या) सोचता है! 
पर सवाल यह भी नहीं है। 
सवाल यह है कि तुम किसी (के) बारे में क्यों सोचते हो! 
क्या इसीलिए नहीं कि किसी और या दूसरे से तुम्हें कोई अपेक्षा, डर है, -कोई कौतूहल, आकर्षण या आसक्ति है? 
आसक्ति अर्थात् मोह और अज्ञान से पैदा हुई भ्रान्ति। 
मोह अर्थात् अनित्य और नित्य में भेद न कर पाना।
अज्ञान अर्थात् पता नहीं है, यह भी न पता होना। 
मोह और अज्ञान परस्पर आश्रित होते हैं।
शायद तुम्हें दूसरे की आवश्यकता होती हो।
पर सवाल यह भी है कि तुम आवश्यकता का भी विचार ही क्यों करते हो?
तुम अतीत या भविष्य का विचार ही क्यों करते हो!
और, सवाल यह भी है कि क्या वर्तमान के बारे में विचार किया भी जा सकता है?
क्या विचार (के) आते ही तुम इस वर्तमान से कटकर तत्काल ही किसी काल्पनिक समय (जो अतीत या भविष्य होता है) में नहीं चले जाते?
किन्तु अपने बारे में सोचने पर भी क्या ऐसा ही नहीं होता?
सवाल यह भी है कि क्या वाकई तुम सोचते हो, या विचार ही आते-जाते हैं और तुम्हें लगता है कि तुम सोचते हो!
क्या सोच-विचार से पृथक् उनका कोई ऐसा नियंत्रणकर्ता होता भी है, जिसे तुम अपने-आप या स्वयं की तरह जान सको?
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July 01, 2021

गलत सवालों के बीच

संवाद और विवाद

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जो बात प्रायः झकझोरती है, वह यह कि हर मनुष्य अकसर ही कितनी गलतफहमियों का शिकार होता है! वह व्यक्ति जो कुछ दिनों तक जेल में बन्द था, इस धारणा से ग्रस्त था कि वह हिन्दू है। जेल में रहते हुए उसे ऐसा व्यक्ति मिला, जो इस धारणा से ग्रस्त था कि वह मुसलमान है। 

दोनों के बीच बातचीत हुई तो उस व्यक्ति ने जो अपने आपको मुसलमान मानता था, अपने आपको हिन्दू माननेवाले से पूछा :

1.संसार के स्वामी की वह प्रतिमा, जो कि अपनी स्वयं की ही रक्षा नहीं कर सकती, वह उसकी उपासना करनेवाले की रक्षा कैसे कर सकती है?

2. क्या संसार का स्वामी एक ही नहीं है? 

ये दोनों तर्क अब्राहमिक परंपरा (क्या इसे धर्म कहा जा सकता है! जो केवल परंपरा और कल्ट है) में  अवश्य सबको मान्य हैं ।

अपने आपको हिन्दू माननेवाला व्यक्ति इन दोनों प्रश्नों का उत्तर न दे पाया और उसने इस विश्वास को सत्य की तरह स्वीकार कर लिया और उसने उसे उसके इस्लामी प्रारूप में अपना भी लिया। 

यदि वह थोड़ा भी जागरूक, सावधान, सतर्क और समझदार होता, और किसी परंपरा या सम्प्रदाय-विशेष के मत की बजाय वास्तविक धर्म को जानने में उसकी जिज्ञासा होती, तो शुरू से ही इन प्रश्नों को उनके उचित परिप्रेक्ष्य में देखकर सोचता कि क्या किसी प्रतिमा की उपासना केवल इसलिए की जाती है, कि वह हमारी रक्षा करे? क्या ईश्वर अर्थात् संसार के स्वामी के प्रति भक्ति, प्रेम, सम्मान और आदर, और उसके उस असीम, अनंत स्वरूप को न समझ पाने के कारण उसकी एक प्रतीकात्मक मूर्ति की तरह उससे संबद्ध होने के उद्देश्य से भी कोई उसकी इस प्रकार से पूजा, उपासना, आदि नहीं कर सकता? 

याद आता है स्वामी विवेकानन्द जब रामनाड के राजा से मिले थे उस समय उन्होंने मूर्तिपूजा के संबंध में ऐसा ही संशय स्वामी विवेकानन्द के सामने रखा था। 

जहाँ वे बैठे हुए थे, उस कक्ष में राजा के पिता की एक तसवीर लगी हुई थी।

स्वामी विवेकानन्द ने उनसे पूछा :

"ये कौन हैं?" 

राजा ने उत्तर दिया :

"मेरे स्वर्गीय पूज्य पिताजी!"

"क्षमा करें, ये आपके स्वर्गीय पूज्य पिताजी हैं, या किसी चित्रकार के द्वारा बनाया गया उनका चित्र?"

"हाँ वैसे तो यह बस एक चित्र ही है, किन्तु इसे देखते ही मुझे उनका स्मरण हो आता है।'

"और स्मरण के ही साथ उनके प्रति आदर की भावना भी मन में जागृत होती होगी!"

"अवश्य ही!"

इसी प्रकार, क्या किसी प्रतिमा के माध्यम से हम ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति और भावना नहीं व्यक्त कर सकते?

"क्या ईश्वर एक नहीं है?"

राजा के इस दूसरे प्रश्न के उत्तर में स्वामी विवेकानन्द ने कहा :

"जो जल ग्रीष्म-ऋतु में सूखकर उड़ जाता है, और वर्षा-ऋतु में पुनः बरसता है, जिससे धरती पर जीवन है, क्या वह जल एक नहीं है?"

"हाँ, और नहीं भी, क्योंकि उस पर एक अथवा अनेक यह शब्द नहीं लागू होता!"

"क्या ईश्वर को एक अथवा अनेक शब्द तक सीमित किया जा सकता है? दूसरा उदाहरण जीवन का लें। क्या जीवन को एक या अनेक में बाँटा जा सकता है?"

(बरसों पहले कहीं उपरोक्त प्रसंग पढ़ा था। एक मित्र से इसकी पुष्टि चाही कि यह कितना सही या गलत है, तो उन्होंने कहा : यह प्रसंग अलवर के राजा से स्वामी विवेकानन्द की भेंट होने के समय का है। शायद ऐसा ही हुआ हो! जो भी हो, वह तथ्य गौण महत्व रखता है, ऐसा कहा जा सकता है।) 

***