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August 01, 2021

उंगली

कविता : 01-08-2021

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याद की उंगली पकड़कर ही तो था चलता रहा, 

सुख-दुःख की गलियों में ही तो भटकता ही रहा! 

याद की उंगली भी वह जो, छूट गई पर आखिर,

पहचान सुख-दुःख की भी मेरी मिट गई आखिर,

मगर पहचान और फिर भी जो बाकी रही थी,

साथ ही अपनी वह पहचान मिट गई आखिर!

मुमकिन नहीं है पूछना भी अब किसी से,

मैं ही नहीं, दुनिया भी खो गई आखिर!

लेकिन कहाँ है अब परेशानी भी कोई,

हर परेशानी भी खो ही गई आखिर!

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August 13, 2017

आज की कविता : ’मैं’

आज की कविता : ’मैं’
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’मैं’ कभी भीड़ है,
’मैं’ कभी भेड़िया,
’मैं’ कभी भेड़ है,
’मैं’ कभी गड़रिया,
’मैं’ कभी नदिया है,
’मैं’ कभी है नैया,
’मैं’ कभी धारा भी,
’मैं’ किनारा भी कभी,
’मैं कभी एक भी,
’मैं’ कभी अनेक भी,
’मैं’ कभी बुरा भी,
’मैं’ कभी नेक भी!
’मैं’ कभी ’मैं’ है,
’मैं कभी ’तू’ है,
’मैं' कभी ’हम’ है,
’मैं' कभी आप भी!
’मैं’ से जुदा कोई,
दूसरा ’मैं’ कहाँ?
’मैं’ के सिवा कोई,
दूसरा ’मैं’ कहाँ?
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