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July 13, 2025

Vimal Mitra

বিমল মিত্র

जब मैं कॉलेज में पढ़ता था तो विक्रम विश्वविद्यालय के जीवाजीराव पुस्तकालय से पढ़ने के लिए किताबें लाया करता था। यहाँ तक कि मेरे पिताजी भी शौक से उन्हें पढ़ा करते थे। ऐसी ही एक किताब थी विमल मित्र की पुस्तक "मन क्यों उदास है?"

आज अचानक मन व्याकुल हुआ तो मन में प्रश्न उठा :

मन क्यों व्याकुल है?

कुछ देर तक मोबाइल पर यूँ ही समय बिताता रहा। फिर अचानक याद आया कि आज सुबह से कुछ ऐसा होता रहा कि मन व्याकुल हो उठा। मेरे साथ तो नहीं, किन्तु कुछ दूसरों, अपरिचित लोगों के साथ, जिनकी खबरें मोबाइल पर देख और पढ़ रहा था। बाढ़, भूकम्प, हत्या, हिंसा की खबरें। धीरे धीरे मन बोझिल हो उठा। जब मन व्याकुल हो उठता है तो हम शायद ही कभी इस बात पर ध्यान देते हैं कि मन व्याकुल कब और क्यों हुआ! कभी कभी अवश्य ही कुछ कारण होते हैं और मन उदास हो जाता है, कभी तो क्षुब्ध, क्रुद्ध, उद्विग्न और कभी कभी तो बहुत विचलित भी। दफ्तर जाने की हड़बड़ी, समय पर दफ्तर न पहुँच पाने का डर, किसी का जरूरी फोन कॉल आ जाना और ऐसी ही अनेक स्थितियों का सामना करते हुए लगातार तनाव में होने पर क्या मन शान्त रह सकता है! फिर जब थोड़ा सा वक़्त मिलता है तब भी उन सब बातों की चिन्ता तो रह ही जाती है। मेरी स्थिति अवश्य ही बाकी लोगों से बहुत अलग है। जंगल हाउस में रहते हुए न तो किसी काम के जल्दी होने या करने का दबाव, न  प्रतीक्षा,  न दफ्तर जाने की चिंता, न किसी के आने जाने का सवाल। कभी कभी तो महीनों तक किसी के दर्शन नहीं होते। न कोई दोस्त न परिचित, बस अपने स्थान से पाँच मिनट की दूरी पर स्थित नर्मदा के पुराने पुल तक जाना और लौट आना। इस पुल पर ट्रैफिक भी कम रहता है, या कहें कि होता ही नहीं है। कभी कभी पुल पर दर्जन भर गाय बैल जरूर बैठे रहते हैं, जिनके बीच से रास्ता निकालना मुश्किल नहीं होता। 

आज जब उस पुल पर पहुँचा तो देखा कि नर्मदा बाढ़ पर आई हुई है। किनारे पर चार दिन पहले जहाँ शंकरजी पत्थर के जिस चबूतरे पर विराजित थे, वह चबूतरा और शंकर जी भी नर्मदा नदी के जल में डूब चुके थे। पानी उनके सिर से एक फुट ऊपर चला गया था। वहीं दूसरे किनारे पर ऊँचाई पर विराजमान दूसरे शंकर जी आँखें बंद किए ध्यानमग्न थे। दूसरी तरफ नए पुल पर वाहन आ जा रहे थे।

रविवार के दिन यहाँ अकसर कुछ अतिरिक्त दुकानें खुल जाती हैं जो शाम होते होते बंद हो जाया करती हैं। कुछ चाय नाश्ता की दुकानें एक दो सब्जी और फल आदि की और बाकी नारियल, चने चिरौंजी, कुंकुम और नर्मदा जी के फोटो की। फल की दुकान से केले लिए, सब्जी कोई नहीं मिली और वापस आ गया। बाहर निर्माण कार्य चल रहा है। अब जब यह लिख रहा हूँ तो धूप खुलकर चमक रही है।

सुबह चार केले और दो लड्डू खाए थे। घंटे भर बाद चाय पी थी और फिर बाहर घूमता रहा।

लेकिन मन अब भी व्याकुल है।

अब याद आया, एक मित्र से फोन पर बात हो रही थी। दो दिन पहले ही वह मिलने आया था। उससे बातें करते हुए ही मन उचट गया था। फिर भी करीब 40 मिनट तक हम बातें करते रहे। एक बुद्धिजीवी मित्र। कुछ किताबें वे लिख रहे हैं। अध्यात्म में भी दखल है। बातचीत तो होती रही पर बात नहीं हुई।

सब कुछ भूलकर, यू-ट्यूब देखकर मन लगाने का प्रयास किया और उसमें भी कुछ ऐसा नहीं मिला जिसका कोई मतलब रहा है। फिर उसे बंद कर दिया। भोजन बनाना था, नहाना तो बारिश में हो चुका था। बस यूँ ही कट रही है आजकल जिन्दगी।

उदासी और व्याकुलता के बीच कभी कभी नींद तो कभी नर्मदा के दर्शन करते हुए मन एकाएक अत्यन्त शान्त तो कभी बहुत प्रसन्न, स्तब्ध हो जाता है। पल भर में सारी व्याकुलता हवा हो जाती है।

और यह प्रश्न भी!

***

May 26, 2025

26-05-2025 / POETRY

व्यथा-कथा, कथा-व्यथा!

कुछ भी!! 

कथा कह कह कर थका वाचक, 

तथा कह कह कर कथावाचक!

पुनः पुनः मांग कर यथा याचक,

व्यथा सह सह कर तथा याचक!

दौड़ दौड़ कर थका यथा धावक,

हाँफता हुआ रुका यथा धावक! 

कथा कह कह कर यथा श्रावक, 

अग्नि सा जलता रहा यथा पावक!

तान भरता रहा यूँ यथा गायक,

अभिनय करता रहा यथा नायक!

सतत सुख देता रहा सुखदायक,

सतत दुःख देता रहा दुःखदायक!

जिसने जो चाहा, उसे वो मिल गया,

जो कभी भी बन पाया इस लायक! 

***

May 19, 2025

Someone There!

कोई कोई!

कविता / Poetry 

نظم

--

कोई तिनका, कोई चारा,

कोई मछली, मछुआरा कोई,

कोई नदिया, कोई तट पर,

बैठा हुआ, देखे धारा!

कोई खेता नाव, कोई,

उस पार उतरनेवाला,

कोई अनाड़ी डूब जाता,

मझधार में बहनेवाला!

कोई भँवर, कोई लहर, 

कोई पानी, कोई नहर,

कोई नदिया, कोई तट पर,

बैठा हुआ देखे धारा!

शाम कोई, सुबह कोई, 

धूप कोई,  छाँव कोई, 

खेत या खलिहान कोई, 

बंजर कोई, मैदान कोई, 

कोई बेईमान, ईमान कोई, 

कोई दानिश, नादान कोई! 

कोई सुखी, आराम कोई, 

बेचैन कोई, चैन कोई!

रंग कोई, रिवाज कोई, 

कोई मौन आवाज कोई!

साज कोई अंदाज कोई,

कोई अंधेरा, रौशनी कोई!

इंतिहा कोई, आगाज कोई!

***

آغاز

انتہا,

دانش

نظم

--


October 18, 2024

ये सब क्या हो रहा है!!

कुछ भी!! 

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जय हो!

--

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। 

सो न पाव मुनि भगति हमारी।। 

(रा मा १/१३७/७)

तो दोनों को प्रसन्न करना जरूरी है!? 

नहीं एक को कर लो,  दूसरा अपने आप मान जाता है। दोनों अलग थोड़े हैं! 

ये तो रामायण का श्लोक है न!

नारायण को मजा आता है महादेव की भक्ति में, इसीलिए ऐसा कहा उन्होंने। 

मेरी अल्प बुद्धि में समझ नहीं आ रहा है।  दोनों अलग नहीं हैं तो दोनों कैसे हैं?

पुत्र!  इसको इस तरह समझो।

अग्नि एक ही होती है। अगर शरीर में है तो प्राण है, अगर भोजन बनाएँ तो ज्वाला है, दीपक जलाएँ तो बिजली है, होती तो एक ही है लेकिन जनसाधारण को समझाने के लिए भाषा में इसके अलग अलग नाम होते हैं। 

जब अनंत ऊर्जा सृष्टि की रचना करती है तो उसे ब्रह्मा कह देते हैं। जब सृष्टि का संचालन करती है तो उसे विष्णु कहते हैं। जब सृष्टि का संहार करती है तो उसे ही शिव कह देते हैं। और जब सिस्टम रिबूट करना होता है तो उसे प्रलय कहते हैं। ये अनंत ऊर्जा एक ही है। सृष्टि का कार्य करने के लिए उसके बहुत से रूप होते हैं। एकोऽहम् बहुस्यामि।। 

हाँ अब थोड़ा समझ में आया। 

जय हो प्रभु आपकी! 

हमें तो पुरारी मुरारी समझ में नहीं आते। हम तो बस माई के भरोसे हैं। वो हमारा ध्यान रखती है।

जय माता दी।

प्रेम से बोलो जय माता दी।

जोर से बोलो जय माता दी।

सब मिल बोलो जय माता दी! 

😂 👏 

भारत माता की जय! 

महात्मा गांधी की जय।!

जवाहरलाल नेहरू की जय! 

इंदिरा गांधी की जय!

राजीव गांधी की जय! 

सोनिया गांधी की जय! 

राहुल गांधी की जय!!

प्रियंका गांधी की जय!!

अरे अरे,  रुको जरा!

हाँ,  नरेन्द्र मोदी की जय! 

अमित शाह की जय!

अरविंद केजरीवालजी की जय! 

आतिशी मारलेना की जय!!

सब सन्तन की जय! 

सब दुष्टों की जय!

थक गए!!! 

***

 **


 


September 05, 2024

The Shadow!

Ego and Alter-Ego

अहं और प्रत्यहं

(अहम् और प्रति-अहम्)

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अभी इस पोस्ट से कुछ मिनट पहले इसी ब्लॉग में एक कविता लिखी है। पता नहीं क्या लिखते लिखते एकाएक वह कविता लिख दी गई!

मन की ऊपरी सतह पर यद्यपि कविता लिखी जा रही थी किन्तु मन की इस ऊपरी सतह से नीचे कोई था जो चुपचाप इस कविता के रचयिता होने के गर्व से बहुत प्रसन्न था।

जब कविता पूरी हो गई तो ध्यान इस पर गया कि कल -  परसों मैंने ईगो / इगो और आल्टर ईगो की जिस प्रकार से विवेचना की थी और उसे परिभाषित किया था, उससे उत्पन्न हुई एक अद्भुत् शान्ति ने मुझे अभी तक अभिभूत कर रखा है। और सब कुछ यद्यपि अक्षरशः वही है, फिर भी सब कुछ नितान्त परिवर्तित भी हो गया है। इसे स्पष्ट  करने के लिए मेरे पास कोई व्याख्या नहीं है! 

कल मैंने संक्षेप में मेरे इस "आत्म-साक्षात्कार" के बारे में लिखा था कि विचारकर्ता ही ईगो और विचार ही आल्टर ईगो है। यद्यपि मैं न तो विचारकर्ता हूँ और न ही विचार!

विचारकर्ता / विचार मैं नहीं! 

आज सुबह से मन में इसी पर ध्यान केन्द्रित था।

और मन फिर भी अपना कार्य अधिक सरलता, स्पष्टता और शान्ति से करता रहा। यद्यपि कभी कभी वह पूरी तरह शब्दरहित भी होता रहता है, और जब विचारकर्ता तथा  विचार दोनों ही विलीन हो जाते हैं फिर भी कभी कभी विचार और विचारकर्ता की गतिविधि भी शुरू हो जाती है। इसी मनःस्थिति में इस पर ध्यान गया कि जैसे मनुष्य का अपना ईगो और आल्टर ईगो, - विचारकर्ता और विचार के रूप में उसके ही अन्तर्मन के दो पक्ष होते हैं, और उससे भिन्न और परे के जगत से उनका कोई सबंध नहीं होता, ठीक वैसे ही मनुष्य के सामूहिक मन (consciousness / collective mind) में भी असंख्य विचार, आभासी और काल्पनिक विचारकर्ता को प्रक्षेपित करते हैं, और वह भी पुनः सामाजिक स्तर पर विभिन्न समुदायों और वर्गों में बँटा होता है। यह है मनुष्य की नियति, जिसे परिवर्तित करने, और दुनिया को बदलने का विचार भी जिसका एक अत्यन्त छोटा विचारमात्र होता है।

विचार और विचारकर्ता (जो वस्तुतः एक ही तथ्य है) के बीच के इस संबंध की तुलना (analogy) शरीर और शरीर की छाया से शायद की जा सकती है, जिनके बीच में "मन"  नामक वस्तु पेन्डुलम की तरह डोलती रहती है।

"अपनी छाया"

शीर्षक से लिखी जानेवाली कविता इसका ही परिणाम या प्रभाव रहा होगा, और बाद में जिससे मुझे :

Oscar Wilde 

की रचना

"अपनी छाया"

का स्मरण हो आया। 

यह सब शायद रोचक और संभवतः नितान्त काल्पनिक ही है, बस इतना ही कह सकता हूँ! 

***


अब तक ऐसा होता आया!

कविता : अपनी छाया

(यह कविता पूरी होते होते मुझे 

Oscar Wilde 

की एक रचना :

"अपनी छाया"

याद आई !

हालाँकि मैंने शायद इस उपन्यास / कहानी / पुस्तक का नाम ही सुना है! याद नहीं आता, इसे मैंने कभी पढ़ा भी है या नहीं! 

***

जब से आँख खुली है मेरी, 

अब तक ऐसा होता आया, 

मेरे पीछे ही लगी रही थी,

खुद मेरी अपनी ही छाया!

मेरी वह थी, या मैं उसका, 

कभी इसे मैं समझ न पाया,

कभी उसे अपना कहता था,

और कभी मैं उसे पराया!

जब जब मुझ पर पड़े रोशनी,

तब तब वह मेरे पीछे होती,

जब जब मुझे अन्धेरे मिलते,

तब तब वह गायब हो जाती!

इसी तरह जब त्रस्त हुआ मैं,

आखिर उसको भुला ही दिया,

तब से बहुत सुखी रहता हूँ,

आखिर ऐसा भी दिन आया!

***




July 26, 2024

क्या मर्द को भी दर्द होता है?

कविता / कुछ भी!

--

जब माहौल बहुत बेदर्द होता है,

हरेक रिश्ता बहुत सर्द होता है, 

हर तरफ गर्द ही गर्द होता है,

हर एक चेहरा ही ज़र्द होता है,

कहीं कोई नहीं हमदर्द होता है, 

तब मर्द को भी दर्द होता है!!

***

 


June 22, 2024

तू ढोल बजा!

कविता 22 06 2024

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कोई जीते, कोई हारे, 

तू ढोल बजा, तू ढोल बजा!

रैली में सब से आगे,

तू जश्न मना, तू जश्न मना! 

कोई हँसता या रोता हो,

तू नाच नचा, तू नाच नचा!

बच पाए, या ना बच पाए, 

तू सबको बचा, तू सबको बचा! 

तू रंग जमा, तू साज सजा, 

तू ढोल बजा, तू ढोल बजा!! 

***




May 15, 2023

आत्मकथा के दो अंश

जीवनी, इतिहास और आत्मकथा 

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किसी भी छोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी, महत्वपूर्ण या महत्व-हीन घटना का समय तय और सुनिश्चित होता है। न तो घटना को और न ही उस तय समय को कोई बिलकुल भी नहीं बदल सकता। किसी घटना के असंख्य कारण इंगित किए जा सकते हैं और इसलिए समस्त विश्लेषण और अनुमान मूलतः भ्रामक होते हैं। फिर भी कोई अतीत की स्मृति के आधार, भविष्य की कल्पना और वर्तमान को, अनगिनत तरीकों और रूपों में सोच सकता है। इसी आधार पर उनका कोई मानसिक चित्र भी बना लिया करता है जो वैसे तो सतत ही बदलता रहता है किन्तु फिर भी उसे मानों उसकी एक निश्चित आकृति हो, ऐसा स्थिर प्रतीत होत है। भविष्य की आशा, निराशा, चिन्ता, कौतूहल उसे इतने अधिक सत्य जान पड़ते हैं, कि वह छोटी बड़ी अनेक योजनाएँ बना लेता है। उसके सोच के फ्रेमवर्क में उनमें से कुछ मूर्त रूप भी ग्रहण लेती हैं, ऐसा भी उसे महसूस होता है। इसलिए किसी मनुष्य की अनेक जीवनियाँ हो सकती हैं, जिसे उसके अलावा कोई और ही लिखता है। इन विभिन्न जीवनियों में से कौन सी वास्तविकता से कितने निकट है या दूर है, इसे जानने का कोई सर्वमान्य पैमाना / उपाय शायद हो ही नहीं सकता। दूसरी ओर, कुछ लोग अपनी जीवनी  लिखने का साहस, दुस्साहस या भूल स्वयं ही कर बैठते हैं। बाद में वे शायद पछताते भी हैं, क्योंकि अनेक बातें जिन्हें वे लिखना चाहते थे, छूट गई होती हैं या जैसा लिखना चाहते थे उससे बहुत हद तक अलग लिख दी गई होती हैं। और बहुत सी जिन्हें न चाहते हुए भी वे भूल से लिख बैठे। क्या ही अच्छा हो अगर किसी की कभी न तो जीवनी लिखी ही न जाए, न इतिहास। सभी मनुष्यों के बारे में यही होना चाहिए। क्योंकि न तो कोई अच्छा या बुरा और न कम या अधिक महान होता या हो सकता है। वो कहते हैं न :

सब क़रिश्माते तसव्वुर है ......,

वर्ना आता है न जाता है कोई!

शायर का नाम ठीक से याद न आने से ......, लिख दिया।

(क़तील या वकील जैसा कुछ होगा।)

इसलिए आत्मकथा के उन दोनों अंशों को लिखने के बाद लगा कि इस सबका क्या मतलब है! इसलिए तुरन्त डिलीट भी कर दिया। आजकल यह सुविधा अच्छी है। कागज पर कुछ लिखो तो उसे नष्ट करना थोड़ा मुश्किल काम हो जाता है। मोबाइल पर या मेल में अगर लिखो तो उसे सेन्ड करने से पहले तक भी ऐसा किया जा सकता है। और अगर सेन्ड कर ही दिया है तो undo करना कभी कभी संभव होता है और कई बार असंभव ही हो जाता है।

क्या सचमुच ही, किसी की कोई जीवनी या आत्मकथा हो भी सकती है?

या, बस दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है! 

***

April 25, 2023

तीसरा प्रश्न

 अव्यय और प्रत्यय

------------©------------

"क्या तुम एक कविता लिखोगे,

- मेरे लिए!"

मैंने अपने ए आई ऐप से पूछा!

"अवश्य!,

किस विषय में,

किस सन्दर्भ में,

किस परिप्रेक्ष्य में?"

"अव्यय और प्रत्यय!"

"व्याकरण या दर्शन?

दर्शन या अध्यात्म?

नई या पुरानी?"

"कुछ भी, जो भी तुम चाहो!"

"छोटी या बड़ी?"

"न छोटी न बड़ी"

"हास्य या गंभीर?"

"दोनों ही!"

"ठीक है,

मतलब 'रबड़ी!'

"ऐं!"

"रबड़ जैसी लचीली!"

"रबड़ी जैसी शीतल, रसीली!"

और हास्य तो इसमें है ही!"

"नहीं, गंभीर सा कुछ!"

"ठीक है, तो सुनो!

न व्येति इति अव्ययं ।

न व्ययति इति कृपणः।

द्रविणं कञ्चनंवत्।

इति कुञ्जयति,

मञ्जूषायाम् गुह्यति। 

अतो हि कञ्जुः कञ्जुस् कञ्जूस इति।

अपि च,

अव्ययो हि आत्मा अविकारी इति अव्ययः। 

अविकारित्वात् अजरः अमरः च। 

जरायाम् जीर्यते, वयसि वयति। 

अथ प्रतीयते यत् तत् प्रत्ययम्।

दृष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः प्रत्ययानुमेयः प्रत्ययानुगम्यः इति।।

व्याकरणे व्याकुर्वाणि। भाषायामपि।

इति कृतम् ।।"

***