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May 03, 2019

उधार, उद्धार नहीं !

उत्तम खेती, मध्यम वाण,
अधम चाकरी भीख निहान
(वाण - वणिक् - व्यापार-व्यवसाय, चाकरी -नौकर होना, नौकरी, निहान - विनाश)
नक्सलवाद क्यों ? 
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 'यूटोपिया' / Utopia या 'मी-टू-पिया' / 'Me-too-pia' ?
श्री राजीव दीक्षित जी का यह वीडिओ देखते हुए ख़याल आया कि उर्दू 'क़र्ज़' की व्युत्पत्ति अरबी 'क़र्ज़' से तथा संस्कृत 'कृष्' -- 'कर्ष' में भी देखी जा सकती है।  
कर्ष का अर्थ है 'खींचना' ।  
'अपकर्ष' (ह्रास, पतन), 'उत्कर्ष' (ऊपर उठना), 'निष्कर्ष' आदि इसी 'कर्ष' के भिन्न-भिन्न प्रयोग हैं।
भीख फिर भी क़र्ज़ से बेहतर है यदि वह केवल अन्न-जल के लिए माँगी जाए। 
मनुष्य-मात्र का यह अधिकार है और 'राज्य' का यह दायित्व भी है कि प्रजा का कोई मनुष्य भूखा-प्यासा न रहे।रोज़गार देना राज्य / सरकार का दायित्व तब तक नहीं हो सकता जब तक कि लोग संतान पैदा करना अपना अधिकार समझते हों। व्यावहारिक सत्य भी यह है कि भूमि पर मनुष्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इसके साथ-साथ मनुष्य का नैतिक पतन भी उतनी ही या और भी अधिक तेजी से हो रहा है। भूख-प्यास सहने की एक सीमा होती है और प्रकृति ने किसी भी प्राणी को इससे सुरक्षित नहीं रखा है। 
केवल मनुष्य ही अपनी बुद्धि का समुचित प्रयोग कर प्रकृति से अधिकतम सामंजस्य रखते हुए यथासंभव अधिकतम सुरक्षित और सुखी रह सकता है।
कृषि और गाय-बैलों की रक्षा (गोपालन) प्रकृति से अभिन्नतः जुड़ा व्यवसाय है। 
हमारी सबसे बड़ी और भयावह, आत्म-विनाशकारी भूल यह है कि हमने गाय-बैलों को सड़क पर या कसाईबाड़े में छोड़ दिया। और यह भी बिलकुल व्यावहारिक और लाभकारी सत्य है कि यदि हम कृषि को गोवंश और गो-पालन से जोड़ लें तो एक संपन्न, सुखी और समृद्ध भविष्य हम सबकी सामान विरासत हो सकता है।    
मशीनीकरण और रासायनिक कृत्रिम खाद, कीटनाशक, खर-पतवार-नाशक आदि के प्रयोग से जहाँ भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जा रही है वहीं ये तमाम विष हमारे कृषि-उत्पादों के माध्यम से हमारे अन्न-जल-वायु को भी खतरनाक हद तक प्रदूषित कर रहे हैं।  'बिज़ली' का उत्पादन करने के लिए हाइड्रो-इलेक्ट्रिक तरीके से बड़े बाँध आदि बनाए गए हैं जिनसे भूमि का जल-स्तर / वॉटर-लेवल अस्थिर हो रहा है, जंगल नष्ट हो रहे हैं और भूकंप-प्रवणता भी बढ़ रही है। 
किसान जब क़र्ज़ लेता है तो यह 'अंत का प्रारंभ' (Beginning of the End) है। 
धरती से भू-संपदा का दोहन, चाहे वह धातुओं, रत्नों आदि का हो, कोयले या पेट्रोलियम-पदार्थों का, धीरे-धीरे, पर तेज़ी से भी भूमि को खोखला करता जा रहा है। 
सबसे बड़ा दुःस्वप्न है 'मुद्राराक्षस' अर्थात् रुपए-पैसे के रूप में 'धन' को विनिमय के लिए प्रयोग किया जाना।  समाज, राष्ट्र या राज्य जब तक ऐसी कोई कागज़ी या इलेक्ट्रॉनिक मुद्रा का इस्तेमाल करता है तब तक लोभ और भय, भविष्य की आशंका और लालसा, चिंता और परस्पर स्पर्धा -प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, द्वेष, और हिंसा, संघर्ष, युद्ध तथा आक्रामकता, शोषण, शोषक और शोषित भी होंगे ही। किसान, श्रमिक और मज़दूर के लिए सर्वाधिक आसान यह है कि वह 'विद्रोह' की किसी भी विचारधारा से प्रेरित और प्रभावित होकर हाथ में बन्दूक थाम ले। या तो वह मशीनी खेती से पैसा कमाकर अपनी आर्थिक-स्थिति को और अधिक सुदृढ़ करने में लगा रहता है या फिर जैसे-तैसे सीमान्त या भूमिहीन कृषक की तरह जीवन-यापन करता है और फिर शराब या राजनीति जैसे दूसरे किसी नशे का शिकार होकर स्वेच्छा से या मज़बूर होकर ज़हर खा लेता है। 
ब्यूरोक्रेसी की निंदा करने से हम व्यवस्था को न तो सुधार सकते हैं न अपने अनुकूल बना सकते हैं।   
बहुत बुद्धिमान भी यह नहीं देख पाते कि भौतिक विकास और समृद्धि से सुख कम, उलझाव और भ्रम अधिक पैदा होते हैं। प्रगति और उन्नति की चकाचौंध उन्हें मोहित कर उनका ध्यान इस सरल तथ्य से हटा देती है कि किसी 'यूटोपिया' / Utopia या 'मी-टू-पिया' / Me-too-pia में जीते रहना आत्म-प्रवंचना और विलम्बित आत्महत्या से ज़रा भी अलग नहीं है।    
कुछ चतुर और धूर्त लोग धर्म के बहाने भोले-भाले, नासमझ, गरीब लोगों को छल-कपट से, लोभ या भय दिखाकर अपनी राजनीतिक आकांक्षाएँ पूरी करने के लिए अपना शिकार बना लेते हैं।  यह भी प्रच्छन्न आतंकवाद ही तो है !
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