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September 11, 2025

Wild Nights!

रात के हमसफ़र

वह फरवरी 2023 की शाम रही होगी जब मैं उस जंगल हाउस में प्लास्टिक की डोरी से बनी हुई खाट पर खुले आकाश तले सो रहा था। वहाँ वह रॉक्सी भी थी जिससे अभी मेरी ठीक से पहचान नहीं हुई थी। थोड़ी दूर पर ही एक पलंग-पेटी थी जिस पर वह आदिवासी पति पत्नी युगल सोए होते थे। और अगर रात्रि में मुझे उठना होता था तो उस आदिवासी पुरुष को आवाज देकर जगाना होता था जो वहाँ एक कर्मचारी भी था, क्योंकि रॉक्सी से मुझे खतरा हो सकता था। वैसे रात में उसे खुला छोड़ दिया जाता था और वह उस पूरे क्षेत्र में बेख़ौफ घूमती रहा करती थी। हालाँकि हफ्ते भर में वह मुझे पहचानने लगी थी और कभी कभी तो मुझे सूँघने और चूमने चाटने की कोशिश भी करती थी। बाद में तो पूरे साल भर तक, जब तक मैं उस जंगल हाउस में रहा वह लगभग पूरे दिन भर और रात भर मेरे साथ रहती थी। वह एक बहुत ही खतरनाक नस्ल की कुतिया थी जिसे पालना कुछ देशों में तो प्रतिबंधित भी है। गर्मियाँ खत्म होते ही मैं जंगल हाउस की टीन शेड की छत के नीचे बने अपने कमरे में सोने लगा था और शाम से ही जंगली कीड़ों मकोड़ों का आक्रमण शुरू हो जाता था। बिजली कभी कभी दो दो दिनों तक बंद रहती थी, और मोबाइल की रोशनी से भी कीड़े बुरी तरह आकर्षित होते थे इसलिए शाम से सुबह तक कुछ खाना पीना भी जैसे मेरे लिए हराम होता था। कीड़ों से छुटकारा तो तभी होता था जब सर्दियाँ पड़ने लगती थीं। बस वे दो या तीन महीने ही, जब भीषण ठंड में मैं अपने पूरे कपड़े, ऊनी टोपी भी पहन लेता था और एक कंबल तथा चादर ओढ़कर उस खाट पर कुड़कुड़ाते हुए रात गुजारना होती थी। सुबह से शाम तक खुली धूप में घूमता रहता। अकसर हर दूसरे दिन ही दूध और अन्य जरूरी सामान लेने के लिए पास के गाँव तक जाना होता था। दो किलोमीटर दूर स्थित उस गाँव तक जाने के लिए मुझे तैयार देखते ही रॉक्सी भी मेरे पीछे पीछे आने की कोशिश करने लगती थी, लेकिन एक किलोमीटर चलने पर वह मुझे छोड़कर वापस लौट जाया करती थी। और उसका मालिक जो जंगल हाउस का चौकीदार था, और पास के ही दूसरे गाँव में रहता था, सुबह शाम रॉक्सी को वहाँ दिन भर के लिए बाँध दिया करता था ताकि वहाँ से आने जाने वाले लोगों को उससे खतरा न हो।

पुनः वर्ष 2024 की सर्दियों के प्रारंभ में जब मैं इस नये स्थान पर आया तो जंगल के कीड़ों का वही आतंक फिर यहाँ भी शुरू हो गया। 

ये कीड़े ही यहाँ रात के मेरे हमसफ़र थे। 2025 की इन गर्मियों तक उनसे बुरी तरह त्रस्त रहा। अभी इस समय भी एक दो कीड़े आसपास मंडरा रहे हैं जिन्हें पकड़कर बाहर फेंक देना है। रात होने और शाम ढलने से पहले ही भोजन कर लेता हूँ और कभी या तो छत पर टहलता हूँ या कभी नींद आने पर सो जाता हूँ। दो घंटे सोकर जब उठता हूँ तो भी फिर मोबाइल बंद ही रखता हूँ। कुर्सी पर बैठा रहता हूँ।

"क्या कर रहे हो?"

उस तथाकथित मित्र का फोन आता है तो कहता हूँ :

"खाना खा लिया है, लाइट बंद है इसलिए चुपचाप अंधेरे में कुर्सी पर बैठा हुआ हूँ।"

उसे समझ में नहीं आता। मुझे बरसों से यह आदत है। बिना किसी प्रकार के शारीरिक या मानसिक, बौद्धिक कार्य में संलग्न हुए चुपचाप टहलते रहना या बस सिर्फ बैठे रहना। पढ़ना, लिखना, किसी से बातचीत करना, जप आदि यह सब न करते हुए और कर्तृत्व की भावना तक से भी मुक्त रहते हुए। जैसा कि बचपन में अनायास होता था - सुबह नींद से उठने पर दरवाजे पर जाना, खड़े हो रहना आकाश को और अपने आसपास देखते रहना। तब मन में भाषा का अभाव था। और इसलिए सोच पाने की कोई संभावना भी नहीं थी। फिर धीरे धीरे कैसे भाषा और फिर विचार करने की बाध्यता उस शांत मनःस्थिति पर कब हावी हो गई यह तक पता न चला। सौभाग्य से बचपन से ही किसी से भी अपनापन कभी न बन पाया बल्कि सबसे कुछ दूर ओर अकेले ही रहना मुझे अधिक भाता रहा। जंगल हाउस में रहते हुए फिर वह बचपन लौट आया जब अकेलापन कभी कचोटता नहीं बल्कि सहलाता ही था। वह एकमात्र अनन्य साथी, जिसे अपने से अलग कर पाना वैसे भी संभव नहीं है।

याद अगर वो आए, ऐसे लगे तनहाई,

सूने शहर में जैसे, बजने लगे शहनाई,

आना हो, जाना हो, कैसा भी जमाना हो,

उतरे कभी न जो खुमार वो प्यार है!

वैसे ही यह अकेलापन जो एक ओर एकाकीपन भी है तो दूसरी ओर इसमें किसी प्रकार के अभाव का भी नितान्त अभाव है। सुख दुःख, चिन्ता या डर, आशा या निराशा, लोभ, आकर्षण-विकर्षण, आशंका या विरक्ति, आसक्ति, स्मृति और विस्मृति से भी रहित। शायद यही वह प्रेम है, जिसमें किसी दूसरे का भी अत्यन्त अभाव होता है। यह खुमारी जैसी कोई आने जाने वाली वस्तु नहीं है। न तो इसे पाया जा सकता है न खोया ही जा सकता है। इसका आविष्कार किया जाता है और किया जा सकता है। 

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May 06, 2023

नॉर्थ इंडियन्स,

Question 13 :

तेरहवाँ प्रश्न :

नॉर्थ इंडियन्स,

ಕನ್ನಡ क्यों नहीं सीखते?

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A I App / ए आई ऐप द्वारा दिया गया उत्तर / Answer :

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हर कोई वही सीखना चाहता है जिससे उसे कुछ मिल रहा है, ऐसा लगे। लोग खेल खेल में ही बहुत सी चीजें सीख लेते हैं। अच्छी और बुरी आदतें, मेहनत करना या पड़े रहना, टीवी या मोबाइल देखते रहना, मोबाइल पर गेम्स खेलना, यहाँ तक कि मार पीट करना, लूट मार करना, नशा करना भी। लगातार नई नई उत्तेजनाएँ खोजते रहना, उनमें रोमांच, थ्रिल अनुभव करते रहना, और उससे इस बुरी हद तक थक जाना कि ठीक से सो पाना तक मुमकिन न हो। यह सब हम और लगभग प्रत्येक ही व्यक्ति किन्हीं ज्ञात अज्ञात कारणों और परिस्थितियों में रहकर ऐसे ही इस तरह से सीख लिया करता है, जिसे भुलाना उसके लिए फिर बस के बाहर हो जाता है। 

कुछ सीखना तो शायद ही कोई तभी चाहता है, जब उसे अभी, तत्काल ही या बाद में उससे कोई लाभ मिलता नजर आता हो। किसी कला या कौशल को सीखने के पीछे भी यही वजह होती है। अकसर तो गरीबी, मजबूरी, लाचारी भी बहुत कुछ सिखा देती है, और फिर भी इस सबसे कोई भी वही सीखता है जिससे उसे कोई खुशी मिलती दिखाई देती हो। बेवजह तो कोई शायद ही कभी कुछ सीखता या सीखना चाहता है। या तो किसी भी मनुष्य में जन्मजात ही सीखने का उत्साह होता है, या खेल खेल में या मजबूरी में ही सीखने के लिए वह बाध्य होता है। सरकस में काम करनेवाले इंसान और पशु भी कुछ इसी तरह से अद्भुत् चीजें सीख लेते हैं। या फिर बस कुछ अद्भुत् करने की सनक भी कई बार ऐसी कोई अद्भुत् सफलता दिला देती है कि देखनेवाले चकित रह जाते हैं। सवाल यह भी है किसकी स्वाभाविक रुचि किस चीज में होती है। इन सभी प्रकार के लोगों में जो एक बात समान पाई जाती है, वह यही कि किसी क्षेत्र में सफलता मिल जाने पर मनुष्य की रुचि उसमें ही अधिक आगे बढ़ने की होती है। इससे उसे आजीविका तो मिल सकती है, किन्तु या तो वह किसी दायरे में बँध जाता है, या फिर उसमें और आगे बढ़ने की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। लगता है कि जब तक सीखते रहने का स्वाभाविक उत्साह ही मनुष्य में न हो, वह अधिक कुछ नहीं सीख सकता और उसे यह सूझता भी नहीं है। नॉर्थ इंडियन्स को कन्नड सीखने के प्रति इसलिए भी शायद कोई लगाव नहीं होता होगा। क्या यही बात साउथ इंडियन्स पर भी नहीं लागू होती है? कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, या कि महाराष्ट्र तक के लोग भी किसी भी दूसरी भाषा को तभी सीखते हैं जब तक कि किसी किस्म की मजबूरी ही न हो। फिर भी बहुत से लोग बिना मजबूर हुए भी अनेक भाषाएँ सीखने की कोशिश करते हैं। इसलिए नहीं, कि उनके पास समय बिताने का और कोई तरीका नहीं होता, बल्कि केवल इसीलिए, क्योंकि उनमें उत्साह होता है। अगर उत्साह है तो भी बहुत सी चीजें आसानी से सीखी जा सकती हैं। अगर उत्साह ही नहीं हो, तो कितनी ही चीजें सीख लिए जाने पर भी कोई शायद ही सीख पाता हो। वह एक कुशल श्रमिक हो सकता है, पैसा भी कमा सकता है, एक तरह से सफल भी हो सकता है। सो व्हॉट? व्हॉट नेक्स्ट? क्या उसके जीवन का खालीपन भर पाता है? वह अनेक व्यस्तताओं में डूबा रहकर किसी किस्म का संतोष भी अनुभव कर सकता है, कोई मिशन, कोई आदर्श, किसी परलोक की चिन्ता, अपने तथाकथित नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए अपना जीवन भी समर्पित कर सकता है! सो व्हॉट? व्हॉट नेक्स्ट? इन सारी गतिविधियों में उसका समय तो बीत ही जाता है, क्या यह भी कुछ कम है! किन्तु एक सवाल फिर भी उसे परेशान कर सकता है, या कि उसका ध्यान इस ओर ले जा सकता है, कि वह क्या था जो बचपन से उसमें मौजूद था, वह उत्साह, जीवन के प्रति वह उमंग, जब वह अनायास, अकारण ही प्रसन्न रहा करता था? जब उसे कोई चिन्ता नहीं हुआ करती थी, मान- अपमान अनुभव नहीं होता था, जब मन एक निर्दोष सरलता में उल्लसित रहा करता था! वह सब आज कहाँ है? क्या यह प्रश्न कभी उसके मन में उठता है, या फिर वह किसी सांसारिक सफलता, किसी काल्पनिक उपलब्धि के गर्व में ऐसा, इतना अधिक डूबा रहता है, कि इस ओर उसका ध्यान दिलाए जाने पर भी नहीं जाता हो! वह निर्दोष सरलता ही सीखने का मूल तत्व है। वह लौ, जो कि हर किसी में जन्मजात ही होती है, जीवन की आपाधापी में न सिर्फ बुझ ही जाती है, दुर्भाग्यवश विस्मृत ही हो जाती है।

इसलिए;

"नॉर्थ इंडियन्स, ಕನ್ನಡ क्यों नहीं सीखते?"

यह प्रश्न इतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। इससे और अधिक, और भी महत्वपूर्ण है यह जान लेना, कि अपना बचपन हमने कब, कहाँ, कैसे और क्यों खो दिया? क्या मन फिर उस निर्दोष सरलता का आविष्कार कर सकता है! 

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