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June 27, 2019

उत्तम खेती ..

कृषि प्रधान देश भारतवर्ष
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हिंदुत्व के स्वाभिमान के प्रति जागृत होना अपनी जगह ज़रूर एक मुद्दा है तो भारत की सांस्कृतिक धरोहर और विरासत के प्रति जागृत होना भी उतना ही, बल्कि उससे भी कई गुना अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसकी उपेक्षा कर हिंदुत्व पर अड़े रहना नासमझी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी आँखें 'प्रगति' की  चकाचौंध से लुब्ध और प्रभावित हुए बिना रह सकती हैं?
निश्चित ही भारत-विभाजन के बाद देश में सहिष्णुता के चलते ही जहाँ मुसलमानों की जनसंख्या बेरोकटोक बढ़ती चली गयी वहीं पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरता और असहिष्णुता के चलते हिन्दुओं, सिखों यहाँ तक कि  ईसाईयों, पारसियों आदि की भी जनसंख्या घटती चली गयी।
जब प्रश्न कृषि के तरीकों को विकासशील बनाने का उठता है, तो हम कृषि के यंत्रीकरण की बात करते हैं, सिंचाई के लिए बड़े बांधों की वकालत करते हैं जिसका (तात्कालिक लाभ जो अंततः सबके लिए बहुत हानिकारक ही सिद्ध होना है), कृत्रिम खाद, कीटनाशक, खर-पतवारनाशक दवाओं के इस्तेमाल को ही कृषि-उत्पादन बढ़ाने का जरिया मान बैठते हैं। इनसे हमारी ज़मीन लगातार खराब होती जा रही है। हमारी उपज की गुणवत्ता गिरती जा रही है और हमारी सब्ज़ियों, फलों और अन्न में तमाम विषकारक पदार्थ भर गए हैं जिनसे हर कोई अनेक बीमारियों की चपेट में आ रहा है।  क्या वह भी एक बड़ी राष्ट्रीय हानि नहीं है? हमारे चिकित्सा-व्यय अनाप-शनाप बढ़ाते जा रहे हैं, और बड़े बड़े अस्पताल खुलने को हमने प्रगति का पैमाना समझ लिया है। लेकिन हम यह बिलकुल भूल बैठे हैं कि गोवंश पर आधारित कृषि से बिना उपरोक्त साधनों के ही हम कृषि से बहुत अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। देशी तरीकों से और चिकित्सा-विधियों से हम वैसे भी अधिक स्वस्थ रह सकते हैं और बहुत सी बीमारियों का इलाज़ काम खर्च में और सरलता से कर सकते हैं।  इस 'प्रगति' ने वास्तव में हमारे लिए विनाश का ही द्वार खोल रखा है।   
आज हमारी गायें सड़कों पर प्लास्टिक और अखाद्य वस्तुएँ कचरा इत्यादि खाती हैं, जबकि श्री राजीव दीक्षित जी ने परिश्रम और तर्क से यह सिद्ध और स्पष्ट कर दिया है कि केवल परंपरागत कृषि ही भारत (और पूरी धरती) की अर्थ-व्यवस्था की ताकतवर बुनियाद हो सकती है।
"उत्तम खेती माध्यम वान (वाण),
अधम चाकरी कुकुर निदान ...  "
को हमने आपने सुना होगा।
गायों के साथ बैल भी बेकार हो गए और इससे भी देश में गोहत्या को अपरोक्षतः बढ़ावा मिला यह भी हमें समझ में नहीं आता और इसलिए जब हमारे महात्मा या हिंदूवादी संगठन गोवध पर प्रतिबन्ध लगाने की बात करते हैं तो हमारी बुद्धि यह कुंठित हो जाती है और हम नहीं समझ पाते कि बेकार गायों का क्या करें! लेकिन यदि हम गोवंश पर आधारित कृषि अपनाएँ तो एक और जहाँ पूरा गोवंश हमारे लिए आय का बहुत बड़ा साधन हो सकता है, वहीं कृषि उपकरणों के न्यूनतम इस्तेमाल से बहुत से हाथों को रोज़गार भी मिल सकता है।
गोहत्या के प्रश्न पर धार्मिक आधार पर सोचा जाना तो अवश्य ही विचारणीय है किन्तु इसके साथ इसे राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दे की तरह देखा जाना और भी अधिक ज़रूरी और हमारे लिए हितकर है।
जनसंख्या का मुद्दा भी ऐसा ही है जिसे धर्म से अलग कर राष्ट्रहित में क्या है इस आधार पर देखा जाना चाहिए।संलग्न विडिओ में मौलाना मुफ्ती साहब तर्क कर रहे हैं कि जनसंख्या नियंत्रण के बजाय विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ज़ाहिर है वे मुस्लिम समाज को जनसंख्या-नियंत्रण करने के लिए राज़ी नहीं कर सकते।  बल्कि उनका छिपा एजेंडा तो यही है कि मुसलमान अपनी आबादी बढ़ाते रहें। और वे कह रहे हैं कि प्रगति (development) होने पर ही लोग जनसंख्या पर नियंत्रण करने लगेंगे। यह तर्क कितना हास्यास्पद है ! दूसरी तरफ यद्यपि गरीबी का अर्थशास्त्र भी एक हद तक इसे सही मानता है क्योंकि समृद्ध (और प्रगतिशील) होने पर मनुष्य 'मनोंरंजन' के दूसरे तरीकों को अपनाने लगता है, क्योंकि गरीब के पास तो 'मनोंरंजन' का यही एक साधन होता है।
इसलिए मुसलमान गरीब हो या अमीर, चार शादियाँ कर सकता है, दर्ज़न भर बच्चे पैदा कर सकता है और हिन्दू एक से अधिक शादी करने पर जेल जाता है । 
इस प्रकार भारत में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है जिसका कारण है क़ानून अन्यायपूर्ण होना ।
जब भारत-विभाजन हुआ था, क्या उसी समय क़ानून द्वारा इस विसंगति और भेदभाव को दूर कर दिया जाना ज़रूरी नहीं था ? अब समस्या बहुत ही विकराल हो चुकी है जिसका प्रमुख कारण स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद से जारी 'तुष्टिकरण' और वोट-बैंक की राजनीति है।
 राष्ट्र के हित में क्या यही उचित न होगा कि अब भी हम राजनीति की इस कुटिलता को समझ सकें?
अवश्य ही कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि किसी भी नागरिक के लिए उसके होनेवाले बच्चों की अधिकतम संख्या तय कर दी जाए और जिसे सभी धर्मों के लोगों पर कड़ाई से लगाया जाए ?        
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