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September 14, 2017

यह हिन्दी-दिवस !

यह हिन्दी-दिवस !
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मुझे हिन्दी मातृभाषा की तरह मिली थी।  स्कूल में हिन्दी माध्यम से पढ़ा, लेकिन अंग्रेज़ी से मुझे न तो वैर था न लगाव। कक्षा नौ में अंग्रेज़ी-विरोध के कारण हमने तय किया कि अंग्रेज़ी का 'पेपर' नहीं देंगे, अर्थात् बहिष्कार करेंगे।  दूसरे दिन मैं परीक्षा के समय घर से तो चला लेकिन स्कूल जाने के बजाय इधर-उधर भटकते हुए दो-तीन घंटे बाद घर पहुँचा। पिताश्री ही स्कूल में प्राचार्य थे और उन्हें कल्पना नहीं थी की मैं ऐसा अनुशासनहीन क़दम उठाऊँगा।  डर भी बहुत लग रहा था।  परीक्षा-परिणाम आने पर मेरी रैंक चौथी थी।  मुझे आश्चर्य हुआ।  फिर जब कक्षाध्यापक का ध्यान इस ओर आकर्षित किया गया कि 'अंग्रेज़ी' की परीक्षा देना-न-देना ऐच्छिक था और उसके मार्क्स जोड़े नहीं जा सकते तब उन्होंने इस भूल को सुधारा।
हिन्दी मेरे लिए घर की दाल-रोटी है, माँ के हाथों की बनी !
दूसरी भाषाएँ मौसी के हाथों के बने व्यञ्जन !
वे भी प्रिय हैं उनसे भी द्वेष नहीं, लेकिन हिंदी-दिवस मनाने का ख्याल ही मुझे गले नहीं उतरता!
एक मित्र ने कविता लिखी :
"मैं हिंदी हूँ !
वेंटीलेटर पर जिंदी हूँ। .. ... ..."
हिंदी के प्रति उसकी भावनाओं पर मुझे खुशी है, लेकिन मेरी दृष्टि में किसी भी भाषा का अपना जीवन होता है, वे जन्म लेती हैं, पनपती और फूलती-फलती, फैलती हैं और बहुत लम्बे समय में इतना बदल जाती हैं कि पहचानना मुश्किल हो जाता है।  हिंदी भी इसका अपवाद नहीं है।
बहरहाल मैंने उसे यह उत्तर दिया :
 
एक प्रश्न :
क्षमा चाहता हूँ, तुक मिलाने के लिये  ’जिंदा’ / ’ज़िन्दा’ को ’जिंदी’ / ’ज़िन्दी’ कर देना शायद ज़रूरी हो, पर ऐसा करने पर हिंदी ’जिंदा’ कैसे रहेगी?
क्या यहीं से हिंदी का विरूपण शुरू नहीं हो जाता?
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यूँ तो आज़ाद परिन्दा हूँ,
लेकिन घायल हूँ, ज़िन्दा हूँ,
तुमने पिंजरे में डाल दिया,
कहते हो मुझको पाल लिया,
तुम जब चाहो प्यासा रक्खो,
भूखा रक्खो या भूल रहो,
याद आए या मन हो तो,
भोजन-पानी तब मुझको दो,
साल में किसी एक दिन तुम,
मना लो मेरा हैप्पी-बड्डे,
देखो घायल या ज़िंदा हूँ,
तो ले जाओ डॉक्टर के पास,
तुम क्या चाहो, मुझे पता है,
तुम्हें चाहिए मान-सम्मान,
तुम्हें चाहिए रुतबा शान,
तुम्हें नहीं मुझसे मतलब,
मैं हूँ नुमाइश का सामान,
बस एक दिन नुमाइश का,
ज़िल्लत के बाक़ी सारे दिन,
अच्छा है जो मैं मर जाऊँ,
ऐसे जीवन से उबर जाऊँ !
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