May 18, 2016

नर्मदे हर !

इस बार 
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संभवतः प्रथम शिप्रा-स्नान मैंने 1956 के सिंहस्थ में किया होगा । क्योंकि तब मेरी आयु 2 या ढाई वर्ष के लगभग थी और आगर से उज्जैन आना छोटी लाइन की रेलगाड़ी से होता था । यह बहुत संभव है कि आगर से माता (माई)-पिता (अण्णा) और भाई बहनों के साथ मेरा उज्जैन आना हुआ हो । पर कुछ याद नहीं आता ।
कभी किसी से पूछा हो, या किसी ने बताया हो, यह भी याद नहीं । 
1980 में दूसरे, 1992 में तीसरे और 2004 में चौथे सिंहस्थ में मैं उज्जैन में था । इस सिंहस्थ में माँ नर्मदा ने मुझसे कहा : "बेटा! इस सिंहस्थ में मैं स्वयं ही उज्जैन जा रही हूँ इसलिए तुम उज्जैन छोड़कर यहाँ मेरे पास ही आ जाओ !" 
और मैं माँ नर्मदा की आज्ञा कैसे टाल सकता था ?
इसलिए मैं यहाँ (नावघाट-खेड़ी ग्राम) आ गया ।
और माई की ऐसी कृपा कि यहाँ आने के बाद कुछ दिनों में ही माई की स्तुति में यह रचना  मुझसे बन पड़ी ! 
एक संकेत देना चाहूँगा :
'अहं-स्फूर्ति' और 'अहं-वृत्ति' का सन्दर्भ श्री रमण महर्षि के उपदेशों के तारतम्य में दृष्टव्य है ।     
माई की महिमा मैं बालक क्या जान सकता हूँ ?
और वर्णन तो बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी भी कहाँ कर पाते हैं ??
नर्मदे हर !
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