December 07, 2014

॥ अज्ञातपथगामिन् कोऽपि ॥ - 3

॥ अज्ञातपथगामिन् कोऽपि ॥ - 3
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पिनाकपाणिन् असौ।
पिदधाति बाणम् ॥
वितनोति प्रत्यञाम् ।
प्रति चिनोति वर्णान् ।
प्रति अञ्चते वर्णैः।
क्षिपति तान् दिग्-दिगन्तान् ।
अस्यति शास्ता तथा,
पिनाकपाणि कोऽपि ।
अक्षर समाम्नायम् तदिदम् परिव्रजेत् ।
प्रत्याहरेत् हरः
आदिरन्त्येन सहेता ।
अ इ उ ण् ।
ऋ लृ क् ।
ए ओ ङ् ।
ऐ औ च् ।
ह य व र ट् ।
ल ण् ।
ञ म ङ ण म् ।
झ भ ञ् ।
घ ढ ध ष् ।
ज ब ग ड द श् ।
ख फ छ ठ थ च ट त व् ।
क प य् ।
श ष स र् ।
ह ल् ।।
--
समर्पयति शिवो महाकालो,
अक्षर समाम्नायमिदम्
ऋषिभ्यः ॥ 
इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसंज्ञार्थानि ॥
--
॥ ॐ शिवार्पणमस्तु ॥
भावार्थ :
--

पिनाकपाणी वह,
बाणों को,
खोलता-छिपाता है, 
खींच ता है,
प्रत्यञ्चा धनुष की ।
वर्णों को चुनता / चिह्नित करता है,
उनकी संयुति करता है,
परस्पर ।
उछाल देता है उन्हें,
दिग्-दिगन्तों में ।
शास्ता इस तरह से,
पिनाकपाणि कोई !
यह अक्षर-समाम्नाय,
प्रसरित होता है,
इस तरह ।
प्रत्याहरण करते हैं हरः,
आदिरन्त्येन सहेता ।
आदि को अन्त्य से युक्त कर,

अ इ उ ण् ।
ऋ लृ क् ।
ए ओ ङ् ।
ऐ औ च् ।
ह य व र ट् ।
ल ण् ।
ञ म ङ ण म् ।
झ भ ञ् ।
घ ढ ध ष् ।
ज ब ग ड द श् ।
ख फ छ ठ थ च ट त व् ।
क प य् ।
श ष स र् ।
ह ल् ।।
--
इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसंज्ञार्थानि ॥
--
अणादि संज्ञाओं के तात्पर्य के सूचक,
इन माहेश्वर सूत्रों को,
अर्पित कर देते हैं शिव,
यह अक्षरमणिमाल
ऋषियों को!
-- 
॥ ॐ शिवार्पणमस्तु ॥
उज्जैन / 07 /12 /2013 

2 comments:

  1. प्रश्न है:

    माहेश्वर सूत्र में ध्वनिक्रम ऐसा क्यों है? इसका क्या वैज्ञानिक कारण है?

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    1. ध्वनिक्रम नहीं, वर्णक्रम है यह, क्या आप कभी भौतिक-विज्ञान के विद्वान से पूछते हैं कि Optics का वर्णक्रम (vibgyor) ऐसा क्योँ है? और जो 'कारण' वहाँ लागू होता है, अक्षरशः वही यहाँ भी लागू होता है . 'विधान' / Law. किन्तु हमारी सुविधा और प्रमाण के लिए हम यह तर्क ग्रहण और प्रस्तुत कर सकते हैं कि इसी आधार पर 'प्रत्याहार' अर्थात् संस्कृत 'व्याकरण' की ईंटें बनाई जाती हैं.. धन्यवाद अर्यमन !

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