June 25, 2009

उन दिनों / 24.

उन दिनों / 24 .
रवि से उसे क्या उम्मीदें थीं ? रवि से उसे कई चीज़ें सीखनी थीं । शास्त्र । कौन से शास्त्र ? ब्रह्म-सूत्र, गीता, त्रिपुरा रहस्य, देवी-कालोत्तर- ज्ञानाचार-विचार-पटलः, मांडूक्य-उपनिषद, उपदेश-सारः, सत्- दर्शनं, रामगीता, श्री दक्षिणामूर्ति-स्तोत्रं, विचार-चंद्रोदय, स्पंद-कारिका, पंचदशी, और भी न जाने क्या-क्या । अब यह बात अलग है कि इनमें से कई के नाम तक रवि ने शायद ही कभी सुने होंगे । -मेरी तरह । और ज़ाहिर है इसमें कई वर्ष लगते । लेकिन अविज्नान बहुत निश्चिंत था । उसे भरोसा था कि जब जो होना है तब वह होकर ही रहेगा ।
बात नाश्ते की हो रही थी । हम सब नाश्ते पर बैठे हुए थे । मेरी दायीं तरफ़ 'सर', बाईं तरफ़ अविज्नान, सामने रवि । रवि ने आज ब्रेड-बटर रखा था । पपीता काट कर रखा था । नाश्ते का समय कुछ ऐसा था कि चाय कभी-कभी कैंसल हो जाती थी , या कहें, घंटे भर लेट हो जाती थी । आज भी ऐसा ही था । यह 'नया-नियम' था ।
-"नया-नियम" ?
वास्तव में यह रवि का अपना बनाया 'नया-नियम' था । उसके अनुसार 'मील्स' या नाश्ते आदि के तुरंत बाद कम-से-कम एक घंटे तक चाय या कॉफी नहीं पीना चाहिए, क्योंकि उससे भोजन पचने में बाधा आती है । हमें मंज़ूर था उसका नियम । क्योंकि चाय बनाना उससे ज़्यादा मुश्किल काम था ।
"लेकिन पहले तो ऐसा नहीं था ! " -अविज्नान ने रोड़ा अटकाया । रवि इस पर बस मुस्कुराया भर ।
अविज्नान के लिए तो ऐसे नियम अनावश्यक अनुशासन ही थे ।
"भइ, चाय तो घंटे भर बाद ही मिलेगी, लेकिन तुम्हें चाहिए तो अभी बना दूँ ?" -वह बोला ।
"नहीं भाई, अनुशासन तो सब पर लागू होना चाहिए । "
लेकिन इस 'नए-नियम' में एक मक़सद छिपा हुआ था, और साफ़ तौर पर उसमें अविज्नान का भी एक उद्देश्य पूरा हो जाता था । चाय के बाद उसे सिगरेट की तलब होती थी और 'सर' के सामने सिगरेट कैसे पीता ? इस बहाने वह चाय के पहले निश्चिंततापूर्वक 'सर' के साथ होनेवाली बातचीत में अच्छी तरह भाग ले सकता था ।
'सर' से तीसरी मुलाक़ात मेरे इसी घर में तब हुई थी, जब वे अचानक ही यहाँ आए थे । तब मुझे यह कल्पना करना भी बहुत मुश्किल था कि उनसे फ़िर कभी मिलना हो सकेगा । खैर वह कहानी फ़िर सही ।
अभी तो नाश्ते की मेज पर 'नया-नियम' था, और यह राजा रवि वर्मा का, या यूँ कहें कि रवीन्द्र वर्मा का नया नियम था । कभी-कभी मैं उसे राजा रवि वर्मा कहा करता था । 'रवि' तो सभी कहते थे । 'रवि-अवि' मेरे घर में रहनेवाले दो पेइंग गेस्ट थे, लेकिन इसका पेमेंट पैसों में नहीं मिलता था ।
"तो यह 'नया-नियम' है कि चाय घंटे भर बाद मिलेगी ?" -'सर' ने मुस्कुराते हुए पूछा ।
किसी ने इस का उत्तर नहीं दिया ।
"एक 'नया-नियम' वह है, -क्या कहते हैं उसे, -शायद न्यू टेस्टामेंट ।" 'सर' ने चर्चा का रुख दूसरी दिशा में मोड़ा । हम सब देख रहे थे ।
"और एक यह 'नया नियम ' है, जिससे अविज्नान को समझौता करना पड़ रहा है । " -रवि ने चुटकी ली ।
"उसे 'नया-नियम' क्यों कहते हैं ?" -'सर' ने प्रश्न किया ।
"ईसाइयत के इतिहास को देखें तो बाइबिल दो हिस्सों में पाई जाती है , एक है, -'ओल्ड टेस्टामेंट', दूसरा है, -'न्यू टेस्टामेंट' -रवि बोला ।
"क्या ईसाइयत और यहूदी मत अलग-अलग हैं ?" -'सर' ने पूछा ।
"क्या मतलब ?" -रवि ने आश्चर्य से पूछा ।
"भाई, मैंने इसलिए पूछा क्योंकि मेरी जानकारी के अनुसार यहूदियों की बाइबिल, जो कि शायद हिब्रू बाइबिल है, वह भी एक धर्मग्रन्थ है, तो क्या ये ओल्ड-टेस्टामेंट, न्यू टेस्टामेंट, और हिब्रू बाइबिल आदि एक ही हैं, या उनमें कोई संबंध है ?"
हममें से किसी को भी इस बारे में ठीक-ठीक कुछ भी नहीं मालूम था । मुझे उम्मीद थी कि अविज्नान ज़रूर इस बातचीत में जोर-शोर से हिस्सा लेगा, लेकिन वह तो खिड़की से बाहर देख रहा था । "चलो यह भी ठीक है " - मैंने सोचा । मुझे उसकी 'सेंसिबिलिटी' को लेकर भी थोड़ी चिंता थी । मैं नहीं जानता कि पश्चिमी 'मतों' के संबंध में उसकी क्या राय थी । वह यहूदी था, कैथोलिक था, क्रिश्चियन था या 'पैगन', -मुझे कुछ पता नहीं था । हाँ वह 'मुस्लिम' नहीं था, इतना मैं कह सकता हूँ ।
"मुझे लगता है कि हमें इस बारे में सावधानी से चर्चा करनी होगी । पहले तो हमें यह तय करना होगा कि 'मान्यता' और 'धर्म' के बीच क्या फर्क हो सकता है । ऐसा इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि जब हम 'मान्यता' को 'धर्म' कहने लगते हैं, तो अनजाने में ही बहुत सी और बहुत बड़ी गलतफहमियों के शिकार हो जाते हैं । विभिन्न समुदायों की भिन्न-भिन्न 'मान्यताएँ' हैं, और वे एक-दूसरे से अलग ही नहीं, बल्कि नितांत विपरीत और विरोधी भी हैं । चाहे स्वर्ग-नरक संबंधी हों, या भौतिक जीवन के क़ानून कायदे, शादी-ब्याह और तलाक़, पाप और पुण्य के बारे में ही क्यों न हो ! और इस आधार पर पूरी मनुष्यता बुरी तरह बँटी हुई भी है । जहाँ तक रीति-रिवाजों की बात है, वे कुछ पूर्व-निश्चित मान्यताओं और परम्पराओं से पैदा हुए हैं, और समय के साथ-साथ उनमें बदलाव आता रहता है । सबसे पहले तो यह देखना होगा कि धर्म का प्रश्न सिर्फ़ मनुष्य जाति के लिए ही कोई अर्थ रखता है । दुर्भाग्य से यथार्थ धर्म को समझे बिना ही, हम धर्म के पक्ष या विपक्ष में होते हैं । जिसे प्रायः धर्म समझा जाता है, वह निश्चित ही किन्हीं मान्यताओं, अनुभवों, और उनसे प्राप्त निष्कर्षों पर आधारित होता है । सामान्यतया धर्म का तात्पर्य यह भी समझा जाता है कि जो सत्य के अनुसार हो । अत: हम कह सकते हैं कि धर्म एक अमूर्त अवधारणा भर है । और भिन्न-भिन्न समुदायों ने धर्म को भिन्न-भिन्न रूपों में अपनाया है । यह तो निर्विवाद सत्य है कि धर्म चाहे परम्परा से आया हो, या खोज से, वह किसी-न-किसी 'दर्शन' पर आधारित होता है । या तो 'दर्शन' अर्थात वैचारिक निष्कर्षों पर आधारित 'सिद्धांत' या 'मान्यताएँ', विश्वास आदि । लेकिन सामान्य मनुष्य तो परम्परा को ही धर्म समझता चला आया है । तात्पर्य यह कि 'धर्म' अपने-आप में कोई ऐसी 'तय' चीज़ नहीं है, जिसे हम एक अथवा अनेक कहें । फ़िर, विभिन्न मत-मतान्तरों को अलग-अलग या समुदाय-विशेष के भेदों सहित 'धर्म' का नाम दिया जाता है । अंग्रेजी में धर्म या 'रिलिजियन' का अर्थ सिर्फ़ परम्परा, रूढ़ि से किए जानेवाले रीति-रिवाज़, कर्म-काण्ड, तथा आस्था, विश्वास, श्रद्घा आदि ही है । हिन्दी या संस्कृत में धर्म का एक व्यापक अर्थ है, लेकिन कामचलाऊ लोक-व्यवहार की भाषा में उसका एक सतही अर्थ भी है, और वह है, - समाज के विभिन्न समुदायों के भिन्न-भिन्न परम्परागत विश्वास, मान्यताएँ, और उन पर आधारित कर्म-काण्ड या रीति -रिवाज़ । हिन्दी या संस्कृत में धर्म का जो अर्थ है, समाज के स्वयंभू कर्णधार धर्म का वह अर्थ शायद ही ग्रहण कर सकें । समाज के ऐसे स्वयंभू कर्णधारों की दृष्टि में धर्म वह है, जो पूरे समाज को आपस में जोड़े रखे । या कम से कम वे ऐसा समझते हैं । उन्हें वास्तविक धर्म क्या है, इसकी खोज में न तो दिलचस्पी होती है, और न उन्हें इसकी ज़रूरत ही महसूस होती है । धर्म उनके लिए एक बोझ होता है, या 'साधन' या मजबूरी । वे अपनी सुविधानुसार धर्म के पक्ष या विपक्ष में होते हैं । सुविधा और स्वार्थ ही उनके लिए 'धर्म' होता है । धर्म उनकी नज़रों में व्यक्तियों, समुदायों, के अपने-अपने आग्रह हैं, जो यूँ तो परस्पर बेमेल होते हैं, लेकिन 'सर्व-धर्म-सम-भाव' रूपी 'चारा' फेंककर वे अलग-अलग तरह की मछलियों को फँसा भी लेते हैं । दूसरी ओर धर्म के धुर विरोधी भी , 'ईश्वर' के अस्तित्व पर प्रश्न उठानेवाले भी अपने-आपको 'धर्म-निरपेक्ष' घोषित करते हुए अपनी सुविधा के अनुसार किसी विशेष धर्म से जुड़े (राजनीतिक)दल पर 'सांप्रदायिक' होने का आरोप मढ़ सकते हैं । ऐसा सिर्फ़ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे स्थानों पर भी है । इसमें वे भिन्न-भिन्न 'धर्मों' को इस्तेमाल भी करते हैं, उन्हें कभी राष्ट्र या मानवता के भिन्न-भिन्न रूप कहते हैं, कभी उन्हें 'समान' बतलाते हैं, लेकिन कभी भी धर्म के मूल स्वरुप पर नहीं सोचते । सर्वहितकारी धर्म क्या हो सकता है , इस पर चिंतन करने के लिए न तो उनके पास दृष्टि है, न समय है, न दिलचस्पी, उत्साह तो बहुत दूर की बात है । और यदि वे इस दृष्टि से सोचने लगेंगे तो उन्हें अपना पूरा नज़रिया ही बदलना पड़ेगा । सतही तौर पर वे सबको खुश रखना चाहते हैं, और येन-केन-प्रकारेण सहिष्णुता, धर्म के नैतिक पक्षों आदि का झूठा गुणगान कर उनके गहरे मूलभूत अंतर्विरोधों और विसंगतियों को नज़रों में नहीं आने देते । यदि धर्म मान्यताओं पर अवलंबित हैं, तो उनमें अवश्य ही परस्पर विरोध होगा यह समझना बहुत आसान है, क्योंकि मान्यताएँ तो अक्सर ही विरोधी हुआ करती हैं , और साधारण मनुष्य इतना विवेकशील और धैर्यवान नहीं होता कि वह धर्म के मूल तत्त्व को जानने की ज़हमत उठाये । हर किसी के लिए तात्कालिक महत्व की दूसरी भी कई चीज़ें होतीं हैं, और धर्म के बारे में कुछ गंभीरता से विचार करनेवालेभी वैज्ञानिक ढंग से उसकी परीक्षा करने से घबराते हैं । भय तथा परंपरा ही उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं । वे धर्म को या तो पूरी तरह से पाखण्ड या ढकोसला कहकर नकार देते हैं, या तथाकथित रूप से प्रगतिशील भी होते हैं, तो वैज्ञानिक ढंग से उसके तत्त्वों को जैसा उन्हें समझ आता है, येन केन प्रकारेण सही सिद्ध करने की कोशिश करने लगते हैं । कुछ लोग तो धर्म से चिढ़ जाते हैं, तो दूसरे कुछ उग्र रूप से धर्म के कट्टर हामी हो जाते हैं । फ़िर यहाँ एक और दुर्भाग्य यह है कि जो 'धर्म' कट्टर होता है, उसके प्रति चिढ़े हुए लोग तो अपनी चिढ ज़ाहिर करने से डरते हैं, लेकिन सहिष्णु 'धर्म' से चिढ़नेवाले अपने ही 'धर्म' को जी भरकर गालियाँ भी दे लेते हैं । इसके क्या परिणाम हो सकते हैं , अनुमान लगाना कठिन नहीं है । पर इसमें संदेह नहीं कि ये सभी अपनी-अपनी 'मान्यताओं' के ही अनुसार 'धर्म' के प्रति व्यवहार करते हैं । धर्म की प्रासंगिकता के बारे में सोचने से पहले इस मूल तथ्य की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जा पाता कि धर्म से हम क्या समझते हैं, यह जानना ज़रूरी है ! इस बारे में स्पष्टता होना आवश्यक है । यदि धर्म एक अपरिभाषित, अमूर्त्त, वस्तु या कारक है, तो वह नितांत वैचारिक अस्तित्त्व रखनेवाली एक चीज़ है; -विचार-मात्र है । जैसे जाति, वंश, इतिहास आदि हैं । यदि हम यह समझने की कोशिश करें कि 'इतिहास' क्या है ? तो जो मूल समस्या हमारे सामने आती है, वह यह है : किसका 'इतिहास' ? आप युद्धों का इतिहास, शिक्षा का इतिहास, साहित्य का इतिहास, खेलों का इतिहास, निर्माण-कला और स्थापत्य का इतिहास, विज्ञान के विकास का इतिहास, संगीत का इतिहास, आदि कितने ही क्षेत्रों को सन्दर्भ में रखते हुए, बिल्कुल अलग-अलग नतीजों पर पहुँच सकते हैं । क्या इसी तरह से 'धर्म' के इतिहास का अध्ययन और अनुसंधान, अन्वेषण नहीं किया जाना चाहिए ? हम समझते हैं, कुछ लोगों ने वह भी किया है । हाँ, इने-गिने लोगों ने अवश्य ही किया है, लेकिन जिस प्रकार मानव-इतिहास के साथ तात्कालिक या लाभों (!), या पूर्वाग्रहों आदि के कारण छेड़-छाड़ की गयी है, वैसी ही छेड़-छाड़ 'धर्म' के इतिहास में भी 'अध्ययन' और खोज के बहाने से की गयी है, इसे सिद्ध किए बिना ही देखा जा सकता है । इतिहासकार स्वयं ही अपने आग्रहों, प्रलोभनों, भयों, से बँधे होते हैं । "Sponsered" , किसी राजनैतिक दल या वर्ग , उसके से 'प्रवर्तित' , परिचालित होते हैं । वे इतिहास की वैसी ही 'व्याख्या' और 'खोज' करते हैं, जो उनके प्रवर्तकों द्वारा इंगित किए गए 'निष्कर्षों' का समर्थन और 'पुष्टि' कर सकें । 'धर्म' के मामले में तो यह सौ फ़ीसदी सही है । 'धर्म' का इतिहास जैसा है, वैसा शायद ही कोई खोजना चाहता है । लगभग हर कोई उसे वैसा खोजना चाहता है, जो उसकी रुचियों से मेल खाता हो । फ़िर, इस बारे में सबसे अधिक दिलचस्पी राजनीतिज्ञों की होती है । उनके पास 'talent' नहीं होती, इसीलिये वे राजनीति में जाते हैं । फ़िर वे तथाकथित 'talented' लोगों को 'खरीदने' लगते हैं । वे इतिहास को तोड़-मरोड़कर, अपने लक्ष्यों के अनुकूल उसकी 'व्याख्या' प्रस्तुत करते हैं । यह ऐसा दुश्चक्र है, जिसमें सारी मनुष्यता लगातार अधिक से अधिक अन्धकार की ओर, अशांति व पारस्परिक वैमनस्य की ओर बढ़ती चली जा रही है । इस सबकी जड़ में राजनीतिज्ञों के अपने भय, लोभ और अविवेक, दंभ, और 'मद' हैं । संक्षेप में, -'अविवेक' । पहले तो हमें धर्म और अध्यात्म को अलग-अलग करना होगा । इन्हें एक-दूसरे से अलग कर लेने के बाद यदि यह लगता है, कि उन्हें एक-दूसरे से अलग किया ही नहीं जा सकता, तो हमें धर्म को नए सिरे से समझना होगा । सामान्यतः सब-कुछ इतना गड्ड-मड्ड हो गया है, कि मनुष्य कभी उनके बारे में ठीक से खोजबीन ही नहीं कर पाता । 'ईश्वर', 'पवित्र'-ग्रन्थ, और उनके द्वारा मनुष्य के लिए 'निर्धारित' किया गया 'धार्मिक' आचरण, इन सबकी परीक्षा करना तक निषिद्ध कर दिया गया है । फ़िर उनके 'मतभेदों' के बीच तालमेल कैसे हो ? शिक्षा-संस्थानों में तथाकथित 'दर्शन-शास्त्र' में उस संबंध में 'अध्ययन' ज़रूर किया जाता है, लेकिन वह 'सतही' और पूर्वाग्रह-ग्रस्त होता है । 'तुष्टिकरण' से 'प्रवर्तित' होकर किया जाता है । हो सकता है कि 'अध्ययन-कर्त्ता' अध्यवसाय-शील हो, मेहनती और 'talented' भी हो, लेकिन उसकी सारी 'प्रतिभा' और टेलेंट का दोहन 'प्रवर्तक' के 'लक्ष्यों' की प्राप्ति की दिशा में किया जाता है । जैसे सरकारी योजनाएँ होती हैं ! यह 'अध्ययन' 'तुलनात्मक' , और 'विचारों' से 'विचारों' तक' 'विचारकों' से 'विचारकों' तक सीमित रहता है । उसका 'जीवन' की वास्तविकता से ज़रा भी संबंध नहीं होता । या फ़िर, 'भारतीय दर्शन' के अन्तर्गत मुख्यतः हिन्दू, बौद्ध, और जैन मतों आदि में, योग, वेदान्त, तंत्र आदि परम्पराओं के अनुसार किया जाता है । इस प्रकार का अध्ययन भी आज के तथाकथित 'बुद्धिजीवियों' का वाग्विलास भर है, क्योंकि भारतीय दर्शन में वैचारिक या कोरे बौद्धिक तर्क-वितर्क को सत्य के उदघाटन में बाधक और निष्फल कहा गया है । वहाँ साधना और 'तपस्या' अर्थात् 'तप' पर, और मुख्यतः 'पात्रता' पर, जोर है । लेकिन आज के तमाम बुद्धिजीवी सोचते हैं की बिना 'पात्रता' के सत्य को 'समझ' या 'प्राप्त' कर लेंगे । इस बुनियादी भूल की जान-बूझकर भी उपेक्षा की जाती है । सारे 'धर्मों' की 'समानता' घोषित करनेवाले किसी एक धर्म के तत्त्व तक को जाने बिना ही ऐसे 'आदर्शों' को स्थापित करते हैं, जो कालांतर में एक सर्वमान्य सत्य समझ लिए जाते हैं । भारतीय तत्त्व-दर्शन में अनेक सम्प्रदाय हैं, और उनके अपने-अपने चिंतन-प्रकार हैं । वे किसी मान्यता पर जोर नहीं देते । वे "एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति " की दृष्टि रखते हैं । पश्चिमी मतवादों से उनकी तुलना तक नहीं है, लेकिन तथाकथित 'सर्व-धर्म-समानता' के विचार से मोहित-बुद्धि लोग, उसके कायल, जानबूझकर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं । सवाल यह नहीं है कि क्या भारतीय तत्त्व-दर्शन और उसके विभिन्न 'सम्प्रदाय' ही सत्य या धर्म को समझने के एकमात्र सम्यक् साधन हैं ? सवाल यह है कि क्या भारतीय तत्त्व-दर्शन और चिंतन की प्रणालियाँ और पश्चिमी विचार-धाराओं, तथा चिंतन-प्रणालियों की परस्पर तुलना की भी जा सकती है या नहीं ? तमाम भारतीय तत्त्व-दर्शन जीव की मुक्ति / निर्वाण को ही परम लक्ष्य मानते हैं । आत्मा- परमात्मा के संबंध में उनके दृष्टिकोण में अन्तर भी हो सकता है, लेकिन 'मुक्ति' के बारे में कोई मतभेद नहीं हैं । पाश्चात्य दर्शन (?) में तो स्वर्ग-नरक और एक (?) ईश्वर के 'होने' या न-होने के बारे में आग्रहों, और वैचारिक (!) कुश्ती से आगे बात नहीं जाती । इस प्रकार यदि 'मान्यताओं' को ही 'धर्म' कहा जाए, तो भी मोटे तौर पर भी 'धर्म' का स्पष्ट विभाजन पाश्चात्य और पौर्वात्य के रूप में मौजूद है । फ़िर तथाकथित 'पाश्चात्य' 'धर्म' में 'मान्यताओं' के सिवा और क्या है ? सवाल यह नहीं है कि वे मान्यताएँ सत्य हैं या असत्य, सवाल यह है कि सारी परस्पर विरोधी मान्यताएँ एक साथ कैसे सत्य हो सकती हैं ? मैं सोचता हूँ कि मैं अपनी बात कह पाया । अब चाय !"
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June 09, 2009

उन दिनों / 23.

उन दिनों / 23 .
उस दिन अविज्नान हमें 'वहाँ' ले गया था, जहाँ वह था । "कहीं और", -रवि की दृष्टि में ।
रवि और अविज्नान आपस में हँसी-मज़ाक करते थे । रवि की नज़रों में अविज्नान योगी, तांत्रिक, दार्शनिक, और 'जासूस' (spy) था, जबकि अविज्नान की दृष्टि में रवि कलाकार, बुद्धिजीवी, और विद्वान् था । एक संघर्ष-शील आध्यात्मिक विभूति । लेकिन सारा हँसी-मजाक निश्छल था, क्योंकि दोनों के बीच कहीं कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी । दोनों में एक गहरी ट्यूनिंग हो गयी थी । अविज्नान जब किसी परम्परा का उल्लेख करता तो उसका सन्दर्भ विभिन्न विषयों से ग्रहण करता था , -जैसे पुनर्जन्म, तंत्र, ज्योतिष, अध्यात्म, साहित्य और दर्शन आदि, और सीधे ही चर्चा या चिंतन के द्वारा वैज्ञानिक दृष्टि से उसकी सत्यता या संदिग्धता पर विचार करता था । रवि अध्ययनशील था, और भिन्न-भिन्न परम्पराओं को समझने का उसका तरीका अविज्नान से काफी हद तक अलग था । लेकिन एक बात दोनों के बारे में एक जैसी थी । दोनों किसी भी पूर्वाग्रह से रहित थे । दोनों सभी चीज़ों को तौलते, समझने की चेष्टा करते, यदि उन्हें कहीं भी ज़रा भी अविश्वास होता, तो वे अपना संदेह सामने रख देते । अविज्नान अध्ययनशील तो नहीं था लेकिन किसी कारण से उसमें एक ऐसी अलौकिक क्षमता थी जो हममें से बहुत कम के पास होती है, जिसे हम 'अंतर्दृष्टि' भी कह सकते हैं । और उस अंतर्दृष्टि के सहारे वह जीवन के गहरे रहस्यों को भी समझ या देख तो लेता ही था । उदाहरण के लिए, 'सत्य' की प्राप्ति के लिए अतीत में मनुष्य ने क्या-क्या प्रयास किए, इसे समझने के लिए वह शास्त्रों का अध्ययन तो करता ही था, लेकिन उस गंभीरतापूर्वक नहीं जिस गंभीरता और उत्कंठा से रवि किया करता था । रवि के मन में यह गहरा विश्वास (निष्ठा?) था कि शास्त्रों में जो कुछ कहा गया वह उस तत्त्व को जाननेवालों ने ही कहा है, (हालाँकि मैं नहीं कह सकता कि ख़ुद रवि ने इतनी बारीकी से इस बारे में सोचा होगा कि ऐसा उसके साथ है ), जबकि अविज्नान का दृष्टिकोण यह था कि सिर्फ़ कुछ ही शास्त्र ज्ञानियों के कहे गए प्रत्यक्ष वचनों का संग्रह हैं और 'शास्त्र' के नाम पर जो अनेक सम्प्रदाय पैदा हो गए हैं, उनमें से अधिकाँश तो मनुष्य को और भी भ्रमित कर रहे हैं, और स्पष्ट है कि उनके बारे में पर्याप्त सावधानी से उनकी जाँच-परख के बाद ही उनकी प्रामाणिकता स्वीकार की जानी चाहिए ।
"या फ़िर ?" -एक बार मैंने उससे प्रश्न किया था ।
"Do away with them, forget them abandon them abolish them।" -उसका जवाब था ।
"कैसे ? "
"यही तो, ....."
" क्या हम नए सिरे से इस पर नहीं सोच सकते ?"
"philosophy ? "
"नहीं ।"
"फ़िर ? "
"यथार्थ, तथ्य के अवलोकन से । "
"तो उसके लिए कहीं कोई शुरुआत तो हमें करना होगी ! "
"हाँ ।"
"कहाँ से ? पूरे समाज को, राष्ट्र को, संसार को प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ? कोई तो सहारा, guiding line, तो ज़रूरी होगी ही ।"
"क्या समाज, राष्ट्र, संसार एक 'तथ्य' है , 'यथार्थ है ? " -उसने पूछा ।
"नहीं है ? "- मैंने हैरत से उसे देखा ।
"नहीं है ।" -उसने शांतिपूर्वक उत्तर दिया ।
" तथ्य, यथार्थ का मन में बना चित्र 'यथार्थ' कभी नहीं होता । और इसलिए मुझे नहीं लगता कि हम समाज या राष्ट्र या संसार के लिए कुछ कर सकते हैं । "
"फ़िर ? "
"क्या हम तथ्य को सीधे नहीं जान सकते ? "
"तथ्य को सीधे ही जाना जा सकता है, 'विचार' के माध्यम से नहीं ! "
"क्या 'विचार' स्वयं भी एक तथ्य नहीं होता ? "
"कभी नहीं, विचार तथ्य का शब्दीकरण भर होता है, जिससे हमें झूठा भरोसा हो जाता है कि हम 'तथ्य' को जानते हैं । "
"फ़िर तुम शास्त्र क्यों पढ़ते हो ? "
"यही तो । शास्त्रों से मुझे स्पष्ट हो जाता है कि कौन से शास्त्र ज्ञानियों के वचन हैं, और कौन से अज्ञानियों और भ्रमित लोगों के । "
"कैसे ? "
वह बहुत देर तक चुप रहा था । क्या वह झूठ बोल रहा था ?
"यदि कोई 'विचार' के उद्गम की खोज करे, तो वह 'बुद्धि' को समझ सकेगा । लेकिन 'बुद्धि' भी न तो तथ्य है, न यथार्थ, यह भी एक उपकरण है । क्या हम स्वाभाविक रूप से ही नहीं जानते कि कभी हमारी बुद्धि काम करती है, और कभी-कभी नहीं भी करती ? यह 'जानना' क्या 'बुद्धि' से होता है ? या 'बुद्धि' ही इस 'जानने' के प्रकाश में अपना काम करती है ?"
"... ... ... "
" इस सीधे, सच्चे 'जानने' को हम 'तथ्य' / यथार्थ क्यों न कहें ? "
" क्या शास्त्रों में इस 'जानने' के बारे में कुछ नहीं कहा गया है ? "
"बहुत कुछ कहा गया है, लेकिन किन शास्त्रों में ? "
आगे रास्ता कहाँ से गुजरेगा, इसका अनुमान मुझे था । आगे हम उस रास्ते से गुज़रे भी थे, लेकिन अभी तो मैं रवि और अविज्नान की विशेषताओं पर कह रहा था ।
अविज्नान बुद्धि की सीमा को समझता था, और उसे लगता था कि बुद्धि के सम्यक् प्रयोग से ही उस सत्य तक पहुंचा जा सकता है, जिसका वर्णन कुछ इने-गिने शास्त्रों में ही है । उसका कहना था कि यदि सत्य हमारे भीतर नहीं है, तो उसे शास्त्रों या किसी अन्य माध्यम से नहीं पाया जा सकता ।
"मतलब ? " -प्रश्न किया था रवि ने ।
"मतलब यह कि हमारी अपनी बुद्धि से यदि सत्य पाया जा सकता है, तो शास्त्र, गुरु, मार्गदर्शक अनावश्यक हैं, और न सिर्फ़ अनावश्यक, बल्कि शायद सत्य के आविष्कार में बाधक भी हो सकते हैं । दूसरी ओर हम यह कैसे तय करेंगे कि सच्चा गुरु, शास्त्र कौन है ? यदि हम इतने सक्षम हैं कि यह तय कर सकें, तो भी गुरु / शास्त्र अनावश्यक हैं । तीसरी बात, हम किसी गुरु या शास्त्र की परीक्षा लेना चाहें भी, और यदि हमें सत्य की प्राप्ति नहीं हुई है, तो उसकी कसौटी हम कैसे तय करेंगे ? और यदि सत्य की प्राप्ति हम कर चुके हैं तो, ..... ... ... ! अन्तिम बात , और ज्यादातर तो यही होता है कि हम इस बहाने से सत्य से पलायन का एक 'सुंदर', 'प्रतिष्ठित' तरीका ज़रूर खोज लेते हैं । "
"लेकिन अगर तुम्हें ख़ुद ही रास्ता निकालना हो तो शास्त्रों के ज्ञान और गुरुओं के अनुभवों का लाभ भी तो मिल सकता है ! " -रवि का तर्क था यह ।
अविज्नान निरुत्तर था । नहीं, निरुत्तर तो नहीं, मौन ज़रूर था । जब संप्रेषनीयता संभव नही रहती तो मौन ही उसका वह उत्तर होता है, जिससे वह अपनी बात कहने की कोशिश करता है । हम ऐसे वक्त मौन हो जाते हैं, और उस मौन में 'विचार' भी ठहरा रहता है । यदि आप इस खूबसूरत एहसास से गुज़रे हैं, तो आपने देखा होगा कि मन की उस शान्ति में कोई ऐसी चीज़ एकाएक 'कौंध' सकती है, जिसे हम अंत:प्रज्ञा या अंतर्दृष्टि कह सकें । और यदि उसके बावजूद बात न भी बने, तो क्या हर्ज़ है ?
अविज्नान के लिए संप्रेषनीयता सबसे अधिक महत्वपूर्ण थी । इसके बाद था संवाद, और यदि संवाद नहीं हो पा रहा, या उसकी ज़रूरत न हो, तो संप्रेषनीयता के लिए जो कुछ भी किया जा सकता है, वह उसे करने से पीछे नहीं हटता था । लेकिन वह उसकी समस्या थी भी नहीं । वह घंटों सबसे अलग अकेला रह सकता था, बिना किसी occupation, involvement, या व्यस्तता के । और रहता भी था । हाँ, भूख, प्यास, सर्दी-गरमी के लिए ज़रूर उसे किसी सहारे की ज़रूरत होती थी । वह हेल्थ-कांशस भी था । लेकिन सिगरेट ? क्या यह विरोधाभास नहीं था ? वह कोई उत्तर नहीं देता था । इस बारे में उसे शायद कोई द्वंद्व नहीं था ।
"अविज्नान, सिगरेट के बारे में कुछ पूछना चाहता हूँ । क्यों पीते हो ? " -मैंने उससे पूछा था ।
"There are so many reasons and causes . " -उसने कहा था ।
"इस पर कभी सोचा नहीं ? "
" हाँ ज़रूर सोचा था । "
" ... ... ... "
"जब मैंने पहली सिगरेट पी थी उस समय मुझे इसका धुँआ, सुगंध अच्छे लगे थे । वास्तव में सिगरेट बनानेवाली कंपनियाँ उसकी टोबैको में ऐसी चीज़ें मिलाती भी हैं । फ़िर मुझे आदत लग गयी । बहुत बाद में ख़याल आया कि मैंने गलती की है । मेरे 'genes' में ही दर-असल 'addiction-susceptibility' थी / है । क्योंकि मेरे माता-पिता दोनों स्मोकिंग करते थे । तो यह तो हुआ एक और कारण । दूसरा ख़ास कारण है , कि मैं छोड़ना नहीं चाहता । "
" क्यों ? " मैंने हैरत से पूछा ।
" क्योंकि मुझे इसमें कोई खराबी नज़र नहीं आती । "
" लेकिन क्या यह स्वास्थ्य के लिए घातक नहीं है ? "
" शायद है । "
"शायद ? "
"हाँ, कई ऐसे लोग हैं , जो हैवी-स्मोकर रहते हुए भी लम्बी आयु तक जिए । "
उसके इस तर्क का मेरे पास कोई जवाब नहीं था ।
"मैं मानता हूँ कि सिगरेट न पीना स्वास्थ्य के लिए ज्यादा ठीक है, लेकिन एक समस्या और भी है, एक बार 'शरीर' सिगरेट का या निकोटीन का आदी हो जाता है, तो छोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है । " - वह बोला ।
"लेकिन अगर आदमी दृढ़ इच्छा-शक्ति से तय कर ले तो ? "
"तो भी नहीं, क्योंकि 'शरीर' निकोटीन की ज़बरदस्त माँग करने लगता है ,और उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती । "
"क्यों ? "
"आपने 'withdrawl-symptoms' के बारे में तो सुना ही होगा ! "
"हाँ, ज़रूर सुना है "
" बस वही एक चीज़ है, जो आदमी को परास्त कर देती है । जब किसी को ड्रग-एडिक्शन हो जाता है, तो इसका कारण सिर्फ़ सतह पर ही नहीं होता । यह इंसान के अवचेतन पर भी असर करता है । मनुष्य के मन का अवचेतन-स्तर, उसके चेतन-स्तर से कई गुना अधिक शक्तिशाली होता है । जब तक उस स्तर पर पहुँचकर एडिक्शन के कारण को नहीं समझा जाता तब तक सतह पर कुछ 'तय' कर लेने का कोई मतलब नहीं है । "
" तो क्या स्मोकिंग या ड्रग को छोड़ने की कोशिश ही न करें ? "
"ज़रूर करें, लेकिन पूरी-पूरी । "
"और तुम्हारे बारे में ? "
"मैं कह चुका हूँ कि अवचेतन तक जाने में मेरी कोई उत्सुकता नहीं, हाँ अगर किसी कारणवश मुझे सिगरेट या टोबैको मिलना बंद हो जाए, तो मुझे कुछ दिनों तक बहुत तकलीफ उठानी पड़ेगी और फ़िर शायद मेरी आदत छूट जाए । "
"शायद क्यों ? "
"क्योंकि मैंने करके नहीं देखा है । "
यह तो कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था ।
"कभी सोचना ! " -मैंने कहा ।
"सवाल यह है की आख़िर कोई टोबैको की आदत में क्यों फँसता है ? क्या उसे समझ लेने पर इस आदत को शुरू होने ही से रोकना क्या बेहतर तरीका नहीं हो सकता ? "
"हाँ उस दिशा में भी मेहनत करना ज़रूरी है, लेकिन जिन्हें आदत हो गयी है, उनके बारे में क्या ? "
"तो इस सवाल को दो स्तरों पर समझना पड़ेगा । पहला यह कि कोई जब इस जाल में फँसता है, तो किन परिस्थितियों में ऐसा होता है । दूसरा यह कि जब कोई इसका आदी हो जाता है, तो उस मूल कारण को अवचेतन से कैसे हटाया जा सकता है, जिसकी वज़ह से अब शरीर भी 'निकोटीन' का अभ्यस्त हो गया है । साधारणतया तो 'शौक' या दोस्तों की देखा-देखी, या कौतूहल, कोरी 'शान' दिखलाने के लिए कोई-कोई सिगरेट पीने लगता है । कोई-कोई 'ट्रॉमा', अवसाद, थकान,से भागने के लिए, ताजगी , एनर्जी, या 'जोश' जगाने के लिए, डिप्रेशन की स्थिति में, कोई-कोई सोचता है कि इससे 'खाना' 'हज़म' होने में मदद मिलेगी, कोई सोचता है कि इससे मुँह का 'जायका' ठीक होता है, तो लोगों की अपनी अपनी दलीलें होतीं हैं, और 'निकोटीन' शरीर में एक ज़बरदस्त हलचल तो पैदा कर ही देता है । यहाँ तक कि कुछ लोग 'रिलैक्स' होने के लिए, या 'मूड' चेंज करने के लिए सिगरेट पीने लगते हैं । तो मैं सोचता हूँ कि बहुत बाद में उस ट्रैक को फ़िर से खोजना बड़ा मुश्किल काम है । फ़िर भी, अगर कोई चाहे तो सही ढंग के 'मेडिटेशन' से इस बुरी लत से निजात पा सकता है । "
"कैसे ? "
"इरादा होना चाहिए, -मेरा मतलब है जिद नहीं, गंभीरता, एक ख़याल होना चाहिए कि क्या मैं इसके बिना नहीं रह सकता ? ख़ुद को टटोलने की ज़रूरत है । मैं इसके बिना क्यों नहीं रह सकता ? तब पता चलेगा कि मैं डरता हूँ, -किसी भी एक या कई बातों से । आत्म-विश्वास की कमी, असफलता का डर, हीन-भावना, इन सब चीज़ों को छिपाने के लिए, नकली आत्म-विश्वास दिखाने के लिए, मैं सिगरेट पी रहा हूँ, या मुझे एक 'सहारा' महसूस होता है सिगरेट पीने में , तो ये सब वज़हें देखनी होंगीं । यदि इन्हें देखे बिना किसी 'दवाई' या 'alternative' तरीके से सिगरेट छोड़ने की कोशिश की जाए, तो वह समस्या कोई दूसरा रूप लेकर बनी रहेगी । आपकी हीन-भावना कहाँ जायेगी ? 'डर' कहाँ जाएगा ? बहुत बाद में 'आदत' रह जाती है, जिसे आदमी देख पाता है, वह उस वज़ह को भूल जाता है जो आदत में तब्दील हो गयी । " क्या उसे फ़िर से खोजकर उसका पता नहीं लगाया जा सकता ?
उसकी विवेचना सुनकर हैरान रह गया । और यह भी समझ में आया कि वह सिगरेट छोड़ने के बारे में ख़ुद गंभीर क्यों नहीं है ।
"तो यह किस किस्म के मेडिटेशन से हो सकेगा ? "
"हाँ, पहले तो आदमी को यह तय करना होगा कि वह इस बुरी लत में फँसा है । फ़िर हो सके तो ठीक-ठीक उस वज़ह का पता लगाना पडेगा जिसकी वज़ह से उसे यह आदत लगी , और फ़िर 'इरादे' के साथ उसके लिए मेहनत करनी होगी । इसका मतलब है कि उसे उस ख़ास वज़ह को दूर करना होगा । क्या यह सारा काम मेडिटेशन नहीं है ? अंग्रेजी में बोलेंगे -
"In a pre-meditated way"
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June 01, 2009

उन दिनों / भूमिका.

भूमिका : /'अविज्नान'
यह मूलतः वही है, जो इस उपन्यास का पहला अध्याय था / होना चाहिए था । किसी अज्ञात तकनीकी त्रुटि के कारण वह हटा दिया गया ।
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"तुम कुछ लिखते हो ? " - मैंने पूछा ।
"हाँ, पहले लिखता था, शुरू में 'रिपोर्टिंग' करता था, फ़िर आलोचना लिखने लगा, फ़िर कविता, और बाद में कहानी भी । एक बुखार है, जो चढ़ता-उतरता रहता था । "
" फ़िर उपन्यास ? "-मैंने चुटकी ली ।
"हो-हो-हो..." -वह हँस पड़ा ।
थोड़ी देर तक हम दोनों चुप बैठे रहे ।
टेबल पर आज का अखबार रखा था , जिस पर उसने अपने दोनों पैर फैला रखे थे । मैं मुस्कुरा रहा था ।
"कुछ याद नहीं आता, अखबार पर नज़र पड़ने पर ?" -मैंने कुरेदा ।
"हाँ, थोड़ा-थोड़ा । उन दिनों हमारे यहाँ संगीत-सभाएँ होतीं थीं । आज भी होतीं हैं, लेकिन चीज़ें बहुत बदल गयी हैं । लड़के-लड़कियाँ डान्स करते थे । 'एक्सटैसी' का चलन था । "
"अच्छा !"
"हाँ, हम सभी 'सुखी' थे । जीवन में उत्तेजनाएँ थीं । 'भारत' था । हमारी संस्कृति का फैलाव हो रहा था । और हम 'युवा' लोग, तंत्र, योग, और पूर्वी संस्कृति के रंगों को अपने जीवन में भर रहे थे । 'मेडिटेशन' और पैरा-साइकोलोजी हमें बहुत आकर्षित करता था । हम इसे विकास समझते थे । "
"क्या लभी ?" -मैंने पूछा ।
"नहीं, मेरे आसपास के लोग , बाकी तो लगभग ज़िंदगी की दौड़ और सपनों में डूबे रहते थे । "
जब वह काफी देर तक कुछ नहीं बोला तो मैंने ही पूछा,
"तो क्या वह विकास नहीं था ?"
"था, लेकिन नहीं था । " एक बार फ़िर वह चुप हो रहा ।
"क्यों ? "
"देखिये हमारी सारी उठापटक उसी दायरे के भीतर थी । -divisive, बुद्धिपरक, intellectual ."
" analytical ? "
"हाँ , फ़िर ओरोबिन्दो थे , 'समन्वय-दर्शन' था, लेकिन वह, ... " उसने पुन: मौन धारण कर लिया था ।
"अच्छा, यह बतलाओ कि जब कहीं कुछ न था, न ज़ेन, न ताओ, न स्पिरिचुअल हीलिंग, तो फ़िर वह क्या था जिसके पीछे तुम पागल थे ?"
"मीनिंग !, मीनिंग इन दि लाइफ, यह बात हमें कौंधती थी । "
"क्या 'सामाजिक, राजनीतिक यथार्थ' तुम्हें आंदोलित नहीं करता था ?"
उसने संदेह की दृष्टि से मुझे देखा । फ़िर बोला,
"नहीं, हम, या कहूँ कि 'मैं' 'यथार्थ' के यथार्थ के बारे में सोचता था । "
उसने मुझे भी मौन कर दिया था ।
"फ़िर ? "
"फ़िर क्या , मैंने महसूस किया कि , 'something is basically wrong with us.' और मैं खोजने-समझने की कोशिश करने लगा । "
"भारत में ? "
"हाँ, भारत में , और भारत से बाहर भी । "
"कहाँ ?"
"साहित्य में नहीं ।" -उसने दो टूक जवाब दिया ।
"फ़िर कहाँ ?"
"अध्यात्म/दर्शन/धर्म/आदि में भी नहीं । विज्ञान/मनोविज्ञान/इतिहास/में भी नहीं । "
"?"
"उन दिनों मैंने जे. कृष्णमूर्ति का नाम ही सुना था, और मुझे लगा कि हमारे साथ मूलतः क्या ग़लत है । "
मैं इंतज़ार करने लगा । थोड़ी देर के मौन के बाद उसने कहा,
" conditioning of the human consciousness . मैं मानता हूँ कि कृष्णमूर्ति ने मेरे जीवन का एक बिल्कुल नया पन्ना खोला । मैं नहीं समझ पाया कि अब तक किसी ने इस बारे में क्यों कुछ नहीं कहा !"
वह फ़िर एक बार मौन हो गया ।
"हम 'कविता' के बारे में बातें करें ?" -उसने प्रस्ताव रखा । शायद वह विषयांतर करना चाह रहा था ।
"काव्य-विमर्श ?" -मैंने पूछा । शायद उसने मेरे चेहरे की मुस्कान पढ़ ली थी । वह भी मुस्कुराने से ख़ुद को रोक नहीं सका ।
"जी । "
"कहाँ से शुरू करें ? "
"मुझे लगता है कि कविता मूलतः अनुभूति और अभिव्यक्ति का जोड़ होती है । अनुभूति किसी जीव में या किसी चेतन में ही घटित होती है । जड़ या निर्जीव वस्तुएँ अनुभूति नहीं कर सकतीं । और उनके द्वारा अभिव्यक्ति किए जाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता । "
मैं सुन रहा था ।
वह मुस्कुराने लगा ।
"आपने मेरी बात मान ली ? " -उसने पूछा ।
"नहीं तो !" -मैंने उत्तर दिया ।
"वही तो, मुझे उम्मीद थी कि आप असहमत होते हुए भी धैर्यपूर्वक सुनेंगे । लेकिन मैंने अभी-अभी जो कहा, वह मेरी उस समय की समझ थी, जब मैंने कुछ लिखना आदि बस शुरू ही किया था ।
"फ़िर ?"
"अब मैं कह सकता हूँ कि जिन्हें मैं 'निर्जीव' अथवा 'जड़' वस्तुएं कहता हूँ, उनकी 'अनुभव-क्षमता' के बारे में मैं कैसे कुछ कह सकता हूँ ? मेरे पास इसका भी कोई प्रमाण नहीं है , कि उनमें अनुभूति क्षमता होती ही नहीं ! "
"क्यों ?"
"क्योंकि हमें यह भी कहाँ पता है कि सजीव और निर्जीव के विभाजन का आधार क्या हो ?"
"हम व्नुभूति की बात कर रहे थे । " मैंने दिशा बदली ।
"हाँ । अनुभूति के लिए एक 'अंतःकरण' का होना आवश्यक है । 'अन्तःकरण' के अभाव में अनुभूति कैसे संभव होगी ? "
"और 'अंतःकरण' तो किसी सजीव वस्तु में ही हो सकता है । "
"हम अंतःकरण' किसे कहेंगे ? "
"अंतःकरण अर्थात् हृदय या मस्तिष्क की वह क्षमता (faculty) , जिससे अपने आस-पास की अन्य वस्तुओं के बारे में कोई कल्पना या प्रतीति / विचार ग्रहण किया जाता है । यह शब्द-गत हो सकता है, या भावगत / अमूर्त्त हो सकता है । यह किसी स्मृति या चित्र /छवि के रूप में भी 'अंतःकरण' में 'स्थिर', जमा / दर्ज हो सकता है । तब इसे अनुभूति कहेंगे । "
" क्या बोध-क्षमता (aware-ness) और अनुभूति-क्षमता एक ही वस्तु है ? "
"ज़ाहिर है कि वे दोनों बहुत अलग-अलग चीज़ें होती हैं । अनुभूति होने के लिए बोध-क्षमता का होना आवश्यक है, बोध-क्षमता न हो तो अनुभूति होने की कोई संभावना नही बनती ।
"और "
"अनुभूति आने-जानेवाली, बदलते-रहनेवाली वस्तु होती है, जो बोध-क्षमता के होने पर बनती-मिटती रहती है । " और "
"दूसरी तरफ़ बोध-क्षमता एक स्वाभाविक वस्तु है, -मेरा मतलब है एक 'स्वतंत्र-सत्ता', जो अपने अस्तित्व के लिए किसी और पर अवलंबित नहीं होती । "
" जीवन पर भी नहीं ? "
"हाँ, लेकिन क्या जीवन और बोध-क्षमता क्या दो अलग-अलग चीज़ें होतीं है ? जहाँ जीवन है, वहाँ बोध-क्षमता अनिवार्य रूप से विद्यमान होगी, और जहाँ बोध-क्षमता है, वहाँ जीवन भी अनिवार्यत: होगा ही ।"
"क्या पेड़-पौधों को इस आधार पर जीवित कह सकते हैं ?"
"इसीलिये मैंने कहा था कि 'सजीव' और 'निर्जीव' के बीच विभाजन करने का कोई आधार हमारे पास है ही कहाँ ?"
"अच्छा, क्या इस बोध-क्षमता को जागृत किया जा सकता है ? "
"नहीं । "
"फ़िर ? "
इसका आविष्कार ज़रूर हो सकता / होता है । "
"मतलब ? "
"यह कोई आने-जानेवाली, प्रकट या विलुप्त होनेवाली चीज़ तो नहीं है ! लेकिन यह 'है' भर । हाँ यदि कोई गंभीर और इसके प्रति उत्कंठित हो, तो इसकी स्वाभाविक पूर्व-अवस्थिति (pre-existence) के प्रति ज़रूर 'जाग' सकता है ।"
" 'कोई' -मतलब ? "
"कोई 'मन', कोई अंतःकरण, कोई चेतना, ... ! "
"और 'विचार' ? "
" 'विचार', -जैसा कि मैंने कहा, अनुभूति है । 'विचार' को भी दो दृष्टियों से समझा जा सकता है । एक तो वह जिसे अभिव्यक्ति या भाषागत शब्द-विन्यास के रूप में प्रयुक्त किया जाता है , वह किसी तात्पर्य को इंगित तो करता है, लेकिन 'बोध-क्षमता' नहीं होता । दूसरी ओर, बोध-क्षमता के प्रकाश में देखे गए 'सत्य' को प्रकट करने के लिए भी एक शब्द-विन्यास इस्तेमाल किया जा सकता है, और यह अलग बात है कि वह सफलतापूर्वक 'सत्य' को संप्रेषित कर पाटा है या नहीं, क्योंकि संप्रेषण की सफलता कई बातों पर निर्भर होती है । इसलिये यह भी स्पष्ट ही है कि ऐसे किसी 'विचार' को सार्थक होने हेतु सबसे ज़रूरी चीज़ होती है, -संप्रेषनीयता । "
"लेकिन संप्रेषनीयता तो अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करने और किसी दूसरे मनुष्य की अभिव्यक्ति को यथावत ग्रहण कर सकने के लिए भी उतनी ही ज़रूरी होती है । "
"हाँ, होती तो है, लेकिन इसे मैं एक उदाहरण से समझाना चाहूँगा । क्या आपको कभी मेरी याद आती है ? "
"हाँ, कभी-कभी आती है । "
"कभी-कभी क्यों ? "
"जैसे अन्य लोगों की, घटनाओं की, वस्तुओं , स्थितियों, आदि की याद कभी-कभी आती है, उस तरह से । "
"अच्छा, आप मेरे बारे में सोचते हैं ? "
"हाँ, ज़रूर सोचता हूँ । " -कहकर मैं मुस्कुराने लगा था ।
"ग़लत ! आप मेरे बारे में कभी कुछ नहीं सोचते, और न सोच ही सकते हैं, और सच तो यह भी है की मैं भी आपके बारे में कुछ भी नहीं सोचता । "
मैं मौन था, वह भी मौन हो गया था ।
"आगे कहो ! " -मैंने ही मौन तोड़ा ।
"पहले बतलाइये कि मेरे वक्तव्य से आप सहमत हैं या असहमत ?"
"सहमत हूँ । "
"ठीक है, अर्थात् आप 'मेरे' बारे में नहीं, बल्कि मेरे विषय में जो जानकारी, कल्पनाएँ, आदि आपके पास हैं, और उनके आधार पर आपने मेरी जो प्रतिमा अपने मन में बना रखी है, उस प्रतिमा के बारे में सोचते हैं, -न कि जो मैं वास्तव में हूँ, उस बारे में ! और इसी प्रकार हम सभी एक दूसरे की स्मृतियों, कल्पनाओं आदि से बनी एक-दूसरे की प्रतिमा के बारे में अनुमान लगाते हैं, उन प्रतिमाओं को निरंतर बदलते, संशोधित करते रहते हैं । "
"ठीक है । संप्रेषनीयता के बारे में क्या कहोगे ? " -मैंने प्रश्न किया ।
" तात्पर्य यह हुआ कि किन्हीं भी दो मनुष्यों की अनुभूतियों , विचारों, कल्पनाओं, स्मृतियों, आदि से उनके द्वारा निर्मित की जानेवाली जगत्-प्रतिमाएँ परस्पर बिल्कुल भिन्न होती हैं । "
" ठीक है । "
" अतः अनुभूति की अभिव्यक्ति जिस शैली, विन्यास, माध्यम आदि से की जा रही है, और उसे जिस शैली, विन्यास और माध्यम में ग्रहण किया जा रहा है, यदि उनमें समरूपता नहीं है तो संप्रेषनीयता बाधित होगी । "
अब कविता के बारे में बातें करने हेतु आधार-भूमि तैयार हो चुकी थी ।
"कविता, -जैसा कि मैंने शुरू में कहा था, अनुभूति और अभिव्यक्ति का जोड़ होती है । "
" क्या कविता के लिए कोई श्रोता या पाठक हो, यह ज़रूरी होता है ? "
"मुझे लगता है , वैसे तो कविता अपने-आप में ही एक अद्भुत 'सृष्टि' होती है, -जैसे बहुत बड़े सरोवर में खिला अकेला कमल, लेकिन यदि प्रशंसक उस के सौन्दर्य को अनुभव कर सकता है, परख सकता है, तो उस कमल-पुष्प से उसका 'संवाद' स्थापित हो जाता है ।"
"शायद इसे ही तुम संप्रेषनीयता कहोगे ?"
"जी । "
"अब हम कथ्य पर आएं । "
"कविता में कथ्य तो होता ही है, कथा न हो तो भी चलेगा । कथ्य तो अपरिहार्यतः होता ही है । उसके अभाव में तथ्य अनुभूति तक सिमटकर रह जाएगा, वह संवाद तक न पहुँच सकेगा । "
"और कथ्य ? "
"हाँ, कथ्य के ही बारे में कहने जा रहा हूँ । कथ्य ही अभिव्यक्ति की शैली, विन्यास, माध्यम आदि तय करेगा । "
"जैसे ? "
"जैसे अपनी अनुभूति को मैंने मान लीजिये कि एक कविता के रूप में प्रस्तुत किया, तो मेरी अनुभूति की विशेषताओं के अनुसार वह गहन, उथली, स्तरीय, या अधकचरी बन जायेगी । इसलिए जैसा मैंने कहा, कविता तो अपने-आप में एक अद्भुत सृष्टि होती है । और कोई वस्तु कभी 'अकेली' ही अद्भुत कैसे हो सकती है ? उसे अद्भुत समझने-कहनेवाला कोई होगा तभी तो वह अद्भुत होगी ! "
"इसे दूसरे ढंग से समझाओ । "
" एक पेंटिंग का उदाहरण लें । चित्रकार अपने द्वारा तय किए गए प्रतिमानों, आदि से पेंटिंग का विशिष्ट भाव और प्रभाव सुनिश्चित करता है । एक रेखा या बिन्दु का विन्यास, रंग का शेड, माध्यम, जल-तैल, या अन्य कोई, एक्रिलिक या ऑइल, आदि यह तय करता है कि वह पेंटिंग में जो कुछ अभिव्यक्त करना चाह रहा था वह किस हद तक वैसा हो पाया है । यहाँ तक कि कैनवस का आकार भी महत्वपूर्ण होता है । किस समय और किस प्रकाश में उसे देखा जाए, इसका भी फर्क पड़ता है । लेकिन यदि 'सम्प्रेषनीयता' नहीं है, या दर्शक नहीं है, तो वह पेंटिंग चित्रकार की नज़रों में भले ही बहुत अद्भुत हो, 'अद्भुत' प्रमाणित नहीं होती । "
" लेकिन फ़िर भी शायद वह 'स्वान्तः-सुखाय' तो हो ही सकती है । "
"हाँ, कवि या कलाकार अपनी सृष्टि को अपनी कल्पना की सर्वोत्तम प्रस्तुति के रूप में देखकर एक गहन आत्म-संतुष्टि ज़रूर अनुभव करता होगा । "
अभी हमें इस बारे में बहुत सी बातें करनी थीं । मसलन, समयगत और समय से अछूती कविता, कविता और बौद्धिकता, कविता और आदर्शवाद, कविता और यथार्थवाद, कविता और प्रतिबद्धता, ... आदि-आदि । लेकिन मैं यह ज़रूर सोचने लगा था कि जे . कृष्णमूर्ति पर बात करते-करते वह मुझे यहाँ क्यों ले आया था !
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May 24, 2009

उन दिनों / 22

उन दिनों - 22
आज लंच के बाद हम अपने-अपने में, -व्यक्तिगत कार्यों में व्यस्त थे । बाई के न आने से भोजन रवि ने बनाया था, अविज्नान ने सहयोग ज़रूर दिया था । खाने के बाद अविज्नान ने ही लंच का टेबल साफ़ किया था खाना 'सर्व' भी उसी ने किया था , सर ने और मैंने पहले खाना खाया था, फ़िर उन दोनों ने । इस बारे में सारी 'प्लानिंग' उन दोनों ने कर रखी थी । कभी-कभी ऐसा भी होता है । खाने के बाद हम तो आराम करते रहे, उन दोनों ने किचन साफ़ किया, बर्तन धोये, और फ़िर दोनों चुप ड्राइंग-रूम में बैठे रहे।
शाम साढ़े चार बजे चाय तैयार थी ।
आज मैं सोच रहा था की अविज्नान के उस दिन के क्रम को आगे बढ़ाया जाए ।
चर्चा की शुरुआत मैंने ही की थी ।
"अविज्नान कहता है कि जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, -'आत्म-ज्ञान' । उससे बढ़कर महत्वपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता । "-क्यों अविज्नान ? " -मैंने उसकी ओर देखकर अपने वाक्य की पुष्टि चाही ।
"हाँ, " -वह सकुचाकर बोला ।
"दर-असल इस शब्द के इर्द-गिर्द इतना कुहासा है कि मैं किसी से भी बातचीत करते समय कभी-कभी ही, और बिरले ही इस शब्द का इस्तेमाल करता हूँ ।" -वह आगे बोला ।
"क्यों ? "
"देखिये इसे इस्तेमाल करने भर से, यह सचमुच क्या चीज़ है, इसका कोई आभास, या अनुमान तक हमें हो पाता है ? "
"मतलब ? "
"मतलब यही कि जब हम आत्मा परमात्मा, मुक्ति, आदि शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं, तो हम उनके बारे में अपनी 'कल्पनाओं' के ही बारे में कुछ इस तसल्ली के साथ बोलते हैं, जैसे हमने उन्हें सचमुच 'अनुभव' किया हो । वे सिर्फ़ सुनी सुनाई बातें होतीं हैं, जैसे साधारण बातचीत में हम अपनी परिचित कुछ चीज़ों के बारे में बोलते हैं, उदाहरण के लिए जब हम भौतिक चीज़ों के बारे में, स्थानों और लोगों के बारे में बोलते हैं, राजनीतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक, आदि 'गतिविधियों' के बारे में बोलते हैं, तब उस भौतिक 'वस्तु' अथवा 'गतिविधि' के बारे में हमें उसके 'मूर्त्त' या 'अमूर्त्त'-रूप में सुनिश्चित पता होता है । सारा 'विज्ञान' इसी का विकास है । विज्ञान, गणित, मेडिकल-साइंस, आदि । ऐसा ही व्यक्तियों के संबंध में भी सच है । जैसे मैं 'सर' के बारे में 'कुछ' ऐसा जानता हूँ जिसका मुझे अनुभव भी है, और जिसकी पुष्टि भी लगातार, अनायास होती रहती है । क्या हम आत्मा या परमात्मा, भगवान आदि के बारे में ऐसा कुछ सचमुच जानते हैं ? यदि नहीं जानते तो उन शब्दों को इस्तेमाल करने से यही होता है कि हमें 'वहम' हो जाता है कि हमने उन्हें 'अनुभव' किया है । फ़िर भी उनके बारे में हमारा 'अनिश्चय' भीतर ही भीतर कुलबुलाता रहता है । क्या यह 'अनिश्चय' मूलत: हमारे उनसे 'अपरिचय' का ही द्योतक नहीं होता ? इसी प्रकार, लोगों की आकृति, कद, स्वभाव रंग-रूप आदि से हम उनकी एक 'इमेज' बना लेते हैं, और सोचने लगते हैं कि हम उन्हें 'जानते' हैं । और इसी प्रकार हर व्यक्ति अन्य वस्तुओं, जीवों, आदि की एक 'इमेज' अपने मस्तिष्क में बना रखता है , और इसे वह 'परिचय' या 'पहचान' कहता है । क्या हम 'आत्मा' या 'परमात्मा' के बारे में ऐसा कुछ 'जानते' हैं, जिससे उनकी कोई 'पहचान' अपने मस्तिष्क में बनती हो ? ज़ाहिर है इसलिए आत्मा या परमात्मा की सारी बातें 'संदेह' के दायरे में होती हैं । फ़िर उन शब्दों का इस्तेमाल फायदे की जगह नुक्सान ही ज़्यादा करता है , क्योंकि तब हम 'वहम' में ही जीते रहने के आदी हो जाते हैं । हमें पता ही नहीं होता कि जिस बारे में हम इत्मीनान से, या उग्रतापूर्वक, आवेश के साथ, आग्रहपूर्वक बोल रहे हैं, वह हमारे ख्यालों के अलावा कहीं है ही नहीं । इसलिए मैं इसे दूसरे ढंग से कहना चाहता हूँ । जब मैं स्वयं अपने बारे में विचार करता हूँ, कि मैं क्या हूँ ?, -या मैं फलाँ-फलाँ हूँ, यह मेरा समाज है, ये मेरे नाते-रिश्ते हैं, मेरा राष्ट्र-भाषा आदि हैं, तो इसे क्या कहा जाए ? " - कहकर वह चुप हो गया ।
हम सभी चुप थे । दो मिनट तक सन्नाटा छाया रहा । बाहर सूरज की रौशनी धीमी पड़ने लगी थी । सूर्यास्त होने जा रहा था । मेरे घर की पूर्वाभिमुखता के कारण धूप बस सामने डी आर पी लाइन के उस पुराने खँडहर हो रहे बंगले पर ही थी, जो इस कमरे की खिड़की से दिखाई देता है ।
"मैं अपने-आप को जानता हूँ , ऐसा हम समझते हैं । लेकिन जैसे हम दूसरी हज़ार चीज़ों को जानते हैं, क्या उसी तरह से ? शायद हाँ । हम 'अपने' बारे में 'अपनी' एक 'इमेज' बना लेते हैं, जिसे हम ज़रूर जानते भी हैं । फ़िर हम कभी-कभी सोचते हैं, मुझे 'बदलना' होगा, मुझे ज़्यादा होशियार होना चाहिए, मुझे 'भला' या चालाक होना चाहिए, मुझे धनवान होना चाहिए, मुझे आगे बढ़ना है, मैं कमज़ोर हूँ, मुझे ताकतवर होना होगा । सवाल यह है, कि यह मैं अपने बारे में जानता हूँ, या 'मेरे' बारे में 'मस्तिष्क' ने जानकारियों के आधार पर जो एक प्रतिमा मेरी बना रखी है, उस प्रतिमा के बारे में जानता हूँ ? यह 'जानना' क्या है ? क्या जानकारी होना, सूचना होना ही 'जानना' /ज्ञान है ? यदि मेरे मस्तिष्क में 'अपने' बारे में कोई सूचना न हो, तो क्या मैं 'अपने' को नहीं जानता ? क्या वैसा 'जानना' बाहर से सीखा जाता है ? मुझे भूख लगती है, प्यास लगती है, इन्हें भी तो मैं जानता हूँ । हो सकता है कि मुझे भाषा न आती हो, क्या भाषा न आने से मेरा 'जानना' बाधित हो जाता है ? तो क्या मैं बिना 'अपनी' 'प्रतिमा' का सहारा लिए भी अपने को नहीं जानता ? क्या मेरा वह जानना वैसा ही जानना है, जैसे मैं दूसरी हजारों बातें, चीज़ें आदि जानता हूँ ? "
किसी ने इस पर कोई प्रतिक्रया नहीं दी । एक जर्मन / यूरोपीय व्यक्ति की इतनी साफ़-सुथरी हिन्दी सुनना भी अपने-आपमें ही वैसे भी एक अद्भुत अनुभव था, फ़िर वह जितनी सरलता से अपनी बात रखता था उसका वह तरीका भी कम दिलचस्प नहीं होता था ।
"पहले तो हमें 'जानने' का ठीक-ठीक अर्थ हमारी दृष्टि में क्या है, हमें इस पर ध्यान देना होगा । 'जानने' को हम सिर्फ़ 'जानकारी'-मात्र समझते हैं । -'सूचनाओं' का संग्रह कर लेना ही हमें 'जानना' प्रतीत होता है । यदि वैसा ही हो, तो एक मनुष्य तथा एक कम्प्युटर में क्या फर्क रह जाता है ? " -कहकर वह कुछ क्षणों तक चुप हो रहा ।
हम सब बस सुन रहे थे ।
"बेहतर हो कि हम इस चर्चा में सक्रीय भागीदारी करें । " -उसने अनुरोध किया । हम सभी राजी थे । राजी ही नहीं, बल्कि उसके अनुरोध से पहले ही से कर भी रहे थे क्योंकि हममें से किसी में उसकी बात के प्रति कोई प्रतिरोध या विरोध तक नही था । हममें कोई पूर्वाग्रह नहीथे । लेकिन उसमें ही थोडा संकोच था । निश्चित ही कहने के लिए उसके पास कुछ दुर्लभ वस्तु थी । हम उसके संकेत समझ रहे थे , हम खुले हृदय से उस चर्चा में शामिल थे, लेकिन वह इस बारे में आश्वस्त होना चाहता था ।
"जानना और जानना, " -उसने कहा -
"केवल जानना और 'कुछ' जानना, क्या इन दोनों में कोई फर्क नहीं होता ?"
वह पुन: कुछ पलों के लिए खामोश हो गया ।
"देखिये हम सामान्यत: इस 'जानना' शब्द का इस्तेमाल भी बहुत लापरवाही से करते हैं, और इसलिए यह तक ख़याल नहीं आता कि इसका वास्तविक मतलब तलाश लें । हम समझते हैं कि 'जानना', सूचनाओं को इकट्ठा करना ही ज्ञान है । हम समझ बैठते हैं कि 'भगवान' या 'आत्मा'-'परमात्मा' आदि का ज्ञान भी हम किताबों से पढ़कर 'प्राप्त' कर लेंगे । और हमें अपनी इस बुनियादी भूल का पता शायद ही कभी चल पाता है । "
"एक तो जानकारी होती है, अर्थात् 'सूचना', 'information' , जो कि मेरे द्वारा ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण किए गए तथ्यों का जोड़ होता है, -और वह भी 'तथ्यों' का नहीं, बल्कि उनकी जो 'प्रतिमा' मेरा मन बनाता है, उन प्रतिमाओं का जोड़-भरहोता है । इसे थोडा और भी सावधानी से समझें । उदाहरण के लिए हम देख रहे हैं कि सूर्यास्त हो रहा है शाम की रौशनी कुछ ही मिनटों में विलीन हो जायेगी । यह सूर्यास्त, सुबह होना, शाम होना एक तथ्य है । यह 'घटना' और घटनाओं की समष्टि भी है । लेकिन इसे अपने इन्द्रिय-ज्ञान के माध्यम से हम जानते हैं, -हमें 'पता' चलता है । क्या यह 'पता' चलना 'सूचना' या 'जानकारी' होता है ?"
हमारा मौन रहकर ध्यानमग्न होकर उसे सुनना ही उस चर्चा में हमारा सहयोग था । यदि उसके प्रश्नों पर कब उत्तर देना है, और कब चुप रहकर 'जिज्ञासा' का प्रदर्शन करना है, यह हमें न पता होता तो शायद वह बोलना ही बंद कर देता ।
"यह नि:शब्द ज्ञान क्या एक स्वाभाविक स्थिति नहीं है ? वहाँ 'तथ्य' है, लेकिन तथ्य का शब्दीकरण नहीं है । क्या तथ्य में शब्द है ? यह ज़ाहिर सी बात है कि 'तथ्य' और तथ्य को इन्द्रियों से जानना, दोनों ही नि:शब्द यथार्थ हैं । इसके बाद यदि हम नि:शब्द ही रहते हैं, तो एक असाधारण गतिविधि का पता चलता है, -शायद इसे मैं 'ध्यान' कह सकता हूँ, और यह 'ध्यान' 'किया' नहीं जा सकता । इसे तो 'खोजना' होता है । यह अत्यन्त स्वाभाविक होता है, -इतना स्वाभाविक, कि अगर मस्तिष्क या स्मृति हस्तक्षेप न करे, तो इसे अनायास देखा, महसूस किया जाता है । यह कोई रोमांच या उत्तेजना नहीं है, यह सुख, दु:ख, या उद्विग्नता नहीं है, विस्मरण या नशा नहीं है, मूर्च्छा या उन्माद नहीं है, -यह बस 'है' । है भर । और इसे जानना भी, बस 'है' भर ! 'जानना' ही 'है' है, और 'है' ही है जानना । क्या इसे हम ध्यान कह सकते हैं ? "
हम सब प्रशंसा भरी नज़रों से, मुग्ध-भाव से उसे देख रहे थे । ज़रूरी नहीं कि हमारी नज़रें उसके चेहरे पर ही रही हों, हालाँकि बीच-बीच में उससे हमारी नज़रें मिल भी जातीं थी, लेकिन हम 'सुन' अधिक रहे थे । यह 'सुनना' भी तो 'ध्यान' ही था । चित्त एक सहज-स्वाभाविक नि:शब्दता में उतर आया था , जहाँ से 'विचार' अपने सारे लाव-लश्कर सहित 'विदा' हो चुका था । अविज्नान का मौन हम सबको संक्रमित कर चुका था । लेकिन, क्या यह 'मौन' उसका व्यक्तिगत 'मौन' था ? क्या वह 'मौन' से पृथक् था, और क्या हम लोग, उस 'मौन' से पृथक्, 'विशेष'-कोई व्यक्ति रह गए थे ? लेकिन यह सब उस समय नहीं सोचा जा रहा था, -यह सब तो अब लिख रहा हूँ । अब शब्द दे रहा हूँ ।
"तो इस 'जाननेके बाद एक 'जानना' और भी होता है, जहाँ 'काल' और 'स्थान' है, इस शुद्ध जानने में क्या 'काल' व स्थान कहीं हैं ? क्या 'काल-स्थान' का इस नि:शब्द 'जानने' से कोई लेना-देना है ? 'जानना एक बिल्कुल स्वाभाविक चीज़ है, जबकि 'अनुभव' एक 'तथ्य', जो 'जानने' के ही अर्न्तगत होता है , 'जानने' पर ही अवलंबित भी होता है, न कि उससे स्वतंत्र । लेकिन 'अनुभव' ही बाद में 'निष्कर्ष' बन जाता है । तथाकथित 'वैज्ञानिक' या 'अवैज्ञानिक' रूप ले लेता है । लेकिन क्या अनुभव स्वयं भी , 'जानने' की ही एक गतिविधि नहीं होता ? 'निष्कर्ष' के जन्म के साथ अनुभवों में 'क्रम' और भेद/भिन्नता तय होने लगती है , -वे सुखद, दु:खद, कटु, मधुर, तिक्त, क्षोभकारी, भयावने, या आशा-भरे, होने लगते हैं । क्या इन 'अनुभवों' में, जो कि 'जानने'-मात्र के ही अलग-अलग प्रकार भर हैं, सचमुच कोई अनुभवकर्ता कहीं होता भी है ? क्या यह 'अनुभवकर्त्ता' भी इस 'निष्कर्ष' के बाद का ही एक और अनुमान-मात्र ही नहीं होता ? क्या कहेंगे आप ?"
वह प्रश्न कर रहा था लेकिन हममें से कोई भी अक्षरशः कुछ भी नहीं सोच रहा था । और उसके प्रश्न में किसी उत्तर की कोई अपेक्षा कदापि नहीं थी । यह वाकई 'मौन'-संवाद था । और यदि हम भूले से भी कोई उत्तर दे देते तो वह अद्भुत मौन-संवाद वहीं रुक जाता ।
"हम इसे और विस्तार दें । इस 'जानने' में काल-स्थान रूपी, या किसी अन्य प्रकार का, जड़-चेतन आदि का, या 'मैं'-तुम'-वह' रूपी कोई विभाजन कहीं नहीं पाया जाता । यह बस 'है'-भर । और 'जानना' ही है, -'है', तथा 'है' ही है -जानना । वे एक ही सत्य के दो पहलू हैं । -हमारी भाषा की सुविधा के लिए । लेकिन 'दो पहलू' कहते ही 'विभाजन' अनचाहे ही बीच में आ टपकता है । है न ?"
अतएव 'जानना' और 'जानना' दो बिल्कुल अलग चीज़ें होती हैं, लेकिन हमारी लापरवाही से हमने दोनों को आपस में गड्ड-मड्ड हो जाने दिया है । इसके बाद आता है, निष्कर्ष और अनुमान । अनुभवों के संग्रह की 'फाइल' बना ली जाती है, उस 'फाइल' का नामकरण कर दिया जाता है । अनुभवों को सुखद, दु:खद, अच्छा, बुरा, गहरा, उथला, उत्तेजक, रोमांचक, रोचक आदि शब्द देकर 'जानकारी' का रूप दे दिया जाता है । यह होता है अनुभवों का कब्रिस्तान जहाँ हर कब्र पर एक 'पत्थर' (tomb-stone) होता है । 'विचार' हर अनुभव पर जाकर फूल चढाता है, 'अकीदत' पेश करता है, और 'अनुभवी' व्यक्ति को हम बहुत सम्मान देने लगते हैं । "
अविज्नान की भाषा में थोडा साहित्यिक 'पुट' आ गया था । इससे वातावरण और भी उत्फुल्ल हो उठा । उस मौन में आनंद की लहर तैर गयी थी ।
"शुरुआत यहीं से होती है , इसे देख लेना शायद उतना मुश्किल नहीं है जितना कि सत्य या धर्म के ठेकेदारों ने इसे बना रखा है । और यह बहुत आसान है, ऐसा कहना भी शायद ग़लत होगा । यह आसान है, या मुश्किल, इस बारे में अपना-अपना सोच हो सकता है , लेकिन इसमें संदेह नहीं कि यही 'आत्म-ज्ञान' है । "
चर्चा, जो अविज्नान के भाषण (?) में सिमट आई थी, उस दिन वहीं समाप्त हो गयी थी ।
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May 22, 2009

उन दिनों / 21

उन दिनों - 21 .
अगले दिन वह कुछ हलके मूड में था । कुछ बोलने की स्थिति में आ चुका था, जबकि दूसरी ओर मैं कुछ-कुछ मौन मन:स्थिति में जा रहा था ।
"आपसे पुरी के सागर-तट की मुलाक़ात के बाद मैं भारत में अनेक स्थानों पर घूमता रहा । उसी दौरान उज्जैन भी जा पहुँचा था, उज्जैन से इंदौर भी जाना हुआ था , क्योंकि मुझे ओंकारेश्वर जाना था । उज्जैन से इंदौर जाते समय, शिप्रा नदी पर एक पुल बना है, जहाँ कोई दूसरी नदी उससे मिलती है । इस दौरान मैं उस पुल पर से गुज़रा, जहाँ संगम पर 'नवग्रह-मन्दिर' है, तो मुझे अचानक नवलक-तंत्र की याद आ गयी । आपके अलावा किसी और ने भी मुझे उस पुल के बारे में बतलाया था । "
"मैंने ?"
"नहीं, शायद किसी दूसरे ने ही कहा होगा, " - वह बोला ।
"लेकिन जब उस पुल पर से मैं गुजरा, तो एक अद्भुत दृश्य देखा । उस पुल पर से मैंने देखा कि एक और बहुत नीचा पुल भी थोड़ी दूरी पर उसी नदी पर बाईं दिशा में भी है, और मेरी दायीं ओर जिस पुल से मैं गुज़र रहा था, उससे लगी हुई सीढियाँ नीचे जिस रास्ते पर पहुँच रहीं थीं, वह पुल के समानान्तर जाकर 'संगम' तक जाता था जहाँ नवग्रह-मन्दिर है । उन सीढियों से उतरते हुए मुझे याद आ रहा था कि जब आपसे मैंने पुरी के समुद्र-तट पर 'सेतु-सोपान-सूत्र' की चर्चा की थी, तो आपने मुझे यह नहीं बतलाया कि ऐसी ही संरचना उज्जैन में है ! तब मैंने आपसे इतना ही कहा था कि आपसे मेरी एक मुलाक़ात और होनी है । जिस व्यक्ति ने आपसे मेरी पहली उस सागर-तट वाली मुलाक़ात के स्थान और समय की अचूक भविष्यवाणी की थी, उसने ही मुझे यह भी बतलाया था । मैंने सोचा भी था कि उज्जैन में आपका पता लगाऊँ, किसी से पूछा भी था, पर तब मेरी आपसे मुलाक़ात न हो पाना भी शायद तय ही था, क्योंकि आपसे पुरी-तट पर होनेवाली मुलाक़ात की भविष्यवाणी करनेवाले ने ही मुझसे यह भी कहा था कि आपसे मेरी एक मुलाक़ात किसी पहाडी तीर्थ-स्थल पर होगी, जहाँ मेरा 'कार्मिक-बैलेंस' शून्य हो जाएगा । यह सब मुझे नवग्रह-मन्दिर के परिसर में तथा शिप्रा-तट की ओर जाते हुए भी याद आया था । 'तब तक तुम भटकते रहोगे।' - मेरे चित्त की अशांत स्थिति को इंगित करते हुए, उसने यह भी बतलाया था ।"
उस पुल से गुज़रते समय मुझे अपना पूर्व-जन्म याद हो आया था । नवग्रह-मन्दिर में एक बड़ा सा वटवृक्ष है, जिसके चारों ओर गोल चबूतरा बना दिया गया है । उस चबूतरे पर बैठकर ध्यान करते समय मुझे सब स्पष्ट हो सका । "
"लेकिन तुम तो कहते हो कि तुम्हें अपने कई पूर्व-जन्मों के बारे में काफी-कुछ स्मरण है ?"
"हाँ, लेकिन उस पुल से गुज़रते हुए, और उस बरगद के वृक्ष के तले बैठकर ध्यान करते समय जो 'स्मरण' मेरे मन में कार्यशील था, वह मेरा बिल्कुल आख़िरी जन्म था, -इस 'अविज्नान' का अन्तिम जन्म था । बरगद तले बैठने पर मेरा मन धीरे-धीरे शांत होने लगा । करीब घंटे भर तक बैठा रहा था । फ़िर मुझे ख़याल आया कि वह वृक्ष 'बोधिवृक्ष' ही था । उसके तले पहले भी कई लोगों को आत्म-ज्ञान हो चुका था, और आगे भी होता रहेगा । "
"लेकिन बोधि-वृक्ष तो 'बोध'गया में ही है !" -मैंने शंका ज़ाहिर की ।
"हाँ , जैसे गंगा सिर्फ़ उत्तर भारत में है, लेकिन दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी है । "
मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था ।
"अच्छा !" -मैंने प्रकटतः कहा ।
"और 'आत्म-ज्ञान' ?" -मैंने पूछा ।
"आत्म-ज्ञान याने यह कि ये सारे जन्म 'मन' के होते हैं, न कि आत्मा के । 'आत्मा' याने 'आत्म-तत्त्व' का न जन्म है, न मृत्यु है, और न पुनर्जन्म है । "
"और 'मन' ?"
"मन सिर्फ़ एक चक्रवात है, जिस पर आत्मा का प्रकाश पड़ता है, और वह 'अपने-आपको' एक स्वतंत्र जीव मान लेता है । उसका कोई केन्द्र तो नहीं होता, लेकिन केन्द्र 'परिभाषित' कर लिया जाता है । चक्रवात की वायु उस 'केन्द्र' के इर्द-गिर्द तेजी से घूमती है, तो चक्रवात को मानो एक 'आभासी' केन्द्र मिल जाता है । लेकिन यह प्रश्न क्या चक्रवात कर रहा है ? " -उसने गंभीरता से पूछा ।
"एक चेतन-सत्ता ही प्रश्न पूछ सकती है । आत्मा के लिए द्वैत नहीं है, और प्रश्न भी नहीं हैं । देह प्रश्न नहीं पूछ सकती । देह का स्वामी अर्थात 'मन', जड़ है या चेतन ?"
मेरे पास उत्तर नहीं था ।
"मेरे पास भी इसका उत्तर नहीं है । एक आभासी सत्ता पर यह प्रश्न लागू ही नहीं होता । " -वह बोला । "फ़िर आत्म-ज्ञान याने ? क्या आत्म-ज्ञान एक नई उपलब्धि नहीं है ?"
"नहीं, आत्म-विस्मरण और आत्म-स्मरण को ही नई उपलब्धि कह सकते हैं । "
" फ़िर पुनः आत्म-विस्मरण नहीं होगा इसकी क्या सुनिश्चितता है ?"
क्योंकि सुनिश्चितता खोजनेवाला वह आभासी अस्तित्त्व ही ढह जाता है, 'असत्य' हो जाता है । -वह शांतिपूर्वक बोला ।
और फ़िर आगे बोला;
"वैसे इसे सिर्फ़ बुद्धि से नहीं समझा-समझाया जाता । "
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May 09, 2009

उन दिनों / 20.

इन सीढ़ियों का ज़िक्र करते हुए मुझे अविज्नान से अपनी वह मुलाक़ात भी ज़रूर याद आ जाती है, जो बिल्कुल ही अनपेक्षित ढंग से हुई थी ।
बहुत दिनों बाद कहीं यात्रा करने के लिए पाँव कुलबुला रहे थे । कहाँ ? इस बार अरविन्द-आश्रम (पॉण्डिचेरी) जाया जाए, -मन ने कहा । अरविन्द-आश्रम जाने का विचार मुझे पहले कभी नहीं सूझा था । श्री रमण-आश्रम तो तीन बार जा चुका हूँ, और वहाँ जाते हुए श्री अरविन्द-आश्रम जाने का ख़याल तो आना स्वाभाविक भी है, लेकिन न जाने क्यों इससे पहले कभी ऐसा ख़याल क्यों नहीं आया ! ठीक है, इस बार श्री अरविन्द -आश्रम । दक्षिण । मद्रास (अब चेन्नई) होकर जाना होगा । पिछली बार की तरह मद्रास का रिजर्वेशन कराया था । अहिल्यानगरी सुपर-फास्ट आजकल बुधवार को चलती है । तीसरे दिन, याने शुक्रवार की सुबह/दोपहर तक चेन्नई । चेन्नई से पॉण्डिचेरी । वहाँ मैं रहना तो हफ्ते भर चाहता था, लेकिन श्री रमण-आश्रम जाने की अदम्य इच्छा ने मजबूर कर दिया, और तीसरे ही दिन सुबह ट्रेन से तिरुवण्णामलै के लिए चल पड़ा । जनवरी-फरवरी में वहाँ रहने के लिए स्थान जरूर मिल जाता है ।
दोपहर ग्यारह बजे भोजन के बाद विश्राम किया और कुछ पढता रहा । फ़िर बाहर जाने के कपड़े पहने, और रवि के रूम पर गया । हिन्दीभाषी होने के कारण उससे पहचान हो गयी थी । वह भी हिन्दीभाषी था, इसलिए भी हमारी कंपनी बन गयी, दोस्ती सी हो गयी थी ।
पहली बार (१९८५) में जब मैं श्री रमण आश्रम गया था, तो आश्रम के सामने की भूमि खाली पड़ी थी । दिन-रात सन्नाटा रहता था । लेकिन इस बार वहाँ अनेक छोटी-बड़ी दुकानें थीं ।
रवि के रूम पर अकस्मात् ही उससे मुलाक़ात हो गयी । मैं तो उसे देखते ही पहचान गया था ।
"मुझे मालूम था कि आपसे पुनः मिलना होगा । " -वह बोल पड़ा ।
"हाँ भाई, संयोग ही तो है । " -मैंने कहा ।
"आप इसे संयोग कहें, लेकिन मैं इसे 'नियति' कहता हूँ । " - वह निश्चिन्ततापूर्वक बोला ।
"आप दोनों एक-दूसरे से परिचित हैं ?" -रवि को आश्चर्य हुआ ।
"संयोगवश," -मेरे मुँह से निकला ।
अविज्नान चुपचाप मुस्कुराता रहा ।
फ़िर हम कॉफी पीने चले गए । थोड़ी देर तक इधर-उधर (आश्रम में तथा बाहर भी ) घूमते रहे, ऑटो में बाज़ार तथा श्री अरुणाचलेश्वर मन्दिर गए, और रात्रि के भोजन के समय तक लौट आए ।
भोजन के बाद रवि अपने रूम पर चला गया, और मैं अविज्नान के साथ मेरे कमरे पर आ गया ।
"बैठो !" - मैंने उससे कहा । इस सिंगल-रूम में एक ही पलंग, एक टेबल-कुर्सी, और एक डस्ट-बिन भर है । खिड़की से अरुणाचल पर्वत दिखलाई देता है, और दीवार पर श्री रमण महर्षि (जिन्हें 'भगवान्' कहा जाता है,) की बड़े साइज़ की लगभग एक फुट बाय डेढ़ फुट की फोटो टँगी है । कमरे में सामने एक छोटी खिड़की और एक ही दरवाजा है । दूसरी तरफ़ की खिड़की से पर्वत-शिखर दिखलाई देता है ।
"हाँ," कहकर वह उस एकमात्र कुर्सी पर बैठ गया ।
"कहाँ-कहाँ घूम आए हमारे भारतवर्ष में ? " - मैंने अपने देश के प्रति गौरव अनुभव करते हुए कुछ नाटकीय ढंग से कहा ।
"वैसे तो जितना घूमना था घूम लिया, मुख्य जगह जो रह गयी थी वहाँ तो अंततः समय पर आ ही गया न ?" "और शादी वगैरह ? "
नहीं, अभी तो इस झंझट से दूर हूँ । "
"अच्छा ?" इन विदेशियों की माया यही जानें, मैं सोच रहा था ।
हम दोनों काफी देर तक चुपचाप बैठे रहे । फ़िर वह बोला, -"मैं बस आता हूँ थोड़ी देर में " । उसने जेब में रखे सिगरेट के पैकेट को हाथ से ठकठकाते हुए इशारा किया, और गायब हो गया ।
करीब आधे घंटे के बाद वह सचमुच लौटा तो मुझे आश्चर्य हुआ, भरोसा नहीं था की अब इतनी रात गए, (ग्यारह बजे) वह लौटेगा भी । मैं शायद सो गया था या तंद्रा जैसी कच्ची नींद में था, कमरे का दरवाजा भी खुला ही था । आते ही वह बोला, : "मैं चुपचाप यहाँ कुर्सी पर बैठा हूँ, आप चाहें तो आराम से सो सकते हैं । "
"कब तक ?' -मैंने थोड़ा हँसते हुए पूछा ।
"जब तक अपने आप जाग न जाएँ । "
" मैं तो सुबह तक सोता रहूँगा । " -मैंने असमंजस दिखलाते हुए कहा ।
" ठीक है, यदि मुझे जाना होगा तो आपको जगह दूंगा । "
मैंने कौतूहल से उसे देखा । "क्या वह सारी रात उस कुर्सी पर बैठा रहेगा ? ठीक है, वही जाने !" -सोचकर मैं आराम से सो गया । सीलिंग-फैन चल रहा था इसलिय गरमी नहीं के समान थी । मैं जल्दी ही गहरी नींद सो गया । फरवरी में यहाँ पंखे चलाने पड़ते हैं ।
रात्रि में उसने मेरे सोते समय ही मरकरी लाईट ऑफ़ कर दी थी । वह कुर्सी को खिड़की की दिशा में लगाकर, उस पर बैठ गया । वहाँ से अरुणाचल के शिखर को और पर्वत के भी बड़े हिस्से को देखा जा सकता है ।
रात्रि में करीब ढाई-तीन बजे आँख खुली, तो उसका ख़याल आया, सोचा, 'क्या वह चला गया ?' रात्रि की मद्धम रौशनी में उसे कुर्सी पर स्थिर 'पद्मासनस्थ' मुद्रा में बैठे देखा । धीरे-धीरे उसके पास गया , वह निर्निमेष दृष्टि से पर्वत को देख रहा था । उसकी आँखें खुली थीं । शायद मेरे पदचाप की आहट से उसने आँखें खोल दी होंगीं । उसे बाधा न देते हुए मैं वापस पलंग पर चला आया, और पुनः सो गया । सुबह रोज़ की तरह लगभग पाँच बजे मेरी नींद खुली, तब भी वह उसी मुद्रा में पद्मासन में बैठा था । शौचादि से निवृत्त होकर जब बाहर आया, तब भी वह वैसे ही सुस्थिर बैठा हुआ था । मैं सोचने लगा कि ये विदेशी वाकई सनकी होते हैं , और कुछ हद तक जिद्दी और पागल भी । मैं उसके समीप गया, उसकी आँखें बंद थीं । धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा, हाथ के स्पर्श से उसका ध्यान भंग नहीं हुआ । मैं फ़िर बाहर चला आया । विस्मित भी हुआ । मन्दिर में जाकर 'प्रसाद' ग्रहण किया और नाश्ते की घंटी बजते ही आश्रम के भोजन-कक्ष में पहुँच गया । नाश्ता कर जब लौटा, तो वह खडा हुआ, 'स्ट्रेचिंग' करता हुआ अपने शरीर की अकड़न दूर कर रहा था । उसने मेरी तरफ देखा । मैं समझ सकता था कि वह बहुत थका होगा ।
"तुम्हारे लिए मैं कुछ लेकर आता हूँ, " -मैंने कहा । मुझे अफ़सोस हुआ कि नाश्ता करते समय ही मैंने उसके बारे में कुछ क्यों नहीं सोचा ।
"नहीं, मैं भी चलता हूँ, बस पाँच मिनट और । "
थोड़ी देर में वह 'फ्रेश' होकर आया और हम ब्रेकफास्ट लेने चल दिए, -खासकर उसके लिए । मैंने तो अभी ही आश्रम के भोजन-कक्ष में डटकर खाया था ।
इस बीच वह मौन ही था । मुझे भी उसके मौन को बाधित करना अशोभनीय लगा ।
उसके मुख पर उस समय संसार से कहीं अत्यन्त 'दूर' होने, बाहर और 'परे' होने की शान्ति का जो भाव दिखलाई दे रहा था, वह अद्भुत और अवर्णनीय था ।
जब हम नाश्ता कर लौटे, तो वह बोला, "अब मैं चलूँगा । " और वह उसके रूम पर जो पास के ही किसी भवन में रहा होगा, (शायद मोरवी चौल्ट्री में था,) चला गया ।
दो-तीन दिनों तक वह दिखलाई नहीं दिया, सोचा, वह कहीं चला तो नहीं गया ! रवि से पूछा तो पता चला कि उससे भी नहीं मिला है ।
चौथे दिन कॉफी के समय लगभग चार बजे वह आश्रम में मुझे दिखलाई पड़ा । मुझे देखकर वह मुस्कुराया । उसके चेहरे पर अब भी पिछली बार की तरह की संसार से 'परे' की अवर्णनीय आभा जगमगा रही थी , जो चार दिन पहले दिखाई दी थी । हमने दो प्याले लिए और कॉफी लेकर चले आए । आश्रम में कप-प्लेट या क्रोकरी का इस्तेमाल नहीं होता, हाँ स्टील के बर्तन ज़रूर काम में लाए जाते हैं ।
"क्या हाल-चाल हैं ?" -मैंने पूछा ।
उत्तर में वह बस मुस्कुराया । उस मौन मुस्कुराहट की स्वाभाविकता और निश्छलता पर संदेह नहीं उठ सकता था , मैं भी फ़िर चुप ही रहा ।
कॉफी पी चुके, तो साथ-साथ टहलते-घूमते हुए पुनः मेरे रूम पर आ गए ।
मैं उसे कुरेदना चाहता था, लेकिन शांत रहा । "कल पूछूँगा," -मैंने सोचा ।
उस शाम हम साथ ही रहे । मैंने उससे अरुणाचल प्रदक्षिणा "गिरिवलम" के बारे में पूछा। अरुणाचल की परिक्रमा करना एक शास्त्रोक्त महत्पुण्य माना गया है । चूँकि यह पर्वत भगवान शिव का ही प्रकट स्वरुप है, इसलिए ।
"हाँ, हाँ, - अवश्य । " - वह बोला । तय हुआ कि अगले दिन सुबह पाँच बजे हम यहाँ से 'गिरिवलम' के लिए निकलेंगे । दूसरे दिन सुबह ठीक पाँच बजे वह मेरे रूम पर हाज़िर था ।
हम आश्रम से निकले, और मौन परिक्रमा करते हुए करीब साढ़े ग्यारह आश्रम वापस लौटे । चूँकि आश्रम में भोजन का समय ग्यारह बजे का है, अतः हम बाहर बाज़ार में ही भोजन करने चले गए। दक्षिण-भारत का यही तो मजा ही, किसी भी वक्त कहीं भी, खाने के लिए उचित मूल्य पर साफ़-स्वच्छ, पेट भर खाना मिल सकता है, चाहे इडली हो, वडा-सांभर, या सिर्फ़ चांवल हों, जिसके साथ रसम, आदि मिल जाता है ।
उसका मौन था कि टूटने का नाम ही नहीं ले रहा था, लगता था जैसे कभी बोलना सीखा ही नहीं होगा ।
इस मौन में एक संक्रामकता थी । उसके नेत्रों को देखते ही आप भी मौन हो जाते थे । और ज़रा भी अस्वाभाविक या भयावना नहीं लगता था । इस मौन में हमने अनुभव किया कि वाणी का प्रयोग करना एक अस्वाभाविकता थी । हमने पाया कि एक ही दिग्-दिगंत तक छाया हुआ मौन था वह मौन । सारी दिशाएं भगवान् अरुणाचल की चैतन्य-ज्योति का विस्तार थीं, और वहाँ 'शब्द' नहीं था । बस एक प्राणवान चेतन प्रकाश था, जिसका केन्द्र सर्वत्र था लेकिन परिधि कहीं नहीं थी । उस मौन ने हम दोनों के वैयक्तिक अस्तित्त्व को लील लिया था । और इसमें भय नहीं था, एक उल्लास था । हम वही थे, जिसमें हम विलीन हो गए थे । हाँ, लेकिन हमारी 'वैयक्तिक' पहचान ज़रूर मिट गयी थी । मानों उस दिव्य सत्ता ने हमें अपने अंक में भर लिया था । अपने आलिंगन में समेट लिया था ।
अब सोचता हूँ, तो मुझे उस "Otherness" (*) का स्मरण हो आता है । चूँकि हम 'नहीं' थे, इसलिए यह भी दावा नहीं कर सकते, कि हमें कोई 'अनुभूति-विशेष' हुई थी । बस एक दिव्य तत्त्व 'था', -अलौकिक और अवर्णनीय सौन्दर्य, निराकार प्रेम, जो स्वयं ही स्वयं में 'रमण' कर रहा था । तब जहाँ काल, और स्थान तक विदा हो चुके थे, वहाँ 'व्यक्तित्त्व' की भला क्या हैसियत हो सकती थी ? अत: वह कोई 'वैयक्तिक' अनुभूति होती हो ऐसा कहनेवाला कोई 'व्यक्ति' भी कैसे हो सकता था ? लेकिन वहाँ 'सत्तामात्र' तो अवश्य ही होती है, जिसे अतीत या भविष्य का, और इसलिए वर्त्तमान तक का सन्दर्भ देना धृष्टता ही कहा जाएगा । वहाँ 'जानना' अर्थात् जिसे वेदान्त की भाषा में 'शुद्ध-चैतन्य' कहा जाता है, वह भी अबाध रूप से विद्यमान होता है । लेकिन इसलिए वह किसी 'पहचान' से रहित था/है, होता है । या कहें वह स्वयं ही अपनी पहचान होता है । हाँ लेकिन 'मेरी' अपनी 'काल्पनिक', स्मृति पर आधारित 'पहचान' ज़रूर 'मिट' गयी थी, या कहें, की 'काल' और 'स्थान' के साथ-साथ पिघलकर 'उस' सत्ता में घुल-मिल गयी थी । इस 'व्यक्तित्व' का नामों-निशाँ' तक बाकी नहीं रहा था । लेकिन अब वह सब 'स्वप्न' लगता है, और 'मैं', और 'मेरा' 'व्यक्तित्त्व', एक कठोर चट्टान सी वास्तविकता प्रतीत होते हैं !
यह हृदय की अनुभूति थी, गूगल के हिन्दी ब्लॉग की सर्विस में 'हृदय' शब्द को 'edit' करते समय एक 'विकल्प' मिलता है; "हृद्य", वैसी अनुभूति थी, हृदय-गत । गीता का श्लोक याद आता है,
"रस्या स्निग्धा स्थिरा हृद्या आहारा: सात्त्विका प्रिया: "
वैसी कुछ अनुभूति थी । वह मस्तिष्क या बुद्धि का विषय नहीं हो सकती । बुद्धि या मस्तिष्क उसके उपकरण अवश्य हो सकते हैं और होते भी हैं, -उसी से 'प्रकाशित' होकर, 'प्रेरित' होकर अपना कार्य कर पाते हैं , ..... ।
ऐसे ही कुछ और मन्त्र याद आते हैं, :
"तन्नो हंसो प्रचोदयात्" , "तन्नो दंती प्रचोदयात्", तथा विश्व-प्रसिद्ध, :
"धियो यो न: प्रचोदयात् " भी,
जो गायत्री मन्त्र का अंश है ।
"क्या 'ज्ञान' ऐसे ही होता है ?" -मैं अब सोचता हूँ ।
लेकिन तब तो बुद्धि और मस्तिष्क की सारी गतिविधियाँ ही ठिठकी हुईं थीं । 'अनुभवकर्त्ता' (the 'experiencer') कहीं न था । और न ही वहाँ पर अनुभव किया जानेवाला 'विषय' (the experienced 'object'), या द्वैत-गत 'अनुभवन' जैसी ही कोई चीज़ ही थी । क्योंकि वहाँ समय या काल ही अनुपस्थित था । यह तो 'विचार' है, जो अब सर पटक-पटककर उस स्थिति को व्याख्यायित करने की कोशिश कर रहा है, जो तब वहाँ नदारद था ! हाँ यह तो समझ पाया की सब कुछ एक ही चैतन्य है, 'अरुणाचल भगवान्' ही हैं । नाम न दें तो भी । क्योंकि 'होना-जानना' अर्थात् 'सत्-चित्' तो तब भी अविच्छिन्न थे / हैं / होते हैं ! सर्वदा !
हम उसी सम्मोहित सी 'दशा' में 'जागृत-दशा' में, रात्रि के नौ बजे तक (भोजन के बाद तक) बस 'बैठे' ही रह गए थे । शायद कुछ इनी-गिनी बातें आपस में की होंगीं, लेकिन वे महत्वहीन रही होंगीं । फ़िर उसने मेरे चरण छुए और विश्राम के लिए चला गया । मुझ पर उसके 'मौन' का 'राज़' खुल चुका था, लेकिन मैं किसी से क्या कहता ?
( *J. Krishnamurti : "Krishnamurti's Notebook".) ***********************************************************************************









उन दिनों / 19.

उन दिनों बिलासपुर में रेलवे के किसी जोनल या रीजनल ऑफिस को रखने की माँग के समर्थन में उग्र उपद्रव हुए थे । रेल-संपत्ति को बहुत नुक्सान भी पहुँचाया गया था, और मैं सिर्फ़ राउरकेला तक ही जा सका था की ट्रेन निरस्त कर दी गयी थी । स्वास्थ्य तो ख़राब था ही, एक होटल में जाकर कमरा लिया, सौभाग्य से मुझे दूसरे दिन बिलासपुर के लिए ट्रेन मिल गयी, याने रिज़र्वेशन हो गया । वैसे भी उस दिन बिलासपुर की ओर कोई गाड़ी नहीं जा रही थी । तीन-चार दिनों बाद मैं घर (उज्जैन) में था ।
इस बीच मैं काफी बदल गया था । (वैसे यह वाक्य मुझे हमेशा से विरोधाभासी लगता रहा है, लेकिन उस बारे में फ़िर कभी ।)
तंत्र के बारे में अविज्नान की जानकारी ने मुझे बाध्य किया कि मैं इस बारे में नये सिरे से खोज-बीन करुँ , इन्हीं दिनों एक मित्र ने अचानक एक नई बात बतलाई, - उज्जैन में त्रिवेणी-संगम नामक तीर्थ-स्थल है, अवन्तिका-पुराण में उज्जयिनी-खंड में उसका वर्णन भी है, ऐसा उसने बतलाया । उससे चर्चा के दौरान पता चला कि उस स्थान पर बहुत पहले एक पुल था, जो बरसात में पानी बढ़ने पर बंद हो जाता था । फ़िर १९६० -७० के आसपास इंदौर-रोड पर वहाँ एक नया पुल बना, उसके एक ओर सीढियाँ हैं, जो शिप्रा-तट पर स्थित नव-ग्रह-मन्दिर तक जाने के लिए पुल के मध्य से भूमि-तल तक हैं । वाकई अविज्नान की बातें मन में कौंध गईं । वैसे तो इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि अविज्नान ने जैसा वर्णन उसकी डायरी से पढ़कर सुनाया था, हू भी ब हू वैसा ही लोकेशन यहाँ था , मैं अनेक बार वहाँ जाता भी रहा हूँ । सीढियों से उतरकर सीधे संगम तक पैदल, कच्ची पगडंडी है । नवग्रह-मन्दिर वहीं है । वहाँ संगम होने के कारण पौराणिक काल से ही लोग तिथि-पर्वों पर स्नान आदि के लिए जाते रहे हैं, लेकिन अविज्नान से मिलने के बाद मैं इसे नए नज़रिए से देखने लगा था । मेरा मित्र शायद मजाक में उन सीढियों को 'उन्नति की सीढियाँ' कहा करता है , मुझे इस पर कौतूहल अवश्य होता है । थोडा रोचक भी लगता है, मनोरंजक तो लगता ही है ।
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April 28, 2009

उन दिनों / 18.

"तंत्र के बारे में तो मैं बिल्कुल अनभिज्ञ हूँ । " - मैंने असहायता जताई ।
"उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि तंत्र-सिद्धांत के अनुसार यह ज़रूरी नहीं है कि शिक्षक शिक्षा के सारे तत्त्वों को जानता हो । कई बार तो आप उससे भी शिक्षा ले लेते हैं, जो आपको जानता तक नहीं । दर-असल शिक्षक तो एक बहाना या 'माध्यम' भर होता है । साधक उसके ज़रिये 'अस्तित्व से ही शिक्षा ग्रहण करता है, और श्रेष्ठतम शिक्षक तो नितांत 'अंहकार- रहित' होता है । तब शिक्षा का हस्तांतरण सर्वाधिक स्वाभाविक, सहज रूप से होता है । तब शिक्षक जिस भी भाषा में बात करेगा, उससे शिष्य को मदद ही मिलेगी, जिस भी शैली में व्यवहार करेगा, वह साधक के सीखने के लिए अनुकूल बना लेगा ।" - उसने तंत्र-दर्शन समझाते हुए कहा ।
मैं चमत्कृत था, संदेह के बादल छँटने लगे थे ।
"अच्छा ! " -मैं फ़िर भी नहीं समझ पा रहा था कि ऐसा कैसे होता होगा !
" मैं तंत्र के बारे में हमेशा से उत्कंठित रहा हूँ, बचपन में जाने-अनजाने मैं अपनी उँगलियों और शरीर के द्वारा कुछ 'मुद्राएँ' बनाने लगता था, और शायद इसीलिये मेरे पिता मुझसे नाराज़ रहते थे । जिसे हम नहीं समझ पाते, या तो उससे आतंकित हो जाते हैं, या विस्मित, अभिभूत, या फ़िर मुग्ध ! यही स्थिति मेरे पिता के साथ थी । सब मैं खेल-खेल में किया करता था, न जाने कौन-कौन से मन्त्र मेरे भीतर गूँजने लगते थे, न जाने अपने भीतर कितने तरह के फूल 'अनुभव' होते, उनकी पंखुडियाँ आलोकित होतीं, उनसे न जाने कैसे स्वर उमड़ते, बाहर का संसार धीरे-धीरे विलुप्त हो जाया करता था, उस संसार के अपने रंग थे, अपनी छटाएँ थीं । बहुत बाद में पता चला था कि अपनी चेतना में ही यह सब होता है । मैं अपने अनुभवों को कुण्डलिनी-जागरण जैसा कोई नाम नहीं देना चाहता । यह सब रोचक होते हुए भी कभी-कभी ही होता था, -बड़ी धीमी गति से । इस बीच पिताजी और माता को देख-देखकर मैं पद्मासन लगाना सीख गया था। जब भी मुझे लगता कि कुछ 'नया' होनेवाला है, मैं पद्मासन लगाकर आँखें बंदकर बैठ जाता था । इससे पिताजी को बिल्कुल परेशानी नहीं होती थी । बस उन्हें 'मुद्राओं' से डर लगता था, और यह मुझे जल्दी ही समझ में आ गया था । शायद इसीलिये मेरा सारा ध्यान तंत्र की बजाय ध्यानयोग की ओर केंद्रित हो गया । लेकिन अभी कुछ आकर्षण तंत्र के प्रति फ़िर भी बना हुआ है, इसलिए भटक रहा हूँ । " -वह बोला ।
"मुद्राओं के बारे में कुछ बतलाओ । " -मैं उसे टटोलने लगा ।
"पद्मासन लगाने के बाद मेरी उँगलियों में कोई हरकत होने लगती थी । कभी-कभी तो ऐसी हरकत का अंदेशा (संकेत) होते ही मैं पद्मासन लगा लिया करता था, ताकि जो ऊर्जा उँगलियों में मुद्राएँ बनाने लगती थी वह बाहरी रास्ता छोड़कर 'भीतर' मुड़ जाती थी और मुझे उन 'लोकों' में ले जाती थी जहाँ मुझे फूलों, खुशबुओं, और ध्वनियों के अनुभव होते थे । बहुत बाद में जाकर पता चला कि पाँचों उँगलियों से, हृदय से, पञ्च-तत्त्वों, पञ्च-प्राणों, एवं पञ्च-तन्मात्राओं का संबंध है, और उनके द्वारा सूक्ष्म-से-सूक्ष्म में गति हो सकती है । "
तो अभी तो वही मेरा शिक्षक था ।
"ठीक है, फ़िर ?" -मैंने शांतिपूर्वक सुनते हुए उसे आगे कहने का मौका दिया ।
"फ़िर मैंने तंत्र-साहित्य पढा, Sir John Woodrofffe की किताबें, : "Serpant-Power", आदि पढ़ीं, पर मुझे कुछ ख़ास समझ में नहीं आ सका । तंत्र किताबों से पढ़ा भी नहीं जाता ।"
"हाँ" -मैंने उसका समर्थन किया, और करने के लिए मेरे पास था ही क्या !
"फ़िर मैंने तिब्बती भिक्षुओं के तांत्रिक प्रयोगों के बारे में जाना लेकिन तिब्बती भाषा मेरे लिए एक बड़ी अड़चन थी , न जाने क्यों मेरा मन उसमें ज़रा भी नहीं लगता था । "
"अच्छा !"
" हाँ, इस बीच मुझे किसी भिक्षु के पास एक हस्तलिखित पुस्तक मिली जिसमें तंत्र के व्यावहारिक प्रयोगों, या यूँ कहें कि लोक-कल्याण की दृष्टि से तंत्र में वर्णित कुछ प्रयोगों की जानकारी थी । सारा विवरण संस्कृत में था, और तिब्बती में उसका अर्थ भी श्लोक-दर-श्लोक दिया हुआ था । तिब्बती भिक्षु भी सिर्फ़ तिब्बती जानता था, कभी-कभी वह मुझे उन प्रयोगों के बारे में बतलाता भी था । मैं नहीं जानता की उसकी बातें कितनी और किस हद तक सच्ची थीं, लेकिन मैं उन्हें नोट ज़रूर कर लिया करता था । जैसे एक बार उसने मुझे आज की तारीख के बारे में बतलाया था। उसने कहा था की आज के दिन एक ऐसे व्यक्ति से मेरी मुलाक़ात किसी समुद्र-तट पर होगी, जो इस जीवन में मेरा आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक होगा । उसी ने मुझे यह भी बतलाया था की वह व्यक्ति बाहर से भले ही एक बिल्कुल साधारण सा आम आदमी दिखलाई दे, लेकिन मैं उसे miss न करूँ, उस पर शक न करूँ, और उससे जो भी सीख सकता हूँ ज़रूर सीख लूँ । और उसने ही मुझे यह भी कहा था, : 'तुम्हारा intution' ही तुमसे कह देगा कि मेरी बात सच है, या झूठ, और यह वही व्यक्ति है, या नहीं जिसके बारे में मैंने कहा था ' । "
वाकई बड़ा रोचक मामला था । लेकिन मैं थका हुआ था, अब आराम करना चाहता था ।
"तुमसे मिलकर खुशी हुई । हम शायद कल फ़िर मिल सकते हैं, अभी तो मुझे आराम करना है । " -मैंने उससे कहा ।
अगले दिन मेरा 'रिज़र्वेशन' था। मैंने उससे कहा कि सुबह साढ़े-नौ बजे मेरी गाड़ी पुरी से रवाना होनेवाली है । तुम चाहो तो हम सुबह यहीं मिलते हैं ।
उसे ऐतराज़ नहीं था । उसमें ज़रा भी अधीरता नहीं थी, जैसे उसे सब कुछ पहले से ही पता हो । वह एकदम बेफिक्र था ।
उस रात मैंने समीप के एक होटल में जाकर चाँवल, दाल, और सब्जी खाई। रोटी वहाँ नहीं थी । पुरी के 'भगवान्' श्रीजगन्नाथजी को मन ही मन प्रणाम किया, उनसे क्षमा-याचना की कि उनके दर्शन नहीं कर सकूँगा । सुबह स्वास्थ्य ख़राब होने की वज़ह से देर तक आराम करता रहा था, नहा भी लिया था, लेकिन रिक्शेवाले की दुष्टता, उद्दंडता से मन उचट गया था । सोचा था कि अपनी मर्जी से चला जाऊँगा, लेकिन उसकी बातों से लगा कि शायद मौका मिलते ही वह मेरे साथ लूट-पाट और मारपीट भी कर सकता है । आस-पास वालों को मुझसे कोई मतलब नहीं था, किसी तरह, उससे पीछा छुडाकर 'Nandi-Lodge' लौट पाया था । हाँ, अब याद आया, : गया था मैं रेलवे-स्टेशन 'रिज़र्वेशन' कराने, लौटते समय सोचा रिक्शे से लौटूँ, और वह मुझे जबरदस्ती मन्दिर ले जाना चाहता था !
सुअबह-सुबह मेरे रूम के दरवाजे पर खट- खटाहट हुई । यह lodge वैसा नहीं था जैसे कि सामान्यतः होते हैं । कोई बैरे या रूम-अटेंडेंट आदि नहीं थे । शायद एक-दो कर्मचारी होंगे जो बस साफ़-सफाई करते होंगे । दरवाजा खोला तो अविज्नान उपस्थित था । उसने दोनों हाथ जोड़कर 'प्रणाम' किया और फ़िर झुककर मेरे पैरों को छुआ, चरण-स्पर्श किए । मुझे थोड़ा अटपटा सा लगा, लेकिन मैंने उदासीन भाव से उसे बैठने के लिए कहा । मैं ब्रश कर चुका था, सामान थोड़ा ही था , ठीक से जमा लिया था । लगभग सात बज रहे थे जब हम वहाँ से चले ।
हम स्टेशन पर आ गए । रास्ते में नाश्ता किया, चाय पी, और उसने सिगरेट जला ली ।
"मैं सोच रहा था कि आपको जगाना ठीक नहीं होगा,लेकिन फ़िर मुझे आज आपसे मिलना भी बहुत ज़रूरी था न !" -वह सफाई देने लगा ।
"हाँ । "
हम लोग स्टेशन पर इधर-उधर घुमते रहे । छोटा सा स्टेशन । एक तरह से टर्मिनस । मुझे लगता है कि वहाँ से सभी गाड़ियाँ एक ही दिशा में जाती होंगीं । या शायद आगे जाकर अधिक-से-अधिक दो दिशाओं में । स्टेशन का ज्यादातर हिस्सा खुला-खुला सा था ।
हम लोग plateform पर एक बेंच पर बैठ गए 'रिज़र्वेशन' का टिकट जेब में था । अभी कोई लिस्ट नहीं लगाई गयी थी । वैसे भी गाडी वहीं से चलती थी । बहुत से बाँग्ला-भाषी, उड़िया-भाषी, आसपास थे । गरीबी और विपन्नता के मारे लोग, और उनके बीच इने-गिने पैसेवाले, समृद्ध, या टूरिस्ट आदि । मैं भी उनके बीच था और शायद ही कोई अनुमान लगा सकता था कि मैं यहाँ (उज्जैन में) एक L.I.G. मकान में रहता होऊँगा ! वैसे मैं वहाँ मौजूद ज्यादातर लोगों के मुकाबले काफी संपन्न हूँ, ऐसा लग रहा था ।
उसके पास कोई पैकेट था, -प्लास्टिक की थैली में ।
शायद कोई किताबें होंगीं । उसने पैकेट खोला और उसमें से एक डायरी निकाली ।
बहुत पुरानी सी दिख रही वह डायरी मुझे देने से पहले, उसने उसमें कोई तारीख ढूँढी, और मुझे बतलाने लगा, : "देखिये, इस तारीख को मैं सिक्किम के इस स्थान पर था ।" और आगे स्पष्ट अक्षरों में लिखा था कि फलाँ तारीख को भारत के किसी समुद्र-तट पर उसे एक आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक मिलेगा । (उसने डायरी में 'स्पिरिच्युअल-गाइड' ) लिखा था । मैंने डायरी पर एक सरसरी निगाह डाली । डायरी को देखकर ऐसा नहीं लगता था कि यह सब उसने आज-कल में या पिछले एक-दो सालों में लिखा होगा । मैंने डायरी हाथ में ली । उस डायरी में अन्तिम से तीन-चार पृष्ठ पहले तक सब-कुछ उसी इंक में लिखा था । बाद में कुछ पेन्सिल से या दूसरी इंक में भी लिखा था, -छोटी-मोटी बातें, किताबों के नाम, शहरों-गावों के नाम, लोगों के नाम पते, आदि-आदि । डायरी पर छपा 'वर्ष' भी 1983 जैसा था, उसमें और भी कई बातें ऐसी लिखीं थीं कि उस पर एकाएक अविश्वास भी नहीं किया जा सकता था । वह जालसाजी नहीं लगता था ।
"देखो, आम भारतीय तो तंत्र को वामाचार या जादू-टोना जैसा कुछ समझता है, और तंत्र में मुझे कभी दिलचस्पी नहीं रही । तंत्र की जो गंभीर और प्रसिद्ध पुस्तकें तुमने पढ़ीं हैं, मैंने शायद कभी उनके नाम ही पढ़े या सुने होंगे, लेकिन दिलचस्पी न होने से उनका स्मरण भी भी मुझे इतना अच्छा नहीं है, कि अधिकार-पूर्वक कुछ कह सकूँ । " -मैंने उससे कहा ।
"देखी, कल मैं आपसे कह रहा था कि मुझे बचपन में 'कुछ' ऐसा होता था कि मैं पद्मासन में बैठकर उँगलियों से 'मुद्राएँ' बनाने लगता था, मेरे भीतर कुछ मंत्रों आदि का उच्छारण मुझे सुनाई देने लगता था, कभी-कभी मैं इस 'दृश्य-जगत्' से बिल्कुल अलग और बहुत दूर, किसी दूसरे जगत् में, 'कहीं और' होता था, और तब मुझे अपने शरीर का, या उसके चारों ओर की दुनिया और वातावरण का ज़रा सा भी होश नहीं रह जाता था । किस्मत से मेरे माता-पिता इस सबसे न तो डरते थे और न चिंतित होते थे, -शायद वे अपने आप को असहाय महसूस करते थे, क्योंकि वे मेरी मदद कैसे करें यह भी नहीं समझ पाते होंगे, और सब-कुछ नियति पर छोड़ देते होंगे, क्योंकि उन्हें यह भी विश्वास था कि यह मनोवैज्ञानिकों या डॉक्टरों के बस की बात भी नहीं थी कि इसे समझ सकें । और इस सबसे किसी किस्म का नुक्सान होता हो ऐसा भी उन्हें नहीं लगता होगा ।
अब मैं समझ सकता हूँ कि वह एक प्रकार का 'ध्यान' ही था जिसमें मेरा मन जागृत अवस्था के चेतन स्तर से निकलकर अवचेतन-स्तर तक चला जाया करता था, और मुझे लगता है कि मन के सारे स्तर, चेतन, अवचेतन, अचेतन, तथा अतिचेतन (conscious, subconscious, unconscious, and transconscious / superconscious) भी, सहवर्त्ती (contemporary) होते हैं । लेकिन हम साधारणतः अपने चेतन-स्तर से ही अपने को बाँधे रखते हैं, और उस स्तर पर ही हर व्यक्ति 'अपनी' एक पहचान स्थापित कर, अपने-आपको वहीं तक सीमित मान लिया करता है । वही उसका 'व्यक्तिगत' जीवन व जीवन-काल, 'समय', और आत्मकथा (autobiography) होता है । लेकिन, 'ध्यान' के प्रयोग द्वारा वह यह भी समझ सकता है कि केवल एक ही अस्तित्व है, और ऐसे सारे 'विभिन्न' 'जीवन-काल' सदैव रहते हैं । समय का विभाजन एक बुद्धिजनित त्रुटि है, हालाँकि भौतिक दृष्टि से समय एक पूर्णतः व्यावहारिक सत्ता भी है, उसे नापा जा सकता है, और उस नाप के आधार पर कुछ कार्य-योजना भी बनाई जा सकती है । लेकिन हम यह न भूलें कि 'वैसा' समय सर्वकालिक या परम सत्य नहीं है । -वह एक सापेक्ष सत्य भर है, है न एक खूबसूरत सच ?
जैसा हमारा स्थूल-जगत् है, वैसा ही इन्द्रियों का अपना एक जगत् होता है, और इसी प्रकार 'तन्मात्राओं' का भी अपना एक जगत् होता है । "
'तन्मात्रा' याने ? , -मैं पूछ बैठा । उसने चेहरे पर किसी प्रतिक्रया का भाव लाये बिना कहा, : ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव, '-प्रतीतियाँ' कहना अधिक सही होगा, जैसे कि 'रूप, रस, गंध, स्पर्श, तथा शब्द ' -वह देवताओं का क्षेत्र है । ये पाँचों 'तन्मात्राएँ' जिन चेतन 'सत्ताओं' द्वारा नियंत्रित और संचालित की जाती हैं, उन्हें ही 'देवता' कहा जाता है । लेकिन जैसे ये पाँच तन्मात्राएँ परस्पर घनिष्ठतः संबंधित होती हैं, वैसे ही उनके 'देवता' भी परस्पर घनिष्ठतः संबंधित हुआ करते हैं । तंत्र का सार-सिद्धांत यही है । " लेकिन ऐसे अनेक तलों वाले असंख्य जगतों का 'अधिष्ठाता' चैतन्य एकमेव है, और अधिष्ठाता, अधिष्ठित से पृथक् नहीं होता है । वह सगुण और निर्गुण दोनों प्रकारों में, व्यक्त और अव्यक्त दोनों रूपों में सदैव एक ही है । व्यक्तिगत रूप से हम जिस जगत् को अनुभव करते हैं, वह चेतन (conscious) और अवचेतन (subconscious) तक ही सीमित होता है । अवचेतन (subconscious) की दूसरी तरफ़ एक ही जगत् है । यदि आपने प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव युंग को पढा हो, तो आप इसे आसानी से समझ सकते हैं, वैसे वैदिक ज्ञान में इस सब का अधिक बेहतर निरूपण है। "
मैं उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुन रहा था, अभी मेरी गाड़ी को काफी वक्त था । कहना न होगा, उसकी बातें रोचक थीं, और समझाने का लहजा भी दिलचस्प था ।
"फ़िर मैंने मांडूक्य-उपनिषद पढ़ा , श्री सुरेश्वराचार्य लिखित 'पंचीकरणं' भी पढ़ा, और मुझमें बौद्धिक-स्तर पर 'अद्वैत' की समझ आई । वैसी निष्ठा जागृत हुई । "
"बौद्धिक-स्तर पर, इसका क्या मतलब ?" -मैंने पूछा ।
"बौद्धिक-स्तर पर इसलिए, क्योंकि अभी यह एक बौद्धिक विवेचना से प्राप्त हुआ सैद्धांतिक निश्चय मात्र था, न कि अपरोक्ष-अनुभूति । दूसरी ओर, मेरी परम्परा में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं थी, जबकि मेरे बचपन के रहस्यमय अनुभवों की व्याख्या पुनर्जन्म की वास्तविकता स्वीकार करने पर सरलता से हो सकती थी । इसलिए मुझे 'अद्वैत-सिद्धांत' आसानी से स्वीकार हो सका । "
"तो ? "
"कहने का मतलब यह कि मुझे पुनर्जन्म की सत्यता पर भी गहरा यकीन हो गया । "
"लेकिन यह तुम्हारा कोरा भ्रम ही रहा हो, ऐसा भी तो हो सकता है ? मन की कल्पना-शक्ति की क्या सीमा हो सकती है ? " -मैंने उसकी परिक्षा ली ।
"हाँ, शायद भ्रम ही रहा हो, और मैं यकीन और शक के बीच झूलता रहा था । "
"फ़िर ? "
"फ़िर उस बौद्ध-भिक्षु के पास जो ग्रन्थ था और जिसकी कुछ बातें मैंने नोट की थीं, उसमें से एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा मैंने यह भी पढ़ा और नोट कर लिया था , -उसने डायरी खोली, और पढने लगा :
"... ... ... 'आचार्य क्षेमस्वर-कृत- सेतु-सोपान-सूत्र ', ... ... .....
'नवलक'-तंत्र के आचार्य क्षेमस्वर के अनुसार अस्तित्त्व के विभिन्न उपादानों (मूल-तत्त्वों) से 'सृष्टि' हो जाने के बाद सृष्टि में ही विभिन्न 'स्थानों' और विभिन्न 'समयों' पर विभिन्न 'कर्मों' का 'उद्भव' होता है, इसके कई (असंख्य) उदाहरण हैं , जैसे तालाब, कुँआ, नदी, प्रपात, भँवर, समुद्र, द्वीप, अंतरीप, नदी का मुहाना, गुफा, पर्वत, अन्तरिक्ष आदि । ये सभी विभिन्न 'स्थान' और 'समय ', जहाँ 'व्यक्ति-सापेक्ष' होते हैं, वहीं 'व्यक्ति' स्वयं , 'आत्म-सापेक्ष' होता है । 'आत्मा' की दृष्टि में न तो कुछ घटता है, न 'बीतता' है, लेकिन 'व्यक्ति' के सन्दर्भ में ही 'सृष्टि' और 'लय' या 'प्रलय' आदि होते हैं । 'अस्तित्त्व' ऐसे ही असंख्य 'व्यक्तियों', 'घटनाओं' 'स्थानों' और 'समयों' की समष्टि है ।
फ़िर, मानवों, और विभिन्न जीवों द्वारा निर्मित कई ऐसे स्थान होते हैं, जहाँ विशिष्ट प्रयोग करने से, विशिष्ट कर्म (और कर्म-फल) प्राप्त होते हैं । 'वास्तु' का आधार-दर्शन भी यही है ।
'कर्म' का प्रथम अर्थ है - 'पुरुषार्थ', और दूसरा , कर्म(-फल) का अर्थ है 'भोग' , अर्थात सुख-दु:ख आदि ।
एक सूत्र यह है, -
जीवन जल है ।
जल की तीन 'गतियाँ' होती हैं,
गतियाँ तीन ही होतीं हैं ।
'चौथी 'अगति' कहलाती / होती है ।
'अगति' में ही सारी (तीनों) गतियाँ प्रतिष्ठित हैं ।
अगति उनसे स्वतंत्र है ।
नदी अस्थिर गति है ।
तीन नदियाँ तीन अस्थिर गतियाँ ,... ... .... .... .... (कुछ लिख कर काटा हुआ, जिसे न वह पढ़ / समझ पा रहा है, न मैं । )
तीन नदियों का संगम, लेकिन अगति से जुड़ता है । वह 'अगति' को प्रतिबिंबित करता है ।
दो नदियों का संगम दो अस्थिर गतियों का मिलकर एक तीसरी अस्थिर गति बन जाना होता है ।
सेतु स्थिर और अस्थिर की धुरी है । यह अगति का अमूर्त्त (abstract) रूप है , अर्थात् साकार और निराकार का संगम ।
सेतु वक्र, सरल या कुटिल हो सकता है ।
इसीलिये यही 'संसार' है, -संसृति ।
इस पर जाने का अर्थ है, जाना, आना, और जाना ।
सेतु के वक्र, कुटिल या सरल होने पर स्थिर और अस्थिर गतिरूपी जल, उसमें समस्त शुभ और अशुभ तथा मिश्रित फलों की उत्पत्ति करता है ।
एक ओर वाम, दूसरी ओर दक्षिण ।
पूर्व या पश्चिम नहीं, क्योंकि वह विभाजन 'पहले' और 'बाद' के रूप में 'समय' का ही विभाजन है, जो बस 'कल्पित' होता है, -'सत्य' नहीं !
प्रथम या अनंतर नहीं !
यह तभी संभव है जब सेतु के एक ओर या दोनों ओर एक या एक से अधिक 'सोपान' हों ।
इसे ही प्रथम चित्र में बतलाया गया है ।
यह सब तो 'text' था, -'कथ्य' ।
फ़िर एक अन्य तारीख का ज़िक्र था । उसी डायरी में उस तारीख के पृष्ठ को अविज्नान ने खोला । वहाँ एक सरल सा रेखाचित्र था । एक नदी, जिस पर पुल है । पुल के दोनों तरफ़ दो सोपान (सीढ़ीयाँ) हैं , जो नदी के दोनों किनारों के समानांतर चली गईं हैं । उन तटों पर मन्दिर, घाट, मकान आदि हैं । नदी आगे जाकर दूसरी नदी से मिल रही है । संगम ।
फ़िर लिखा था :
इस सोपान-सत्य-सोपान या सेतु-सोपान-सेतु पर (जहाँ एक ही ओर सोपान हो) निश्चित समय पर, आकाश और काल की स्थिति--विशेष के अनुसार मनुष्य का भाग्य, यश-अपयश, लाभ,-हानि, जीवन-मृत्यु, शुभ-अशुभ, चरित्र, धर्म तथा पाप-पुण्य जन्म लेते हैं ।
यह गहन चिंतन का विषय है लेकिन सामान्य मनुष्य के कल्याण के लिए आचार्य क्षेम-स्वर ने कुछ विशिष्ट प्रयोग निर्देशित किए हैं, जिन्हें ऐसे स्थान पर करने से वह जीवन में सुखी और अंततः मोक्ष की प्राप्ति का अधिकारी हो जाता है । यश, लाभ तथा दैवी सिद्धियाँ भी प्राप्त कर सकता है ।
"यह सब क्या है ? " -मैंने पूछा ।
"यही तो ! यह सब मुझे थोडा-थोडा समझ में आया है, लेकिन चाहता हूँ कोई इसे मुझे ठीक से समझा दे । "
"पर तुम्हें यह क्यों लगा की मैं तुम्हें यह सब समझा सकूँगा ? "
" न भी समझा सकें तो भी कोशिश करने में हर्ज़ क्या है ? फ़िर उस बौद्ध-भिक्षु ने मुझे आज की तारीख दी थी, उस आधार पर आपसे पूछने के अलावा मैं कर भी क्या सकता था ? "

उत्तर में मैं मुस्कुरा दिया । गाड़ी आने का सिग्नल हो चुका था । अविज्नान से फ़िर मुलाक़ात होगी ऐसी कल्पना तक नहीं थी। 'चलो, यह अनोखा अध्याय भी समाप्त हुआ' -मैंने सोचा । गाड़ी के आते ही मैंने अपनी 'बर्थ' और डिब्बा तलाशा , कुछ देर तक साथ बैठे रहे, फ़िर गाड़ी के चलते ही वह उठ खडा हुआ, एक लिफाफा मुझे दिया, बोला - 'बाद में खोलियेगा ... ... 'प्लीज़' । मेरे चरण स्पर्श किए, और गाड़ी से उतर गया ।
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April 25, 2009

उन दिनों / 17.

"Don't you feel, you are spoiling our sea-coasts "?
-मैंने उसे झिड़ककर कहा । मुझे 'सिखाने' का रोल जो मिला था !
"हाँ, आप ठीक कह रहे हैं ।" -उसने दुखी होकर कहा ।
"लेकिन मैं सोचता हूँ कि बाकी अधिकाँश लोगों की तुलना में मैं इस धरती को कुछ कम ही बरबाद कर रहा हूँ । "
"कैसे ? "
"देखिये धरती, जल, वायु, और आकाश को तो हम सभी समान रूप से विनष्ट कर रहे हैं, लेकिन मैं सोचता हूँ कि जो व्यक्ति इनका न्यूनतम दुरुपयोग करता है, वह कम दोषी है । उतना नुक्सान तो सर्व-सहा धरती आसानी से झेल लेती है, और उसकी क्षतिपूर्ति भी कर देती है । "
"हाँ ",-मैंने उसकी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा ।
"अच्छा, क्या आप मुझे तंत्र के संबंध में कुछ बतलाएंगे ? " -उसने बिना देर किए मौके का फायदा उठाते हुए मुझसे पूछ लिया ।
"तंत्र के संबंध में ? इसका तुम्हें क्या उपयोग होगा ? "
"देखिये मेरे माता-पिता को ध्यान और भारतीय आध्यात्म की दूसरी चीज़ें बहुत आकर्षित करतीं थीं, लेकिन तंत्र के प्रति उनके कुछ पूर्वाग्रह थे । सिर्फ़ पूर्वाग्रह ही नहीं थे, बल्कि यह उन्हें शायद एक धोखा या ऐसा ही कुछ लगता था । वे तंत्र से डरते भी थे, और ज़ाहिर है कि उनका तंत्र का यह आधा-अधूरा ज्ञान ही था जिसके कारण तंत्र का नाम लेते ही उनकी भौंहें तन जातीं थीं । "
"तुम्हारा अपना धर्म क्या है ?" -मैं स्वयं ही अनजाने ही दलदल में उतर गया था । मैं उसके फैलाए जाल में फँस चुका था ।
"यही तो, " -वह गंभीर होकर बोला ।
मैं उसे देख रहा था ।
"मेरा, या कहें 'हमारा' कोई धर्म भी है ?"
"अरे भाई कोई तो धर्म परम्परा से तुम्हें मिला होगा, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे नाते-रिश्तेदार, तुम जहाँ रहते हो वहाँ का समाज, किसी तो धर्म से जुड़ा होगा ? " -मैंने थोड़े रोष और आश्चर्य से कहा ।
"लगता है हमें लम्बी चर्चा करनी होगी, मैं तैयार हूँ, मैं बहुत संक्षेप में आपको बतलाऊँगा कि ऐसा क्यों है कि मेरा कोई धर्म नहीं है ! लेकिन फ़िर भी उसमें आपको धीरज से सुनना होगा, मेरा निवेदन है यह आपसे ! "
- उसने अनुनयपूर्वक कहा ।
"ठीक है । " -मैं राजी था ।
'हमारा यूरोप, जहाँ खासकर दो परम्पराएँ प्रचलित हैं, यहूदी, और ईसाई, और एक तीसरी परम्परा जो मध्य एशिया से आई है, अर्थात इस्लाम, इन्हें मैं 'धर्म' की श्रेणी में नहीं रखता । ये 'परम्पराएँ'-मात्र हैं, न कि धर्म । इसीलिये मैंने आपसे निवेदन किया कि आप कृपया धीरज से मेरी बातें सुनें । "
जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ, मैं अनजाने में ही एक दलदल में उतर आया था, और वही अब मेरा उद्धार करनेवाला था । अब मुझे वह 'धर्म' के महासमर में खींच लाया था । मुझे भगवद्गीता याद आ रही थी ,
"किम् कर्म किम् अकर्मो वा, कवयो-अपि अत्र विमोहिता :"
पता नहीं गीता में इस श्लोक में किस शब्द का इस्तेमाल हुआ है, लेकिन मुझे लगता है कि इस श्लोक में यदि 'कर्म' के स्थान पर 'धर्म' लिखा होता, तो शायद अविज्नान का अभिप्राय इस समय यही जान पड़ता था । मुझे धीरज रखने को कहा गया था ।
"गलती कहाँ है ?" -उसने पूछा । मुझे लग रहा था कि इस समय उसका ज़ोर सीखने की बजाय सिखाने पर अधिक था ।
"मैं आपको ज्यादा परेशान नहीं करूँगा । मेरा अपना सम्प्रदाय है ईसाई । सम्प्रदाय धर्म नहीं है, और धर्म सम्प्रदाय हो भी सकता है तथा नहीं भी हो सकता । यदि सम्प्रदाय का अर्थ 'sect' करें, तो भी कुछ छूट जाता है, सम्प्रदाय संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है, सम्यकत्वेन प्रदीयेत इति ... ... । मैं बहुत अच्छी संस्कृत नहीं जानता लेकिन उस अर्थ में भी सम्प्रदाय शब्द का प्रयोग वैदिक या सनातन धर्म की परम्पराओं तथा शिक्षाओं को जिन लोगों (ऋषियों) ने स्थापित किया और जिसे अपनी संतानों के लिए सुरक्षित किया , उनके अपने अपने वर्ग-विशेष हेतु होता है । पश्चिम की तीनों परम्पराओं में ऐसा कुछ नहीं है, वे 'विश्वास' पर आधारित हैं, वहाँ 'मान्यताएँ' हैं, वहाँ सम्प्रदाय नहीं हैं, अपने-अपने 'sect' हैं, -फिरके हैं। हरेक की अपनी अपनी किताब है, अपना-अपना अन्तिम पैगम्बर है, और दूसरे पैगम्बरों के बारे में उनकी मान्यताओं में असहमति है । हैरानी की बात यह है कि यहूदी परम्परा वैदिक परम्परा का ही बहुत बदला हुआ रूप है, अब इसे क्या कहूँ ? फ़िर इस बदलाव में ऐतिहासिक प्रभावों के फलस्वरूप ईसाइयत और इस्लाम का जन्म हुआ। बदलाव में और बदलाव हुए, इतिहास गवाह है कि इन परम्पराओं का आपसी बैर कितना गहरा है । फ़िर इन तीनों परम्पराओं के पुन: अनेक फिरके और अनेक विरोधाभास हैं, तत्त्व-चिंतन का तो वहाँ नाम तक नहीं है । पाश्चात्य विद्वानों ने जब वैदिक ग्रंथों का अध्ययन किया तो अपने परम्परा से प्राप्त हुए पूर्वाग्रहों के खाके में उसका औचित्य टटोलने लगे । उन्होंने इसे 'religion' समझा और 'धर्म' का अनुवाद 'religion' हो गया । फ़िर आपके देश के गांधीजी जैसे लोगों ने सारे 'धर्मों' को समान समझने की शिक्षा दी, जो कि मूलत: एक 'blunder' है । मैं नहीं जानता कि मेरी बात आपको किस हद तक गले उतर सकेगी । लेकिन आज की समस्याएँ उन्हीं की शिक्षाओं का दुष्परिणाम हैं । मेरे लिए गांधीजी कतई महत्वपूर्ण नहीं हैं, लेकिन उनकी शिक्षाओं में विद्यमान विसंगतियों को हम देखना तक नहीं चाहते, यही हमारी और एक भूल है, ऐसा लगता है । "
"तो तुम अपने को हिन्दू कहना चाहते हो ?" -मैंने पूछा ।
"यही तो, ... ..." , यह उसका तकिया-कलाम था ।
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"मुझे नहीं लगता कि 'हिन्दू' कोई धर्म है , किसी भी वैदिक-ग्रन्थ या पौराणिक शास्त्र में भी इस शब्द का नाम नहीं पाया जाता । यह यहाँ के रहनेवालों को, पश्चिमी लोगों द्वारा दिया गया जातीय नाम है, जिससे यहाँ के निवासियों को संबोधित किया जाता रहा है । "
"तुम क्या सोचते हो, क्या गांधीजी ग़लत थे ? " -मैंने पूछा ।
"बेशक । लेकिन इसका सबूत मुझे नहीं देना है । मेरे पास बस इसके पर्याप्त प्रमाण हैं की कैसे एक 'किताब' का ज़िक्र , यहूदी, ईसाई, कैथोलिक, और इस्लामिक परम्पराएँ करती रहीं हैं, कैसे ऋग्वेद के इन्द्र का नाम यहोवा था, और कैसे यहूदी परम्परा के उदय से पहले जिसे पगानिस्म कहा जाता है, वैसी सामाजिक परम्परा पूरी धरती पर थी । आज इस सब बारे में पर्याप्त खोज-बीन की जा चुकी है । वैसे आपने मेरे धर्म के बारे में पूछा इसलिए इतना बताना ज़रूरी समझा। आपने सूना, इसके लिए आपका धन्यवाद । " -इतना कहकर वह मेरी ओर देखने लगा । उसकी बातों में सच्चाई थी । मुझे शर्म आने लगी कि एक विदेशी मेरे और मेरी परम्पराओं, भाषा, तथा संस्कृति आदि के बारे में मुझसे बेहतर जानता है । शर्म भी, और गौरव भी अनुभव हो रहा था !

April 04, 2009

उन दिनों / 16.

हमारे इस सत्र का एक 'अभिसमय' था । पहले यह बतला दूँ कि 'सर' के यहाँ पर आते ही यह तय हो गया था कि इसे हम सत्र (session) भर कहेंगे । और यह बहुत हद तक अनौपचारिक था । इसे न तो प्लान किया गया था, और न इसे कोई नाम दिया गया था । 'एजेंडा' जैसा कुछ नहीं था । अधिक से अधिक फ्रैंडली चैट कह सकते हैं इसे । अब रही बात 'अभिसमय' की, तो आज ही डॉ. वेदप्रताप वैदिक के एक लेख में 'अभिसमय' इस शब्द का प्रयोग देखने को मिला था, जिसे उन्होंने 'convention' के अर्थ में इस्तेमाल किया था । उनका संकेत ब्रिटिश संविधान के उन अलिखित 'conventions' की ओर था, जिसका पालन करना ब्रिटेन के शासकों, नेताओं, पार्लियामेंट हाउस ऑफ़ कॉमन्स तथा हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स से किया जाना अपेक्षित होता है । और मैंने वहाँ से यह शब्द उठा लिया, -श्री वैदिक के प्रति आभार सहित ।
सो, हमारा 'अभिसमय' यही था कि हम अपने विचार, मत, वक्तव्य आदि के लिए किसी शास्त्र, धर्म-शास्त्र, धार्मिक मान्यताओं, ग्रंथों, विचारकों, दार्शनिकों, आदि को बीच में नहीं लायेंगे । इसके अपने फायदे हैं, -और अपने जोखिम भी हैं । पर यह 'अभिसमय' हम सबने मानों साथ बैठकर तय किया हो, ऐसा लग रहा था, जबकि इसे तो मैंने सत्र की समाप्ति पर अचानक ही महसूस किया था, - नोट किया था ।
अविज्नान और 'सर' के बीच की बातचीत, ज़ाहिर है कि अभी शुरू ही हुई थी । अविज्नान की अंतर्दृष्टि, और 'सर' की प्रज्ञा दोनों के बीच 'ट्यूनिंग' बैठ गयी थी । अविज्नान के पास मौलिक चिंतन की अथाह क्षमता थी, और 'सर' के पास उस क्षमता को 'जागृत' करने की असाधारण शक्ति । मुझे याद आता है, अविज्नान से जब मेरा परिचय हुआ था तो वह सिगरेट पीता था, शायद आज भी पीता हो, मुझे उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन वह तो मानो हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ा हुआ था ।
नवलक-तंत्र के आचार्य क्षेमस्वर को कौन नहीं जानता ! मेरा एक मित्र रतनलाल खेमेसरा कहा करता था, कि उसका कुलनाम उनसे ही प्रारंभ हुआ था , लेकिन मैं स्वयं भी तब तक उनके नाम से अपरिचित था, जब तक कि अविज्नान से मेरी मुलाक़ात नहीं हुई थी ! सचमुच काल के प्रवाह में यद्यपि सब कुछ बह जाता है, लेकिन संयोगवश या अपूर्व की शक्ति से कभी-कभी वह पुनः उभरकर प्रत्यक्ष भी हो उठा करता है ।
सन् १९९३-९४ की बात रही होगी । यात्रा पर था मैं । उड़ीसा के पुरी का समुद्र-तट । स्वास्थ्य काफी ख़राब था । बस ऐसे ही कुछ वक्त गुजारने के लिए घूमता-घामता नंदी lodge के पीछे इस समुद्र-तट पर चला आया था । मछेरों के नॉयलोन के जाल बनाए -सुधारे जा रहे थे । हो सकता है कि दो-एक दिनों में ज्वार आनेवाला हो, क्योंकि तब शुक्ल-पक्ष समाप्ति की ओर था, या यह वैसे ही उनकी रोज़मर्रा ज़िंदगी का हिस्सा रहा हो, और मछलियाँ बटोरने के लिए ज्वार का इंतज़ार हो रहा हो । जो भी हो । समुद्र-तट पर भीड़ में मैं एकाकी-सा रेत में ही एक स्थान पर पैर फैलाकर बैठ गया था । थोड़ी ही दूरी पर कुछ विदेशी तैरने और जल-क्रीडा करने के बाद कोल्ड्रिंक्स आदि का सेवन कर रहे थे । मैंने दो दिनों से खाना तक नहीं खाया था । बस चाय, पानी, थोडा सा नमकीन आदि बीच-बीच में खाता रहा था । पुरी के स्टेशन पर एक गंदे-से होटल में चार छोटी-छोटी इडलियां ज़रूर सुबह जैसे-तैसे खाईं थीं , -नाश्ते के तौर पर । लेकिन सभी चीज़ें बहुत महँगी और घटिया किस्म की लग रहीं थीं ।
मेरे समीप ही एक यूरोपियन भी आकर बैठ गया था । मुझे पता भी नहीं चला की वह वहाँ कब आकर बैठ गया था । और उस पर दृष्टि पड़ते ही मैंने अपनी नज़रें तुंरत ही उससे दूर हटा ली थी, क्योंकि मेरा ख्याल था की विदेशियों के बारे में मैं कुछ ठीक से नहीं जानता, उनके बारे में कोई भी अनुमान लगाना रिस्की होता है । थोड़ी देर तक वह वहाँ बैठा समुद्र को देखता रहा, फ़िर उसने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला ।
"आप लेंगे ?" -कहते हुए अचानक ही उसने इतनी सहजता और आत्म-विश्वासपूर्वक मेरी ओर सिगरेट का पैकेट बढाया कि मैं अचकचा गया । उसके हिन्दी के विशुद्ध उच्चारण और टोन से मैं चकित हुआ, लेकिन उसकी आवाज़ में फ़िर भी विदेशी और खासकर यूरोपियन या अमरीकी रंग भी झलक रहा था । मैंने मानो उसकी ओर नहीं देखा हो, और उसकी आवाज़ नहीं सुनी, ऐसा अभिनय किया । उसने अपनी उपेक्षा पर कोई प्रतिक्रया नहीं दर्शाई ।
आकाश की ओर देखते हुए लेकिन मुझे संबोधित करते हुए उसने थोड़ी सी ऊंची आवाज़ में पूछा, -
"If you don't mind, may I smoke here ?"
"Oh sure !", - मैंने उदासीन भाव से उसे उत्तर दिया , और पुनः समुद्र की लहरों, उसमें जल-क्रीडा करते युवक-युवतियों, बच्चों, आदि को देखने लगा । सचमुच भारतीय लोग कोई भी काम पूरी सहजता और उन्मुक्तता से नहीं कर पाते हैं । वे शर्म, संकोच, अपराध-बोध, और तथाकथित माडर्न और 'फ्रैंक' होने के गर्व तथा 'नयेपन' के रोमांच को अनुभव करने के मिले-जुले अहसास से किसी भी चीज़ के स्वाभाविक आनंद का सत्यानाश कर डालते हैं । लेकिन वह वर्ष ९३-९४ की बात थी । अब सदी पलट गयी है , मेरे मित्र, खासकर नई पीढी के लोग मुझसे कहते हैं, -"अरे, अब तो इंडिया 'americanised' हो चला है । " मैं उनकी बात से सहमत हूँ । आजकल लड़कों की 'girlfriend' और लड़कियों के 'boyfriend' होना 'socially accepted' होता जा रहा है, ऐसा लगता है, और वह भी इस छोटी सी कालोनी तक में दिखलाई देता है । 'मोबाइल'-क्रांति इधर के पाँच-दस वर्षों में भारत के आम बच्चों के चेहरे और चिंतन (या नज़रिया ?) में जमीन-आसमान का फर्क ले आई है । लेकिन उस समुद्र-तट पर नहाते या जलक्रीडा करते उन भारतीयों में अजनबियों से 'शर्म', जान-पहचानवालों से 'सभी' दूरी, इन सबका अटपटा घालमेल नजर आ रहा था । खैर, वे उनकी जानें, -मैंने सोचा ।
लेकिन यह यूरोपीय, जो निश्चिंतता से यहाँ बैठे हुए सिगरेटें फूंक रहा था, अचानक सिगरेट बुझाकर मेरे बिल्कुल पास आ बैठा ।
" आप क्षमा करें, तो मैं आपसे परिचय करना चाहता हूँ ।" -वह पुनः बोलचाल की शुद्ध हिन्दी बोल रहा था ।
"मुझसे ?, क्यों ? "- मुझे हैरत हुई ।
"इसलिए, क्योंकि आप आम भारतीयों जैसे नहीं लगते । "
"कैसे ?"
"देखिये आप सबसे उदासीन, कटे-कटे से, अकेले ही बैठे हैं, मैंने बातचीत करने के इरादे से दो बहाने बनाए, पर आपने मुझे ज़रा भी महत्व नहीं दिया, शायद आप मेरे बारे में सोचना तक नहीं पसंद करेंगे ।"
"ठीक है, इसके लिए मैं आपसे माफी चाहता हूँ । " - मैंने एक बार फ़िर औपचारिक सा उत्तर दिया और पुनः अनुद्विग्न भाव से समुद्र की ओर देखने लगा ।
"लेकिन फ़िर आप यूरोपियन या अमेरिकन भी नहीं लगते । "
"हाँ ।"
"मैं सोचता हूँ कि आपके पास अवश्य ही वह रहस्य है, जो भारतीय ऋषियों के पास हुआ करता था । "मुझे समझ में नहीं आया कि आख़िर वह मुझसे क्या चाह रहा था, अभी तो मैं इस साधारण से रहस्य को भी नहीं समझ सका था ।
"देखिये, मैं पिछले बारह-तेरह वर्षों से संतों, ऋषियों, आदि की खोज में भटकता रहा हूँ ।, और इसी खोज को जारी रखने के लिए मैंने हिन्दी सीखी, मैं थोड़ी-बहुत तिब्बती और संस्कृत भी जानने लगा हूँ, और मैंने सूना है कि वास्तविक संत की यही पहचान है, कि उसके समीप जाने पर मन अनायास ही शांत हो जाता है । और इसी कसौटी पर मुझे महसूस हुआ कि आप ऐसे ही एक श्रेष्ठ संत हैं, इसलिए मैं बेझिझक आपके पास चला आया । आप ऋषि भी हों तो कोई आश्चर्य की बात न होगी । "
"अच्छा ! " -मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया ।
"हाँ, और यह अकारण नहीं है, कि मैं किसी बहाने से आपके समीप पुनः आया, और मेरे इस अनुमान की पुष्टि भी हो गयी ।"
उसकी शुद्ध, धाराप्रवाह हिन्दी के लहजे से मुझे लगा, हो न हो, यह किसी विदेशी सरकार का एक जासूस है ।
"आप सोच रहे होंगे कि मैं किसी विदेशी सरकार या गुप्तचर संस्था द्वारा भेजा हुआ एक जासूस तो नहीं हूँ !" -उसने मानो मेरे विचार को पढ़ लिया हो ।
"हाँ, सोच तो रहा था, लेकिन यह समझ में आते ही, कि आप दूसरों के विचार भी पढ़ सकते हैं, मैंने उस विचार को झटक दिया । "
"यही तो ! मैं जाने-अनजाने कभी-कभी दूसरों के विचार तो पढ़ भी लेता हूँ, लेकिन ख़ुद अपने विचारों से त्रस्त रहता हूँ ।" और मुझे चिंताओं, भयों, इच्छाओं आदि से छुटकारे का उपाय नहीं मिल रहा है ।
"अच्छा ! "
"मेरा नाम अविज्नान है, और मैं यहाँ पर दो दिनों तक और रहूँगा । मैं चाहता हूँ आप मुझे कुछ सिखाएं । "
"मैं ? -मैं आपको क्या सिखा सकता हूँ ? " -मैंने थोड़ा आश्चर्य-चकित होकर कहा ।
"कुछ भी । जो भी आप उचित समझें । "
"देखो भाई, मैं हिन्दुस्तानी आदमी हूँ, और चाय पीने की इच्छा हो रही है । " -मैंने सोचा शायद इस बहाने इस विचित्र मुलाक़ात का अंत हो सकेगा ।
"चलिए, मैं भी पी लूंगा । "
हम दोनों पास के किओस्क नुमा केबिन में जाकर बैठ गए ।
"यहाँ शायद चाय नहीं मिलेगी ", -उसने आसपास नज़रें दौडाते हुए कहा ।
"फ़िर काफ़ी चलेगी । "
बैरा काफ़ी ले आया ।
थोड़ी देर बाद उसने अपनी जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और टेबल पर रखी माचिस के बजाय अपनी ही दूसरी जेब से लाईटर निकाला ।
"आप सचमुच स्मोकिंग बिल्कुल नहीं करते ? " - एक बार फ़िर उसने पूछा ।
"मैं कभी-कभी बीड़ी पी लेता हूँ । " -मुझे मजाक सूझी ।
वह थोड़ी हैरत से मुझे देखने लगा । मैंने दृष्टि फेर ली ।
"अच्छा ! " -कहकर वह सिगरेट जलाने लगा । पास से आ रही समुद्री हवाएं उसके सिगरेट जलाने में बाधा दे रहीं थीं ।
"आप कब तक यहाँ रहेंगे ? " -उसने पूछा ।
"बस कल ही सुबह चला जाऊंगा । "
कुछ समय बाद हम बाहर निकल आए । पुनः घूमते हुए उसी स्थान पर जाकर वापस बैठ गए जहाँ से काफ़ी पीने के लिए उठकर किओस्क गए थे ।
"आप..., तुम मुझसे क्या सीखना चाहते हो ? " -मैंने पूछा ।
"मुझे आपसे क्या सीखना चाहिए ? " उसने सवाल किया ।
"हाँ, यह ठीक है, अच्छा अपने बारे में पहले कुछ बतलाओ, अब तक तुम क्या-क्या करते रहे, पढाई-लिखाई, जन्म, परिवार , और ये आध्यात्म और भारत का क्या चक्कर है ? "
"मैं आस्ट्रिया में पैदा हुआ था, फ़िर माता पिता के साथ जर्मनी चला गया था। बाद में मेरे माता-पिता के बीच तलाक हो गया था लेकिन फ़िर भी वे एक-दूसरे के अच्छे दोस्त ज़रूर बने रहे थे । उन्होंने उनके अकेले बेटे यानी मेरी परवरिश में लापरवाही नहीं की । मेरे माता- पिता भी आध्यात्म, खासकर 'मेडिटेशन' नाम की चीज़ की ओर बहुत आकर्षित थे । मेरी माता तो हिंदू बनना चाहतीं थीं , और मेरे पिता उपनिषद् तथा गीता आदि पढा करते थे । लेकिन उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो उन्हें इन ग्रंथों के बारे में ठीक से समझाता । भारत में भी विद्वान् लोग हैं, वे कोरे बौद्धिक हैं, और ज़्यादातर तो ख़ुद ही भ्रमित हैं । दूसरी ओर पारंपरिक मठों आश्रमों के मठाधिकारी या महंत आदि हैं, वे अपनी परम्परा से बाहर के लोगों की अवहेलना करते हैं । फ़िर कुछ स्वघोषित, तथाकथित 'enlightened' लोग हैं, कुछ 'भगवान्', स्वामी, आचार्य, godman, आदि हैं, जिनके अपने-अपने अनुषंगी ध्येय हैं, वे राजनीति से ज्योतिष, और तंत्र से योग और साहित्य तक में दखल रखते हैं । हम जैसे लोग उनके दायरे में कतई फिट नहीं होते । कुछ गुरु या साधु-संत किस्म के लोग भी हैं, लेकिन ज़्यादातर लोग तो 'मार्केटिंग' (स्पिरिच्युअल व्हीलिंग ) में ही लगे हैं । "
-कहते हुए वह हँसने लगा ।
"हम न तो यह समझ सकते हैं कि उनमें से कौन जेनुइन स्पिरिच्युअल टीचर है, और न उन पर शंका कर सकते हैं । लेकिन स्थिति लगभग यही है । बस इसलिए मेरे पिता ख़ुद ही बहुत सी किताबें पढ़कर यह जानने की कोशिश करते रहे कि इस सबका सच्चा तत्त्व खोज पाएँ । यूँ कहें कि दर्शन-शास्त्र की भूल-भुलैया में भटक गए । मेरी माता चित्रकार है, और उसमें ही उन्होंने आध्यात्मिक शान्ति खोज ली है, ऐसा वे कहती हैं । मुझे नहीं पता कि इसका मतलब क्या है ! लेकिन अब उन्हें सिर्फ़ मृत्यु की प्रतीक्षा है, तब तक जीवन भक्ति करते हुए गुजारना है, ऐसा भी उनका विश्वास है। वे शिव-भक्त हैं, और बस ओम नमः शिवाय का जाप करती हैं। वैसे सिनेमा, ड्रामा, (थियेटर) आदि देखना भी उन्हें अच्छा लगता है । पार्टियों में आना-जाना भी उन्हें अच्छा लगता है, लेकिन वे चर्च कभी भूलकर भी नहीं जातीं । मेरे माता-पिता शर्रब नहीं पीते, लेकिन दोनों कभी-कभी स्मोकिंग करते हैं । वही बात मेर जींस में भी आ गयी है, ऐसा लगता है । " -कहकर वह फ़िर मंद-मंद मुस्कुराने लगा ।
"और तुम्हारी पढाई-लिखाई ? "
"कॉलेज तक पढाई की, स्कोलरशिप मिल गयी थी, माता-पिता भी देख-भाल करते थे, कॉलेज में ही हिन्दी और संस्कृत पढ़ा, , भारतीय भाषाएँ पढ़ीं, और भारत चला आया ।"
"और तिब्बती कहाँ सीख ली ?"
"कुछ समय धर्मशाला,सिक्किम, भूटान तथा नेपाल के मठों के चक्कर लगाते हुए टूटी-फूटी तिब्बती सीख ली । लेकिन अभी भी कोई ख़ास नहीं आती । "
उसकी सिगरेट ख़त्म हो चुकी थी, उसने उसे धरती पर रेत में मसलकर बुझा दिया और दूसरी एक जलाने का उपक्रम करने लगा ।
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