April 04, 2009

उन दिनों / 16.

हमारे इस सत्र का एक 'अभिसमय' था । पहले यह बतला दूँ कि 'सर' के यहाँ पर आते ही यह तय हो गया था कि इसे हम सत्र (session) भर कहेंगे । और यह बहुत हद तक अनौपचारिक था । इसे न तो प्लान किया गया था, और न इसे कोई नाम दिया गया था । 'एजेंडा' जैसा कुछ नहीं था । अधिक से अधिक फ्रैंडली चैट कह सकते हैं इसे । अब रही बात 'अभिसमय' की, तो आज ही डॉ. वेदप्रताप वैदिक के एक लेख में 'अभिसमय' इस शब्द का प्रयोग देखने को मिला था, जिसे उन्होंने 'convention' के अर्थ में इस्तेमाल किया था । उनका संकेत ब्रिटिश संविधान के उन अलिखित 'conventions' की ओर था, जिसका पालन करना ब्रिटेन के शासकों, नेताओं, पार्लियामेंट हाउस ऑफ़ कॉमन्स तथा हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स से किया जाना अपेक्षित होता है । और मैंने वहाँ से यह शब्द उठा लिया, -श्री वैदिक के प्रति आभार सहित ।
सो, हमारा 'अभिसमय' यही था कि हम अपने विचार, मत, वक्तव्य आदि के लिए किसी शास्त्र, धर्म-शास्त्र, धार्मिक मान्यताओं, ग्रंथों, विचारकों, दार्शनिकों, आदि को बीच में नहीं लायेंगे । इसके अपने फायदे हैं, -और अपने जोखिम भी हैं । पर यह 'अभिसमय' हम सबने मानों साथ बैठकर तय किया हो, ऐसा लग रहा था, जबकि इसे तो मैंने सत्र की समाप्ति पर अचानक ही महसूस किया था, - नोट किया था ।
अविज्नान और 'सर' के बीच की बातचीत, ज़ाहिर है कि अभी शुरू ही हुई थी । अविज्नान की अंतर्दृष्टि, और 'सर' की प्रज्ञा दोनों के बीच 'ट्यूनिंग' बैठ गयी थी । अविज्नान के पास मौलिक चिंतन की अथाह क्षमता थी, और 'सर' के पास उस क्षमता को 'जागृत' करने की असाधारण शक्ति । मुझे याद आता है, अविज्नान से जब मेरा परिचय हुआ था तो वह सिगरेट पीता था, शायद आज भी पीता हो, मुझे उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन वह तो मानो हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ा हुआ था ।
नवलक-तंत्र के आचार्य क्षेमस्वर को कौन नहीं जानता ! मेरा एक मित्र रतनलाल खेमेसरा कहा करता था, कि उसका कुलनाम उनसे ही प्रारंभ हुआ था , लेकिन मैं स्वयं भी तब तक उनके नाम से अपरिचित था, जब तक कि अविज्नान से मेरी मुलाक़ात नहीं हुई थी ! सचमुच काल के प्रवाह में यद्यपि सब कुछ बह जाता है, लेकिन संयोगवश या अपूर्व की शक्ति से कभी-कभी वह पुनः उभरकर प्रत्यक्ष भी हो उठा करता है ।
सन् १९९३-९४ की बात रही होगी । यात्रा पर था मैं । उड़ीसा के पुरी का समुद्र-तट । स्वास्थ्य काफी ख़राब था । बस ऐसे ही कुछ वक्त गुजारने के लिए घूमता-घामता नंदी lodge के पीछे इस समुद्र-तट पर चला आया था । मछेरों के नॉयलोन के जाल बनाए -सुधारे जा रहे थे । हो सकता है कि दो-एक दिनों में ज्वार आनेवाला हो, क्योंकि तब शुक्ल-पक्ष समाप्ति की ओर था, या यह वैसे ही उनकी रोज़मर्रा ज़िंदगी का हिस्सा रहा हो, और मछलियाँ बटोरने के लिए ज्वार का इंतज़ार हो रहा हो । जो भी हो । समुद्र-तट पर भीड़ में मैं एकाकी-सा रेत में ही एक स्थान पर पैर फैलाकर बैठ गया था । थोड़ी ही दूरी पर कुछ विदेशी तैरने और जल-क्रीडा करने के बाद कोल्ड्रिंक्स आदि का सेवन कर रहे थे । मैंने दो दिनों से खाना तक नहीं खाया था । बस चाय, पानी, थोडा सा नमकीन आदि बीच-बीच में खाता रहा था । पुरी के स्टेशन पर एक गंदे-से होटल में चार छोटी-छोटी इडलियां ज़रूर सुबह जैसे-तैसे खाईं थीं , -नाश्ते के तौर पर । लेकिन सभी चीज़ें बहुत महँगी और घटिया किस्म की लग रहीं थीं ।
मेरे समीप ही एक यूरोपियन भी आकर बैठ गया था । मुझे पता भी नहीं चला की वह वहाँ कब आकर बैठ गया था । और उस पर दृष्टि पड़ते ही मैंने अपनी नज़रें तुंरत ही उससे दूर हटा ली थी, क्योंकि मेरा ख्याल था की विदेशियों के बारे में मैं कुछ ठीक से नहीं जानता, उनके बारे में कोई भी अनुमान लगाना रिस्की होता है । थोड़ी देर तक वह वहाँ बैठा समुद्र को देखता रहा, फ़िर उसने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला ।
"आप लेंगे ?" -कहते हुए अचानक ही उसने इतनी सहजता और आत्म-विश्वासपूर्वक मेरी ओर सिगरेट का पैकेट बढाया कि मैं अचकचा गया । उसके हिन्दी के विशुद्ध उच्चारण और टोन से मैं चकित हुआ, लेकिन उसकी आवाज़ में फ़िर भी विदेशी और खासकर यूरोपियन या अमरीकी रंग भी झलक रहा था । मैंने मानो उसकी ओर नहीं देखा हो, और उसकी आवाज़ नहीं सुनी, ऐसा अभिनय किया । उसने अपनी उपेक्षा पर कोई प्रतिक्रया नहीं दर्शाई ।
आकाश की ओर देखते हुए लेकिन मुझे संबोधित करते हुए उसने थोड़ी सी ऊंची आवाज़ में पूछा, -
"If you don't mind, may I smoke here ?"
"Oh sure !", - मैंने उदासीन भाव से उसे उत्तर दिया , और पुनः समुद्र की लहरों, उसमें जल-क्रीडा करते युवक-युवतियों, बच्चों, आदि को देखने लगा । सचमुच भारतीय लोग कोई भी काम पूरी सहजता और उन्मुक्तता से नहीं कर पाते हैं । वे शर्म, संकोच, अपराध-बोध, और तथाकथित माडर्न और 'फ्रैंक' होने के गर्व तथा 'नयेपन' के रोमांच को अनुभव करने के मिले-जुले अहसास से किसी भी चीज़ के स्वाभाविक आनंद का सत्यानाश कर डालते हैं । लेकिन वह वर्ष ९३-९४ की बात थी । अब सदी पलट गयी है , मेरे मित्र, खासकर नई पीढी के लोग मुझसे कहते हैं, -"अरे, अब तो इंडिया 'americanised' हो चला है । " मैं उनकी बात से सहमत हूँ । आजकल लड़कों की 'girlfriend' और लड़कियों के 'boyfriend' होना 'socially accepted' होता जा रहा है, ऐसा लगता है, और वह भी इस छोटी सी कालोनी तक में दिखलाई देता है । 'मोबाइल'-क्रांति इधर के पाँच-दस वर्षों में भारत के आम बच्चों के चेहरे और चिंतन (या नज़रिया ?) में जमीन-आसमान का फर्क ले आई है । लेकिन उस समुद्र-तट पर नहाते या जलक्रीडा करते उन भारतीयों में अजनबियों से 'शर्म', जान-पहचानवालों से 'सभी' दूरी, इन सबका अटपटा घालमेल नजर आ रहा था । खैर, वे उनकी जानें, -मैंने सोचा ।
लेकिन यह यूरोपीय, जो निश्चिंतता से यहाँ बैठे हुए सिगरेटें फूंक रहा था, अचानक सिगरेट बुझाकर मेरे बिल्कुल पास आ बैठा ।
" आप क्षमा करें, तो मैं आपसे परिचय करना चाहता हूँ ।" -वह पुनः बोलचाल की शुद्ध हिन्दी बोल रहा था ।
"मुझसे ?, क्यों ? "- मुझे हैरत हुई ।
"इसलिए, क्योंकि आप आम भारतीयों जैसे नहीं लगते । "
"कैसे ?"
"देखिये आप सबसे उदासीन, कटे-कटे से, अकेले ही बैठे हैं, मैंने बातचीत करने के इरादे से दो बहाने बनाए, पर आपने मुझे ज़रा भी महत्व नहीं दिया, शायद आप मेरे बारे में सोचना तक नहीं पसंद करेंगे ।"
"ठीक है, इसके लिए मैं आपसे माफी चाहता हूँ । " - मैंने एक बार फ़िर औपचारिक सा उत्तर दिया और पुनः अनुद्विग्न भाव से समुद्र की ओर देखने लगा ।
"लेकिन फ़िर आप यूरोपियन या अमेरिकन भी नहीं लगते । "
"हाँ ।"
"मैं सोचता हूँ कि आपके पास अवश्य ही वह रहस्य है, जो भारतीय ऋषियों के पास हुआ करता था । "मुझे समझ में नहीं आया कि आख़िर वह मुझसे क्या चाह रहा था, अभी तो मैं इस साधारण से रहस्य को भी नहीं समझ सका था ।
"देखिये, मैं पिछले बारह-तेरह वर्षों से संतों, ऋषियों, आदि की खोज में भटकता रहा हूँ ।, और इसी खोज को जारी रखने के लिए मैंने हिन्दी सीखी, मैं थोड़ी-बहुत तिब्बती और संस्कृत भी जानने लगा हूँ, और मैंने सूना है कि वास्तविक संत की यही पहचान है, कि उसके समीप जाने पर मन अनायास ही शांत हो जाता है । और इसी कसौटी पर मुझे महसूस हुआ कि आप ऐसे ही एक श्रेष्ठ संत हैं, इसलिए मैं बेझिझक आपके पास चला आया । आप ऋषि भी हों तो कोई आश्चर्य की बात न होगी । "
"अच्छा ! " -मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया ।
"हाँ, और यह अकारण नहीं है, कि मैं किसी बहाने से आपके समीप पुनः आया, और मेरे इस अनुमान की पुष्टि भी हो गयी ।"
उसकी शुद्ध, धाराप्रवाह हिन्दी के लहजे से मुझे लगा, हो न हो, यह किसी विदेशी सरकार का एक जासूस है ।
"आप सोच रहे होंगे कि मैं किसी विदेशी सरकार या गुप्तचर संस्था द्वारा भेजा हुआ एक जासूस तो नहीं हूँ !" -उसने मानो मेरे विचार को पढ़ लिया हो ।
"हाँ, सोच तो रहा था, लेकिन यह समझ में आते ही, कि आप दूसरों के विचार भी पढ़ सकते हैं, मैंने उस विचार को झटक दिया । "
"यही तो ! मैं जाने-अनजाने कभी-कभी दूसरों के विचार तो पढ़ भी लेता हूँ, लेकिन ख़ुद अपने विचारों से त्रस्त रहता हूँ ।" और मुझे चिंताओं, भयों, इच्छाओं आदि से छुटकारे का उपाय नहीं मिल रहा है ।
"अच्छा ! "
"मेरा नाम अविज्नान है, और मैं यहाँ पर दो दिनों तक और रहूँगा । मैं चाहता हूँ आप मुझे कुछ सिखाएं । "
"मैं ? -मैं आपको क्या सिखा सकता हूँ ? " -मैंने थोड़ा आश्चर्य-चकित होकर कहा ।
"कुछ भी । जो भी आप उचित समझें । "
"देखो भाई, मैं हिन्दुस्तानी आदमी हूँ, और चाय पीने की इच्छा हो रही है । " -मैंने सोचा शायद इस बहाने इस विचित्र मुलाक़ात का अंत हो सकेगा ।
"चलिए, मैं भी पी लूंगा । "
हम दोनों पास के किओस्क नुमा केबिन में जाकर बैठ गए ।
"यहाँ शायद चाय नहीं मिलेगी ", -उसने आसपास नज़रें दौडाते हुए कहा ।
"फ़िर काफ़ी चलेगी । "
बैरा काफ़ी ले आया ।
थोड़ी देर बाद उसने अपनी जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और टेबल पर रखी माचिस के बजाय अपनी ही दूसरी जेब से लाईटर निकाला ।
"आप सचमुच स्मोकिंग बिल्कुल नहीं करते ? " - एक बार फ़िर उसने पूछा ।
"मैं कभी-कभी बीड़ी पी लेता हूँ । " -मुझे मजाक सूझी ।
वह थोड़ी हैरत से मुझे देखने लगा । मैंने दृष्टि फेर ली ।
"अच्छा ! " -कहकर वह सिगरेट जलाने लगा । पास से आ रही समुद्री हवाएं उसके सिगरेट जलाने में बाधा दे रहीं थीं ।
"आप कब तक यहाँ रहेंगे ? " -उसने पूछा ।
"बस कल ही सुबह चला जाऊंगा । "
कुछ समय बाद हम बाहर निकल आए । पुनः घूमते हुए उसी स्थान पर जाकर वापस बैठ गए जहाँ से काफ़ी पीने के लिए उठकर किओस्क गए थे ।
"आप..., तुम मुझसे क्या सीखना चाहते हो ? " -मैंने पूछा ।
"मुझे आपसे क्या सीखना चाहिए ? " उसने सवाल किया ।
"हाँ, यह ठीक है, अच्छा अपने बारे में पहले कुछ बतलाओ, अब तक तुम क्या-क्या करते रहे, पढाई-लिखाई, जन्म, परिवार , और ये आध्यात्म और भारत का क्या चक्कर है ? "
"मैं आस्ट्रिया में पैदा हुआ था, फ़िर माता पिता के साथ जर्मनी चला गया था। बाद में मेरे माता-पिता के बीच तलाक हो गया था लेकिन फ़िर भी वे एक-दूसरे के अच्छे दोस्त ज़रूर बने रहे थे । उन्होंने उनके अकेले बेटे यानी मेरी परवरिश में लापरवाही नहीं की । मेरे माता- पिता भी आध्यात्म, खासकर 'मेडिटेशन' नाम की चीज़ की ओर बहुत आकर्षित थे । मेरी माता तो हिंदू बनना चाहतीं थीं , और मेरे पिता उपनिषद् तथा गीता आदि पढा करते थे । लेकिन उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो उन्हें इन ग्रंथों के बारे में ठीक से समझाता । भारत में भी विद्वान् लोग हैं, वे कोरे बौद्धिक हैं, और ज़्यादातर तो ख़ुद ही भ्रमित हैं । दूसरी ओर पारंपरिक मठों आश्रमों के मठाधिकारी या महंत आदि हैं, वे अपनी परम्परा से बाहर के लोगों की अवहेलना करते हैं । फ़िर कुछ स्वघोषित, तथाकथित 'enlightened' लोग हैं, कुछ 'भगवान्', स्वामी, आचार्य, godman, आदि हैं, जिनके अपने-अपने अनुषंगी ध्येय हैं, वे राजनीति से ज्योतिष, और तंत्र से योग और साहित्य तक में दखल रखते हैं । हम जैसे लोग उनके दायरे में कतई फिट नहीं होते । कुछ गुरु या साधु-संत किस्म के लोग भी हैं, लेकिन ज़्यादातर लोग तो 'मार्केटिंग' (स्पिरिच्युअल व्हीलिंग ) में ही लगे हैं । "
-कहते हुए वह हँसने लगा ।
"हम न तो यह समझ सकते हैं कि उनमें से कौन जेनुइन स्पिरिच्युअल टीचर है, और न उन पर शंका कर सकते हैं । लेकिन स्थिति लगभग यही है । बस इसलिए मेरे पिता ख़ुद ही बहुत सी किताबें पढ़कर यह जानने की कोशिश करते रहे कि इस सबका सच्चा तत्त्व खोज पाएँ । यूँ कहें कि दर्शन-शास्त्र की भूल-भुलैया में भटक गए । मेरी माता चित्रकार है, और उसमें ही उन्होंने आध्यात्मिक शान्ति खोज ली है, ऐसा वे कहती हैं । मुझे नहीं पता कि इसका मतलब क्या है ! लेकिन अब उन्हें सिर्फ़ मृत्यु की प्रतीक्षा है, तब तक जीवन भक्ति करते हुए गुजारना है, ऐसा भी उनका विश्वास है। वे शिव-भक्त हैं, और बस ओम नमः शिवाय का जाप करती हैं। वैसे सिनेमा, ड्रामा, (थियेटर) आदि देखना भी उन्हें अच्छा लगता है । पार्टियों में आना-जाना भी उन्हें अच्छा लगता है, लेकिन वे चर्च कभी भूलकर भी नहीं जातीं । मेरे माता-पिता शर्रब नहीं पीते, लेकिन दोनों कभी-कभी स्मोकिंग करते हैं । वही बात मेर जींस में भी आ गयी है, ऐसा लगता है । " -कहकर वह फ़िर मंद-मंद मुस्कुराने लगा ।
"और तुम्हारी पढाई-लिखाई ? "
"कॉलेज तक पढाई की, स्कोलरशिप मिल गयी थी, माता-पिता भी देख-भाल करते थे, कॉलेज में ही हिन्दी और संस्कृत पढ़ा, , भारतीय भाषाएँ पढ़ीं, और भारत चला आया ।"
"और तिब्बती कहाँ सीख ली ?"
"कुछ समय धर्मशाला,सिक्किम, भूटान तथा नेपाल के मठों के चक्कर लगाते हुए टूटी-फूटी तिब्बती सीख ली । लेकिन अभी भी कोई ख़ास नहीं आती । "
उसकी सिगरेट ख़त्म हो चुकी थी, उसने उसे धरती पर रेत में मसलकर बुझा दिया और दूसरी एक जलाने का उपक्रम करने लगा ।
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