March 26, 2009

उन दिनों / . 15.

तो ये अक्टूबर के दिन थे । रवि और अविज्नान उन दिनों मेरे घर में रहा करते थे । अविज्नान तो अपने कमरे में होता, वह रात्री में 'ध्यान' किया करता था । रवि रात्रि में क्रांतिकारी और 'विचारोत्तेजक' चिंतन वाली किताबें पढा करता था । वे दोनों इसलिए सुबह-सुबह शायद ही कभी उठते होंगे । सिर्फ़ तभी जब इसकी कोई ख़ास वज़ह हो । उन्हें पता था कि मेरे लौटकर आने तक वे आराम से सो सकते थे । अविज्नान का तो फ़िर भी कुछ तय नहीं था, कभी-कभी मैं लौटकर आ भी जाता और आठ-नौ बजे तक भी उसका कमरा बंद ही मिलता। मेरे घर में सारे दरवाजे ऐसे थे जो कि ठीक से बंद नहीं होते थे । अविज्नान ऊपर नए बने दो कमरों में से एक में टिका हुआ था । उसका दरवाजा बंद तो होता था लेकिन वह कभी उसके खुले या बंद होने की चिंता नहीं करता था । ऊपर बने दो कमरों के साथ एक छोटा किचन भी था लेकिन शायद ही उसने कभी उसे इस्तेमाल किया हो । जब आठ-नौ बजे तक भी उसका 'अवतरण' न होता, तो रवि सीढियाँ चढ़कर उसके कमरे में जाता, धीरे से किवाड़ उढ़काकर झाँकता तो अविज्नान पलटकर देखता । वह 'ब्रश' कर रहा या नहा रहा होता । या फ़िर ऐसे ही कुर्सी पर बैठा हुआ, सर कुर्सी की पीठ पर टिकाए हुए हाथों को एक-दूसरे से सटाकर ध्यानमग्न होता । कभी-कभी वह अब भी सो रहा होता, लेकिन एक खटके से ही उसकी आँखें खुल जातीं और पता चल जाता कि वह बस 'कहीं और' है । 'कहीं और', -रवि की दृष्टि में ।
अविज्नान से पूछें तो कहेगा - 'कहीं नहीं' । फ़िर अपनी बात सुधारते हुए कहेगा - 'यहीं हूँ ' । इसमें शब्दों के उसके तात्पर्य कुछ अलग थे । वह यहाँ परम स्वतंत्र था । रवि की ही तरह, - और मेरी तरह भी । उसका नीचे आना यदि आठ बजे तक न होता, तो रवि चाय बनाता, मैं और रवि चाय-नाश्ता करते । अगर अविज्नान आ जाता तो हम तीनों ।
मैं अपने सोफे पर बैठता, जो दो कुर्सियों के साइज़ का था । अन्य दो सोफे सिंगल चेयर के रूप में थे , और एक टी-टेबल के दोनों बाजू लेकिन काफी दूरी पर थे। कमरे की बनावट ऐसी थी की उन्हें टेबल के पास रखने पर आने-जाने का रास्ता रुकता था । मेरे सामने खिड़की थी / है, जिसमें दूर डी आर पी लाइन की पुरानी बिल्डिंग का दाहिना कोना दिखलाई देता । बीच के मैदान में कुत्ते, गाय, सूअर, और लोग भी आते-जाते दिखलाई देते । रवि अक्सर पिछले कमरे से प्लास्टिक की दो चेयर्स उठाकर ले आता और कमरा भरा-भरा सा लगने लगता ।
'सर' के आते ही व्यवस्था में बदलाव लाना पड़ा । ऊपर के एक कमरे को साफ़ कर 'सर' के लिए व्यवस्थित किया गया । ऊपर के किचन में थोड़ा सामान आदि रखा गया । फ्रिज ऊपर रखना मुश्किल था। छोटे से एल आई जी मकान की सीढियों से उसे ले जाना मुश्किल था ।
बरसात जा चुकी थी , हालाँकि कभी-कभी बादल घिर आते थे और सड़कों को धो जाते थे । उन दिनों सुबह, शाम, या दोपहर में भी घूमना बहुत अच्छा लगता था । मैं अकेला ही निकल पड़ता था । एल आई जी मकान में रहने के अपने फायदे हैं। खासकर तब, जब आपके रिश्ते-नातेदार एम आय जी या एच आय जी या फ्लैट्स में रहते हों । वे व्यस्त होते हैं, आप व्यस्त नहीं होते । -मैं व्यस्त नहीं था ।
इसलिए अक्टूबर की सुबह, दोपहर, शाम, या फ़िर रात में भी, सड़कों पर घूमने जा सकता था । यह एक सुख था । दिन भर में इतना walking हो जाता था की शरीर स्वस्थ रहता, वजन, रक्त-चाप, शुगर, सब कंट्रोल में रहते । और सौभाग्य से मेरे साथ इस उम्र तक इनमें से कोई समस्या नहीं है । आँखों पर चश्मा ज़रूर है, लेकिन वह भी दूर का । पढने-लिखने की आदत होते हुए भी पास की चीज़ें आसानी से देख समझ लेता हूँ -यहाँ तक की फाइन प्रिंट भी ।
'सर' के आने के बाद दोपहर-शाम का घूमना कम हो गया था। सुबह नाश्ते पर अब हम 'चार' होते थे । अविज्नान और रवि 'सर' को छोड़ना नहीं चाहते थे । 'सर' के आने के बाद रवि और अविज्नान नियमित रूप से जल्दी (नाश्ते के समय तक) फ्रेश होकर नाश्ते की मेज पर आ जाते थे । रवि बाज़ार से बहुत सी चीज़ें नमकीन, बिस्किट्स, टोस्ट, ले आया था । बाई भी उसके घर से कुछ न कुछ बनाकर नाश्ते के लिए भेज देती थी । काफी बनने लगी थी, और फ्रिज में फल भी रखे रहते थे । रवि कभी-कभी इडली या उपमा भी बना लेता था । अविज्नान इस मामले में फिसड्डी था । भारत में आने के बाद उसे भारतीय व्यंजन पसंद आने लगे थे, लेकिन वह वैसे भी उम्र के दसवें-बारहवें साल से शुद्ध शाकाहारी ही था । अंडे तक नहीं खाता था, मछली तो हरगिज़ नहीं, और माँस की गंध से ही उसे उबकाई आने लगती थी । शायद उसमें डाले जानेवाले मसालों की वज़ह से ।
नाश्ते की टेबल पर सारा सामान होता था । अविज्नान अब टेबल पर पहले की तरह पैर फैलाकर नहीं बैठता था , अब वैसा करना मुमकिन भी नहीं था । मेरा लिहाज़ वह अवश्य करता था लेकिन रवि से उसके टर्म्स अनौपचारिक थे । और 'सर' के प्रति तो उसमें अगाध श्रद्धा थी । नाश्ते की टेबल पर वह शून्य भाव से लेकिन प्रसन्न-चित्त बैठा रहता ।
" 'सर', मैं जानता हूँ कि आप अध्यात्म या धर्म के बारे में रेयरली कभी बात करते हैं । और मैं भी सोचता हूँ कि यह विषय अत्यन्त कठिन है । पर हो सकता है कि मेरा ऐसा सोचना ग़लत हो । "
-अविज्नान ने पहला मोहरा चला ।
नहीं, यह शतरंज नहीं था, लेकिन अविज्नान जितनी सतर्कता से बोलता है उस पर ध्यान देन तो कभी-कभी ऐसा लगता है मानों वह शतरंज का कोई खिलाड़ी हो । लेकिन अविज्नान हार-जीत को ध्यान में रखता हो ऐसा भी नहीं है -बल्कि उसे तो हार-जीत का ख़याल तक नहीं होता । एक बहता हुआ निर्झर, जो अपने रास्ते से निर्भयतापूर्वक बहता भर है । जो मुड़ सकता है, झुक सकता है, रुक भी सकता है, लेकिन अपना रास्ता निकाल ही लेगा।
'सर' शान्ति से सुन रहे थे । थोड़ी देर तक शान्ति छाई रही, रवि दीवाल पर टँगी हुई एक पेंटिंग को देख रहा था । उसकी रुचि अभी अविज्नान के प्रश्न के प्रति जागृत नहीं हुई थी ।
"मैं ऐसा इसलिए सोचता हूँ क्योंकि मनुष्य नामक जीव की विकास-यात्रा जिस प्रकार से चल रही है, उसमें इस धर्म या अध्यात्म की भुमिका अत्यन्त या कहें की सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्त्व है जो यह इस विकास-यात्रा की दशा और दिशा तय करता है । "
-अविज्नान ने अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा ।
"क्या अन्य जीवों में भी कोई विकास-यात्रा चल रही है ?" -'सर' ने पूछा ।
"हाँ, डार्विन के मतानुसार एक विकास या 'evolution' उनमें अभी भी जारी है और अभी तक उसके प्रमाण पाये जा रहे हैं । "
"वह कौन सा मौलिक अन्तर है जिसके आधार पर हम मनुष्य को अन्य प्राणियों से 'अलग' कह सकते हैं ?"
"शरीर-क्रिया-विज्ञान", और "शरीर-रचना-विज्ञान" (physiology and anatomy) की दृष्टि से तो मनुष्य और बाकी जीवों के बीच ख़ास फर्क नहीं है, अगर कहीं ख़ास फर्क है, तो वह यह है की मनुष्य में 'विचार' नामक तत्त्व का विकास हुआ है जो दूसरे जीवों में मनुष्य की तरह शायद ही हुआ हो । "
'विचार' से मेरा मतलब है, 'क्रम' की अवधारणा -उस 'क्रम' में 'समय' और 'स्थान' भी शामिल हैं । "
"उदाहरण से समझाओ । " - 'सर' ने कहा ।
"देखिये, हम कहते हैं, : आज सोमवार है, आज चार जुलाई है, आज के ही दिन हमारा देश एक 'स्वतंत्र' राष्ट्र बना ।
या, हम कहते हैं : आज ग्यारह सितम्बर है, दो वर्षों पहले आज ही के 'twin-towers' पर अटैक हुआ था ।"
"अर्थात् हममें एक इतिहास-बोध है," -'सर' ने कहा ।
"हाँ, और इसी के फलस्वरूप एक भविष्य-बोध भी हममें होता है । इस प्रकार से हमारे मन में 'समय' का एक विचार या अवधारणा है । यहाँ तक कि आम आदमी ही नहीं, बल्कि तथाकथित वैज्ञानिक भी इस अवधारणा से बन्धकर 'समय' को या यूँ कहें कि काल को एक स्वतंत्र तत्त्व स्वीकार कर बैठते हैं , उन्हें यह कल्पना तक नहीं हो पाती कि जिस 'समय' या 'काल' को वे एक स्वतंत्र तत्त्व की भाँतिग्रहण करते हैं, वह इस अवधारणा पर अवलंबित एक 'अनुमान'-मात्र है । उसकी सत्यता संदिग्ध है, इस ओर उसका ध्यान तक नहीं जाता। और इतना ही नहीं, यह अवधारणा इतनी बद्धमूल रूप से उनकी बुद्धि में बैठी हुई है कि वे इस ढंग से देखने तक से इनकार कर देते हैं । "
"तुम्हारा मतलब है कि 'काल' को एक 'भौतिक'-राशि मान लिया जाता है, -बिना यह जाँचे-परखे कि क्या 'काल' कोई वस्तुतः अस्तित्त्वमान चीज़ है भी या नहीं ?"
"exactly, मैं यही कहना चाहता हूँ । "
"फ़िर 'काल' क्या है ?"
"देखिये, काल को नापा जा सकता है, और जिसे भी नापा जा सकता है, वह एक 'सापेक्ष-तत्त्व' होगा । इससे उसकी वास्तविक सत्ता कैसे सिद्ध हो सकेगी ? उस दृष्टि से 'काल' एक ऐसी चीज़ है, जिसे नापा तो जा सकता है, लेकिन यह नाप-जोख कितनी सत्य है, या है भी या नहीं, यह कैसे तय किया जा सकेगा ?"
"काल" को किस प्रकार से नापा जाता है ?"
"काल" घटनाओं के क्रम से 'निर्धारित' किया जाता है, - पूर्व-पर क्रम के आधार पर, दो घटनाओं के अन्तर को परिभाषित किया जाता है, और इस प्रकार से विभिन्न घटनाओं के अनेक अंतरों की पारस्परिक तुलना में बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा अन्तर सुनिश्चित किया जाता है । उदाहरण के लिए अब atomic घडियाँ हैं, जो सौ या पचास वर्षों एक सेकंड आगे या पीछे कर दी जाती हैं , यह 'काल' का सूक्ष्मतम (या, लघुतम) माप हुआ । दूसरी ओर 'Big-Bang' पहले अन्तिम बार कब हुआ था, और पुनः सृष्टि अपनी उस अवस्था की ओर कब लौटेगी, जब 'Big-Bang' होनेवाला था, -इस पूरे अंतराल (Gap) को 'काल' का वृहत्तम माप कह सकते हैं । फ़िर यह भी हो सकता है, कि शायद पुनः कभी 'Big-Bang' हो ही नहीं, या 'Big-Bang' की पूर्व-अवस्था तक सृष्टि कभी पुनः जाए ही नहीं ! तो इस प्रकार से विभिन्न घटनाओं का अन्तर 'कल्पित' किया जाता है, उसे 'छोटा'-'बड़ा' कहकर नापा भी जाता है, पर इससे उसकी 'सत्यता' तो नहीं प्रमाणित हो जाती है ! उस दृष्टि से 'काल' का एक 'गणना' पर अवलंबित अस्तित्त्व माना जा सकता है, - उस आधार पर भावी घटनाओं का 'विचार' कर शायद उन्हें नियोजित भी किया जा सकता है, लेकिन यह प्रश्न तो अनुत्तरित ही रहता है कि क्या वे घटनाएँ १००% सुनिश्चितता से 'समय' के उसी 'परिमाण' में घटित होंगीं ? हम जितनी अधिक सूक्ष्मता में जाते हैं, 'संभावना' यद्यपि उतनी ही बढ़ जाती है, लेकिन 'समय' ऐसी कोई 'राशि' है, यह तो तभी प्रमाणित होगा, जब हम १००% सुनिश्चितता से इस 'समय' (अंतराल) को सुनिश्चित कर सकेंगे ।
दूसरी ओर यह भी है, कि जैसे अन्य भौतिक राशियों के बारे में एक सर्वमान्य 'सत्यता' सभी को एक जैसी 'प्रतीत' होती है, वैसा 'समय' के संबंध में नहीं है । जैसे स्थान या पदार्थ के विभिन्न रूपों, ऊर्जा आदि के नियम और उनका बोध सभी मनुष्यों को एक समान होता है, वैसा 'समय' के संबंध में नहीं कहा जा सकता है । उदाहरण के लिए कड़ी धूप में गर्म सड़क पर पैदल जा रहे मनुष्य को एक मिनट जितना लंबा महसूस होता है, वह उसके ठंडी छाया में पहुँच जाने के बाद उसे महसूस होने वाले एक मिनट की तुलना में उसे बहुत बड़ा जान पड़ता है । 'समय' की भौतिक नाप की सुनिश्चितता असंदिग्ध रूप से सत्य है, जबकि जिस राशि को इस नाप के माध्यम से नापा जाता है, वैसी राशि के रूप में वस्तुतः कोई 'पदार्थ' अस्तित्त्व में होता ही नहीं है ! 'निष्कर्ष' के रूप में समय मापने के लिए एक उपयुक्त पैमाना अवश्य हमारे पास है, लेकिन वह 'किसे' मापता है ?
इसे इस ढंग से भी कह सकते हैं कि समय या काल एक निष्कर्ष-मात्र ,एक इन्फेरेंस मात्र है, और उस दृष्टि से उसकी एक व्यावहारिक सत्ता है, यह भी स्वीकार किया जा सकता है, किंतु उसकी आत्यंतिक सत्ता भी है, यह किस आधार पर कहा जा सकता है ? उसकी ऐसी कोई सत्ता हो भी नहीं सकती, क्योंकि वह एक 'विचार'-मात्र है। "
" और , 'विचार' ? " -'सर' ने पूछा ।
" 'विचार' ?" -अविज्नान ने प्रतिप्रश्न किया ।
"हाँ, 'विचार', 'विचार का स्वरूप क्या है ?"
अविज्नान को प्रश्न समझने में समय तो लगा और यह उसके जैसे धीर गंभीर मनुष्य के लिए स्वाभाविक भी था ।
यहाँ 'संवाद' घटित हो रहा था, और सन्दर्भ था जीवन का । यहाँ किन्हीं दूसरों के मतों, आकलनों, अनुभवों या तर्कों को दुहराया नहीं जा रहा था , यहाँ वस्तुतः कौन 'गुरु' था और कौन 'शिष्य', यह प्रश्न बाकी नहीं रह सका था ।
अविज्नान स्तब्ध नहीं था, वस्तुतः उसके पास इतने विकल्प थे कि कहाँ से शुरू करे, यह देख रहा था ।
"देखिये, -उसने कहना शुरू किया -
"एक 'विचार' तो वह होता है, जो स्मृति से आता है। जो बात स्मृति में न हो, क्या वह 'विचार' में आ सकती है ? क्या स्मृति से अछूता हो, ऐसा कोई 'विचार' होता है ?
दूसरी ओर 'विचार' किसी ऐसी अनुभूति या बोध की अभिव्यक्ति भी हो सकता है, जिसे आप शब्दों के ज़रिये कहने की कोशिश में वुक्त करते हैं । क्या 'विचार' इन दो रूपों में नहीं हुआ करता ?
फ़िर यह भी देखना होगा कि क्या विचार 'शब्दगत' ही होता है ? जैसे आपको भूख या प्यास लगी । या आपको सिर में दर्द हो रहा है । क्या सिर में दर्द शुरू होते ही, : यह सिरदर्द है, - ऐसा 'विचार' आता है ?लेकिन दर्द या भूख-प्यास आदि की अनुभूति एक तात्कालिक 'तथ्य' है ।
भय लगना, और 'भय लग रहा है,' -यह वक्तव्य दिया जाना, इन दोनों में से कौन सी वस्तु 'विचार' है ? भय लगना, या भय का बोध होना ? क्या भय के बोध से पहले भय जैसी कोई चीज़ वास्तव में होती है ? 'विचार' के आगमन के पश्चात् ही 'मुझे' भय लग रहा है,' -ऐसा कहा जाता है । भय के क्षण में तो हम स्तब्ध हो जाते हैं । फ़िर स्मृति से कोई 'विचार' 'मन' की ऊपरी सतह तक चला आता है, और फ़िर उस अनुभूति की 'पहचान' हम 'भय' के रूप में करते हैं । 'भय' के क्षण में स्तब्धता थी, और अगले ही पल 'विचार' का उदय होता है, -ज़ाहिर है कि वह स्मृति से ही, अतीत के अनुभवों के संग्रह से ही हुआ होता है । तो, 'विचार' का स्वरूप क्या है ? इसे हम किसी भी ढंग से क्यों न कहें, 'विचारकर्त्ता' 'अनुभवकर्त्ता', 'दृष्टा', या 'अहं', 'स्व' आदि कुछ भी क्यों न कहें, क्या उसका स्रोत 'स्मृति' के अतिरिक्त कहीं और हो सकता है ? और 'विचार' यही है, - 'विचार' ही स्मृति से उठकर भिन्न-भिन्न मुखौटे धारण करता है, कभी 'अनुभवकर्त्ता' , अर्थात 'सुखी-दु:खी', कभी 'दृष्टा', कभी 'स्वामी', और कभी निपट एक विचार-मात्र ।
"और 'काल' ? 'सर' ने अविज्नान को विस्तार करने का मौका दिया ।
"काल ? -अविज्नान सन्दर्भ खोज रहा था, प्रश्न का सही परिप्रेक्ष्य, वह प्रश्न का यथार्थ पक्ष नहीं चूकना चाहता था ।
"काल का स्वरूप ?" -'सर' ने धीरे से, बहुत धीमे स्वरों में कहा ।
"यही तो !" -अविज्नान बोला ।
हम दोनों (रवि की और मेरी )साँसें थम सी गईं थीं ।
"क्या काल और विचार एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं होते ?" -उसने पूछा ।
"हाँ, होते हैं । " - 'सर' ने अविज्नान की पीठ थपथपाई ।
उस दिन पहला दिन था । अब मुझे ' इवेंट-मैनेजमेंट' का कोई पाठ नहीं पढ़ना पड़ेगा, -मैंने सोचा ।
'सर' उठे । बोले, -नहाने के लिए गर्म पानी मिलेगा ? मैं 'हीटिंग-क्वोइल' इस्तेमाल करता था । "हाँ-हाँ, थोड़ा टाइम लगेगा , तब तक एक-एक चाय पीते हैं, " - मैंने अनुरोध किया ।
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