March 18, 2009

उन दिनों / 12.

बहरहाल गर्गजी, (सर) हमारे बीच थे । अविज्नान तथा रवि से मेरी बातचीत जब भी होती थी, 'सर' का ज़िक्र ज़रूर अनायास उसका हिस्सा होता था । इसके जो भी कारण रहे हों, लेकिन्यः तो तय था की हम चारों का यह समूह सिर्फ़ संयोगवश ही बना हो, इसकी संभावना नगण्य ही जान पड़ती है । हम चारों में कुछ बातें समान थीं । 'सर' के अलावा हम तीनों अपने-अपने ढंग से 'अध्यात्म' से जुड़े थे । और हम तीनों के अध्यात्म का 'शेड' एक दूसरे से थोड़ा अलग अलग भी था । सौभाग्यवश औपचारिक दर्शनशास्त्र का अध्ययन हममें से किसी ने भी नहीं किया था और हम सभी प्रायः उसका मजाक भी उड़ाया करते थे । साहित्य का शौक हम तीनों को था, लेकिन बहुत अधिक नहीं । मैं तो 'लिखने' की हद तक 'गिरा हुआ' था !! रवि साहित्य की उपादेयता खोज रहा था और अविज्नान बौद्ध-धारा तथा उपनिषदों की प्रज्ञा से अभिभूत था । विज्ञान का अध्ययन भी उसने काफी किया था लेकिन वह आज के विज्ञान का मज़ाक ही उड़ाया करता था । कला की समझ दोनों को ही थी लेकिन अविज्नान 'कला के लिए कला' से बिल्कुल असहमत था, जबकि रवि की दृष्टि में साहित्य और कला यदि स्वान्तःसुखाय या 'तपस्या' हों, 'साधना' हों, तो वे मनुष्य की चेतना को आमूलतः 'रूपांतरित' कर सकते हैं । लेकिन इस विषय में, उसकी दृष्टि में, 'कार्य-कारण नियम' का कोई प्रयोजन नहीं था ।उसका कहना था कि कार्य-कारण, सापेक्ष धरातल पर कई चीज़ों की व्याख्या अवश्य करते हैं, लेकिन वह व्याख्या कभी 'पूर्णता' तक नहीं पहुँचती । अविज्नान कहता था कि कार्य-कारण नियम भौतिक स्थान (Space) और काल (Time) अर्थात् 'दिक्काल'-सापेक्ष हैं, जबकि 'दिक्काल', 'व्यक्ति-सापेक्ष' है । "व्यक्ति दिक्काल की उपज है, या 'दिक्काल' व्यक्ति का 'विचार'/ 'निष्कर्ष' / अनुमान' ?" -इस प्रश्न को वह प्रायः उछालता रहता था । उसकी दृष्टि में आज का विज्ञान दिशाहीन और मूल्हीन (rootless) है । धन, प्रतिष्ठा और भौतिक सुरक्षा के प्रति अविज्नान और रवि दोनों ही लापरवाही की हद तक बेफिक्र थे । मुझे पेंशन मिलती थी, रहने के लिए अपना ख़ुद का मकान था, और किताबों की रोयल्टी आदि भी मिल जाती थी । 'सर' को पेशन मिलती थी, और परिवार में उनकी एक बिटिया थी जो स्टेट्स में (नब्बे के दशक में ) 'वेल-सेटल्ड ' थी । वे शायद उसके या किसी के भी बारे में सोचते भी नहीं थे । उनके हृदय का एक कोना 'अजय' या 'राजेश' के लिए सुरक्षित था, और याददाश्त खोने तक वे उसे खोना नहीं चाहते थे । (क्या याददाश्त खोने पर आदमी की इच्छाएँ भी 'खो' जाती हैं ?) यह एक विरोधाभास ही था कि 'अजय' से ही उन्हें जीवन के रहस्य का 'बोध' हो सका था, और वह भी उनकी 'स्मृति' के भीतर है, -पर वस्तुतः कहीं नहीं, इसका भान भी उन्हें स्पष्ट रूप से था । वे 'स्मृति' से परे के उस अनंत- अस्तित्त्व के जीवन-रूपी सागर की अक्सर चर्चा करते थे जिसमें 'अजय' और उसकी स्मृति भी अन्य स्मृतियों की ही तरह क्षणिक तरंगों की तरह उठती-गिरती रहती हैं । यह उनका 'बनाया' या गढ़ा हुआ कोई सिद्धांत या बौद्धिक मंतव्य या मार्ग-दर्शक नीतिवाक्य आदि न था । उन्होंने न तो उपनिषदों का अध्ययन किया था, न दर्शन-शास्त्र का, वे किसी गुरु की शरण में भी कभी नहीं गए । किसी राजनीतिक, साहित्यिक, धार्मिक या सामाजिक / साम्प्रदायिक संस्था या समूह से भी उनका दूर-दूर तक का कोई वास्ता कभी नहीं रहा था । उनके घर 'कल्याण' या ऐसी दूसरी कोई पत्रिका तक मैंने कभी नहीं देखी थी । प्रसंगवश एक बार उन्होंने बतलाया था कि साहित्य और मानव-समाज के सरोकारों के चिंतकों का उन्होंने भरपूर अध्ययन ज़रूर किया था लेकिन उस सबकी व्यर्थता और व्यर्थता ही नही, बल्कि उसके 'खतरों' से भी वे आगाह हो चुके थे । वे जानते थे कि ये सभी चीज़ें जीवन के सरल सत्य से पलायन करने का शक्तिशाली साधन भी बन जाया करती हैं । हाँ, रवि या अविज्नान की तरह विज्ञान और राजनेताओं / राजनीतिज्ञों की विद्वत्ता और तथाकथित प्रतिबद्धता का उन्होंने शायद ही कभी उपहास किया हो । कम से कम मैंने तो यही महसूस किया कि उस बारे में वे कभी सोचते तक नहीं थे । उन्हें जीवन में कोई दु:ख नहीं था। पर उन्होंने न तो कभी गीता पढी, न उपनिषद पढ़े, और न वे कोई कर्मकांड आदि करते थे । शायद संस्कृत से अपरिचय और अन्य बातें भी इसके मूल में कारण रही होंगीं । उन्होंने साहित्यिक चीज़ों, हिन्दी-अंग्रेजी की साहित्यिक विधाओं का अच्छा-खासा अध्ययन किया था श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं के हिन्दी-अंग्रेजी अनुवाद भी पढ़े थे, लेकिन वह सब बस रुचिवश ही पढ़ा था । वे उन्हें वहीं तक रखते थे ।
इस प्रकार जहाँ अविज्नान में कोई बारूद भरी हुई थी, जिसे वह ख़ुद भी नाम देने में असमर्थ था, वहीं रवि थोड़ा 'कूल' था । वैसे अविज्नान भी बहुत संतुलित और संयमित था, लेकिन रवि की अपेक्षा अधिक सक्रिय (pro-active ?) ज़रूर था । हम चारों इस मायने में अनोखे थे, कि किसी भी परम्परा के पिछलग्गू तो कतई नहीं थे । न हमें किसी परम्परा को महत्त्व देना ही पसंद था । यहाँ एक ख़तरा था और यही हमारा उल्लास भी था । हमारे जीवन का कोई उद्देश्य नहीं था, या कहें कि प्रकटतः तो कदापि नहीं था । हम जीवन के साथ-साथ अपनी रौ में आगे बढ़ रहे थे । फ़िर भी इस मानव-समाज में रहते हुए यदि हम चिंतन की उन्हीं धाराओं में पड़े रहते जिनमें तथाकथित महान या सफल मनुष्य भी अनचाहे ही पड़े रहते हैं, तो यह आश्चर्य न होता । नहीं, हम न तो धारा के विरुद्ध थे और न धारा की दिशा ही में थे । हमें धारा में फेंका ज़रूर गया था लेकिन हम सबने अपने-आपको ये-कें-प्रकारें धारा से बाहर निकाल लिया था । धाराएँ ग़लत या सही हैं, इस पर हमारा कोई आग्रह न था, हमें बस यह लगता था की किसी भी धारा में बँधकर न सोचा जाए । अतः हम चारों अपने-अपने ढंग से अपने आसपास के जीवन को जानने-समझने की उत्कंठा में अपने प्रयास कर रहे थे । हममें कोई 'गुरु' या 'शिष्य' न था,- या कहें हम सभी एक-दूसरे के गुरु तथा एक-दूसरे के शिष्य थे । प्रश्न उठता है कि और बाकी लोगों से हमारा क्या संबंध था ? तो इसका उत्तर यही होगा कि बाकी लोगों से उन्हीं विषयों पर बातचीत होती थी, जिन पर आपस में संप्रेषण सम्भव होता था । और इसीलिये हम चारों का मिलना भी नियति या अज्ञात की एक असाधारण योजना ही रहा होगा, -शायद एक बिरला संयोग-मात्र ।

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