March 11, 2022

सोचना / न सोचना

कविता / 11-03-2022

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किसी भी बारे में न सोचना, 

किसी के भी बारे में न सोचना, 

कितना मुश्किल लगता है! 

फिर भी, जब सुबह-सुबह, 

आप इस निर्जन वन में, 

इस सर्पिल स्वच्छ सड़क पर, 

भ्रमण के लिए निकलते हैं,

और वृक्षों-लताओं की गंध, 

आपका पीछा करने लगती है, 

तो मुश्किल नहीं रह जाता,

बहुत ही आसान होता है, 

किसी भी बारे में न सोचना,

किसी के भी बारे में न सोचना!

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March 08, 2022

जीवन का यह दृष्टिकोण !

कविता / जीवन-दर्शन

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न आलस्य है, और न उत्साह है, 

ये जो जीवन है, कर्म-प्रवाह है!

जीते जाना है, जब तक है जीवन, 

है करते रहना, कर्म-निर्वाह है!

किसी का किसी से संबंध नहीं,

हरेक की भूमिका, या कोई चाह है!

इसे भाग्य, कर्तव्य, या संघर्ष कहें,

हँसी, सुख की, या कि दुःख की आह है!

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देह इंजन

कविता / 08-03-2022

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देह से बाहर जाने के लिए, 

प्राणों को राह नहीं मिलती,

श्वास-प्रश्वास पुनः पुनः फिर, 

भरती है वायु, -फुफ्फुस में,

करती है प्रज्वलित अग्नि को,

अग्नि जो प्राणाग्नि है, -प्राण,

चक्र चलता है देह में सतत, 

प्राण से चेतना, चेतना से प्राण,

प्राण से मैं, मैं से प्राण पुनः,

चक्र चलता है देह में सतत, 

एक संसार, -वहाँ देह में,

एक देह, यहाँ संसार में, 

होते हैं बिम्बित-प्रतिबिम्बित,

परस्पर एक-दूसरे में!

जीवन-चुम्बित प्राण, 

प्राण-चुम्बित जीवन,

जीवन-चुम्बित चेतना, 

चेतना-चुम्बित जीवन, 

खेलते रहते हैं सभी, 

परस्पर एक-दूसरे से,

परस्पर एक-दूसरे में!

चढ़ते-उतरते रहते हैं,

मन-यात्री असंख्य अनगिनत,

कोई नहीं जानता किसी को! 

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March 07, 2022

बात, वक़्त-वक़्त की!

कविता / 07-03-2022

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जब भी मन हो तो बात कर लेना,

मन न हो अगर, तो कोई बात नहीं!

मिलना, न मिलना, जरूरी तो नहीं,

मिलना न मिलना, मुलाक़ात नहीं!

वक़्त की बात है, कि जरूरी ही हो,

हर घडी़ मुनासिब, ऐसे हालात नहीं!

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March 05, 2022

त्रिवियु - (पुरा कथा)

प्रथम, द्वितीय और तृतीय विश्वयुद्ध,

(प्रवियु, द्विवियु और तृवियु) 

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कालपुरुष के तीन पुत्र थे, जिनका नाम क्रमशः --

प्रवियु, द्विवियु और तृवियु था। तृवियु को ही त्रिवियु भी कहा जाता था।

एक बार तीनों भाइयों में इस पर विवाद होने लगा, कि उनमें से कौन अधिक श्रेष्ठ, पराक्रमी और निर्भय है। 

जब उनमें इस प्रकार से विवाद हो रहा था, तो अंततः विवाद को सुलझाने के लिए वे अपने पिता के पास जा पहुँचे।

"पिताजी! क्या मैं ही मेरे इन दोनों भाइयों से श्रेष्ठ नहीं हूँ!"

-प्रवियु ने प्रश्न किया। 

तब द्विवियु ने हस्तक्षेप करते हुए कहा :

"पिताजी! क्या प्रवियु का अन्त होने के बाद ही मेरा जन्म नहीं हुआ था?"

तब त्रिवियु ने उसे टोकते हुए पिता से कहा :

"पिताजी! क्या प्रवियु की ही तरह, इसी प्रकार से द्विवियु का भी अन्त नहीं होनेवाला है? और तब क्या सर्वत्र मेरा ही वर्चस्व नहीं यह जाएगा?"

तब कालपुरुष ने हँसते हुए कहा :

"तुम तीनों मेरे ही अंश हो। हाँ, प्रवियु का अन्त होने पर उसी ने द्विवियु के रूप में जन्म लिया, और द्विवियु का अन्त हो जाने पर वही त्रिवियु के रूप में जन्म लेगा।"

"तो पिताजी! क्या मैं ही अपने दोनों भाइयों से अधिक पराक्रमी और शक्तिशाली नहीं हूँ?"

-त्रिवियु ने उत्साह और गर्व से कहा।

"नहीं बेटा! तुम्हारे जन्म के बाद इस संसार का अन्त हो जाएगा, और इस संसार के ही साथ तुम्हारा भी। किन्तु मैं तब भी अदृश्य होकर नये नये संसार में पुनः पुनः प्रकट होता रहूँगा। यह संसार मेरा ही विस्तार है।"

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March 04, 2022

वर्तमान का विचार

विचार का वर्तमान

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इस श्रृंखला में दो पोस्ट क्रमशः :

अतीत का विचार और विचार का अतीत, 

एवं,

भविष्य का विचार और विचार का भविष्य

शीर्षक से लिखे जा चुके हैं।

इसी क्रम में यह तीसरा और अंतिम पोस्ट है।

विचार एक अद्भुत् प्रक्रिया तथा वस्तु है जो एक सिरे पर यद्यपि बुद्धिग्राह्य और इसलिए बुद्धिगम्य है, तो दूसरे सिरे पर एक शुद्ध भौतिक इन्द्रियग्राह्य और इसलिए इन्द्रियगम्य है।

केवल बुद्धि और इन्द्रिय ही नहीं, विचार भावग्राह्य, भावगम्य भी है। संक्षेप में कहें तो विचार संवेदनगम्य, अर्थात् संवेदनागम्य है। पुस्तक या कागज पर लिखा विचार जहाँ उस लिपि से अनभिज्ञ व्यक्ति के लिए अर्थरहित चिह्नों का क्रम है, वहीं वाणी से व्यक्त विचार उसी / इसी वर्तमान क्षण में सक्रिय सार्थक तथा प्रयोजन को इंगित करनेवाली अभिव्यक्ति है। 

स्पष्ट है कि इस प्रकार का कोई विचार किसी न किसी भाषा पर आधारित होता है।

विचार की व्युत्पत्ति विच् (विविच्) धातु से है जिसे मुख्य रूप से पूछने, खोज करने, जिज्ञासा करने के अर्थ में प्रयोग किया जाता है, किन्तु पर्याय से (imperatively) या परोक्षतः, शाब्दिक या भाषागत और व्यावहारिक रूप से किसी तात्पर्य-विशेष को इंगित करने के लिए भी किया जाता है । यही 'विचार' का रूढ प्रयोग है। 

जब कोई 'मेरा विचार' कहता है, तो तात्पर्य यह होता है कि इस विचार का उद्भव एक शब्द-समूह की तरह उसके मन / उसकी चेतना में हुआ है जिसे उसने वाणी से प्रकट किया।

जब कोई 'मैं सोचता हूँ' कहता है तो तात्पर्य यह होता है कि यह विचार उसे स्वीकार्य है।

यही विचार अन्य किसी समय पर उसे अस्वीकार्य भी हो सकता है। तात्पर्य यह, कि वह स्वयं को कभी तो विचार से अभिन्न और कभी विचार से भिन्न मानता है।

यही विभाजन विचार और विचारकर्ता / विचारक के बीच पैदा होनेवाला आभासी और कृत्रिम विभाजन है। 

इस प्रकार एक और नया विचार प्रकट होता है, जो कि :

'मैं विचार से पृथक् स्वतंत्र विचारक हूँ'

की निःशब्द अनुभूति / प्रतीति का रूप ले लेता है ।

यही निःशब्द अनुभूति / प्रतीति पुनः शाब्दिक विचार की तरह मन / चेतना पर हावी हो जाती है, जबकि मन / चेतना मूलतः किसी भी विचार से नितान्त अछूता जीवन्त वर्तमान (living presence) है जिसमें 'मैं-विचार' तक के लिए कोई संभावना या स्थान नहीं होता। 

इस 'मैं-विचार' के प्रभाव से ही विचार :

'मेरा विचार', 'मैं सोचता हूँ', 'मैं विचार से पृथक् और स्वतंत्र विचारक / विचारकर्ता हूँ',

इत्यादि अनुमान प्रकट और विलीन होते रहते हैं। 

यही है :

वर्तमान का विचार, और विचार का वर्तमान! 

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March 02, 2022

भविष्य का विचार

विचार का भविष्य

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भविष्य के दो ध्रुव / पक्ष हो सकते हैं :

विषयपरक (objective) और स्वपरक (subjective).

किन्तु ये दोनों ही पक्ष एक ही चेतना की दो प्रतीत होनेवाली अभिव्यक्तियाँ होती हैं। इसी प्रकार इनकी जो पृष्ठभूमि है उसके भी पुनः दो और पक्ष हैं : काल (Time), और स्थान / आकाश (Space) . यद्यपि चेतना में ही काल और स्थान की कल्पना और कल्पना से उद्भूत विचार सक्रिय होते हैं, और काल और स्थान की एक आधारभूत वैचारिक पृष्ठभूमि के रूप में चेतना ही काल और स्थान के विचार की भूमिका होती है, इसलिए काल और स्थान के वैचारिक स्मृति में परिणत हो जाने के कारण ही उनके किसी वास्तविक (Real) अस्तित्वमान तत्व जैसे होने का अनुमान होता है। यह अनुमान भी आभास और कल्पना ही है, न कि कोई वस्तुनिष्ठ सत्यता (Objective Reality) । इस प्रकार इस आभासी काल के ही अन्तर्गत किसी भविष्य का आभास अतीत के सत्य होने के वैचारिक भ्रम का परिणाम है। अतः वस्तुतः तो भविष्य नामक किसी वस्तु का अस्तित्व हो ही नहीं सकता। यदि है भी, तो वह केवल उस तथाकथित भविष्य के बारे में उठनेवाले विचार का।

इसे ही विषय-परक सत्यता (Objective Reality) और स्व-परक (Subjective Reality) की दृष्टि से देखें, तो भविष्य (या भविष्य का विचार) भी या तो संसार (mental-world) / जगत् ( material-world) के बारे में होता है, या स्वयं ही के बारे में। संसार / जगत् की सत्यता के बारे में किसी को कोई संशय नहीं होता और उसे प्रत्येक ही मनुष्य एक अकाट्य और अनुभव-गम्य, इन्द्रियगम्य, विचारगम्य, असंदिग्ध तथ्य मानकर चलता है, किन्तु अपने-आपमें ऐसे किसी सर्व-सामान्य, समान (common) संसार का अस्तित्व, जिसे कि भौतिक विज्ञान के द्वारा सत्यापित किया जा सके, या ग्राह्य वस्तु की तरह स्वीकार कर सकें, संदिग्ध ही है।

फिर विचार का भविष्य क्या है? क्या यह भविष्य का एक और विचार भर ही नहीं है?

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March 01, 2022

अतीत का विचार

विचार का अतीत

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अतीत विचार पर आधारित स्मृति है,

स्मृति पहचान है, और पहचान ही स्मृति।

यदि पहचान है तो ही स्मृति है, और यदि पहचान नहीं है, तो स्मृति भी नहीं हो सकती।

विचार पहचान और स्मृति के बीच की काल्पनिक दूरी है। इस दूरी में ही विचार जन्म लेता है, और उस विचार से पुनः कोई दूसरा विचार जन्म लेता है। स्मृति से विचार की पहचान होती है तथा पहचान से स्मृति की निरंतरता। इस प्रकार विचार यद्यपि क्षण क्षण उत्पन्न और विलीन होता रहता है, किन्तु विचारों की निरंतरता ही स्मृति / पहचान के रूप में ऐसी वस्तु की तरह प्रतीत होती है जो सतत परिवर्तित होते हुए भी किसी स्वतंत्र वस्तु की तरह प्रतीत होती है और उसे अपरिवर्तनशील सत्य मान लिया जाता है। उस अपरिवर्तनशील प्रतीत होनेवाली वस्तु की स्मृति-निर्मित धारणाओं (conceptual existence) के आधार पर और अनेक प्रकार की दूसरी भी ऐसी धारणाओं के समूह को सत्य की तरह ग्रहण कर लिए जाने के कारण, मूलतः एक काल्पनिक वस्तु होते हुए भी, स्मृति वास्तविक वस्तु जैसी जान पड़ती है। स्मृति को इसलिए मन का भी समानार्थी समझा जाता है। इस दृष्टि से स्मृति है, तो ही मन होता है और मन है तो अवश्य ही कोई न कोई स्मृति / पहचान विद्यमान होती है।

क्या यह कहना ठीक नहीं होगा कि स्मृति-रूपी मन से भी अन्य चेतना-रूपी कोई आधारभूत मन अवश्य है जो स्मृति से स्वतंत्र और वस्तुतः अपरिवर्तनशील है। यह चेतना-रूपी मन नितान्त शुद्ध, अविकारी है जिसमें यद्यपि विचार उठते और विलीन होते रहते हैं किन्तु यह स्वरूपतः उस मन से अछूता है, जिसमें अन्य सभी विचारों का जन्म, पहचान और स्मृति प्रकट और अप्रकट होते हैं, और एक विशिष्ट विचार अर्थात् अपने निरपेक्ष अस्तित्व के सहज भान के साथ इस अस्तित्व के साथ उसके भान की भी स्मृति, पहचान का विचार के रूप में उद्भव होता है। यह विचार मूलतः एक ओर अन्य विचारों की तरह ही आता-जाता है किन्तु दूसरी ओर अन्य सभी विचारों को एक सूत्र में पिरोता भी है।  अन्य विचार जहाँ सतत उठते और मिटते रहते हैं यह विशिष्ट विचार अपनी स्मृति के रूप में "मैं"- विचार की तरह मन पर आधिपत्य कर अपेक्षतया स्थायी रूप ग्रहण कर लेता है। 

इस सापेक्ष मन से, जिसमें इस सूत्र-रूपी "मैं"- विचार पर अन्य सभी विचार पिरोए होते हैं, एक ऐसा चेतना-रूपी और एक मन भी अवश्य है जिसमें "मैं"-विचार के उठने-मिटने या होने तक के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। अतः इसकी स्मृति या पहचान तक नहीं हो सकती। तर्क, अनुमान, इन्द्रिय-अनुभव, बुद्धिगम्य रूप में भी यद्यपि इसके अस्तित्व, अस्तित्व के भान और भान के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसे प्रत्यक्ष (objective) की तरह जानना असंभव है। 

स्मृति, पहचान, विचार, मस्तिष्क में विचार के रूप में संग्रहित होकर संगठित हो जाते हैं, जिससे संसार की नित्यता अर्थात् ऐसे किसी संसार के काल्पनिक अस्तित्व के अनुमान का जन्म होता है, और चेतना-रूपी मन ही इस कल्पना का अचल-अटल अविनाशी आधारभूत सत्य भी है इसलिए यह मन ही मनुष्य की आत्मा है। 

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गुल

कविता / 01-03-2022

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रौशनी गुल होती है, तो फैलता है अन्धेरा, 

शोर गुल होता है जब, तो टूटता है अमन ।

जब भी दोस्त मिलता है, तो ऐसा लगता है, 

जैसे गुल खिलता है, तो खिलता है चमन।

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February 26, 2022

धूलि-वन्दन

होली-उत्सव

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कविता 

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धूल-धूसरित चरण तुम्हारे,

मेरे मन को भाते हैं,

चरण-धूलि सिर पर रखकर,

भक्त-हृदय हरषाते हैं

चरण-धूलि का अंगराग,

पृथ्वी भी धारण करती है, 

जीवों, वृक्षों का स्नेह-सहित,

पालन-पोषण करती है!

गोधूलि वेला हो संध्या को, 

सूर्योदय में भी प्रतिदिन ही,

वायु में बिखरी स्वर्ण-कणों,

रत्नों जैसी जगमगाती है?

मन खोया-खोया रहता है, 

हृदय भी पुलकित विस्मित सा,

कण-कण में प्रभु कृपा तेरी, 

हर मन को हरषाती है।

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