July 09, 2021

दर्द लेकर दर-ब-दर

अहं, अहंकार, अभिज्ञा, अभिमान, 

अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना,

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कविता : 09-07-2021

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क्या मेरी अपनी कोई पहचान होना चाहिए!

क्या नहीं पहचानता (हूँ) असलियत भी मैं खुद की?

यूँ तो ये लगता है, सब पहचानते ही हैं खुद को ,

ये भी लेकिन सच नहीं, क्या जानते हैं वे खुद को!

मुमकिन है क्या, अनजान कभी, कोई होता हो खुद से?

हाँ जरूर हो सकता है, गा़फ़िल हो जाता हो खुद से!

अपने वजूद से क्या कभी इंकार कोई करता है?

फिर कभी होगा कोई, नावाकि़फ़ कैसे खुद से?

यही तो ग़फ़लत है अपनी, जान और पहचान में,

हकी़क़त में, जानने-पहचानने के, दरमियान में!

खुद को कोई जिस तरह से भी जाना करता है,

और अपने-आपको, जैसे कि पहचाना करता है,

'जान' पर 'पहचान' कोई, जब अपनी लाद लेता है,

अपने वजूद को भुलाकर ओढ़ लेता है जब ग़फ़लत,

खुद को, उसी तो भूल में, खुद ही तो बाँध लेता है!

लेकिन मगर उस भूल को जब वह जान लेता है,

खुद को, खुदी को भी तभी पहचान लेता है!

खुद से खुद की ही, जान-पहचान तक का सफ़र,

है बहुत दिलचस्प भी, इतना बहुत ही पुर-असर!

कोई मुसाफ़िर जब तलक करता नहीं है यह सफ़र,

तब तक भटकता रहता है, दर्द लेकर दर-ब-दर!

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July 07, 2021

वह पूरा शहर!

विज्ञान कथा : 2027

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15 किमी गुणित 15 किमी में पूरा शहर बसा हुआ है। 

अफवाह फैलती है कि यह शहर जल्दी ही खाली कर दिया जाना है। कुछ ही दिनों बाद एक सरकारी आदेश जारी किया जाता है कि शहर छोड़कर जो भी जाना चाहे, जा सकता है।  अपनी इच्छा के अनुसार वह देश के किसी भी दूसरे शहर में जा सकता है जहाँ उसे रहने के लिए वैसा ही या उससे बेहतर घर दिया जाएगा। सभी को इस बारे में विस्तार से जानने की इच्छा थी। पर क्यों? 

कई लोग शहर छोड़ने को लेकर दुविधा में थे। 

सरकार ने फिर दूसरी चेतावनी जारी की। 

जल्दी ही किसी भी दिन किसी भी समय कोई सुप्त ज्वालामुखी अचानक सक्रिय हो सकता है, भूचाल आ सकता है, या ऐसा ही कुछ और भी हो सकता है, जिसके बाद शहर में रहना मतलब खतरों से सामना करने के लिए तैयार रहना होगा ।

फिर भी कुछ मुट्ठी भर साहसी लोग शहर को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। धीरे धीरे शहर की जनसंख्या 10% से भी कम रह गई । इनमें से 1% तो वे थे, जिनका बहुत अधिक राशि के लिए सरकार ने मुफ्त बीमा कर रखा था। शेष 9% में से भी कुछ लोग धीरे धीरे हिम्मत हारने लगे थे। 

शहर की जनसंख्या 2% रह गई, और एक सुबह जब लोगों की नींद खुली, तो उन्हें सब कुछ बड़ा अजीब सा लग रहा था। सुबह सुबह मॉर्निङ्ग वॉक पर जानेवालों ने देखा, क्षितिज उनके शहर की हद तक आ चुका था। उन्हें क्षितिज दिखाई तो देता था, और वे उसे छू भी सकते थे। लेकिन यह एक ठोस अपारदर्शी दीवार जैसा था, जिससे पार कुछ नहीं देख सकते थे। वे जब लौट कर घर आए तो उनके मोबाइल वैसे ही काम कर रहे थे जैसे पहले किया करते थे। पर वे शहर में बन्द होकर रह गए थे। 

वे दूसरे स्थानों के अपने मित्रों, परिचितों से वीडियो चैट भी कर सकते थे और उन्हें बता रहे थे कि क्या हुआ आज, और वे किस परेशानी में पड़ गए हैं। 

और लोगों की तरह ही उन्हें भी शीघ्र ही पता चल गया कि उनके शहर को 'स्कूप' कर लिया गया है और वे अब 6 माह से 1 साल  तक अंतरिक्ष में ही रहेंगे। लेकिन यह भी पूरी तरह सत्य नहीं था। उनका शहर जो एक आकाशीय पिंड हो चुका था, एक अजीब स्थिति से गुजर रहा था। कुछ दिनों तक तो उनके लिए कृत्रिम गुरुत्वाकर्षण की व्यवस्था की गई थी, फिर वह भी धीरे धीरे कभी कभी कुछ समय के लिए बंद रहने लगी। तब उन्हें समझ में आने लगा कि कृत्रिम गुरुत्वाकर्षण न होने पर भी कैसे अपने सारे कार्य कर सकें। तीन माह बाद तक तो उनमें से हरेक को अपनी आँखों पर भरोसा नहीं रह गया था।

किन्तु उनके भोजन, पानी आदि की व्यवस्था और देखरेख बहुत अच्छी तरह से हो रही थी। वे आराम से फ़िल्में देख सकते थे,  किसी भी शहर के किसी भी परिचित व्यक्ति से बातचीत भी कर सकते थे। लगता है कोई अदृश्य शक्ति उनकी देखभाल कर रही थी।  कभी कभी वह एक मनुष्य की तरह उनसे बातें भी करती थी, लेकिन उसकी ही मर्जी से, -न कि उन लोगों की मर्जी से। 

वह आवाज स्वयं को 'परमात्मा' कहती थी। शहर के बच्चे यही मानने भी लगे थे। बड़े लोगों को भी धीरे धीरे ऐसा विश्वास हो चला था। जब एक बूढ़े आदमी की मृत्यु होनेवाली थी, तो उस आवाज ने उससे कहा था : 

"तुम्हें नींद आनेवाली है, तुम सो जाओ, जब तुम्हारी नींद खुलेगी  तो तुम अपने आपको उसी पहले वाली धरती पर इस शहर से अलग किसी दूसरे शहर में पाओगे । वहाँ तुम फिर युवा हो जाओगे और जब तक चाहोगे जीवित रहोगे।"

फिर वह व्यक्ति सो गया, और एक एम्बुलेंस उसके घर आकर उसे ले गई ।

अन्ततः वह पूरा शहर किसी ग्रह पर इस तरह से उतर गया जैसे कोई उड़न-तश्तरी हो। वहाँ वह वैसा ही था जैसा धरती पर हुआ करता था। लेकिन अब वहाँ क्षितिज वैसा ही बहुत दूर दिखाई देता था जैसा कि धरती पर हुआ करता था। वे लोग अब अपनी कारों में बैठकर आसपास के दूसरे स्थानों पर भी जा सकते थे जहाँ के लोग इन्हें 'देवता' (Alien) समझने लगे थे। 

फिर एक दिन आवाज सुनाई दी :

"हमें कल तक ही यहाँ रहना है। कोई भी शहर छोड़कर न जाए! और सब लोग घबराकर लौट आए थे।"

रात्रि में किसी समय फिर उस शहर को 'स्कूप' कर लिया गया था, और सुबह वह धरती पर लौट आया था। जाते समय पूरे सात या आठ माह लगे थे, तीन चार महीने वे वहाँ रहे थे, और जब धरती पर किसी उड़न-तश्तरी की तरह से उनका शहर उतरा, तो ठीक उसी स्थान पर जहाँ से उन्हें उठाकर ले जाया गया था।

बहुत से लोगों को यह सब स्वप्न जैसा लग रहा था लेकिन धरती पर बहुत से लोगों को अफ़सोस  हो रहा था :

काश! वे शहर न छोड़ते!

शायद ही कोई इस कहानी को सच माने!

***

देर आयद दुरुस्त आयद!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ / R.S.S.

(Really Simplified Solutions) 

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अभी दो तीन दिनों पहले "सुबह का भूला" शीर्षक से एक पोस्ट इसी ब्लॉग में लिखा था। 

इसी सन्दर्भ में एक पोस्ट अंग्रेजी भाषा के मेरे ब्लॉग :

vinayvaidya 

में लिखा था किन्तु संतोष न होने से उसे डिस्कार्ड कर दिया था। संक्षेप में यही कि उसे लिखने का विचार राहुल रौशन के 'संघी' विषयक लेख : 

 (A Sanghi who never went to Shakha) 

को पढ़कर मन में आया था ।

सबसे पहले R.S.S. अर्थात् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अस्तित्व से मैं उस समय अवगत हुआ था, जब मेरे गाँव में शाखा के एक कार्यकर्ता ने मुझसे इसका आग्रह किया था। उस समय मैं कक्षा ९ या १० में पढ़नेवाला छात्र था।

एक दिन शाम शाखा में जाकर लौटा, और उस कार्यकर्ता ने मुझे R.S.S. संगठन के बारे में कुछ समझाया। 

हिन्दू एवं हिन्दुत्व क्या है, हिन्दू-राष्ट्र क्या है, राष्ट्रवाद क्या है, और हिन्दुओं को क्यों संगठित होना चाहिए, इस बारे में R.S.S. की क्या भूमिका और दृष्टि है, उसने मुझे समझाया। 

उसने पढ़ने के लिए मुझे दो पुस्तकें भी दीं, जिसमें R.S.S. के संस्थापक श्री हेडगेवार से संबंधित कुछ जानकारी और उनका जीवन-चरित्र भी था। 

उन पुस्तकों को पढ़कर मुझे यह लगा कि यह संस्था अवश्य ही हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य पैदा करने का प्रयास कर रही है। हालाँकि तब मेरी बुद्धि इतनी परिपक्व भी नहीं हुई थी (जैसी कि शायद आज है), और मैं सतर्कता एवं सावधानी से यह देख और सोच-समझ पाता कि हिन्दू या मुसलमान, भारतीय या ऐसे ही, कांग्रेसी, कम्युनिस्ट, या और कुछ भी होना केवल मान्यता और धारणा ही है न कि जीवन की वास्तविकता। और  किसी भी मान्यता में अपने आपको परिभाषित कर लेना तथा मानसिक दुराग्रह में जकड़ लेना तात्कालिक रूप से ज़रूरी और उपयोगी भी हो सकता है, किन्तु मूलतः भ्रान्तिपूर्ण ही है।

तब मैं स्कूल में प्राप्त हुई शिक्षा के वातावरण से प्रभावित होकर महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित था और इसलिए भी R.S.S. की रीति-नीति मुझे बिलकुल अच्छी नहीं लगी। 

बाद में कॉलेज और विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए भी, कुछ ऐसे लोगों के संपर्क में आया जो R.S.S. या ऐसी किसी राजनैतिक विचारधारा के समर्थक या विरोधी थे, और निरंतर एक दूसरे से बहस करते रहते थे।

बहुत बाद में जब श्री बलराज मधोक के भारतीय, भारतीयता और भारतीयकरण विषयक विचारों को पढ़ा तो मुझे लगा कि इस व्यक्ति ने हमारे समय की समस्या को न सिर्फ बेहतर ढंग से समझा है, बल्कि उसका व्यावहारिक हल व समाधान भी हमारे सामने रखा है।

हिन्दू, मुसलमान, यहूदी, कैथोलिक, ईसाई या पारसी, भारतीय,  अमरीकी, रूसी, चीनी इत्यादि होना हमारी भौतिक सत्यता नहीं हो सकता, न उसका भौतिक सत्यापन करना ही संभव है, और उसे एक कामचलाऊ और उपयोगी मान्यता भी ज़रूर समझा जा सकता है, क्योंकि वह हमारी सामाजिकता की पहचान मात्र है, मूलतः उसमें ऐसा कोई तत्व है ही नहीं जिसे दृढ़ और / या पुष्ट किया जा सके।

फिर भी देश के लोगों की यह सामाजिक व्यवस्था सुचारु रूप से चले इसके लिए आवश्यक है कि विभिन्न सामाजिक संरचनाओं  के बीच सामंजस्य रखते हुए ऐसा प्रबंध किया जा सके जिससे शासन (government) सबके कल्याण, प्रगति, सुख-समृद्धि को सुनिश्चित कर सके। अनेक दलों की व्यवस्था (प्रणाली) के होने से सत्ता और प्रतिपक्ष के बीच सतत टकराहट होती रहती है जिससे हमारी ऊर्जा का ह्रास ही होता है ।

यदि राजनीति और शासन, दलों और विचारधारा पर आधारित न होकर व्यक्ति और प्रतिनिधित्व-आधारित हो, सभी प्रतिनिधि मिलकर अपने बीच से अपने नेता का चुनाव करें और वह सदन का प्रमुख हो, तो भी हम बेहतर कार्य कर सकते हैं। 

महात्मा गांधी की पंचायती राज की कल्पना शायद यही रही होगी।

यह एकदलीय शासन (जैसा कि चीन में है,) से बहुत भिन्न है, और R.S.S. यदि हिन्दुत्व आधारित राजनीति को त्याग कर इस प्रकार के गांधीवाद पंचायती राज के स्वप्न को साकार करे तो वह अवश्य ही प्रशंसनीय होगा।

यदि हम ग्राम-पंचायत, जिला-पंचायत, नगर-पंचायत आदि के मॉडल पर सोच सकते हैं, तो राष्ट्रीय पंचायत के बारे में क्यों नहीं!

इतना ही नहीं, आगे चलकर शायद विश्व-पंचायत के बारे में भी! 

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न जाने क्यों!

कविता : 07-07-2021

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घूम-फिर कर मैं, यहीं फिर लौट आता हूँ, 

किसलिए निकला था, यह भी भूल जाता हूँ!  

पर कभी ऐसा भी हो, कोई बुला ले यदि मुझे,

तो भटक जाता हूँ, यह भी भूल जाता हूँ!

नित भटकता रहता हूँ, पर याद आता ही नहीं,

किसकी तलाश है मुझे, यह भी भूल जाता हूँ!

यह भी हैरानी है मुझे, ऐसा क्यों है मेरे साथ,

कौन मेरा, किसका मैं, यह भी भूल जाता हूँ!

कोई लुभा लेता मुझे, कोई भुला देता मुझे,

अपना-पराया कौन है, यह भी भूल जाता हूँ!

कोई तो हँसता है मुझ पर, कोई है दग़ा देता,

कोई समझता है पागल, यह भी भूल जाता हूँ!

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July 06, 2021

भक्ति-सूत्र

अथातो भक्ति-जिज्ञासा! 

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महर्षि शाण्डिल्य कृत 

 "भक्तिदर्शनम्"

वर्ष 2004 में उज्जैन में सिंहस्थ पर्व के समय उपरोक्त ग्रन्थ प्राप्त हुआ था। उसका सरल अर्थ लिखने का मन था। उस समय न हो पाया। 

आज ही सुबह अचानक पुरानी पुस्तकों को व्यवस्थित करते हुए वह ग्रन्थ हाथ आया। 

सुबह 08:00 बजे उसे अपने 

swaadhyaaya blog 

में type-set करना शुरू किया और अभी दस मिनट पहले यह कार्य पूरा हुआ। 

अभी केवल सरल संधि-विग्रह किया है। 

शायद कुछ त्रुटियाँ भी होंगी। 

ऐसे ही जब कभी पुनः भगवत् प्रेरणा होगी तो उसका सरल अर्थ भी लिख पाऊँगा !

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July 05, 2021

सुबह का भूला

हिन्दू और हिन्दुत्व

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इस ब्लॉग में किसी बहुत पहले के पोस्ट में स्वर्गीय श्री बलराज मधोक के 'भारतीयता' और 'भारतीय-करण' के विचार पर कुछ लिखा था।

उस समय के एक राजनीतिक दल "जनसंघ" के नेतृत्व ने जिस डर और जिस लालच से प्रेरित होकर उन्हें हाशिए पर रख दिया इस बारे में यही कहना उचित होगा कि जनसंघ का वह नेतृत्व आर.एस.एस. के नियंत्रण में, उसके मार्गदर्शन के अनुसार राजनीतिक महत्व के तमाम निर्णय करता था। 

वह 'हिन्दू' और 'हिन्दुत्व' का प्रयोग राजनीति के औजार की तरह राजनैतिक 'ध्रुवीकरण' के लिए करना चाह रहा था, (और आज भी कर रहा है।) जो देश के लिए अन्ततः अत्यन्त घातक ही होगा। 

श्री बलराज मधोक ने उस नेतृत्व की परवाह नहीं की, और वे अपने भारतीयता एवं भारतीयकरण के उस विचार पर डटे रहे जिसकी कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी।

आज सुबह आर.एस.एस. के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के जो शब्द आकाशवाणी के प्रातःकालीन समाचार बुलेटिन में सुने, उनमें श्री बलराज मधोक जी के उसी विचार की प्रतिध्वनि जब सुनाई दी तो मुझे थोड़ा भी आश्चर्य नहीं हुआ। 

श्रोताओं के किसी समूह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा :

"हिन्दू-मुस्लिम को परस्पर जोड़ने से पहले तो हमें अपनी इस मान्यता को त्यागना होगा कि हम अलग अलग हैं। 

हमारे डी.एन.ए. एक ही हैं। हाँ, हमारी पूजा-पाठ की पद्धति एक-दूसरे से भिन्न भिन्न हो सकती है, किन्तु हमारे डी.एन.ए. से यही प्रमाणित होता है कि हमारी राष्ट्रीयता भारतीय ही है। और हम सभी सबसे पहले तो भारतीय हैं, और इसके बाद ही हिन्दू या मुसलमान आदि हैं।"

यहाँ जो शब्द मैंने उद्धृत किए हैं, वे लगभग वही हैं, जैसा कि मुझे याद है और जैसा उसका अभिप्राय मैंने समझा। 

किन्तु इससे जुड़ा एक विवादास्पद तथा विचारणीय प्रश्न और भी है जिसका उत्तर भी पुनः दो तरीकों से दिया जा सकता है। 

वह है "राष्ट्र" और "देश" इन शब्दों की वैदिक-सनातन-धर्म के अन्तर्गत पाई जानेवाली धारणा, तात्पर्य, तथा व्यवहारिक प्रयोग और, इसी प्रकार से "वतन" तथा "मुल्क" शब्दों के व्यावहारिक प्रयोग के परिप्रेक्ष्य के अनुसार इन दोनों शब्दों का तात्पर्य। 

संस्कृत में "राष्ट्र" शब्द संपूर्ण पृथिवी (earth, globe) के अर्थ में प्रयुक्त होता है और इसी संदर्भ में सनातन-धर्म सार्वभौम-धर्म है, न कि किसी देश-काल की सीमा से परिभाषित किसी स्थान से संबद्ध रीति रिवाज (ritual,  custom,  tradition) तक सीमित परंपरा आदि।

इस प्रकार जिसे religion कहा जाता है वह स्थान-विशेष और समाज के रीति रिवाजों आदि के अनुसार सर्वत्र भिन्न भिन्न होता है, जबकि धर्म पाँच सार्वभौम महाव्रत अर्थात् "यम" हैं जिनका उल्लंघन किसी भी स्थान, समय पर नहीं किया जा सकता। 

इस प्रकार "धर्म" या सनातन-धर्म सर्वत्र और सबके संबंध में एक ही है, जबकि religion अर्थात् रीति-रिवाज पूजा पाठ, उपासना इत्यादि जो "नियम" है,  उसका स्वरूप देश-काल-परिस्थिति के अनुसार सदैव और सर्वत्र ही बदलता रहता है ।

इसीलिए "अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह" इन पाँचों का पालन सर्वत्र और सबके लिए अनुल्लंघनीय है, और उनमें से भी प्रथम "अहिंसा" है, जिसका तात्पर्य है किसी भी वस्तु या किसी भी प्राणिमात्र से वैर न रखना।

अहिंसा परमो धर्मः।। 

इस प्रकार सनातन-धर्म की मूल प्रेरणा यही है कि हर मनुष्य को स्वयं ही अपने धर्म का आविष्कार करना होता है, और जानते या न जानते हुए भी किसी दूसरे के 'धर्म' का अभ्यास / अनुष्ठान करना, न सिर्फ अनिष्टकारी है, बल्कि मृत्यु की तरह भयावह भी है ।

(स्वधर्मे निधनं श्रेयो परधर्मे भयावहः)

इसलिए किसी पर भी लोभ या भय दिखाकर बलपूर्वक, अपनी धारणा को आरोपित करना मतान्तरण तो हो सकता है, किन्तु धर्मान्तरण कदापि नहीं हो सकता। 

इसलिए वास्तविक "धर्म" का प्रचार किया ही नहीं जा सकता, और उसकी खोज स्वयं ही करना होती है।

भौगोलिक तथा वैज्ञानिक आधार पर भी इसलिए हिन्दू हो या मुसलमान, भारत में जिसका भी जन्म हुआ है उसे भारतीय कहना सर्वथा उचित ही है।

देर आयद, दुरुस्त आयद!

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July 03, 2021

तीन पँखुड़ियाँ

मेरे ड्राइंग-रूम में दो सीलिंग फैन्स लगे हैं। पिछले दो साल का अधिकाँश समय इसी हॉल में बीता है। यह वास्तव में ऐसा हॉल है, जिसमें पार्टीशन कर लिया जाए, तो इसे ड्राइंग-कम-डाइनिंग रूम कहा जाता है। फ़ुरसत बहुत रहती है, जो काम कर सकता हूँ उन्हें करने में मन नहीं लगता, और जिनमें मन लगता है,  उन्हें कर पाने की सुविधा नहीं है। मोबाइल पर न्यूज़ देख लेता हूँ, वीडियो देखने में या म्यूजिक, संगीत सुनने में दिलचस्पी नहीं है। कुछ खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं और किसी से बातचीत करने के लिए न तो कोई विषय है, न ही कोई ऐसा परिचित, दोस्त, या अन्य व्यक्ति जिससे बातचीत हो सके। कहा जा सकता है कि मैं बहुत बोर होनेवाला और बोर करनेवाला आदमी हूँ। 

30 जून को अख़बार में श्री जे. कृष्णमूर्ति का लेख पढ़ रहा था। सवाल ऊब के बारे में था। 

"हम क्यों ऊबते हैं?" 

उन्होंने जो कहा उसे आप उनकी पुस्तकों में या उनके ऐसे लेखों आदि में जो अनेक स्थानों पर उपलब्ध हैं पढ़ सकते हैं । आप यदि इस प्रश्न को महत्वपूर्ण नहीं मानते तो आपके पास इससे बचने के लिए बहुत से तर्क भी होते हैं। सच तो यह है कि संसार में मन को बाँधे रखने के इतने साधन हैं कि उम्र ही कम प्रतीत होती है। किसी को दुनिया घूमनी है, किसी को पैसा कमाना है,  किसी को राष्ट्र, समाज, मानव, या पशु-पक्षियों की सेवा करना है, किसी को ईश्वर-प्राप्ति या ऐसा ही कोई दूसरा कार्य करना होता है। यह भी सच है कि कोई राउंड द क्लॉक अपने कार्य में लगा रहे यह भी संभव नहीं है। शारीरिक आवश्यकताएँ अपनी जगह होती हैं, स्वास्थ्य और आर्थिक समस्याएँ भी मनुष्य के लिए इतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं । और समय कभी अनुकूल तो कभी प्रतिकूल भी होता है। फिर भी यह प्रश्न कभी न कभी हर मनुष्य के सामने आता है। 

ऊब से बचने के लिए भी मनुष्य के पास कई उपाय और बहाने होते हैं। मनोरंजन की दुनिया उस पर लगातार आक्रमण करती रहती है, और वह भौतिक साधनों की चकाचौंध से अभिभूत होता रहता है। 

मेरे कमरे में लगे वो दोनों पंखे मानों दो समांतर हैं :

एक की पँखुड़ियाँ मानों कर्म, भोग और ज्ञान तथा दूसरे की मानों सफलता, विफलता और संघर्ष की कहानी कहती हैं। 

उन पंखुड़ियों की ही तरह कर्म, भोग और ज्ञान निरंतर एक के पीछे दूसरा, दूसरे के पीछे तीसरा और तीसरे के पीछे पहला, इस तरह घूमते रहते हैं। 

दूसरी ओर सफलता,  विफलता और संघर्ष भी। 

बोलो कितने तीतर! 

बिजली कभी भी आती और चली जाती है। 

तब वे पँखुड़ियाँ धीरे-धीरे रुककर ठहर जाती हैं ।

मनुष्य चेतन प्राणी है, जिसके पास मन नामक यंत्र है। 

मनुष्य स्वयं ही यह यंत्र है या इस यंत्र का स्वामी है, इस प्रश्न की ओर शायद ही किसी का ध्यान जा पाता है।

यंत्र स्वयं चेतन है या चेतनता ही यंत्र है यह भी पूछा जा सकता है। क्या यंत्र कभी ऊबता है?

मन जो कभी ऊबता है तो कभी बहुत व्यस्त होता है तो वह ज्ञान, कर्म और भोग की अति पर ही होता है।

सफलता या विफलता क्षणिक लेकिन संघर्ष छोटा या बड़ा हो सकता है।  समय की दृष्टि से भी। 

एक सवाल फिर और आता है :

ऊबता कौन है?

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July 02, 2021

मुझे नहीं पता,

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"Advertisement is the life-line of business."
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पहले किसी ने ऐसा कहा या नहीं, लेकिन अभी अभी जब अपने गीता-ब्लॉग के पोस्ट्स देख रहा था तो अचानक यह पंक्ति मन में कौंध उठी। 
पब्लिसिटी का समानार्थी शब्द है "एड्वर्टाइज़मेंट" ! 
और इसी तरह, 
"एड्वर्टाइज़मेंट" है डंके की चोट पर की जानेवाली पब्लिसिटी! 
मेरे गीता से संबंधित ब्लॉग में किसी किसी दिन अचानक और बिलकुल अनपेक्षित रूप से पेज-व्यूज़ की संख्या बढ़ जाती है। वैसे मेरे दूसरे ब्लॉग्स के बारे में भी यही होता है। 
मुझे इसकी खुशी या दुःख तो नहीं, थोड़ा सा अचरज तो होता ही है।
गीता पर जो ब्लॉग मैं लिखता हूँ, उसमें एक अप्रकाशित पोस्ट  का टाइटल है :
"Gita As It Is".
इसे लिखना शुरू किया था तब कुछ इस बारे में सोच रहा था।
फिर लगा कि इसे लिखने का अर्थ होगा -विवादास्पद होना।
आज के युग में विवादास्पद होने से भी कभी कभी रातों-रात पब्लिसिटी हो जाती है। 
इसलिए इसे अधूरा छोड़ दिया।
लेकिन यह अचरज / कौतूहल अब भी बाकी है कि अचानक किसी दिन पेज-व्यूज़ अकस्मात् इतने अधिक कैसे बढ़ जाते हैं।
मुझे नहीं मालूम कि इसका क्या रहस्य है, और मुझे क्या किसी दिन पता चलेगा !
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सोचना क्या है!?

एक और पहलू 
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यदि तुम किसी (के) बारे में नहीं सोचते, तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन तुम्हारे बारे में (क्या) सोचता है! 
पर सवाल यह भी नहीं है। 
सवाल यह है कि तुम किसी (के) बारे में क्यों सोचते हो! 
क्या इसीलिए नहीं कि किसी और या दूसरे से तुम्हें कोई अपेक्षा, डर है, -कोई कौतूहल, आकर्षण या आसक्ति है? 
आसक्ति अर्थात् मोह और अज्ञान से पैदा हुई भ्रान्ति। 
मोह अर्थात् अनित्य और नित्य में भेद न कर पाना।
अज्ञान अर्थात् पता नहीं है, यह भी न पता होना। 
मोह और अज्ञान परस्पर आश्रित होते हैं।
शायद तुम्हें दूसरे की आवश्यकता होती हो।
पर सवाल यह भी है कि तुम आवश्यकता का भी विचार ही क्यों करते हो?
तुम अतीत या भविष्य का विचार ही क्यों करते हो!
और, सवाल यह भी है कि क्या वर्तमान के बारे में विचार किया भी जा सकता है?
क्या विचार (के) आते ही तुम इस वर्तमान से कटकर तत्काल ही किसी काल्पनिक समय (जो अतीत या भविष्य होता है) में नहीं चले जाते?
किन्तु अपने बारे में सोचने पर भी क्या ऐसा ही नहीं होता?
सवाल यह भी है कि क्या वाकई तुम सोचते हो, या विचार ही आते-जाते हैं और तुम्हें लगता है कि तुम सोचते हो!
क्या सोच-विचार से पृथक् उनका कोई ऐसा नियंत्रणकर्ता होता भी है, जिसे तुम अपने-आप या स्वयं की तरह जान सको?
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July 01, 2021

गलत सवालों के बीच

संवाद और विवाद

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जो बात प्रायः झकझोरती है, वह यह कि हर मनुष्य अकसर ही कितनी गलतफहमियों का शिकार होता है! वह व्यक्ति जो कुछ दिनों तक जेल में बन्द था, इस धारणा से ग्रस्त था कि वह हिन्दू है। जेल में रहते हुए उसे ऐसा व्यक्ति मिला, जो इस धारणा से ग्रस्त था कि वह मुसलमान है। 

दोनों के बीच बातचीत हुई तो उस व्यक्ति ने जो अपने आपको मुसलमान मानता था, अपने आपको हिन्दू माननेवाले से पूछा :

1.संसार के स्वामी की वह प्रतिमा, जो कि अपनी स्वयं की ही रक्षा नहीं कर सकती, वह उसकी उपासना करनेवाले की रक्षा कैसे कर सकती है?

2. क्या संसार का स्वामी एक ही नहीं है? 

ये दोनों तर्क अब्राहमिक परंपरा (क्या इसे धर्म कहा जा सकता है! जो केवल परंपरा और कल्ट है) में  अवश्य सबको मान्य हैं ।

अपने आपको हिन्दू माननेवाला व्यक्ति इन दोनों प्रश्नों का उत्तर न दे पाया और उसने इस विश्वास को सत्य की तरह स्वीकार कर लिया और उसने उसे उसके इस्लामी प्रारूप में अपना भी लिया। 

यदि वह थोड़ा भी जागरूक, सावधान, सतर्क और समझदार होता, और किसी परंपरा या सम्प्रदाय-विशेष के मत की बजाय वास्तविक धर्म को जानने में उसकी जिज्ञासा होती, तो शुरू से ही इन प्रश्नों को उनके उचित परिप्रेक्ष्य में देखकर सोचता कि क्या किसी प्रतिमा की उपासना केवल इसलिए की जाती है, कि वह हमारी रक्षा करे? क्या ईश्वर अर्थात् संसार के स्वामी के प्रति भक्ति, प्रेम, सम्मान और आदर, और उसके उस असीम, अनंत स्वरूप को न समझ पाने के कारण उसकी एक प्रतीकात्मक मूर्ति की तरह उससे संबद्ध होने के उद्देश्य से भी कोई उसकी इस प्रकार से पूजा, उपासना, आदि नहीं कर सकता? 

याद आता है स्वामी विवेकानन्द जब रामनाड के राजा से मिले थे उस समय उन्होंने मूर्तिपूजा के संबंध में ऐसा ही संशय स्वामी विवेकानन्द के सामने रखा था। 

जहाँ वे बैठे हुए थे, उस कक्ष में राजा के पिता की एक तसवीर लगी हुई थी।

स्वामी विवेकानन्द ने उनसे पूछा :

"ये कौन हैं?" 

राजा ने उत्तर दिया :

"मेरे स्वर्गीय पूज्य पिताजी!"

"क्षमा करें, ये आपके स्वर्गीय पूज्य पिताजी हैं, या किसी चित्रकार के द्वारा बनाया गया उनका चित्र?"

"हाँ वैसे तो यह बस एक चित्र ही है, किन्तु इसे देखते ही मुझे उनका स्मरण हो आता है।'

"और स्मरण के ही साथ उनके प्रति आदर की भावना भी मन में जागृत होती होगी!"

"अवश्य ही!"

इसी प्रकार, क्या किसी प्रतिमा के माध्यम से हम ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति और भावना नहीं व्यक्त कर सकते?

"क्या ईश्वर एक नहीं है?"

राजा के इस दूसरे प्रश्न के उत्तर में स्वामी विवेकानन्द ने कहा :

"जो जल ग्रीष्म-ऋतु में सूखकर उड़ जाता है, और वर्षा-ऋतु में पुनः बरसता है, जिससे धरती पर जीवन है, क्या वह जल एक नहीं है?"

"हाँ, और नहीं भी, क्योंकि उस पर एक अथवा अनेक यह शब्द नहीं लागू होता!"

"क्या ईश्वर को एक अथवा अनेक शब्द तक सीमित किया जा सकता है? दूसरा उदाहरण जीवन का लें। क्या जीवन को एक या अनेक में बाँटा जा सकता है?"

(बरसों पहले कहीं उपरोक्त प्रसंग पढ़ा था। एक मित्र से इसकी पुष्टि चाही कि यह कितना सही या गलत है, तो उन्होंने कहा : यह प्रसंग अलवर के राजा से स्वामी विवेकानन्द की भेंट होने के समय का है। शायद ऐसा ही हुआ हो! जो भी हो, वह तथ्य गौण महत्व रखता है, ऐसा कहा जा सकता है।) 

***