कविता
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आजकल वक़्त बदलता क्यों नहीं,
आजकल दिल सँभलता क्यों नहीं!
क्या ही पत्थर का दिल है उसका,
नर्म है, तो मोम सा पिघलता क्यों नहीं!
यूँ तो पत्थर भी कभी दहल जाता है,
उसका दिल कभी दहलता क्यों नहीं,
और इधर है एक मेरा ये नाक़ाबिल,
किसी बहाने से भी, बहलता क्यों नहीं!
सुबह ढलती है, और शाम भी ढलती है,
दर्द मेरे दिल का कभी ढलता क्यों नहीं!
बुझा हुआ चिराग़ है, जैसे दिल ग़रीब का,
शाम से अब रात हो गई, जलता क्यों नहीं!
29052024
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