May 31, 2021

जुगाड़ और बिगाड़

जुड़ाव

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जीवन रचनात्मकता (creativity) है ।

किसी भी परिस्थिति में,  किसी भी तल पर,  किसी भी रूप में। हर जीवित वस्तु में यह रचनात्मकता स्वयंस्फूर्त होती है, और वस्तु-विशेष की प्रकृति, आकृति तथा अनुकृति से सतत व्यक्त होती रहती है। 

रचनात्मकता अर्थात् उपाय, रीति या युक्ति। 

जैसे भगत और भगति भक्त तथा भक्ति के अपभ्रंश हैं,  वैसे ही जुगत, युक्त और युक्ति का, जो लोकभाषा में ढलकर 'जुगाड़' हो गया !

इसी प्रकार  'बिगाड़' शब्द, विघटन का ही अपभ्रंश है। इसलिए रचनात्मकता / सृजनात्मकता या creativity एक स्वाभाविक प्राकृतिक गतिविधि है। 

जब तक इस रचनात्मकता को अवसर, अनुकूल परिस्थितियाँ और प्रोत्साहन आदि प्राप्त होते रहते हैं,  यह सतत समृद्ध होती रहती है। जब इसे ऐसे अवसर, एवं अनुकूल परिस्थितियाँ आदि नहीं मिलते, या इसका मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, केवल तभी यह विघटित होने लगती है अर्थात् विनाशशील, विनाशकारी होकर 'बिगाड़' का रूप ले लेती है।

जीवन ऊर्जा है और ऊर्जा सकारात्मक होती है या नकारात्मक। ऊर्जा शून्य नहीं होती। यह सृजनात्मक या ध्वंसात्मक ही होती है। पॉज़िटिव या निगेटिव होती है। 

जीवन में जब किसी अवसर को चुनौती की तरह स्वीकार किया जाता है, तो जीवनरूपी यह ऊर्जा अपने चरम सामर्थ्य पर पहुँच जाती है। 

किन्तु निराशा, भय, आलस्य, आत्मविश्वास की कमी, संशय आदि या अविवेकयुक्त लोभ के कारण यह नकारात्मक अथवा  शून्य होने लगती है। 

ऐसी स्थिति आ जाने पर उचित और अनुकूल समय आने की प्रतीक्षा कर सकने को भी एक चुनौती की तरह लिया जा सकता है, और इसका उपयुक्त तरीके से सामना करना भी युक्तिपूर्वक किया जानेवाला 'जुगाड़' हो जाता है। चुनौती को इस प्रकार से सम्यक् उत्तर दिया जाना ही प्रसन्नता में फलित हो जाता है।

किन्तु जब कोई, जीवन को उपयोग या अवसर की तरह देख पाने में अक्षम होता है, या समाज उसे ऐसा बना देता है, तो वह नकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। तब नकारात्मक उत्तेजना, छिछले कौतूहल, तात्कालिक सफलता और सक्रियता को ही जीवन की कसौटी मान बैठता है,और उसकी स्वाभाविक प्रतिभा (talent), सृजनात्मकता कुंठित होने लगती है। किसी आदर्श से प्रेरित, प्रभावित, अभिभूत (infatuated) होकर कोई हिंसा को भी परिवर्तन का माध्यम समझने लग सकता है। यह आदर्श और इससे जुड़ी उत्तेजना, सफलता, सक्रियता, पाखंड, दंभ में गौरव भी अनुभव किया जा सकता है, और उस आदर्श को इतना महिमामंडित भी किया जा सकता है, कि उसके लिए प्राणों का बलिदान देना भी पावन और परम कर्तव्य प्रतीत हो सकता है। किन्तु इस सबसे उत्पन्न विनाशकारी परिणाम से सारे विश्व को ही क्षति उठानी पड़ती है।

ऐसा ही एक उदाहरण है :

"राष्ट्रवाद" 

यही "राष्ट्रवाद" मनुष्यमात्र में समानता, स्वतंत्रता की स्फूर्ति भी पैदा करता है, किन्तु जब किसी विशेष राजनीतिक विचार से नियंत्रित होकर किसी भाषा, वर्ग, समुदाय आदि से संबद्ध हो जाता है और उसी दायरे और संदर्भ में वर्तमान का अवलोकन करता है, तो मनुष्यों के बीच परस्पर घृणा, ईर्ष्या, प्रतिद्वन्द्विता, उग्रता तथा हिंसा का 'जुगाड़' हो जाता है। यही 'जुगाड़' तब जुड़ाव या सौहार्द की बजाय विनाशकारी बिखराव, 'बिगाड़' हो जाता है। 

समुदाय भी पुनः युक्ति, उपाय के रूप में 'जुगाड़' होता है। वही,  लोभ, आधिपत्य, ईर्ष्या, नासमझी के कारण दूसरे समुदायों के विरोध में खड़ा होकर हिंसा और उग्रता के आवेग से ग्रस्त होकर अपने ही द्वारा तय किए आदर्श को कट्टरता की अति तक ले जाने का कारण, अर्थात् 'बिगाड़' का प्रारंभ है। युक्ति ही सबके लिए कल्याणकारी आधारभूत तर्क हो सकता है। यह तर्क किसी आदर्श की अपेक्षा न करते हुए भी सर्वोत्तम सामञ्जस्य भी हो सकता है। 

जीवन की विविध चुनौतियों का सामना वैयक्तिक या सामूहिक रूप से भी क्षण-प्रतिक्षण किया जाना होता है। शुरू में कोई विश्वास या आस्था, कामचलाऊ अवधारणा यद्यपि सहायक हो सकती है, किन्तु यही जब रूढ़ि, परिपाटी, परंपरा या रिवाज की तरह दुराग्रह बन जाती है तो अपने-आप, और दूसरों के भी लिए अहित का साधन, 'जुगाड़' हो सकती है। 

भय, चिन्ता, सुरक्षा और असुरक्षा आदि की भावनाओं को भी सकारात्मक या नकारात्मक दृष्टि से देखा जा सकता है। भय और चिन्ता सकारात्मक दृष्टि से सावधानी रखने के लिए संकेत समझे जा सकते हैं और धैर्य की परीक्षा लेते हैं, जबकि इनसे घबरा जाने पर वे ही नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

प्रेम अर्थात् संवेदनशीलता ही सकारात्मकता व नकारात्मकता की एकमात्र कसौटी है। प्रेम / संवेदनशीलता के अभाव में यही नकारात्मकता मनुष्यों और समुदायों के बीच परस्पर संघर्ष का कारण हो जाती है। 

संवेदनशीलता भी प्रथमतः और मौलिक रूप से तो अपने आप से ही प्रेम का द्योतक लक्षण होता है, और जाने-अनजाने भी हर व्यक्ति और छोटे से छोटा या बड़े से बड़ा प्राणी भी अपने आप के ही प्रति वैसे भी सर्वाधिक संवेदनशील होता ही है, या अपने आप से ही सर्वाधिक प्रेम करता है । इसी प्रेम या संवेदनशीलता से प्रेरित होकर आत्म-रक्षा और आत्म-संतुष्टि, आत्म-तृप्ति और आत्म-पुष्टि में हर कोई अनायास ही प्रवृत्त भी होता है। 

यह तो संवेदनशीलता अर्थात् प्रेम की संकीर्णता या विस्तार ही है जिसमें इस आत्म / स्व को केवल एक शरीर-विशेष तक बद्ध कर लिया जाता है, या इसमें संपूर्ण जड-चेतन, अस्तित्व को ही शामिल कर लिया जाता है ।

विघटन या 'बिगाड़' चूँकि नकारात्मक होता है, इसलिए सदैव अभावात्मक रिक्तता मात्र होता है। इसलिए इस नकारात्मकता  से न तो युद्ध किया जा सकता है, न इसे मिटाया जा सकता है। अतः इससे संघर्ष का विचार ही निरर्थक  है। 

मनुष्य की सामूहिक और वैयक्तिक चेतना :

(personal and collective consciousness)

इसी सकारात्मकता और नकारात्मकता की क्रीडा है।

इसलिए समाज या पूरी मनुष्यता के लिए ऐसा कोई सुनिश्चित तरीका नहीं हो सकता, जिसे पूरे विश्व पर थोपा जा सके!

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कीड़ा

कविता : 31-05-2021
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जब मैं फेसबुक पर हुआ करता था, एक मित्र ने एक सुन्दर कीड़े का चित्र पोस्ट किया था। तब किसी ने कहा था, सुन्दर है पर कीड़ा है! 
तब मैंने लिखा था :

हाँ कीड़ा है, पर सुन्दर है, 
हाँ सुन्दर है, पर कीड़ा है!
उसके कीड़ा हो जाने से, 
तुमको हमको क्यों पीड़ा है!!
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छाँह

 कविता : 31-05-2021

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चाह ही 'मैं' है, 

मृत्यु की चाह भी! 

राह ही मंजिल है, 

सत्य की राह भी! 

आह ही आशा है, 

वियोग की आह भी! 

छाँह ही मुक्ति है, 

प्रेम की छाँह भी!! 

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May 29, 2021

चेतना-जल!

कविता : 29-05-2021

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।। बोध-द्वादशी।। 

इस नदी के दो किनारे,

एक मैं, संसार एक,

इस नदी में जल भी है,

चेतना, वह भी है एक! १

किस काल में इस चेतना से, 

संसार का सृजन हुआ,

प्रश्न कितना विसंगत है, 

काल है आयाम एक! २

हर किसी के लिए अपना, 

बिंदु वर्तमान एक, 

विस्तार जिसका मनोकल्पित, 

अतीत एक, भविष्य एक! ३

फिर वही मन खोजता है,

जगत्-उद्गम काल में,

पड़ा रहता है विमोहित,

विचारभ्रम के जाल में! ४

काल का उद्भव अगर है,

और है, अवसान अगर, 

तो काल से पहले का क्या,

यह प्रश्न ही अतः वृथा! ५

पहले तथा फिर बाद में, 

काल के हैं रूप कल्पित!

काल तो केवल बिंदु है, 

शाश्वत, चिरंतन, है अभी! ६

चेतना से काल है,

काल से ही, स्थान भी,

काल-स्थान हैं कहाँ, 

यदि नहीं हो चेतना ही! ७

और फिर यह चेतना,

भी नहीं बस कल्पना! 

कल्पना का अधिष्ठान,

स्वयंस्फूर्त, स्वयंप्रमाण! ८

यद्यपि यह मन नहीं, 

नहीं बुद्धि, भाव, विचार,

न अस्मिता, विचारकर्ता,

पर सभी का है आधार! ९

सब से परे, सबसे पृथक्,

अनछुई, यह अस्पर्शित,

नित्य है यह बोध-मात्र, 

अप्रकट, पर प्रकट नित्य! १०

चेतना के दो किनारे,

एक मैं, संसार एक,

दो नहीं, जब जल नहीं,

इसलिए मैं भी, नहीं एक! ११

आभास दो का एक से,

न हों दो तो, कहाँ एक!

इसलिए कहते हैं उसको,

एकमेवाद्वितीय-अभेद! १२

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May 28, 2021

पल पल की है बात!

कविता : 28-05-2021

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पलक झपकते सब कुछ होता, 

पलक झपकते जाता बीत, 

पलक झपकते वर्तमान का, 

पल पल हो जाता अतीत! 

कितनी जल्दी चिन्ता होती, 

कितनी जल्दी उठता भय,  

कितनी जल्दी मन घबराता,

कितनी जल्दी होता निर्भय!

कितनी जल्दी जगती पीड़ा, 

कितनी जल्दी दुःख गहराता, 

कितनी जल्दी थम भी जाता,

सुख में भी तत्क्षण रम जाता! 

कितनी जल्दी होता व्याकुल, 

बनते-ढहते आशा के पुल,

कितने जल्दी पथ मिल जाते, 

कितने जल्दी खो भी जाते!

कितने छोटे,  कितने लम्बे,

कितने अल्प, कितने सुदीर्घ,

पल पल, युग युग, कितनी देर, 

ठहरते, रुकते, जाते बीत!

कितने जल्दी मिलकर मीत,

कितने शीघ्र बिछुड़ जाते, 

जीवन की तो रीत यही है,

आते-जाते समझाते! 

कितनी जल्दी ऋतुएँ आतीं,

पावस, शरद, शिशिर, हेमन्त,

वासंती-ऋतु के पीछे-पीछे, 

कितने शीघ्र,  ग्रीष्म-आतप!

कितनी गति से चक्र घूमता,

चिरस्थायी, फिर रुकता भी,

कभी पूर्ण उल्लास भरा,

लेकिन फिर पुनः रिक्तता भी!

कभी मधुर हवा के झोंके, 

कभी ऊष्ण लू, झंझावात,

कभी रसीली पवन-गंध,

कटुता कभी, तिक्तता भी!

मन बहता, या स्थिर रहता है,

बार बार कहता रहता है,

पलक झपकते सब कुछ होता, 

पलक झपकते जाता बीत, 

पलक झपकते वर्तमान पल,

खोकर हो जाते अतीत! 

लेकिन दृष्टि इस चंचल मन की, 

वहाँ नहीं क्यों जाती है, 

जहाँ स्रोत है जग, जीवन का,

सृष्टि जहाँ से आती है!

किंतु कभी वह जीवन-उत्स,

क्या पहचाना भी जाता है!

फिर कोई कैसे जाने, 

उससे अपना क्या नाता है! 

क्या उसकी पहचान है कोई, 

क्या उसकी स्मृति या विस्मृति! 

वह संस्कृति है या विकृति,

या शुद्ध नितांत, निपट प्रकृति!

पलक झपकते मन खो जाता, 

जिसके आँचल में सो जाता, 

फिर ना कभी लौटना जाने,

ना फिर कभी लौट पाता! 

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May 27, 2021

क्या कहूँ!

कविता : 27-05-2021

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मेरी ही क्या सत्यता, 

संसार की क्या कहूँ,

मेरी ही क्या सुरक्षा, 

संसार की क्या कहूँ! 

मैं हर पल बनता-मिटता,

संसार भी तो, मुझ जैसा ही,

फिर भी दोनों नित्य लगें,

इससे ज्यादा क्या मैं कहूँ! 

मुझसे ही संसार है मेरा, 

संसार ही से तो मैं भी हूँ, 

एक हैं दोनों, या हैं दोनों,

अलग अलग वे, मैं क्या कहूँ!

जब मैं न था, संसार न था, 

संसार न था तब, था क्या मैं! 

अब लगता है, वे दोनों हैं,

इससे ज्यादा, क्या मैं कहूँ!

लेकिन फिर यह भी लगता है, 

इक दिन दोनों नहीं रहेंगे,

क्या ऐसा भी हो सकता है, 

आकर किससे लोग कहेंगे!

उस दिन होने-ना-होने की, 

उलझन शायद मिट जाएगी,

लेकिन किसको चैन आएगा,

मौत मुझे क्या बतलाएगी!!

जिसमें संसार है बनता-मिटता,

जिसमें मैं भी हूँ बनता-मिटता,

जो बनता है, ना मिटता है,

उसके बारे में, मैं क्या कहूँ! 

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मेरा जीवन-दर्शन

जीवन के सप्तसूत्र

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मेरी समझ में जीवन के जो सात आयाम सदैव होते हैं, जीवन को जिनसे अभिन्न और अनन्य कहा जा सकता है उन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है :

1. जरूरत, संबंध और प्रेम, 

2. अर्थ, प्रयोजन, समाधान और संतुष्टि। 

अस्तित्वमान होने का तात्पर्य है, -जरूरतें होना। 

जरूरतें पुनः दो प्रकार की, शारीरिक या मानसिक हो सकती हैं। इन जरूरतों की पूर्ति होना और निरंतर होते रहना ही जीवन या जीने को संभव बनाता है।

इन जरूरतों की पूर्ति जिन माध्यमों से होती है, उनसे ही संबंध हो सकता है। ये माध्यम भी पुनः व्यक्ति, वस्तुएँ एवं परिस्थिति होते हैं। 

इसका विस्तार समूह या समुदाय तक किया जा सकता है, और जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ परिभाषित की जा सकती हैं। जिन माध्यमों से ये आवश्यकताएँ पूरी होती हैं, उनसे संबंधित होने पर जीवन सुचारु और सरल रूप से व्यतीत होता है। 

जरूरतों तथा आवश्यकताओं, इन दोनों आयामों के बाद का जो महत्वपूर्ण तीसरा आयाम है वह है प्रेम, जिसे वैसे तो ठीक-ठीक परिभाषित करना न तो संभव है न आवश्यक ही है, फिर भी यह कहना पर्याप्त है कि प्राणिमात्र को जीवन से, और विशेष रूप से अपने जीवन से तो प्रेम होता ही है।

प्रश्न यह भी है कि प्रेम का पर्यायार्थी, निकटतम शब्द क्या हो सकता है, जिससे इस अमूर्त तत्व / आयाम को अधिक स्पष्टता से कहा-समझा जा सके? 

मुझे लगता है कि प्रेम और संवेदनशीलता एक ही वस्तु के लिए प्रयुक्त दो भिन्न शब्द हैं। प्रेम हो तो संवेदनशीलता होती है, और संवेदनशीलता होती है तो प्रेम भी!  

इस प्रकार प्रेम कोई भावना-विशेष नहीं, बल्कि जीवनमात्र के प्रति सहज संवेदनशीलता का ही एक रूप है। 

यह संवेदनशीलता ही किसी भावना का रूप ले लेती है, किंतु उसमें भी अपने-आपसे प्रेम अर्थात् स्वयं के जीवन के प्रति होने वाला संवेदन ही उसका प्रमुख आधार होता है। 

इसी "स्व" या स्वयं को हर कोई अनायास ही सदैव जानता भी है, यद्यपि इस "जानने" में, जाननेवाला स्वयं को स्वयं से भिन्न उस तरह से नहीं जानता जैसे कि वह (सापेक्षतः) किसी अन्य विषय, वस्तु या व्यक्ति को जाना करता है।

इस प्रकार, आत्मप्रेम ही अपने और अपने से भिन्न के प्रति होने वाली सहज स्वाभाविक संवेदनशीलता है।

इसी आत्मप्रेम को स्वार्थ के रूप में भी देखा जाता है, जहाँ यह बहुत संकीर्ण हो जाता है। 

शारीरिक जरूरतों में प्रमुख हैं भूख, प्यास, निद्रा और सुरक्षा । किंतु एक विशिष्ट प्रवृत्ति जो इतनी ही शक्तिशाली, स्वाभाविक और अदम्य होती है, वह है अपनी संतान को उत्पन्न करने की तीव्र लालसा। इसकी अभिव्यक्ति स्त्री और पुरुष में भिन्न भिन्न प्रकार से होती है, जिसे समाज और सामाजिक नैतिकता और भी अधिक जटिल तथा कठिन बना देते हैं। 

समाज का तात्पर्य है : व्यक्तियों के बीच समन्वय, तालमेल और सामञ्जस्य, जो प्रायः संघर्ष ही बन जाता है। विभिन्न समुदायों के अपने-अपने रीति रिवाज, रूढ़ियाँ और आग्रह इसे और भी पेंचीदा बना देते हैं। 

यहाँ से हमारे चिंतन की दिशा सनातन / वैदिक परंपरा अर्थात् 'धर्म' को आधार की तरह ग्रहण कर स्थापित की गई 'विवाह' नामक संस्था की उपादेयता की ओर भी जा सकती है, वर्णाश्रम धर्म को महत्व देने की दृष्टि से उसकी आवश्यकता भी समझी जा सकती है।

श्रीमदभगवद्गीता अध्याय 7 में कहा गया है :

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। 

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।। ११

उल्लेखनीय है कि यहाँ अर्जुन से कहते हुए श्रीकृष्ण उसे "भरतर्षभ" का संबोधन देते हैं ।

ऋषभ का एक अर्थ है श्रेष्ठ। 

ऋषभ शब्द का प्रयोग उस नर गौवंश के लिए भी किया जाता है जिसे गौवंश की संतति की वृद्धि के लिए गायों के साथ, उनके बीच छोड़ा जाता है। इसे ही 'वृषोत्सर्ग' कहा जाता है। 

चूँकि कृषि पर आधारित समाज में गो-पालन तथा नर गोवत्स को बधिया कर कृषि तथा अन्य कार्यों को किया जाता है, अतः ऋषभ का तात्पर्य है "श्रेष्ठ" ।

इस प्रकार मनुष्यों में श्रेष्ठ के अर्थ में अर्जुन को भरतर्षभ कहा गया। गौवंश में पशुओं के लिए बल ही श्रेष्ठता का पैमाना होता है और इसी प्रकार प्रकृति भी श्रेष्ठतर की जीवितता (survival of the fittest) के सिद्धांत से श्रेष्ठता तय करती है, इसलिए इस श्लोक में "काम" अर्थात् संतान उत्पन्न करने की प्रवृत्ति के  भेद को क्रमशः पशुओं और मनुष्यों की स्थिति में स्पष्ट किया गया है। 

इस प्रकार यह निर्देश दिया गया कि मनुष्यों के लिए "काम" उपभोग न होकर कर्तव्य है, जिससे वर्ण-व्यवस्था सुचारु रूप से संरक्षित रहे। (वैसे भी "काम", धर्म, अर्थ, तथा मोक्ष की ही तरह एक पुरुषार्थ की तरह भी जाना जाता है। यहाँ "काम" का अर्थ काम-वासना न होकर कामनाएँ, इच्छाएँ, ऐषणाएँ आदि हैं :

जैसा कि वित्तैषणा, पुत्रैषणा या कीर्तिप्राप्ति की अभिलाषा होने के अर्थ में समझा जाता है।) 

किंतु विवाह की अवधारणा का यह आधार ही आज के समाज में खो चुका है। 

फिर भी, परिवार नामक संस्था को सुचारु रूप से बनाए रखने के लिए कोई न कोई आधार तो आवश्यक है ही।

स्वार्थ अर्थात् स्व के संकीर्ण अर्थ तक सीमित 'प्रेम' क्या ऐसा आधार हो सकता है?

क्या इस प्रकार से सुनिश्चित और परिभाषित विवाह में कोई ऐसा घटक हो सकता है जो परिवार और समाज को शक्तिशाली बना सके? 

जीवन का चौथा आयाम है मनुष्य और मनुष्यों के समुदाय की सामूहिक इच्छाएँ, परंपराएँ, रूढियाँ आदि। 

यह मनुष्य की मानसिक स्थितियों के बारे में है। 

संवेदनशीलता के अभाव में ऐसी तमाम इच्छाएँ, परंपराएँ आदि शायद ही समाज को सुखी और संतुष्ट कर सकें। 

अगला पाँचवाँ आयाम है : 

अर्थ यानी सार्थकता / उपयोगिता।

इसी अर्थ को समग्रता से प्राप्त करना "प्रयोजन" नामक आयाम है। 

एक व्यक्ति के सुख प्राप्त कर लेने से क्या मनुष्यमात्र सुखी हो सकता है? क्या सभी के सुख परस्पर टकराते नहीं? 

यह अपनी व्यक्तिगत समृद्धि, स्वतंत्रता का आदर्श (model), क्या अंततः सभी के लिए हानिप्रद और विनाशकारी ही नहीं सिद्ध होता है?

क्या इस आदर्श (model) के स्थान पर वैदिक सूक्ति :

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।।"

को  आदर्श-वाक्य की तरह ग्रहण किया जाना ही सामयिक नहीं होगा? 

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May 25, 2021

जिज्ञासा!

कविता : 25-05-2021

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देह प्रकृति की अभिव्यक्ति,

मन प्रकृति की अनुकृति, 

देह का परिणाम मन,

या देह का परिमाण मन!

भाव,  बुद्धि,  चित्त,  विचार, 

सब कुछ मन का ही विस्तार!

स्मृति या स्मृति की कल्पना, 

जिससे अपनी प्रतीति, 

मन का ही गुण-दोष वह,

काल,  स्थान,  भवभूति! 

यह प्रतीति क्या प्रकृति है, 

या प्रकृति का परिणाम? 

क्या यह नित्य-अनित्य है!

या है कोरा अनुमान? 

नित्य अनित्य, काल पर निर्भर,

इन्द्रिय,  विषय,  अनुमान,

बुद्धि, विचार, स्मृति, कल्पना,

स्मृति की ही सब पहचान!

इस पूरे प्रपञ्च का, 

फिर है कर्ता कौन? 

मैं तो हूँ कदापि नहीं, 

प्रकृति भी है मौन! 

कर्ता वैसी ही कल्पना,

जैसे कर्म प्रतीति, 

सुख-दुःख फिर क्या वस्तु है,

है किसकी अनुभूति? 

जिसकी भी अनुभूति है, 

क्या वह भी कोई स्वतंत्र?

या वह भी है कल्पना, 

प्रकृति की ही तरंग! 

यह सब बिलकुल स्पष्ट है, 

फिर क्यों है अभिमान? 

क्या यह भी नहीं कल्पना? 

प्रमाद या अनवधान!

अनवधानता ही जगत है, 

अनवधानता ही है संसार,

अविवेक ही सुख-दुःख है, 

सुषुप्ति है अहंकार! 

अनवधानता है अभाव, 

कल्पित जैसे अंधकार,

उसको दूर करेगा कौन, 

यह तो है मिथ्या विचार!

देह तो है मात्र प्रकृति,

जन्म-मृत्यु देह का धर्म, 

देह का परिणाम ही मन,

न कोई कर्ता, न कोई कर्म!

देह तो है मात्र प्रवृत्ति,

प्रकृति का निश्छल विलास, 

बनते-मिटते चित्र नित्य,

नियति-नटी का है उल्लास!

फिर क्या मेरा, हुआ जन्म! 

तो क्या मृत्यु होगी, मेरी? 

प्रश्न असंगत, कोरा भ्रम,

मैं जीवन! जीवन की रीत!

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अनंत जीवन!

कविता : 25-05-2021

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मन भटकता जा रहा था, 

चंचल निराकृति प्राण सा, 

आसरा फिर उसने पाया, 

शरीर मूर्तिमान का! १

देह मन ऐसे मिले, 

इक दूसरे में खो गए,

कौन था पहचान किसकी,

ऐसे अबूझ हो गए! २

नित्य साथी सुख-दुःख के, 

एक बिन दूजा नहीं, 

दोनों के ही साथ साथ,

बसा सकल संसार यहीं! ३

किंतु फिर भी धीरे धीरे, 

पल पल, दिन दिन, बीते युग,

देह हो गई जीर्ण-जर्जरित, 

प्राण भी हो गए थकित!  ४

और फिर जब अंततः, 

प्राणों ने तजी देह, 

देह ने भी तजा मन को, 

विलीन वह हुआ गेह!  ५

किंतु नहीं हुआ विलीन,

देह मन का नेह वह, 

प्राणों में रहा रमता, 

अजर अमर विदेह वह!  ६

फिर से नवीन देह हुई, 

फिर आकर्षित हुआ मन, 

फिर प्राण चंचल आ बसे, 

फिर हुआ पुलकित जीवन! ७

***

 




May 24, 2021

मैं और मेरा सुरक्षा-कवच

कविता : 24:05:2021

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मैं और मेरा सुरक्षा-चक्र, 

अकसर ही बातें करते हैं, 

कौन है किसके सहारे,

कौन है किसका सहारा! 

क्या प्रयोजन है मेरा, 

और क्या है, कवच का!

कौन है, जो सोचता है,

कौन किसकी करे रक्षा!

हर घड़ी भयभीत, चिन्तित,

हर घड़ी संत्रस्त, व्याकुल,

जागता रहता निरंतर, 

अंततः सो जाता थककर!

नींद लेकिन टूटते ही, 

फिर वही चिन्ता प्रलाप, 

फिर वही उल्लास पल भर,

फिर वही आशा-विश्वास! 

मैं वही जो नींद में था, 

मैं वही जो जागता है! 

जागने पर फिर ये कैसा, 

द्वन्द्व मुझको भासता है?

मैं और मेरा सुरक्षा-चक्र,

रोज प्रकट-अप्रकट हो,

रोज रोज होते हैं व्यक्त,

रोज ही करते हैं प्रश्न,

अंततः हो अनभिव्यक्त! 

क्या कोई उनमें अकेला,

दूसरे बिन रह पाता!

क्या है फिर दोनों का, 

परस्पर अबूझ नाता!

क्या है फिर दोनों का, 

परस्पर अटूट नाता! 

***