July 17, 2023

जीवन का उत्स

'नोट्स'  : क्रमशः 3,

"सफलता" का मद क्या है?"

इसे कोई कैसे जान सकता है?

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।

(अध्याय ७)

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार प्राणिमात्र जन्म से ही इच्छा और द्वेषरूपी द्वन्द्व और मोहित बुद्धि से युक्त होता है। फिर "मैं" उसका अपवाद कैसे होता?

हाँ कूर्म, कच्छ, वराह, नृसिंह, वामन, भार्गव, राम, कृष्ण-बलराम और कल्कि अवश्य ही अवतार होते हैं इसलिए उनका "अवतरण" होता है न कि "जन्म"। यहाँ "बुद्ध" की गणना नहीं की गई है क्योंकि "बुद्ध" यद्यपि अवतार हो सकते हैं, किन्तु उनके अनुयायी ही इसे स्वीकार नहीं करते। "ब्राह्मण" यद्यपि उन्हें "अवतार" मानते हैं, बौद्ध परंपरा वेद-विरोधी होने से अवतारवाद के "सिद्धान्त" से सहमत नहीं है। ऐतिहासिक दृष्टि से "कृष्ण" के ही साथ  "बलराम" को भी "विष्णु" का अवतार माना जाता है। यही दोनों और उनकी बहन सुभद्रा को वैसे ही अवतरित माना जाता है, जैसे राम के साथ लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न  और सीता को भी क्रमशः "विष्णु" और "लक्ष्मी" के ही रूप में "अवतार" माना जाता है। इस दृष्टि से "बलराम" और "बुद्ध" एक दूसरे के विकल्प, और "विष्णु" के नवें "अवतार" हो सकते हैं।

"सफलता" का मद उसी सम्मोह का परिणाम है जो कि मनुष्य में इच्छा तथा द्वेष का कारण होता है। "अवतार" तो विधि के विधान के अनुसार किसी विशेष प्रयोजन के लिए मनुष्य या अन्य आकृति में प्रकट और विलुप्त होते हैं। मैंने भी एक सामान्य मनुष्य की तरह जन्म लिया, तो मैं भला "सम्मोह" से कैसे बच सकता था?

इसलिए मुझे कार्य-कारण के सिद्धान्त की संकीर्णता या मर्यादा का आभास है।

मेरे शीशमहल पर पत्थर फेंककर किसी ने उसे चूर-चूर कर दिया इससे मुझे दुःख तो हुआ, परन्तु खिन्न कदापि नहीं हुआ। उस दुःख के बाद दुःखों से मुक्ति भी हो गई।

जब तक मनुष्य इच्छा और द्वेष से युक्त होता है तब तक वह भाग्य और भाग्य विधाता के हाथों का खिलौना होता है। और इच्छा तथा द्वेष, मोहित बुद्धि की डोर में बाँधकर उसे नियंत्रित और संचालित करते रहते हैं।

भाग्य और भाग्य विधाता, एकमेव वास्तविकता के ही दो पक्ष हैं। किन्तु मोहित बुद्धि से ग्रस्त होने से उन्हें परस्पर  एक दूसरे से अलग मान लिया जाता है।

हर मनुष्य इसी प्रकार से अपना जीवन जीता रहता है। और इतना ही नहीं, यहाँ तक कि "ईश्वर" / "अवतार" स्वयं भी विधि के विधान से संचालित होता है, किन्तु उसके लिए यह लीला या नाटक होता है, जबकि मनुष्य और दूसरे भी सभी जीव अपनी बुद्धि से मोहित होने के कारण अपने आपको अपने संसार में, संसार से पृथक्  उसका ही एक ऐसा अंश मान लेते हैं जिसकी स्वतंत्रता सीमित है। "ईश्वर" और "अवतार" इस मान्यता से रहित होते हैं।

इसलिए "ईश्वर" का इष्ट-रूप में स्मरण, चिन्तन, मनन और प्रणिधान से मनुष्य अन्ततः उससे अपनी अनन्यता को जान लेता है। पातञ्जल योगसूत्र, समाधिपाद-२३ :

ईश्वर प्रणिधानाद्वा ।।

में यही कहा गया है।

जब कोई चेतन अस्तित्व जीव-भाव से तादात्म्य कर लेता है और अपने स्वतंत्र कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता और स्वामी होने की बुद्धि को अपने इष्ट "ईश्वर" के प्रति समर्पित कर देता है, तो अनायास ही जन्म मरण के चक्र से छूट जाता है।

इसलिए अध्यात्म के किसी जिज्ञासु के लिए परम श्रेयस् की प्राप्ति के लिए दो ही प्रकार की निष्ठाएँ हो सकती हैं :

लोकेऽस्मिन्द्विधानिष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।।

ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।३।।

मैं इच्छा और संकल्प के द्वन्द्व में झूलता हुआ इस तथ्य को भूल रहा था। यही "सफलता" का मोह और मद था, जिसका उस पत्थर फेंकनेवाले ने निवारण कर दिया।

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July 16, 2023

आशीर्वाद

सफलता का मद

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'नोट्स' -- 2

अपनी बुद्धि और "सफलता" के मद में डूबा हुआ मैं यह नहीं देख पाया कि सफलता भी सामर्थ्य, साधनों, समय और श्रम का परिणाम होती है। इच्छा तो बस एक प्रेरक तत्व है। और इन सबका सम्मिलित रूप है अनुशासन :

यो शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।।

याद आया। 

मैं कुछ इसी तरह इच्छा और संकल्प के बीच झूल रहा था। तब जीवन में पहली बार अपनी क्षमता, सामर्थ्य, साधनों की अपर्याप्तता और समय की सुनिश्चितता पर  संशय उठा। ईश्वर के बारे में तो मुझे यही लगता था कि वह अपनी सुविधा के लिए तय की गई एक मान्यता भर है, जो उसके अस्तित्व को मानते हैं उनके लिए भी, और जो उसके अस्तित्व को नहीं मानते, उनके लिए भी, और मजे की बात है कि जिन्हें इस बारे में दुविधा है, और तय नहीं कर पाते कि ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करें या नहीं, उनके लिए भी। 

मैं अपने आपको इसी तीसरी कोटि में रखता था। फिर किसी दिन मन में यह प्रश्न कौंधा कि ईश्वर है या नहीं, या मैं इस बारे में संशयग्रस्त हूँ, ऐसे विचारों में उलझे रहने से क्या मैं किसी ठोस नतीजे पर पहुँच सकूँगा! तात्पर्य यह, कि ये तीनों ही विकल्प मूलतः इस प्रश्न से मेरे ध्यान को पूरी तरह से हटा देते हैं कि "ईश्वर" शब्द किस वस्तु का या उसके अर्थ का द्योतक है? ईश्वर शब्द "समय" जैसा ही एक शब्द है और जैसे हम "समय" शब्द का अर्थ या तात्पर्य न जानते हुए भी इस शब्द का बेहिचक प्रयोग करते हैं, क्या उसी तरह से हम "ईश्वर" का अर्थ, तात्पर्य और यह शब्द किस वस्तु का सूचक है, इसे भी न जानते हुए ही प्रयोग नहीं किया करते हैं! शायद मैं अज्ञेयवाद की दिशा में आगे बढ़ रहा था। फिर मुझे लगा, क्या "मैं नहीं जानता" यह कल्पना भी एक विचार या अवधारणा / मान्यता ही नहीं है! एक नया शब्द सीख लेने से मैं मान लेता हूँ कि ईश्वर "अज्ञेय" है और मैं "अज्ञेयवादी" हो जाता हूँ!

इसलिए पहले यह तय करना होगा कि "ईश्वर" शब्द का मेरे लिए क्या अभिप्राय हो सकता है?

जैसा मैंने पहले कहा, "समय" भी तो ऐसा ही एक शब्द है! क्या कभी कोई, समय का अस्तित्व है या नहीं है, इसे जानता या इस बारे में प्रश्न उठाता है?

श्रीमद्भगवद्गीता खोलता हूँ तो एक संकेत मिलता है :

कालो कलयतामहम्।।

तात्पर्य यह कि काल का अस्तित्व आकलन करनेवालों के लिए है। या काल अनुमानजनित एक निष्कर्ष भर है।

फिर लौट कर :

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।।

और, 

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।।

पर आ जाता हूँ।

इसलिए काल "विकल्प" नामक वृत्ति हुआ।

काल के स्वरूप / चरित्र को दर्शानेवाला एक अन्य सूत्र :

वर्तते इति वर्तमानम्।।

भी है। 

अंततः यही लगता है कि ईश्वर भी काल की ही तरह से अव्याख्येय, अनिर्वचनीय वास्तविकता है। और इस पर एक या अनेक का विशेषण लागू नहीं हो सकता। जैसे कोई भाववाचक संज्ञा होती है, ईश्वर, काल और "मैं" भी abstract noun  ह8ं।

यह सब तो ठीक, किन्तु प्रश्न उठता है कि काल, ईश्वर और "मैं" क्या तीन पृथक् पृथक् वास्तविकताएँ हैं? यदि ऐसा है तो इन तीनों के बीच क्या संबंध है, या हो सकता है?

यहाँ मेरी बुद्धि स्तब्ध हो जाती है और शायद उस दशा का भागी हो जाता हूँ और जिसका श्रीमद्भगवद्गीता में : 

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।

इस प्रकार से वर्णन किया गया है, ऐसा मुझे लगता है।

जैसे ही मुझे इस सत्य / स्थिति का साक्षात्कार होता है, यह भी स्पष्ट हो जाता है कि "काल", "मैं" या "ईश्वर" यद्यपि उसी दशा के पर्यायवाची हैं, फिर भी उन्हें मैं स्व या पर में विभाजित नहीं कर सकता। स्व / पर अर्थात् subjective or objective.

मेरे द्वारा दिए गए जानेवाले ऐसे ही वक्तव्यों के आधार पर लोग मुझे संत, ज्ञानी, महात्मा या गुरूजी आदि जैसे शब्दों से संबोधित करने लगते हैं। किन्तु जब इन विषयों पर बातचीत होती है कि किसी "निष्कर्ष" पर पहुँचने की उम्मीद करते हैं। क्या यह मुमकिन है? 

इस पर भी ऐतराज नहीं है, लेकिन जब लोग इस बहाने से मुझसे "आशीर्वाद" माँगने लगते हैं तो मैं समझ नहीं पाता कि "आशीर्वाद" का क्या मतलब है! जिन्हें यह सब अच्छा लगता है, वे आशीर्वाद का आदान करने के लिए स्वतंत्र हैं और उनसे मेरा कोई विरोध भी नहीं है, किन्तु मेरे लिए यह संभव ही नहीं कि मैं किसी को "आशीर्वाद" कह भी सकूँ! देना तो बहुत दूर है! औपचारिकतावश भी ऐसा करना मुझे अच्छा नहीं लगता। क्योंकि तब यह भी भावनात्मक शोषण का ही रूप हुआ। और अधिकांश लोग मुझसे सहमत नहीं हो पाते। क्योंकि वे "सफलता" के अभिलाषी होते हैं। पर पता नहीं कि क्या "सफलता" का "आशीर्वाद" से कोई संबंध है भी या नहीं! और फिर इस सिलसिले का अंत कहाँ है! 

इस पोस्ट में तो यहीं तक! 

***

 








July 15, 2023

'नोट्स'

प्रणश्यति  / विनश्यति 

पत्रकार महोदय से परिचय होने के दूसरे ही दिन उन्होंने अपना उद्देश्य प्रकट कर दिया। वे बोले 'सर' वैसे तो आपका नाम लिए बिना ही आपके विचारों की चर्चा हम सबसे किया करते थे और इन विचारों को ही 'नोट्स' में लिख लिया करते थे, जिसे डायरी भी कह सकते हैं। वहाँ भी उन्होंने आपका नाम कहीं नहीं लिखा लेकिन जैसा कि लोगों को और खासकर मुझे पता चला, इसमें संदेह नहीं कि उन विचारों का स्रोत आपकी ही प्रेरणा से उत्पन्न उनका निजि चिन्तन था। चूँकि इसका कोई ठोस प्रमाण भी मेरे पास नहीं है, इसलिए जब आपके बारे में पता चला तो उनके उन 'नोट्स' को संपादित और संशोधित करने का दायित्व मैंने स्वेच्छया स्वीकार कर लिया। और इसलिए इस कार्य में आपसे मदद लेने मैं आपके पास आया हूँ।

पत्रकार महोदय ने उनके 'नोट्स' की फ़ोटोकॉपी की स्पायरल बाइन्डिंग की हुई एक प्रति मुझे देते हुए कहा।

"आप आराम से अपनी सुविधा के अनुसार इसका अवलोकन कीजिए और जरूरत महसूस हो तो अपनी टिप्पणी इस पर ही या अलग से भी दे सकते हैं।"

बस कुल सौ सवा सौ पृष्ठ रहे होंगे, जिन पर तारीख़ भी अंकित नहीं की गई थी।

मैंने एक सरसरी नजर उस पर डाली।  

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'नोट्स' - १

इस नोटबुक के पृष्ठों पर तारीख़ लिखना जरूरी नहीं है, क्योंकि इन 'नोट्स' का कोई विशेष सामयिक सन्दर्भ नहीं हो सकता है। बस एक क्रम अवश्य है पर वह भी एक संयोग ही है। 'नोट्स' को क्रमबद्ध करना भी आवश्यक नहीं है क्योंकि सभी 'नोट्स' की पृष्ठभूमि एक ही होते हुए भी उन्हें परस्पर स्वतंत्र रूप में भी देखा जा सकता है। इन्हें मैं अपनी डायरी की तरह लिख रहा हूँ और इसलिए इन्हें मेरे ही व्यक्तिगत विचार और निष्कर्ष माना जा सकता है। 

मोहभंग :

शिक्षा संस्थान की स्थापना करते समय मैं जिस स्वप्न से मोहित हुआ था, वह शीशे के सुन्दर लेकिन नाज़ुक महल की तरह टूट कर चूर चूर हो चुका है। यद्यपि उसके टुकड़ों से हृदय लहूलुहान भी हुआ पर अच्छा ही लगा कि समय रहते मैं चेत गया। और अपने उद्देश्य के बारे में अब बहुत अलग ढंग से देख पा रहा हूँ। श्रीमद्भगवद्गीता पर मैंने बहुत से विद्वतापूर्ण लेख लिखे हैं किन्तु उस सबकी प्रेरणा सिर्फ स्मृति, स्मृति तथा बुद्धि का प्रशिक्षण ही था और मूल तात्पर्य से मैं अब तक अनभिज्ञ ही था।

यह श्लोक मुझ पर पूरी तरह सही उतरता है :

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।। 

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।

मेरे प्रसंग में इस "विनश्यति" के "प्रणश्यति" अर्थ की पुष्टि इस श्लोक से भी होती है :

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।। 

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।

क्रोधात्भवतिसम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।।

स्मृतिभ्रंशात्बुद्धिनाशः बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

मेरे विषय में तो यह पूरा क्रम कुछ ऐसा ही था / है।

मैंने बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त की, मैं मेधावी और प्रतिभाशाली भी था। और शरीर से स्वस्थ, परिवार से समृद्ध और प्रतिष्ठित भी था / हूँ। संसार की सफलताएँ भी मानों मेरे पीछे पीछे ही चलती थीं, और मैं सदैव जीवन में किसी आदर्शपूर्ण उद्देश्य से प्रेरित होकर उसकी प्राप्ति के लिए अपनी संपूर्ण क्षमता, शक्ति और सामर्थ्य झोंक देता था।

राजनीति से मुझे कोई मतलब नहीं था। किसी विचारधारा आदि में मुझे कोई सार्थकता नजर नहीं आती थी। सभी कुछ जैसे एक उपद्रव ही लगा करता था। धार्मिक आयोजनों को तो मैं मुखौटा मानता था और उनके पीछे छिपे वीभत्स चेहरों की सच्चाई से भी भली-भाँति अवगत था। और हमेशा से यही लगता रहा कि धर्म और अध्यात्म खोज की वस्तु है, न कि आँखें मूँदकर नकल करने या कि अनुकरण किए जाने की वस्तु । दिखावा करने की तो कदापि नहीं। 

दर्शनशास्त्र और दर्शन का भेद भी मुझे स्पष्ट था। बुद्धिवाद की मर्यादा और सीमा तो मुझे पातञ्जल योगदर्शन पढ़ते ही समझ में आ गई थी, जहाँ :

"प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।।"

और, 

"प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।।"

के माध्यम से ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञात के आभासी भेद का पूर्णतः  निवारण / निराकरण कर दिया गया है।

किन्तु मैं स्वयं बुद्धि से मोहित होकर किसी कल्पित "भविष्य" को आदर्श और उद्देश्य के सुन्दर स्वप्न की तरह गले लगा हुए था। मुझे यह स्वप्न इतना मनोहर और आकर्षक लगता था कि इसकी काल्पनिकता पर मुझे संदेह तक नहीं उठता था। ऐसे ही हर मनुष्य ही किसी न किसी स्वप्न में डूबा रहता होगा।

इसका मूल क्या है?  क्या विषयमात्र पर ध्यान दिये जाने से ही यह प्रारंभ नहीं होता? किसी भी विषय पर ध्यान दिए जाते ही वह सुखद या दुःखद प्रतीत होता है। अर्थात् विषय से चित्त के जुड़ते ही उससे संग घटित हो जाता है जिसके बाद संग होने से उसमें प्रतीत होनेवाले सुख की कामना उत्पन्न होती है। कामना के पूर्ण होते ही दूसरा विषय उस विषय का स्थान ले लेता है, या कामना के पूर्ण न हो पाने पर क्रोध उत्पन्न हो जाता है। दोनों ही स्थितियों में बुद्धि सम्मोहित हो जाती है जिससे भले-बुरे, सही और गलत की स्मृति और विवेक-बुद्धि भी नष्ट हो जाती है। मैं ठीक इसी बिन्दु पर था जहाँ अपने कल्पित आदर्श-रूपी स्वप्न की निरर्थकता और रिक्तता को देख तक नहीं पा रहा था, और तब कहीं से किसी प्रेरणा ने मेरे उस स्वप्न के काँच के महल पर एक पत्थर फेंक दिया।

तब मैं क्रोध से पागल हो उठा और उस पत्थर फेंकनेवाले के लिए मन में भयानक दुर्भावनाएँ उठने लगी। यद्यपि उसके मन में ऐसा कुछ नहीं था। वह तो मुझे जानता तक नहीं था।

उस एक दिन और रात्रि में मैंने युगों युगों की यात्रा कर ली। फिर थक गया और सो गया। सोकर उठा तो लगा मानों मेरा नया ही जन्म हुआ है।

इस 'नोट्स' में यहीं तक। 

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July 14, 2023

मुझे नहीं पता था!

एक अंत : एक प्रारंभ 

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कि यह अंत एक नया प्रारंभ होगा।

अब वे मुझसे मिलने प्रतिदिन आने लगे। फोन उनके पास भी था और मेरे पास भी था, लेकिन मुझसे फोन पर बात करना वे नहीं चाहते थे। शायद वे यह भी चाहते थे कि उनके मित्रों और 'टीम' के लोगों से मैं भी बातें न करूँ। वैसे भी मैं बहुत ही कम लोगों से फोन पर बातचीत करता था। वह भी आवश्यक होने पर ही। इसलिए हम दोनों के बीच फोन पर कभी बातचीत ही नहीं हुई।

वे अकसर शाम को मेरे घर आया करते थे। और चूँकि उनके घर पर उनसे और उनके परिवार से मिलने के लिए आनेवाले लोग कम न थे, और मैं नितान्त अकेला था, इसलिए भी वे ही मुझसे मिलने आया करते थे। यह थोड़ा विचित्र लगता था कि उन्होंने कभी उनके मित्रों, परिवार या परिचितों के बारे में मुझसे कोई बात कभी नहीं की, लेकिन मेरे बारे में, मेरा नाम लिए बिना ही वे बहुत सी बातें उनके मिलनेवालों से करते रहते थे। उन्होंने ही इसका भी अपना ही एक तरीका खोज लिया था। मुझसे बातें करने के बाद वे उन बातों के 'नोट्स' बनाने लगे थे, और उन पूरे दो तीन वर्षों के 'नोट्स' को उन्होंने बहुत सुरक्षित रखा, जिसकी जानकारी किसी और को नहीं थी। मुझसे मुलाकात होने के दो तीन साल बाद दुर्भाग्यवश उनकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। बहुत दिनों तक वे मुझसे मिलने नहीं आए, तो मुझे फिक्र होने लगी। और चूँकि उन्होंने मेरा किसी से परिचय नहीं कराया था, इसलिए भी मुझे बहुत दिनों बाद ही इस बारे में पता चला।

हुआ यह, कि जिस शिक्षा संस्थान की स्थापना उन्होंने की थी, वहाँ उन्होंने उनके मित्रों और लोगों से शिक्षा प्रणाली से संबंधित मेरी उन बातों की चर्चा मेरा नाम लिए बिना ही की थी, उनमें से ही पत्रकार किस्म के एक आदमी को यह मालूम था कि मुझसे मिलने के लिए वे प्रायः शाम को आया करते थे।

चूँकि वह पत्रकार था, इसलिए मेरे यहाँ अखबार देनेवाले से भी उसकी पहचान थी। और उसी माध्यम से मुझे इस बारे में पता चला।

उनके परिवार के लोग और दूसरे लोग भी उनके उन 'नोट्स' को प्रकाशित करने के बारे में सोच रहे थे और इसलिए भी अचानक मैं उनके लिए महत्वपूर्ण बढ़ गया।

वैसे भी शिक्षा के व्यवसाय और व्यवसाय (प्रबंधन) की शिक्षा के क्षेत्र में वे एक जाना माना नाम थे, और उनकी लिखी कुछ किताबें पहले भी प्रकाशित हुईं थी, इसलिए भी उनके 'नोट्स' का प्रकाशन एकाएक ही एक महत्वपूर्ण, विचाराधीन विषय हो गया।

उनके द्वारा स्थापित उस शिक्षा संस्थान में उस किताब का एक विशेष स्थान हो सकता था। इसलिए भी कुछ लोग इस दिशा में सक्रिय हुए होंगे।

अब वे तो नहीं रहे थे, किन्तु ये पत्रकार महोदय मुझसे मिलने के लिए आने लगे, क्योंकि उन्हें अनुमान हो गया था, या उन्होंने ही उसे मेरे बारे में कोई संकेत या जानकारी दी होगी।

एक छोटी सी बात भी कितनी दूर तक जा सकती है!

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आमफ़हम

आम के आम, गुठली के दाम!

कविता / १४-०७-२०२३

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आम आदमी तो आम / आप हैं,

आम का मौसम आते ही टिकोरे,

झुकने, झूलने और झूमने लगते हैं,

उत्साह से भरे, बच्चे गिराते हैं उन्हें 

पेड़ पर चढ़ या मारकर पत्थर, 

बड़े तो भून या उबालकर उसको, 

बना लेते हैं "पना", या फिर उसका, 

चटनी, अचार, मुरब्बा या अमचुर,

आम आदमी ही तो आम होता है! 

ख़ास तो वह है, जो कि आम नहीं! 

फिर भी आम को है गलतफहमी,

कि वो ही तो बस खास है कोई,

उसके जैसा न दूर पास कोई!

आप ही अब तय कर लें यह,

आप आम हैं या कि ख़ास हैं,

आपका क्या भरोसा, विश्वास है!

सच ही है कि आम है जब तक,

कोई उम्मीद है,  कोई आस है! 

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July 13, 2023

और, अगले ही दिन

भविष्य या भविष्य की कल्पना! 

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वे अप्रत्याशित रूप से मुझसे मिलने चले आए। 

"क्षमा चाहता हूँ, कल आपसे हुई बातों पर देर तक सोचता रहा। मैं मानता हूँ कि इस शिक्षा संस्थान की स्थापना मैंने सिर्फ इस उद्देश्य से की थी ताकि बच्चों का भविष्य बनाया और सँवारा जा सके, और इसलिए मैंने अपने जैसे विचारोंवालों दोस्तों और दूसरे लोगों को मिलाकर एक टीम बनाई। वास्तव में मुझे इसकी कल्पना तक नहीं थी, कि मुझसे जुड़नेवाले दोस्तों और लोगों की रुचि उस लक्ष्य में कदापि नहीं थी जो कि मेरा सपना था। मैं यह भी मानता हूँ कि मैं स्वयं किसी आदर्शवाद से प्रेरित था। पर कल हुई आपके साथ की बातचीत से यह भी समझ में आ गया कि कोरा आदर्शवाद कितनी बुरी तरह भ्रमित कर देता है। आदर्शवाद के साथ सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम भविष्य को तो नहीं, उसके काल्पनिक चित्र को सत्य मान बैठते हैं और उससे बुरी तरह मोहित होकर संसार को सुधारने और बदलने जैसे व्यर्थ कार्य में अपने प्रत्यक्ष वर्तमान (के) सत्य को न सिर्फ तोड़ मरोड़ देते है, बल्कि उस चित्र के आकर्षण में इसलिए भी बँध जाते हैं क्योंकि इस प्रकार से हम अपनी अस्मिता को और  गौरवान्वित कर सकें। यह अस्मिता, जो भीतर के खालीपन की, रिक्तता की भी प्रत्यक्ष वास्तविकता होती है, निरंतर सहारा दिए जाने से ही इतनी ठोस और सत्य जान पड़ती है।

कल की आपकी बातों से पहले तो मुझे बहुत गहरी ठेस लगी, और मन में आपके प्रति दुर्भावनाएँ पैदा होने लगी। रात भर मैं सो भी न सका। लेकिन भोर होने से कुछ पहले आँख लग गई।  भोर में जब उठा तो मन अत्यन्त शान्त था। वैसा ही, जैसा मेरे बचपन में अकसर ही होता था। फिर कल की आपसे हुई बातें याद आईं तो मन में शर्म, ग्लानि और अपराध बोध पैदा हुआ।  फिर भी साहस कर आपसे क्षमा माँगने चला आया ।"

उनका गला रुँध आया था और वे बोल तक नहीं पा रहे थे।

मैंने उनसे क्षमा माँगी तो बोल पड़े :

"अरे अरे! क्या करते हैं! मैं तो आपको धन्यवाद देने आया हूँ। आजकल आपके जैसे लोग कहाँ मिलते हैं। लेकिन मुझे किसी दूसरे से भी कोई शिकायत नहीं है, आखिर कल तक तो मैं भी उनके ही जैसा था न!"

वे दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गए। यह तो अच्छा था कि उनके संस्कार ने ही उन्हें मेरे पैर छूने से रोक रखा था, इस तरह उन्होंने मुझे शर्मिन्दा होने से भी बचा लिया था। 

मैंने भी प्रत्यत्तर में हाथ जोड़ दिए और उन्हें छोडने के लिए गेट तक चला आया।

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फिलहाल यहाँ हूँ!

सड़क पर! 

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यहाँ से पहले उज्जैन में नवंबर 2019 से 2023 के जून माह  तक रहा। इससे भी पहले क़रीब सवा तीन साल तक जहाँ रहा, वहाँ किसी विद्यालय में शिक्षक के पद पर कार्य करने के लिए एक प्रस्ताव मिला था। जिसने प्रस्ताव दिया था विद्यालय उसका ही था, हालाँकि कहने के लिए एक समिति भी थी जिसमें बहुत से अन्य लोग भी थे, जो सभी मिलकर विद्यालय की व्यवस्था की देखरेख करते थे। 

उत्सुकतावश मैंने कहा कि मुझे विद्यालय में पढ़ाने का पहले से कोई अनुभव नहीं है। उन्होंने कहा : कुछ दिन पढ़कर देखिए। अगर आपको ठीक लगे तो ज्वॉइन कर लीजिए।

मैंने कहा : मैं पहले यह देखना चाहूँगा कि अन्य शिक्षक क्या और कैसे पढ़ाते हैं।

पहले दिन मैं उस कक्षा में गया जहाँ शिक्षक अंग्रेजी पढ़ा रहे थे। वह भी हिन्दी माध्यम में। बी ए टी बैट, बैट याने बल्ला, सी ए टी कैट, कैट याने बिल्ली।

फिर मैं दूसरे दिन भी उसी कक्षा में गया जहाँ बच्चों को अंग्रेजी भाषा में गिनती, जोड़ बाकी और टेबल (पहाड़े) की शिक्षा दी जा रही थी।

सभी शिक्षाएँ बच्चों में नैसर्गिक और बालसुलभ उत्सुकता और जिज्ञासा को जागृत करना तो दूर, बल्कि केवल कुंठित कर रही थीं। दूसरे दिन उस व्यक्ति ने मुझसे पूछा कि वहाँ ज्वॉइन करने के बारे में मेरा क्या विचार है?

मैंने उनसे कहा कि मैं नहीं पढ़ा सकूँगा। वे इसका कारण जानने पर अड़े रहे। अंततः मैंने उससे कहा : मुझे लगता है कि इस पूरी शिक्षा प्रणाली में मौलिक बदलाव किया जाना चाहिए।

"किस प्रकार का बदलाव?"

वे उद्विग्न होकर कुछ अधीरता से बोले। 

"देखिए किसी भी भाषा की शिक्षा उसी भाषा के माध्यम से दी जाना चाहिए। जैसे हिन्दी की शिक्षा हिन्दी भाषा के माध्यम से,  अंग्रेजी भाषा की शिक्षा अंग्रेजी भाषा के माध्यम से और इसी तरह अन्य सभी भाषाओं की शिक्षा भी उस उस भाषा के ही माध्यम से। जब आप कोई भाषा किसी दूसरी भाषा के माध्यम से देते हैं तो बच्चे के मन में "ऐसा क्यों है?" इस प्रश्न को उठने से पहले ही दबा दिया जाता है और यह भी इतना या और भी विचित्र ही है, कि न तो शिक्षक और न ही शिक्षा प्रणाली थोपने वालों को ही इसकी कल्पना तक होती है कि इस प्रकार से बच्चे के मन में अनावश्यक तनाव और असमंजस भी पैदा हो जाता  है, जिस पर न तो उसका और न किसी का और का ध्यान होता है। उसका मन बँट जाता है और वह केवल बाध्यता और दबाव में शिक्षा को दोहराता रहता है। यदि किसी भाषा को सीधे उसी भाषा के माध्यम से सिखाया जाए तो बच्चे का मन अनायास ही इस सच्चाई को स्वीकार कर लेता है कि भिन्न भिन्न भाषाओं की संरचना अलग अलग और एक दूसरे से स्वतन्त्र होती है, जिससे वह दो या दो से अधिक भाषाएँ भी आसानी से सीख सकता है।

यह तो हुई भाषा शिक्षा की बात।

अब गणित की शिक्षा के विषय में :

गणित (जोड़ बाकी) और संख्या की शिक्षा दिए जाने से पहले बच्चे को यह बतलाया जाना चाहिए कि संख्याएँ और संख्याओं का एक दूसरे से संयोजन केवल मान्यता ही है जिसकी सत्यता सुनिश्चित नहीं है इसके लिए यह एक उदाहरण देना ही पर्याप्त होगा :

मान लीजिए एक टोकरी में तीन आम और दूसरी टोकरी में चार आम हैं। यदि सभी आमों को एक ही टोकरी में रख दिया जाए, तो कुल सात आम होंगे। इस प्रकार एक दृष्टि से जिनकी संख्या सात है, वे ही फल की दृष्टि से "एक" ही हैं।

इसी प्रकार से मान लीजिए एक टोकरी में तीन आम और दूसरी टोकरी में चार सेब हैं, और यदि उन्हें एक ही टोकरी में रख दिया जाए तो संख्या की दृष्टि से तो वे "सात" होंगे, "फल" की दृष्टि से "दो" ही होंगे।

आम और सेब के उपरोक्त उदाहरण से :

एक = दो = तीन = सात 

यह रोचक निष्कर्ष प्राप्त किया जा सकता है!

इस प्रकार संख्या की अवधारणा भी उतनी ही भ्रामक हो सकती है, जितनी कि किसी भाषा में किसी शब्द का कोई विशेष अर्थ होने की अवधारणा।"

वे भौंचक होकर मेरा मुँह देखने लगे।

फिर ठहाका लगाकर बोले : "हाँ आप ठीक कहते हैं, इसलिए  आपका और हमारे विद्यालय का, यही सभी के हित इसी में है  कि आप हमारे विद्यालय में न ही पढ़ाएँ! अच्छा हुआ जो पहले से ही आपने यह स्पष्ट कर दिया!

धन्यवाद!"

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July 11, 2023

भूत, भविष्य और स्मृति

वर्तमान का यह क्षण

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मेरा आज का वर्डप्रेस ब्लॉगपोस्ट 

Is There A Future?

संक्षेप में, पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार :

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।।

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।।

यही पाँच वृत्तियाँ हैं जिनके निरुद्ध किए जाने के बाद ही योग का अभ्यास प्रारंभ होता है। 

अतः प्रमाण पुनः "वृत्ति" है। वृत्ति ही "मन" है। और जैसा कि श्री रमण महर्षि कृत "उपदेशसारः" में कहा गया है :

वृत्तयस्त्वहंवृत्तिमाश्रिताः।। 

वृत्तयो मनः विद्ध्यहं मनः।। 

अतीत, "भविष्य" और कल्पित वर्तमान "अनुमान" है।

अतीत, वर्तमान और भविष्य के रूप में जिसे अनुभव किया / या जाना जाता है, वह "काल" जड है, जबकि उसे जाननेवाला चेतन है। काल और स्थान परस्पर अभिन्न हैं, जिनका उद्भव  एक ही स्रोत अविनाशी अक्षर ब्रह्म से होता है:

शिव अथर्वशीर्ष में इसे ही रुद्र कहा जाता है :

अक्षरात्सञ्जायते कालः कालाद्व्यापकः उच्यते भोगायमानो।। व्यापको हि भगवान् रुद्रो यदा शेते रुद्रः संहार्यते प्रजाः।।

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July 09, 2023

Question / प्रश्न 31

प्रश्न  / Question  31

What is Dharma and What is Sanatan Dharma?

धर्म क्या है, और सनातन धर्म क्या है? 

उत्तर  / Answer :

धर्म / Dharma is The Law Universal that maintains, holds to and strictly governs this whole existence everywhere at all times and places for all sentient beings  and insentient things irrespective of the individuals.

धर्म / Dharma is therefore the सत्य / Truth and not subject to speech, because and obviously, the speech / language distorts the essense of Truth to a great extent. Then Truth is lost irretrievably, greatly  and धर्म / Dharma too remains unseen.

Then further determination and decay of धर्म / Dharma takes place, custom and  traditions turn धर्म / Dharma into अधर्म / Adharma and Vidharm / विधर्म and many different and contradicting beliefs and faiths cause chaos and straighten in the human mind and society at large.

At the global scale this results in wars and the wars are forced upon, justified as crusade and jihad.

The three western religions are stark  evidence to this fact.

In comparison, the Religions of the East in unison and coherence speak of what is true धर्म / Dharma, worth the name.

The fundamentals of this धर्म / Dharma or सनातन धर्म / The Sanatana Dharma has been stated already in the beginning of this Answer.

These comprise of :

अहिंसा / ahinsA, सत्य /satya, अस्तेय / asteya, ब्रह्मचर्य / Brahmacharya and the last is -- अपरिग्रह /  aparigraha.

The Treatise on the Yoga of Maharshi Patanjali narrates these very same five cardinal principles and refer to them as यम / Yama सार्वभौम पञ्च महाव्रत meaning the Universal Law, everyone should follow without exception and in no condition to be violated. 

The Hindu, The Buddhists, The Jain, and The Sikh traditions / religions agree to this and that is why they are different forms of the same Sanatana Dharma. Manusmriti however speaks directly in the following words :

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।।

प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्म सनातनः।।

The same is found in the Buddhist text hammapada in the following words :

एस धम्म सनंतन।।

In Sikh Tradition :

एक ओंकार सतनाम।।

Expresses the same sense of :

"What is Dharma?"

Jain too insist that the True धर्म / Dharma is Sanatana Dharma only.

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July 04, 2023

Question 30

Question  30.

प्रश्न 30.

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Lasting Relationships :

Why Relationships don't last? 

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रिश्ते वास्ते कब, कैसे और क्यों ख़त्म हो जाते हैं? 

उत्तर / Answer :

पहले कभी मैंने "अर्थ और प्रयोजन" शीर्षक से एक पोस्ट लिखा था। यहाँ उसी विषय को पुनः

" अर्थ या प्रयोजन"

के सन्दर्भ में लिख रहा हूँ।

प्रयोजन और अर्थ का परस्पर संतुलन और सामञ्जस्य हो तो दोनों एक दूसरे के पर्याय हो जाते हैं। और यदि ऐसा न हो तो दोनों एक दूसरे के विपर्याय हो जाते हैं। परिवर्तनशीलता जीवन का नित्य सत्य है। जीवन इस दृष्टि से सतत द्वैत है। फिर यही द्वन्द्व, दुविधा हो जाता है। कुछ पंक्तियों में :

जीवन से लंबे हैं बन्धू!

ये जीवन के रस्ते!

इक पल रोना होगा, बन्धू, 

इक पल चलना हृषीकेशं, 

ये जीवन के रस्ते!  

राहों से राही का रिश्ता,

कितने जनम पुराना!

एक को आगे जाना होगा, 

एक को पीछे आना!

मोड़ पे रुक मत जाना, 

(बन्धूऽऽऽऽ)

दोराहे पे फँस के!

ये जीवन के रस्ते! 

जीवन से लंबे हैं बन्धू,

ये जीवन के रस्ते! 

जैसे ही जीवन में किसी लक्ष्य, आदर्श या गन्तव्य कक विचार या कल्पना कर ली जाती है, मन अतीत की स्मृति के आधार पर ही ऐसा कर पाता है। इस लक्ष्य, आदर्श या गन्तव्य आदि का विचार उस स्मृति के ही परिप्रेक्ष्य में होता है। अर्थात् यह वर्तमान से सर्वथा विच्छिन्न किसी कल्पित भविष्य का सपना होता है, न कि जीवन का नित्य और वर्तमान सत्य। 

फिर ऐसा ही मन संबंधों के अर्थ और प्रयोजन का चिन्तन करने लगता है। पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार स्मृति भी (मन की) अन्य वृत्तियों की तरह मन की एक वृत्ति ही है। स्मृति अतीत है, अर्थात् अतीत का विचार, इसी तरह इस स्मृति के ही प्रारूप में किसी भविष्य का विचार या कल्पना उसी अतीत में लौटना है, जिसकी अति इति हो चुकी है। इस इंद्रियगम्य भौतिक जगत में स्मृति के आधार पर कुछ अकाट्य, अचल नियमों की स्थापना और आविष्कार किया जा सकता है और बौद्धिक दृष्टि से वह सब के लिए सत्य और तर्कसंगत भी है ही, इस पर संदेह नहीं, किन्तु मन नामक वस्तु, जो कि वैयक्तिक जीवन है, जो अनेक भावनाओं और भावदशाओं की सम्मिलित अनुभूति है, उसके बारे में भौतिक विज्ञान कोई तय नियम नहीं खोज सका है।

अतीत ही मन के संदर्भ में समस्त ज्ञात (known) है। अतीत ही संस्कारित मन (conditioned mind) है। संस्कारित मन अभ्यास habit या आदत, पुनरावृत्ति है, जो कि किसी यंत्र के लिए तो आवश्यक है, किन्तु जीवन जो सजगता है, इस जीवन और मन की सजगता, अभ्यास की पुनरावृत्ति से कुंठित होने लगती है, इसलिये मनुष्य जितना अधिक अभ्यस्त (संस्कारित / conditioned) होने लगता है, उतना ही अधिक यांत्रिक भी हो जाता है। खेल खेलना, कार, कंप्यूटर या मोबाइल चलाना तो अवश्य ही अभ्यास पर निर्भर है, किन्तु जैसे जैसे आप इसमें कुशल, दक्ष और प्रवीण हो जाते हैं जीवन से उतने ही अधिक दूर होने लगते हैं। "नयापन" का जो आकर्षण प्रारंभ में होता है वह आगे जाकर बोझिल, निरर्थक और ऊबाऊ लगने लगता है। "तो हम क्या करें" का प्रश्न मन में आते ही हम पुनः उसी दिशा में, और भी अधिक प्रगति, "विकास" या "उन्नति" करने के बारे में सोचने लगते हैं। यह सब एक यांत्रिक चक्र में घूमते रहने की तरह है, और भले ही यह चक्र वृत्तीय (circular) से बदलकर कुन्डली (spiral) की तरह ही क्यों न हो जाए, हम इसे देख या समझ पाने में विफल हो जाते हैं और यह तक नहीं जान पाते हैं  कि त्रुटि कहाँ हुई!

पातञ्जल योगदर्शन इस दृष्टि से अनूठा है कि उसमें अभ्यास के महत्व को रेखांकित किया गया है, और श्रीमद्भगवद्गीता की ही तरह "कर्म"और "कर्ता" की अवधारणा को सत्य "मानकर" उस आधार पर वृत्ति के निरोध, एकाग्रता और समाधि के प्रयोग से "संयम" के द्वारा सिद्धियों की प्राप्ति और व्यर्थता की ओर भी संकेत किया गया है। अन्ततः कैवल्यपाद के अंतिम योग-सूत्र में

"पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति।।"

के माध्यम से पुरुषार्थ (कर्म) तथा गुणों के प्रतिप्रसव को ही कैवल्य अर्थात् चितिशक्ति की स्वरूप में प्रतिष्ठा का पर्याय कहा गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता में इसे ही अध्याय ५ में :

यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।।

एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।५।।

स्पष्ट किया गया है।

अब हम इस प्रश्न पर आएँ, कि रिश्ते कब कैसे और क्यों ख़त्म हो जाते हैं?

स्पष्ट है कि सभी रिश्ते या संबंध द्वैत-मूलक होते हैं और केवल "मान्यता" ही होते हैं। उनकी सत्यता संदिग्ध ही होती है। किन्तु  विचार और विचारकर्ता के संबंध पर ध्यान दें तो यह स्पष्ट होगा कि यह संबंध यद्यपि अत्यन्त घनिष्ठ और स्थायी भी जान पड़ता है, मूलतः एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह एक दूसरे से अभिन्न होता है। विचारकर्ता विचार का छायाचित्र होता है। जैसा कि सूरज की धूप में हवा से इधर उधर दौड़ते मेघों का धरती पर पड़ती उनकी छाया से होता है।

छाया का अस्तित्व मेघों और सूरज दोनों पर ही निर्भर होता है, ठीक उसी तरह "विचारकर्ता" का अस्तित्व विचार-रूपी मेघों और चेतना रूपी सूर्य के प्रकाश पर आश्रित होता है। छाया की तुलना में मेघ स्थायी होते हैं और मेघों की तुलना में सूरज नित्य। इसलिए सूरज, मेघों और छायाओं का परस्पर संबंध अस्थायी और क्षणिक होता है। यह क्षणिकता कितनी ही अल्प या दीर्घ प्रतीत हो, इसका अन्त अवश्यंभावी है।

यह है समस्त संबंधों की अस्थिरता और अनिश्चितता का रहस्य।

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