February 24, 2022

एक कविता-चित्र

फ़ोटोकॉन / photocon 

---------------©--------------

उल्लास-उत्सव से भरे! 



जब दर्द बयाँ होता है!

कविता : 24-02-2022

--------------©-------------

हर बार ही नया होता है, 

जब भी दर्द बयाँ होता है,

लेकिन यह मालूम नहीं, 

दर्द किसे, कहाँ होता है!

भीतर होता है, या बाहर,

यहाँ-वहाँ या कहीं नहीं,

दर्द होता है, अहसास क्या, 

अहसास, क्या दर्द होता है!

किसी व्यतीत की पीड़ा, 

किसी भविष्य की आशंका, 

या कि, वर्तमान का ही दंश,

दर्द यूँ, ऐसा भी, होता है!

धुन्ध जैसा बिखरता है,

रौशनी जैसा निखरता है, 

अँधेरे जैसा फैलता हुआ,

कौंध के जैसी प्रखरता है!

***

अयमात्मा ब्रह्म...

सूक्ति :

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।

--

यह मेरा है या यह पराया है, इस प्रकार का आकलन संकीर्ण बुद्धि से युक्त मनुष्य ही करते हैं। उदार-हृदय से प्रेरित आचरण करनेवाले मनुष्यों के लिए तो पूरी पृथ्वी मानों एक ही परिवार होता है।

महावाक्य :

अयमात्मा ब्रह्म।।

'अयं' (पद) सर्वनाम अर्थात् 'यह' शब्द सूक्त में किसी सांसारिक या भौतिक वस्तु के लिए प्रयुक्त है, और महावाक्य में आत्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है। सूक्त में जिसे परिवार कहा गया है, उसे ही महावाक्य में निज आत्मा कहा गया है। 

जब तक अयं का विचार है तब तक इदं (यह) भी होगा ही, और जब तक इदं (यह) है, तब तक अहंकार (मैं) भी होगा ही।

इस प्रकार जिस 'मैं' का निर्देश सूक्त में 'निज' (मेरा) के सन्दर्भ में किया गया है, वह उस 'मैं' से भिन्न है जिसका महावाक्य में निर्देश है। जिस 'मैं' का निर्देश महावाक्य में ब्रह्म कहकर किया गया है, उसका ही निर्देश पुनः 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य में ब्रह्म के अर्थ में है।

परो या परः के भी दो तात्पर्य हो सकते हैं :

अन्य अर्थात् दूसरा, 

परम अर्थात् आत्यन्तिक, पूर्ण, अंतिम,

परः पुनः ब्रह्म, आत्मा या परमात्मा के अर्थ में भी ग्रहण किया जा सकता है। 

***

February 22, 2022

क्षितिज और परिधि

समय क्या है?

-----------©--------

बया का घोंसला

--

महर्षि वेदव्यास सूर्य को अर्घ्य देकर शान्त और प्रसन्न मुद्रा में अपने आश्रम में आसन पर विराजमान थे। उनका पुत्र क्षितिज, और पुत्री परिधि उस कुल्या, कूलिनी के तट के समीप अवस्थित उनकी उस पर्णकुटी के आसपास खेल रहे थे, जहाँ पर उनका आश्रम था।

उस क्षीणधारा पयस्विनी के इस तट पर तथा दूसरे तट पर भी बबूल (acacia) के अनेक वृक्ष थे, जिन पर बया के अनेक नये पुराने घोंसले हवा में झूल रहे थे।

वे पक्षी ऋतु आने पर हर बार उन वृक्षों पर नये घोंसले बनाया करते थे। बबूल के वृक्ष पर काँटे उनकी रक्षा करते थे, तो नीचे नदी के बहते जल के कारण कोई शिकारी पशु भी उन घोंसलों तक पहुँच नहीं पाता था।

एक बया उस समय पास के ही एक वृक्ष पर तिनकों से ऐसा ही एक घोंसला बनाने में संलग्न थी, जिसे देखकर दोनों भाई-बहन को अपने पिता के मुख का आभास होता था। भगवान् वेदव्यास जी की मुखमुद्रा और इस घोंसले की रचना में अवश्य ही, कोई समानता तो थी ही!

भैया! इस चिड़िया को क्या समय का भान ही नहीं होता कि वह धीरे धीरे, तिनकों से बुनकर इतने अधिक श्रम और धैर्य के साथ अपना नीड़ निर्मित करती है?

क्षितिज ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह कौतूहल और विस्मय से उस पक्षी को तिनके लाते हुए और उसके साथ के दूसरे पक्षी को तिनकों को बुनकर घोंसला बनाते हुए देखता रहा। 

तब परिधि दौड़कर पिता के पास पहुँची, और उनके समक्ष पुनः अपनी वही जिज्ञासा रख दी, जिसे उसने क्षितिज से पूछा था।

"तुम्हें क्या लगता है? क्या समय के होने से वह चिड़िया अपना घोंसला बुनती है, या उसके घोंसला बुनने के कारण ही समय का, या समय के अस्तित्व का प्रारम्भ होता है?"

यह उत्तर सुनकर परिधि चकित रह गई। 

"फिर समय क्या है?"

उसने पिता से पूछा। 

"अक्षरात्संजायते कालो कालाद् व्यापकः उच्यते... "

पिता ने पुत्री की जिज्ञासा शान्त करते हुए कहा।

"पिताजी! 'व्यापक' शब्द का क्या तात्पर्य हुआ?"

"परधि! 'व्यापक' शब्द के दो आशय हैं : एक है काल, -जिसके आदि या अन्त को कोई भी नहीं जानता, दूसरा आशय है स्थान या आकाश, जिसका विस्तार कहाँ से कहाँ तक है, इसे भी कोई भी नहीं जानता।"

"किन्तु पिताजी! अभी-अभी तो आपने यह कहा कि काल का उद्भव अक्षर से होता है!"

"हाँ, उस अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-नायक परमेश्वर, चैतन्यघन अक्षर परमात्मा से ही, जिसमें कि सतत असंख्य काल और आकाश, अनवरत वैसे ही उठते और विलीन होते रहते हैं, जैसे कि समुद्र में सदैव असंख्य बुलबुले उठते ओर विलीन होते रहते हैं।"

(कल्पित)

***



February 21, 2022

जैसे

 कविता / 21-02-2022

--------------©---------------

नींद आती है, ख्वाब आते हैं, 

चिट्ठियों के जवाब आते हैं!

किसी मुफलिस की झोंपड़ी में,

जैसे कोई नवाब आते हैं!

हिफाज़त, देखरेख, कीजिए, 

काँटों के पीछे गुलाब आते हैं!

हाँ निगाहें तो हैं क़ातिल उनकी, 

मगर अंदाजो-आदाब आते हैं!

बेख़याली में भी खयाल होता है, 

रंजो-ग़म के हिसाब आते हैं!

बैठे-बैठे भी ऐसे ही अकसर, 

खयाल उसको, नायाब आते हैं!

***




सोचो, साथ क्या जाएगा!

कविता / 21-02-2022

--------------©-------------

तुम कौन!

सोचने दो संसार को,

संसार के बारे में!

सोचने दो मन को,

मन के बारे में!

सोचने दो साँस को,

साँस के बारे में,

बुद्धि को बुद्धि के बारे में,

स्मृति को स्मृति के बारे में!

शरीर को खुद उसके बारे में! 

तुम क्या सोच सकते हो! 

क्या तुम सोच सकते हो!

क्या तुम सोच भी सकते हो! 

फिर सोचता कौन है! 

तय है, कोई कहीं नहीं!

तुम्हें डर लगता है! 

पर क्या डर तुम्हें लगता है!

तुम्हें भूख लगती है, 

पर क्या भूख तुम्हें लगती है! 

तुम्हें नींद आती है,

पर क्या नींद तुम्हें आती है!

तुम जाग जाते हो, 

पर क्या तुम सोये भी थे! 

तुम्हें स्वप्न आते हैं, 

पर क्या स्वप्न तुम्हें आते हैं!

भूख और प्यास,

थकान और नींद,

स्वप्न और जागना, 

तुम्हें पूछे बिना ही आते हैं,

पता नहीं कौन है वह, 

जो करता है इंतजाम सारा, 

शायद उसे ही भगवान कहते हैं!

या उसको ही संसार कहते हैं, 

भगवान को भगवान के बारे में,

संसार को संसार के बारे में,

भगवान को संसार के बारे में,

संसार को संसार के बारे में,

मन को मन के बारे में,

तन को तन के बारे में,

बुद्धि को सोचने दो,

बुद्धि के बारे में,

और स्मृति को सोचने दो, 

स्मृति के बारे में!

तुम्हें पता ही है, 

कि तुम बस, हो भर! 

पता न भी हो,

तो भी तुम हो ही! 

पता होना भी है ही!

बस तुम्हें इतना ही पता है, 

इतना होना पता भी काफी है, 

तुम्हारा होना भर ही काफी है!

अपना होना पता भी काफी है!

पता होने का होना काफी है!

सोचना निहायत गैर-जरूरी है, 

और फिर, यूँ भी नामुमकिन है! 

***


 


 

February 20, 2022

चींटियाँ और चिन्ता

कविता / 20-02-2022
---------------©------------
चिन्ता,
चिमटा या चिमटी नहीं,
चिन्तित हुई कोई, 
चींटी ही तो होती है, 
जो अकेली नहीं, 
अकसर सदल बल,
समूह होती है!
चली आती हैं, 
बेहिचक, बेखटके,
चुपके-चुपके, बेधड़क!
कर देती है, -आक्रमण,
अपने शिकार पर, 
और उनमें से जब,
कोई या कुछ,
पैरों-तले कुचल जाती हैं,
तो तुरंत ही उसे,
लादकर ले जाती है,
दूसरी कोई चींटी!

***


February 19, 2022

निष्ठा और श्रद्धा,

विश्वास और मत

---------©----------

यद्यपि यह एवं इससे पहले का अंतिम पोस्ट मेरे स्वाध्याय ब्लॉग में लिखा जाना उचित होता किन्तु इसे यहाँ लिखने का प्रयोजन यह है कि पाठक मेरे उस ब्लॉग का भी अवलोकन करें। या उस ब्लॉग के पाठक इस ब्लॉग का भी अवलोकन करें। 

ब्लॉग लिखना मेरे लिए एक स्वाभाविक कार्य है, इसका न तो कोई विशेष उद्देश्य है, न इसके माध्यम से मुझे किसी प्रकार का आर्थिक लाभ लेना होता है। व्यक्तिगत रूप से मुझे न तो किसी धर्म, सिद्धान्त, व्यक्ति, मत आदि का खण्डन-मण्डन करना है, न अपने आपको किसी उपदेशक की तरह स्थापित करना है। न ही मेरा यह दावा है कि मैं किसी का गुरु इत्यादि हूँ। हाँ, यहाँ मैं अपने विचार अवश्य व्यक्त करता हूँ, जिसे पढ़ना चाहे वह पढ़े, इससे पाठक सहमत या असहमत हो तो यह अवश्य ही उसकी अपनी स्वतंत्रता है, जिसका भी मैं पूरा सम्मान करता हूँ।

निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास, आस्था और मत आदि यद्यपि एक ही व समान अर्थ के द्योतक प्रतीत होते हैं, किन्तु यह आंशिक सत्य ही है, न कि पूर्ण सत्य । 

निष्ठा वह प्रतीति है, जो हमारे मन से स्वाभाविक रूप से उभर आती है, और जिसकी सत्यता पर प्रश्न या संदेह तक नहीं किया जा सकता । जैसे अपने आपके अस्तित्व का भान हर जीवित प्राणी में अनायास ही होता है। मैं यह शरीर हूँ, ऐसी प्रतीति भी अनायास ही हर किसी को होती है। इसके ही बाद यह शरीर मेरा है, इसकी प्रतीति होती है जो स्वाभाविक और अंतःस्फूर्त निष्ठा ही है। यह निष्ठा अतः अचल-अटल, और अपरिवर्तनशील होती है, जो बाहर से नहीं पाई जाती है। 

इसी प्रकार से यह निष्ठा या ज्ञान, कि मुझसे अर्थात् मेरे शरीर से अलग एक वह संसार भी है जिसे हर कोई यद्यपि जानता तो है, किन्तु कभी उसे अपना, तो कभी अपने से भिन्न भी मानता है।

यह ज्ञान अवश्य ही एक सतत परिवर्तित होते रहनेवाला विचार ही होता है, किन्तु फिर भी इस संसार को भी अपने आपकी ही  तरह हमेशा रहनेवाली एक वस्तु की तरह अनायास स्वीकार कर लिया जाता है। परंतु फिर भी अभी भी यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि मैं और (मेरा) संसार परस्पर भिन्न और स्वतंत्र दो अलग अलग चीजें हैं या कि एक ही वस्तु है।

जैसे संसार के अस्तित्व की प्रतीति और उसके बारे में होनेवाला ज्ञान हमें अपने बाहर से प्राप्त होता है, वैसे ही इस संसार के ही एक अंश की तरह से अपने शरीर का ज्ञान भी हमें बाहर से ही प्राप्त होता है। अपने शरीर का ज्ञान तो बाहर से पाई जानेवाली जानकारी मात्र होता है, जबकि अपने आपका भान ऐसी किसी प्रकार की जानकारी न होकर नित्य विद्यमान अनुभव / प्रतीति होता है। अपने अस्तित्व का भान भी है, और इस भान का भी अस्तित्व तो है ही। अस्तित्व और भान एक दूसरे से अविभाज्य सत्य  हैं। 

किन्तु शरीर के चेतन होने से ही अस्तित्व का भान मैं के रूप में अभिव्यक्त होता है और तत्क्षण ही इस शरीर को ही मैं की तरह सत्य भी मान लिया जाता है। 

शरीर के रूप में अपने आपको स्वीकार कर लेने के बाद भी इस तथ्य पर ध्यान नहीं जा पाता है कि जिन मूल तत्वों से यह शरीर बना है, संसार भी तो उन्हीं मूल तत्वों से बना हुआ है।

इस प्रकार मैं और मेरा संसार एक ही साथ एक दूसरे से भिन्न / अभिन्न भी प्रतीत होने लगते हैं। बाद में यहीं से संशय, दुविधा और तथाकथित अज्ञान प्रारम्भ होता है।

इस अज्ञान से ही फिर विभिन्न विचार, मत, आस्था, विश्वास भी  पैदा होते हैं, जो सामाजिक मान्यताओं का रूप ले लेते हैं, जिसे समाज के प्रभावशाली वर्ग के लोग दूसरों को शिक्षा के माध्यम से प्रदान करते हैं। शिक्षा के अंतर्गत इसलिए निष्ठा के स्वरूप के बारे में नहीं, बल्कि वैचारिक सिद्धान्तों के बारे में अध्ययन किया जाता है । इस प्रकार की शिक्षा पुनः या तो सामाजिक विखंडन का कारण बनती है, या तथाकथित समन्वयात्मक दृष्टिकोण को स्थापित करने का प्रयास करती है और कुछ लोग उसके कायल हो जाते हैं। यह दृष्टिकोण साम्यवाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद, भाषा या धर्म (रिलीजन) आदि के रूप में राजनीतिक दर्शन हो जाता है। यह अहिंसावादी हो सकता है या हिंसा को उचित ठहराने पर बल देने के आग्रह के रूप में अतिवाद का रूप भी ले सकता है। यही फिर वर्ग-संघर्ष को अपरिहार्यतः आवश्यक भी घोषित कर, उसका औचित्य भी सिद्ध कर सकता है।

किन्तु यदि मत, विश्वास, विचार आदि के स्थान पर -निष्ठा क्या है, इसे जानने का प्रयास किया जाए तो पता चलता है कि यह हमारे भीतर विद्यमान सत्य का सहज स्वाभाविक साक्षात्कार ही है। और यह सत्य अलग अलग लोगों का अलग अलग अनुभव न होकर सभी की एकमेव वास्तविक अनुभूति ही है।

***

संकल्प, निश्चय, और द्वंद्व

अनिश्चय और अन्तर्द्वन्द्व

-----------©------------

संकल्प किया जाता है, जिसे करनेवाला संकल्पों से भिन्न और स्वतंत्र, संकल्प का स्वामी, कोई संकल्पकर्ता भी अवश्य होता है, या ऐसा मान लिया जाता है।

निश्चय किया नहीं जाता, बस होता भर है। वह, जिसे निश्चय का स्वामी या निश्चय करनेवाला कहा जा सके ऐसा कोई निश्चयकर्ता न तो कल्पना में और न ही वस्तुतः भी कहीं होता है। 

संकल्प करनेवाले जिस तथाकथित संकल्प-कर्ता की स्वीकृति, संकल्प से भिन्न और स्वतंत्र एक अस्तित्वमान सत्ता और समस्त संकल्पों के स्वामी की तरह से होती है, और प्रमादवश ही जिसे तत्क्षण ही अपने-आपकी तरह स्वीकार कर लिया जाता है, वह भी वस्तुतः और यद्यपि अनुमान से ही उत्पन्न हुआ, वैसा ही एक विचार होता है, जैसा कि संकल्प भी एक विचार ही होता है।

इस प्रकार संकल्प से भिन्न और स्वतंत्र प्रतीत होनेवाला कोई आभासी संकल्पकर्ता अस्तित्व में आता है, जिसका अस्तित्व एक तात्कालिक और क्षणिक घटना होता है ।

तात्पर्य यह, कि संकल्प और संकल्पकर्ता दोनों, विचार की ही गतिविधि होते हैं, किन्तु संकल्पकर्ता को अपने होने के विचार के रूप में सातत्य प्राप्त हो जाता है, जबकि संकल्प को सतत बदलते रहनेवाली वस्तु मानकर अस्थायी और तात्कालिक वस्तु समझ लिया जाता है। 

इस प्रकार से उत्पन्न मान्यताएँ विचार-मात्र हैं।

निश्चय स्वयं विचार न होकर, दृष्टि या दृष्टिकोण ही होता है, जो पुनः त्रुटिहीन या त्रुटियुक्त भी हो सकता है। 

फिर भी संकल्प करनेवाला कोई संकल्पकर्ता भी केवल विचार और उस विचार से सीमित होता है, और स्मृति तथा विस्मृति के सहारे कार्य करता है, निश्चय का कार्य उससे नितान्त भिन्न रीति से होता है। 

इसलिए संकल्प और संकल्पकर्ता, -- द्वन्द्व तथा संशय, आशा और निराशा, अतीत की स्मृति और भविष्य की कल्पना को जन्म देते हैं, जबकि निश्चय से सदैव एक नई दृष्टि प्राप्त की जा सकती है ।

संकल्प सदैव द्वन्द्व और संशय, अनिश्चय और दुविधा, आशा एवं निराशा को जन्म देता है । संकल्प सदा ही लोभ और भय का कारण होता है, जबकि निश्चय उचित कर्तव्य क्या है इस बारे में दृष्टि देता है। 

संकल्प करनेवाला कल्पित संकल्पकर्ता अपने आपको सदैव ही कर्ता, भोक्ता, स्वामी, ज्ञाता इन चार रूपों में सीमित कर लेता है, जबकि निश्चय केवल दृष्टि मात्र होने से त्रुटिपूर्ण या त्रुटिरहित भर होता है और इसलिए चिन्ता, लोभ, भय, द्वन्द्व, संशय, दुविधा और अन्तर्द्वन्द्व से मुक्त होता है।

***

Terminology :

संकल्प - choice, 

निश्चय - vision, 

संकल्पकर्ता - the assumption : 'I'm the authority,

कर्ता - the assumption / thought : 'I do',

भोक्ता - the thought / assumption :

'I experience, enjoy, suffer',

स्वामी - the thought / assumption :

'I' possess, I have control over things. 

ज्ञाता - the idea :

I have the knowledge, information, or the memory.

ज्ञान - knowledge, information, memory,

दुविधा - conflict,

संशय - suspicion / doubt, 

द्वन्द्व - confusion, अन्तर्द्वन्द्व - indecision.

***


February 18, 2022

अनलिखा

कविता / 18-02-2022

---------------©--------------

मुमकिन / संभावना

--

कुछ कहा अनकहा हो जाएगा, 

अनकहा कुछ कहा हो जाएगा! 

कुछ पढ़ा अनपढ़ा हो जाएगा,

अनपढा़ कुछ पढ़ा हो जाएगा!

कुछ सुना अनसुना हो जाएगा, 

अनसुना कुछ सुना हो जाएगा, 

कुछ लिखा अनलिखा हो जाएगा,

अनलिखा कुछ लिखा हो जाएगा,

ऐसा भी क्या कभी हो जाएगा,

कहीं यहीं अभी ही हो जाएगा!

कुछ किया अनदेखा हो जाएगा,

अनकिया कुछ किया हो जाएगा!

कुछ हुआ अनहुआ हो जाएगा, 

अनहुआ कुछ हुआ हो जाएगा! 

***