February 17, 2022

चारा, मछली, मछुआरा!

कविता / 15-02-2022

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वह चारा, वह मछली, और वह मछुआरा, 

युग-युग से नाटक, चला आ रहा सारा!

हर बार उसे लगता है, वह चारा खाएगी,

हर बार ही होता है, निराश वह बेचारा!

होता है सागर, कितना अति-विस्तीर्ण!

होता है तालाब मगर, अति ही संकीर्ण!

तालाब में हैं कितनी और भी मछलियाँ,

रोज पकड़ता है मछुआरा, उनमें से कुछ, 

लेकिन वह अब तक हाथ नहीं है आई,

जिसके लिए कर रहा कोशिश मछुआरा!

कभी कभी लगता है सचमुच, क्या वह है भी! 

कभी कभी लगता है सचमुच, हाँ वह है ही!

लगता है, क्या यूँ ही, बीतेगा जीवन सारा,

मेहनत करता फिर, बेचारा थका-हारा!

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कस्तूरी तन में बसे, मृग ढूँढे बन माँहि,

प्रीतम तो हिय में बसे, सब ढूँढें जग माँहि!!

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February 15, 2022

वर्तमान

कविता / 15-02-2022

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अङ्गद के पाँव की तरह,

अडिग, अटल, वर्तमान, 

किसी की भी शक्ति से, 

लेशमात्र भी हिलता नहीं, 

शायद इसीलिए समय, 

यद्यपि चलता रहता है,

सतत और लगातार,

वर्तमान, फिर भी, कभी,

जरा भी बदलता नहीं!

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नई जगह!

कविता / 14-02-2022

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विस्मय और रहस्य 

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किसी अपरिचित नई जगह पर जाना हो,

जहाँ न कोई अपना जाना पहचाना हो, 

लेकिन जो है जानेवाला, उसको खुद को, 

कैसे याद रखेंगे उसको, जिसको "मैं" माना हो, 

कितना मुश्किल है यह, कितना आसान है यह, 

मैं स्वयं अपरिचित "मैं" से, अनजान भी तो है, 

क्या यह कभी किसी जगह जा भी सकता है!

कितना व्याकुल, बेचैन और परेशान है यह,

क्या इससे बाहर कोई कभी, जा भी सकता है!

लेकिन यही तो यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ जाता है, 

फिर भी सर्वत्र सदा स्वयं को ही पाता है! 

जब सबको अपने में, अपने को सबमें पाता है,

तब यह उपरत, शान्त, समाहित हो जाता है!

इस स्थिति तक आने में समय लगा करता है, 

किन्तु समय भी यह, विलीन इसमें हो जाता है।

वह सर्वत्र, जहाँ विलीन, समय भी हो जाता है,

यहाँ-वहाँ भी वह जिसमें कि समय नहीं होता,

जहाँ स्थान-समय की सीमा भी मिट जाती है, 

अपने स्वरूप पर विस्मय तब, किसे नहीं होता!

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February 12, 2022

वह जो है!

कविता / 12022022

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अकसर मुझसे कहता है, 

वह जो मुझमें रहता है,

तुम हो कौन मेरे, बोलो!

तुममें मैं कौन, जो रहता है!

एक खयाल उठता है,

एक सवाल पूछता है,

एक खयाल बूझता है,

कोई जवाब ढूँढता है!

यह सवाल, वह जवाब,

उस रौशनी में चमकते हैं,

रौशनी, खामोश है जो!

खयाल जोश, पर बेहोश,

रौशनी, मगर, होश है जो!

रौशनी कुछ नहीं कहती

करती है लेकिन लाजवाब

जोश या बेहोशी ही तो, 

करते हैं, सवाल-जवाब!

तो कौन है जो कि देखता है, 

ख़यालों, जवाबों, रौशनी को,

या, रौशनी देखती है, खुद को?

ये सवाल, सवाल ही तो है!

खयाल का कमाल ही तो है!

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February 08, 2022

और शरद जोशी

आषाढ़ का एक दिन,

और नावक के तीर,

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कभी इन दो पुस्तकों (!) के बारे में पढ़ा-सुना था। 

अगर मेरी याददाश्त ठीक है, तो इनमें से प्रथम हिन्दी का नाटक है, जिसकी पृष्ठभूमि में संस्कृत की, संभवतः महाकवि कालिदास की रचना "मेघदूतम्" है।

सोचता हूँ कि एक बार पाठ कर लूँ। संस्कृत की पुस्तकों के बारे में अकसर अनुभव होता है, कि अगर उन्हें किसी आध्यात्मिक या धार्मिक संस्था द्वारा प्रकाशित किया गया हो तो प्रायः उनकी छपाई कलात्मक और सुंदर होती है, किन्तु किसी व्यावसायिक प्रकाशन द्वारा किया गया उनका प्रकाशन वास्तव में पाठक के धैर्य की परीक्षा ही करता है।

"आजकल किताबें कौन पढ़ता है!"

जब मैंने 1990 में नौकरी छोड़ दी थी और अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक की एक अंग्रेजी / मराठी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने में उत्साह से संलग्न था तब मेरे एक मित्र और कॉलेज के  सहपाठी तथा बैंक के मुझसे जूनियर सहकर्मी ने मेरे इस वक्तव्य पर उपरोक्त टिप्पणी की थी।

यद्यपि मुझे उसकी इस टिप्पणी पर न तो आश्चर्य और न ही दुःख हुआ, क्योंकि उससे मुझे ऐसी कोई आशा थी, कि वह मेरी बात को महत्व देगा।

वह बात वहीं ख़त्म हो गई। 

किन्तु जिन पुस्तकों का अनुवाद मैंने किया, उनके प्रकाशकों ने जिस कुशलता और दक्षता से मेरे कार्य का मुद्रण और प्रकाशन किया वह अवश्य ही प्रशंसनीय था। 

यद्यपि उस मित्र की यह बात भी अपनी जगह शायद सही ही थी कि आजकल किताबें कौन पढ़ता है।

सचमुच बहुत से प्रकाशक संस्कृत के ग्रन्थों का न तो प्रूफरीडिंग ठीक से करते हैं, न सौ पचास साल पहले मुद्रण करना इतना आसान था, जैसा कि आजकल कंप्यूटर से डेस्कटॉप-एडिटिंग होता है। बीच में कुछ समय इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटरों के आने से यह कार्य अवश्य ही बेहतर ढंग से होने लगा था, किन्तु जैसे मोबाइल के आगमन के बाद पेजर कालातीत (redundant, obsolete, out-dated) हो गए वैसे ही डेस्कटॉप एडिटिंग के आने से पुराने लिथो-प्रिन्टर्स भी कहीं ओझल हो गए। 

किन्तु अब बहुत सा साहित्य (विशेषतः संस्कृत भाषा का) on -line भी पाया जा सकता है पर वहाँ इन्हीं प्रोफेशनल्स कारणों से संस्कृत ग्रन्थों की दुर्दशा भी होती है।

'नावक के तीर' का अनुवाद क्या होगा?

मुझे लगता है यह किसी पत्रिका या अन्यत्र लिखा जाने वाला उनका कोई स्तंभ (column) रहा होगा। 

निश्चित ही 'नावक' शब्द से श्री शरद जोशी का तात्पर्य 'नाविक' अर्थात् नाव-वाला ही रहा होगा और 'तीर' शब्द से 'बाण' नहीं, -'तट' ही रहा होगा।

नौ, नाव, नावक, नाविक और अंग्रेजी के navigation, naval, navy, एक ही अर्थ को इंगित करते हैं।

गीता का यह श्लोक दृष्टव्य है :

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।।

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।६७।।

(गीता 2/67)

शायद यह समय ही है जो वायु की तरह नेट-सर्फिंग करनेवाले नेवीगेटर को कहीं से कहीं ले जाता है! 

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बात

कविता / 07-02-2022

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बात करने के लिए, कुछ भी न हो अगर, 

तो भी शुरू करने से बात शुरू होती है! 

मिलने की कोई वजह न भी हो अगर, 

तो भी मिलने से, मुलाका़त नई होती है! 

हाँ अगर अजनबी लग रहा हो हर कोई,

और अगर दिल में नहीं हो जज्बा कोई,

तो किसी बात का मतलब ही क्या है, 

तो बात करने का मक़सद ही क्या है! 

तो बात करने की ज़रूरत ही क्या है!

मुलाकात करने की ज़रूरत ही क्या है?

दोस्ती-दुश्मनी की कोई वजह क्या है! 

ज़िन्दगी की फ़ितरत-ओ-सूरत क्या है!! 

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सन्दर्भ  : Russia Ukraine conflict.

February 05, 2022

भक्ति का भेद

वसंत का आगमन

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बृजभूमि पर वसंत का आगमन हो चुका था। संध्या में गौएँ वन में चरकर गाँव की ओर लौट रही थीं। चन्द्रमा अभी उदित नहीं हुआ था। अभी दो घड़ी की देर थी।

दो तीन घड़ी के बाद चन्द्रमा जब उदित हुआ तब तक ग्वाल- बाल घर से शाम का भोजन कर रास नृत्य के लिए एकत्र हुए।

उन ग्वाल-बालों के बीच एक ऐसा भी बालक था जो नृत्य तो कम, उछल-कूद ही अधिक करता था। और दूसरे ग्वाल-बालों को उसकी उछल-कूद पर कोई आपत्ति भी नहीं होती थी। 

एक दिन उसके एक साथी ने उससे पूछा :

"तुम नृत्य कम और उछल-कूद अधिक क्यों करते हो?"

उसने कहा : 

"मैं हनुमान का भक्त हूँ, इसलिए नृत्य तो अधिक नहीं, उछल-कूद ही अधिक जानता हूँ।"

"तो तुम रासबिहारी कृष्ण की रासमंडली में सम्मिलित ही क्यों होते हो?"

"अरे! तुम्हें नहीं पता कि भगवान् श्रीराम ही तो इस द्वापर युग में भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं, और हनुमानजी तो भगवान् श्रीराम के ही परम भक्त हैं।"

"तो"

"यही कि जहाँ श्रीराम होते हैं, वहाँ हनुमानजी भी होते ही हैं। इसीलिए मुझे नृत्य नहीं आता तो भी मैं अपने आपको रास-नृत्य में सम्मिलित होने से नहीं रोक पाता!"

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जब सब कुछ है!

कविता 05-01-2022

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जब सब कुछ होगा, 

तो सुख भी तो होगा ही! 

जब सब कुछ होगा, 

तो दुःख भी तो होगा ही! 

जब सब कुछ होगा, 

तो सुख-दुःख भी होगा ही! 

जब सुख-दुःख होगा,

तो बेचैनी भी होगी ही!

फिर क्यों यह मन कहता है, 

यह बेचैनी क्यों होती है! 

फिर क्यों यह मन सोचता है, 

यह बेचैनी क्यों होती है! 

यह सुख किसको होता है?

यह दुःख किसको होता है?

यह सुख-दुःख किसको होता है? 

यह सुख-दुःख जिसको होता है, 

जब तक वह है तब तक तो,

सुख-दुःख, बेचैनी, होगी ही!

जब तक ऐसा, कोई जो भी है,

उसको बेचैनी होगी ही! 

फिर वह कोई भी, जो भी है, 

कैसे बेचैनी दूर करे? 

क्या वह खुद ही फिर मिट जाए, 

क्या तब ही उसको चैन मिले! 

लेकिन यदि वह ही मिट जाए,

तो फिर कैसे 'वह' रह पाये!

कैसे 'वह' तब फिर यह जाने,

बेचैनी फिर कैसे जाये!

***


तो सवाल यह है :

जो मन सुखी-दुःखी होता है,

जो "मैं" सुखी-दुःखी होता है, 

जो मन "मैं" कहता है,

जो "मैं" मन को जानता है,

क्या "मैं" ही, 'वह' मन है? 

क्या मन ही, 'वह' मैं है? 

फिर किसको कौन मिटाता है,

कौन बचा रह जाता है?

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February 03, 2022

एक पुरा कथा

बलि-पशु और पशु-बलि

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तब समय नहीं था। 

मतलब यह कि वह समय नहीं था, जो कि बीतता या व्यतीत होता है। धरती पर जीवन था किन्तु तब धरती सूरज के इर्द-गिर्द नहीं घूमती थी, बल्कि आकाश में, या अन्तरिक्ष में किसी अज्ञात दिशा की ओर गतिमान थी। यह भी पता नहीं, कि वह तब किसी सरल रेखा में गतिशील थी, या कि उसका मार्ग वृत्तीय, अंडाकार, वक्र, परवलयाकार या अतिपरवलयाकार था।

जो भी हो किन्तु यह भी सच है कि तब सूरज ही धरती के इर्द-गिर्द घूमा करता था - और शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है ही! बहरहाल, तब सूरज और चन्द्रमा दोनों ही धरती की परिक्रमा करते रहे होंगे, और आकाश के तमाम तारे, नक्षत्र आदि भी। 

इसलिए भी तब धरती पर सुबह और शाम तो होती थी, रात्रि में चन्द्रमा और तारे, नक्षत्र आदि भी दिखाई देते रहे होंगे, -क्योंकि  इसका उल्लेख भी शास्त्रों में है ही!

तब भी धरती पर मनुष्य था, और सभी मनुष्यों का जीवन अलग अलग कबीलों के अपने अपने रीति रिवाजों से संचालित होता था। कुछ कबीले नितान्त शाकाहारी, कुछ मांसाहारी, तो कुछ सामिष-निरामिष दोनों ही प्रकार का आहार करने के अभ्यस्त थे। कुछ थोड़े से ऐसे नरभक्षी (cannibal) भी थे, जो कि अपने कबीले के मनुष्यों के अलावा अन्य किसी भी कबीले के मनुष्यों को अपना आहार बना लेते थे। ऐसे ही नरभक्षियों को राक्षस, असुर, दानव, और दैत्य भी कहा जाता था।

तब समय नहीं था ।

मतलब वह समय नहीं था जो कि बीतता या व्यतीत होता है।... 

तब देवता भी नहीं थे, या थे भी तो वे अपने अपने लोक में रहते हुए अपना कार्य करते रहते थे। 

कुछ देवता कभी कभी मनुष्यों से उनके प्रेम के कारण अवश्य ही उनके समक्ष प्रकट होने लगे थे, और उन मनुष्यों से धीरे धीरे उनके संबंध प्रगाढ होने लगे थे। फिर भी देवता ही यह तय करते थे कि उन्हें किसी के समक्ष प्रकट होना है या नहीं। 

बहुत समय तक ऐसी परंपरा चलते रहने से मनुष्यों को यह स्पष्ट हुआ कि किस देवता या देवी का संबंध रात्रि से है, और किसका संबंध दिन से है। इतना ही नहीं, किसका संबंध अंधेरे से है, और किसका संबंध प्रकाश से है। किसका संबंध बादलों से है, और किसका संबंध वायु से है, किसका संबंध अग्नि से है, किसका धूप से, किसका वर्षा से, किसका शीत या ऊष्णता से है। किसका संबंध रोग से है, किसका स्वास्थ्य, नीरोगता, या आरोग्य से, किसका जन्म या मृत्यु आदि से है। किसका काम-भावना से है, किसका लोभ या भय से है।  संबंधों के और प्रगाढ होते-होते धीरे धीरे मनुष्य देवताओं की भाषाओं को भी समझने लगे। तब तक मनुष्यों को यह नहीं पता था कि क्या सभी देवता एक ही या अलग अलग भाषाएँ बोलते हैं ? 

फिर जब मनुष्यों को यह पता चला कि देवता अलग अलग और अनेक भाषाएँ बोलते हैं, तो उन देवताओं की भिन्नता के आधार पर ही उन्हें यक्ष, किन्नर, गंधर्व, नाग आदि नाम प्रदान किए गए। देवताओं के पास यह शक्ति थी कि वे अपनी इच्छा के अनुसार किसी के सामने प्रकट या अप्रकट हो सकें, किन्तु जब मनुष्यों ने धीरे धीरे उनकी भाषा सीख ली, तब मनुष्यों को यह विद्या आ गई कि वे आवश्यकता होने पर वाणी का प्रयोग करते हुए उन देवताओं का आवाहन या आह्वान कर सकें। इसी क्रम में मनुष्यों को यह भी अनुभव हुआ कि जैसे मधुमक्खियाँ, भ्रमर और तितलियाँ अलग अलग सुगन्धों से आकर्षित होते हैं, उसी तरह अलग अलग देवताओं को अलग अलग प्रकार की सुगन्ध के प्रयोग के द्वारा आकर्षित किया जा सकता है। आकर्षित ही नहीं, बल्कि प्रसन्न भी किया जा सकता है। 

यही मनुष्य ऋषि कहलाए। 

उन्हीं ऋषियों ने तब सभी देवताओं का आवाहन करने, उनसे संपर्क करने, तथा उन्हें प्रसन्न करने के विज्ञान का, अर्थात् यज्ञ का आविष्कार किया और इसकी पूरी प्रक्रिया लिपिबद्ध की। 

कुछ देवता यद्यपि सात्विक प्रवृत्ति के थे, और प्रायः केवल घृत की आहुति से ही अत्यंत प्रसन्न हो जाते थे, किन्तु राजसी और तामसिक प्रवृत्ति रखनेवाले कुछ अन्य देवता मांसभोजी थे, और इसलिए यज्ञों के अनुष्ठान में पशु-बलि का प्रचलन प्रारम्भ हुआ।

इन सभी देवताओं के साथ इन देवताओं के कुछ ऐसे अनुचर या दास भी यज्ञ की आहुतियाँ प्राप्त करने लगे और चूँकि ये अनुचर भिन्न भिन्न प्रकार के उच्छिष्ट आहार को ग्रहण करने के अभ्यस्त थे, इसलिए यज्ञ के स्वरूप में क्रमशः विकार आने लगा । इसके बाद कुछ मनुष्यों ने ही उन अनुचरों को प्रसन्न करने का विज्ञान भी खोज लिया।

इन अनुचरों में बहुत से ऐसे थे, जो कि देवताओं की ही तरह पहले तो मनुष्य ही थे, किन्तु मनुष्य के रूप में उनकी मृत्यु हो जाने के बाद केवल वायुरूप के होकर रह गए और देवताओं के अनुचर हो गए, ताकि उस जीवन को आनन्दपूर्वक जीते हुए उस स्तर के भोग प्राप्त कर सकें।

धरती पर यज्ञ का धर्म धीरे धीरे जब विकार को प्राप्त होते होते अंततः पूरी तरह से लुप्त हो गया, तो इन दासों / अनुचरों ने मनुष्यों को प्रेत-कुल (ghost-cults) की ओर आकर्षित कर लिया।

चूँकि इस समय तक यज्ञ के विज्ञान का अंत हो चुका था, अतः प्रेत-कुल की परंपरा के अनुयायियों ने पुस्तकों और ग्रन्थों आदि के माध्यम से अपनी अपनी परंपराओं की स्थापना की।

चूँकि हर ग्रन्थ का अपना एक देवता होता है, इसलिए अनेक ग्रन्थों के भिन्न भिन्न देवता ही एकमेव परमेश्वर बन बैठे और तब  पशु-बलि की पूर्व-परंपरा के समाप्त हो जाने के बाद परस्पर युद्ध करने लगे। और इन विभिन्न परंपराओं के अनुयायी, जो कि पहले अपने अपने देवता के वाहन थे, धीरे धीरे अन्य देवताओं के लिए बलि-पशु के रूप में प्रयुक्त किए जाने लगे।

इसके बाद जब से सूरज और ग्रह-नक्षत्रों ने धरती की परिक्रमा करना छोड़ दिया और, जब धरती ही सूरज की परिक्रमा करने लगी, तब तक विभिन्न मतों, देवताओं के अनुयायी दूसरे मतों के मतावलंबियों को बलि-पशु की तरह प्रयुक्त करने लगे। 

यह परंपरा आज तक वैसी ही सतत, निरंतर जारी है।

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क्रिप्टोकरेंसी

Non Fungible Tokens

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दिनांक 02 दिसंबर 2021 को क्रिप्टोकरेंसी के बारे में मैंने :

"The Wolf of the Wall Street"

शीर्षक से एक पोस्ट इस ब्लॉग में लिखा था। 

कल परसों देश के बजट में बिटकॉइन, ईथीरियम एवं ऐसी दूसरी आभासी प्रतिभूतियों (non fungible tokens) पर सरकार के दृष्टिकोण से मेरे इस विचार की पुष्टि हुई कि जनता के हितों की सुरक्षा के लिए सरकार के द्वारा लिए गए निर्णय विवेकपूर्ण हैं, और पर्याप्त सावधानी से लिए गए हैं ।

सबसे बड़ी और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले दो तीन वर्षों में तथाकथित "माइनिंग" की अवधारणा को लॉन्च, सपोर्ट या एन्डोर्स करते हुए यह भ्रम फैलाया गया कि क्रिप्टो-करेंसी के माध्यम से किया जानेवाला लेन-देन सुरक्षित है, तथा क्रिप्टोकरेंसी में किया जानेवाला निवेश कम से कम समय में अधिक से अधिक रिटर्न दे सकता है।

निश्चित ही सरकार फूँक फूँक कर कदम रख रही है, किन्तु यह भी सरकार का दायित्व है कि इस बारे में क्रिप्टोकरेंसी की वैधता के बारे में स्पष्टता से अपना दृष्टिकोण सामने रखे। वैसे इसे नॉन फंजिबल टोकन्स (Non Fungible Tokens) की श्रेणी में रखे जाने से यह तो स्पष्ट ही है कि इसमें निवेश करने में कितना जोखिम है, इस पर ध्यान देकर ही अपने लिए कोई निर्णय लिया जाना चाहिए। यदि आपके पास अनाप शनाप और बेहिसाब इतना पैसा है और आप इसमें निवेश की रिस्क ले सकते हैं, तो भी आपसे प्रेरणा लेकर दूसरे वे लोग जिनके पास केवल मेहनत की गाढी़ कमाई है, कहीं अपने  लालच और नासमझी की वजह से इसे गवाँ न बैठे!

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