~~~~~~प्रीति का उल्लास ~~~~~~
____________________________
****************************
जानता हूँ,
कि तुम जो बहती हुई निर्झरिणी थी कभी,
जीवन की सख्त शीत में ,
जमकर बर्फ हो गयी हो !
और यह बर्फ हो गयी है सख्त चट्टान .
भूल से इसे ही अपना अस्तित्त्व समझकर,
अस्मिता बना लिया है तुमने !
लोग आते रहे, और इस झूठी अस्मिता को बचाने के लिए,
तुम और भी अधिक कठोर तीक्ष्ण होती चली गयी .
सख्त से सख्त,
-शीशे सी पैनी,
पर भंगुर भी !!
तुम्हें लगता है कि मैं भी तुम्हें तोड़ने ही आया हूँ,
तुम्हारे समीप ,
कि तुम्हारे एक छोटे से टुकड़े को,
अपने ड्रिंक में डालकर,
अपने नशे का लुत्फ़ बढ़ाऊँ !
नहीं प्रिये !
मैं तो आया हूँ तुम्हारे समीप सिर्फ इसलिए,
कि पिघला सकूँ,
तुम्हें अपनी प्रीति की ऊष्मा से,
कर दूँ तुम्हें पानी-पानी !
शापमुक्त कर बना दूँ तुम्हें अहिल्या,
ताकि तुम बह सको,
उन्मुक्त स्वच्छंद,
और मैं बह जाऊं,
तुम्हारी प्रीति में,
देवी !
_______________________________________
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October 13, 2010
October 01, 2010
संदर्भ :"अब्बू की बकरियाँ"/अन्यथा.
यह कविता श्री गीत चतुर्वेदीजी के ब्लॉग पर प्रकाशित
कविता "अब्बू की बकरियाँ"पढ़ते हुए मन में उत्पन्न हुई,
और कमेन्ट के रूप में पोस्ट की थी, आज दिनांक
०१-१०-'१० को .
_____________________________________________
गीतजी,
कविता वही श्रेष्ठ होती है, जो पाठक को किसी अद्भुत् अनुभूति
का साक्षात्कार करा दे. यूँ तो कवि के सिरे पर कविता का जो
भाव या अर्थ होता है, वह पाठक के सिरे पर आते-आते अपना
रंग-रूप, विन्यास बदल लेता है और फ़िर भी एक अमूर्त वस्तु
ही हुआ करता है, किन्तु वह पाठक में कोई प्रतिक्रिया भी जगा
सकता है, और वह प्रतिक्रिया पुनः एक कविता का रंग-रूप ले
सकती है .
आपकी कविता पढ़ते हुए लगा :
अन्यथा.
अब्बू के पास तीन ही बकरियाँ थीं /हैं /रहेंगीं.
एक लोहित,
दूसरी श्वेत,
और तीसरी कृष्ण वर्ण की,
अब्बू अनंत काल से चरा रहा है उन्हें .
चराता रहा था, /रहेगा.
बकरियाँ चरती हैं तृण,
देती हैं दूध,
जो लोहित, कृष्ण अथवा श्वेत नहीं होता.
कुछ पीताभ सा होता है.
तृण अन्न है, बकरियोँ का,
दूध अन्न है, अब्बू का,
बकरियाँ अन्न हैं,
-भेड़ियों का.
तो इसमें गलत क्या है ?
अब्बू कहता है अपने आप से,
"अन्नं न त्यजेत् ।
तद् ब्रह्म ॥"
भेड़िया भी तो अन्न है,
किसी व्याघ्र का !
तीन वर्णों वाली अजा,
घूमती रहती है,
अहर्निश,
अजा एका,
लोहित कृष्ण श्वेता .
अब्बू अज है,
अज और अजा,
सनातन.
___________
सादर,
कविता "अब्बू की बकरियाँ"पढ़ते हुए मन में उत्पन्न हुई,
और कमेन्ट के रूप में पोस्ट की थी, आज दिनांक
०१-१०-'१० को .
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गीतजी,
कविता वही श्रेष्ठ होती है, जो पाठक को किसी अद्भुत् अनुभूति
का साक्षात्कार करा दे. यूँ तो कवि के सिरे पर कविता का जो
भाव या अर्थ होता है, वह पाठक के सिरे पर आते-आते अपना
रंग-रूप, विन्यास बदल लेता है और फ़िर भी एक अमूर्त वस्तु
ही हुआ करता है, किन्तु वह पाठक में कोई प्रतिक्रिया भी जगा
सकता है, और वह प्रतिक्रिया पुनः एक कविता का रंग-रूप ले
सकती है .
आपकी कविता पढ़ते हुए लगा :
अन्यथा.
अब्बू के पास तीन ही बकरियाँ थीं /हैं /रहेंगीं.
एक लोहित,
दूसरी श्वेत,
और तीसरी कृष्ण वर्ण की,
अब्बू अनंत काल से चरा रहा है उन्हें .
चराता रहा था, /रहेगा.
बकरियाँ चरती हैं तृण,
देती हैं दूध,
जो लोहित, कृष्ण अथवा श्वेत नहीं होता.
कुछ पीताभ सा होता है.
तृण अन्न है, बकरियोँ का,
दूध अन्न है, अब्बू का,
बकरियाँ अन्न हैं,
-भेड़ियों का.
तो इसमें गलत क्या है ?
अब्बू कहता है अपने आप से,
"अन्नं न त्यजेत् ।
तद् ब्रह्म ॥"
भेड़िया भी तो अन्न है,
किसी व्याघ्र का !
तीन वर्णों वाली अजा,
घूमती रहती है,
अहर्निश,
अजा एका,
लोहित कृष्ण श्वेता .
अब्बू अज है,
अज और अजा,
सनातन.
___________
सादर,
_______________________________________
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September 24, 2010
अहं-ब्रह्मास्मि अर्थात् I AM THAT
~~~~अहं ब्रह्मास्मि~~~~
___________________
*******************
~~~~I AM THAT~~~~

मेरे द्वारा अनुवादित यह पुस्तक,
चेतना प्रकाशन,
मुम्बई द्वारा वर्ष २००१ में प्रकाशित
की गयी थी.
अंग्रेज़ी में प्रकाशित
" I AM THAT "
की हिन्दी प्रस्तुति.
विश्व की १७ से अधिक प्रमुख
भाषाओं में अनुवादित एक
महाकृति जो अपने-आप में
एक अमर आध्यात्मिक
रचना है .
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(यह पुस्तक चेतना प्रकाशन, मुम्बई द्वारा प्रकाशित की गयी थी .
इसके लिये,
Chetana Pvt.Ltd.
34, K.Dubash Marg, Mumbai-400 001.
पर संपर्क कर सकते हैं).
सादर,
___________________
*******************
~~~~I AM THAT~~~~

मेरे द्वारा अनुवादित यह पुस्तक,
चेतना प्रकाशन,
मुम्बई द्वारा वर्ष २००१ में प्रकाशित
की गयी थी.
अंग्रेज़ी में प्रकाशित
" I AM THAT "
की हिन्दी प्रस्तुति.
विश्व की १७ से अधिक प्रमुख
भाषाओं में अनुवादित एक
महाकृति जो अपने-आप में
एक अमर आध्यात्मिक
रचना है .
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(यह पुस्तक चेतना प्रकाशन, मुम्बई द्वारा प्रकाशित की गयी थी .
इसके लिये,
Chetana Pvt.Ltd.
34, K.Dubash Marg, Mumbai-400 001.
पर संपर्क कर सकते हैं).
सादर,
August 25, 2010
॥ अतिथि तुम कब आओगे ? ॥
~~~~~ ॥ अतिथि तुम कब आओगे ? ॥ ~~~~~
____________________________________
************************************
(Ode to a sparrow,
sitting on the window-sill)
_____________________________
अतिथि !!
जब भी खिड़की पर आते-जाते हुए,
-मैं तुम्हें देखता हूँ,
ठिठक जाता हूँ .
और कभी-कभी तो,
घंटों प्रतीक्षा करता हूँ,
-तुम्हारे आने की .
खिड़की बंद करते हुए,
लगातार यह ख़याल आता रहता है,
कि बस तुम आ ही रहे होगे !
और खिड़की को बंद देखकर,
कहीं लौट न जाओ .
अतिथि, मैं तुम्हारी भाषा तो नहीं समझता,
लेकिन भाव-भंगिमा शायद पढ़ लेता हूँ .
फ़िर कुछ समय के लिए सुनता रहता हूँ,
तुमसे कुछ अबूझ, भेद-भरी बातें .
शायद मेरी बातें भी तुम्हें अबूझ लगती हों !
अतिथि,
तुम फ़िर कब आओगे ?
______________________________
******************************
इस कविता को पढ़कर मेरे एक आलोचक मित्र ने इसे
सुंदर सरल रचना कहा .
इसे पढ़कर मेरे एक सुहृद कवि मित्र ने कहा,
लगता है इसमें अतिथि ईश्वर को कहा गया है .
और मेरी एक परिचता बोली,
प्रेम में पगी एक कविता है यह .
'अतिथि' शब्द उसने शायद प्रेमी / प्रेमिका
के अर्थ में लिया होगा .
_________________________________
August 16, 2010
सपना पिछली रात का
~~~~~~~~ सपना पिछली रात का ~~~~~~~~~
_____________________________________
*************************************
कल रात,
फेसबुक पर मित्र से चैट करते,
नींद आने लगी थी .
मित्रों की भावनापूर्ण कविताएँ,
स्वतन्त्रता-दिवस की शुभ कामनाएँ,
और बधाइयों के बीच,
किसी ने पूछा था, -
'' वह सब ठीक है, बहुत ठीक,...
लेकिन आप देश या देशभक्ति के लिए,
क्या कर रहे हैं ?
सिर्फ बातें ?
भाषण ?
या किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल होकर,
-अपना उल्लू सीधा ! "
हाँ,
मानता हूँ मैं,
कि मेरा देशप्रेम बहुत छिछला है,
और इसीलिये,
मेरी नींद में कोई व्यवधान नहीं आया.
और सुबह-सुबह भोर के अँधेरे में मैं,
-उस समाधि पर जा पहुँचा,
जो किसी अज्ञात स्वतन्त्रता सेनानी की थी .
बस एक उजड़ी सी जगह थी,
एक ओटला,
-चबूतरा,
और पास में एक ऊँचा दरख़्त,
न जाने किस तरह,
-जैसे नींद में चलने की बीमारी से ग्रस्त,
कोई व्यक्ति,
कहीं से कहीं पहुँच जाता है !
कोई फ़कीर सा बैठा था वहाँ .
'' किससे मिलने आये हो ? ''
-उसने आँखों में आँखें डालकर पूछा .
'' आपसे !''
-मैंने साहस के साथ जवाब दिया .
''क्यों ?''
''कल सारे देश में आज़ादी की सालगिरह का
...उत्सव मनाया गया,
और मुझसे किसी ने पूछा था कि मैं देश या देशभक्ति के लिए,
क्या-कुछ कर रहा हूँ !''
''तो, क्या कहा तुमने ?''
'' बस बगलें झाँकता रहा था .''
-मैंने ईमानदारी से कहा .
''बाबा आप यहीं रहते हैं ?''
''हाँ, फिलहाल .''
उसने उत्तर दिया .
''आप क्या कहते,
इस सवाल के जवाब में ?''
-मैंने सवाल उन पर दागा .
''मैं,...?''
-वह अचकचाकर बोला .
''अभी तो मैं कैद हूँ,
लेकिन जल्दी ही रिहा हो जाऊँगा,
....''
''आप आज़ाद ही तो हैं, ...!''
अविश्वासपूर्वक मैंने कहा.
''हाँ, देह की कैद से आज़ाद ज़रूर हूँ,
लेकिन देश के लिए कुछ कर सकूँ,
इसके लिए,
इंतज़ार कर रहा हूँ,
-एक नई देह की कैद का,
तब तक भटकता रहूँगा,
क्योंकि मातृभूमि पर प्राण न्यौछावर करनेवाले,
अमर हो जाते हैं,
और उन्हें मौत से खौफ नहीं होता.
सिकंदर और गौरी ,
मुगलों और अंग्रेजों के समय से,
मैं मरता रहा हूँ,
उनसे लड़ते हुए,
अपने वतन की हिफ़ाज़त करते हुए,
और ह़र बार धरती माँ मुझे एक नई देह दे देती है .
क्या तुम्हारे सवाल का जवाब तुम्हें मिला ?''
उसने कौतूहल से मुझे देखकर पूछा.
''लेकिन मैं तो ऐसा कहाँ कर सकता हूँ ?
मैं तो बीवी-बच्चों वाला एक अदना सा इंसान हूँ !''
मैंने सहमकर कहा.
''कोई बात नहीं,
अगर तुम लालच न करो,
बेईमानी न करो,
रिश्वत लेने-देने का काम न करो,
तो क्या यह कोई कम देश-भक्ति है ?''
इतना भी काफी है .
नींद में ही चलकर अपने घर आकर,
और बिस्तर पर पुनः सो जाने के,
- कोई पंद्रह मिनट बाद,
जब आँखें खुलीं,
तो सूरज चढ़ आया था कमरे में .
सोचता हूँ ढूँढूँगा उस चबूतरे को कभी,
दर्शन करूँगा उस अमर देशभक्त की समाधि के .
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कल रात,
फेसबुक पर मित्र से चैट करते,
नींद आने लगी थी .
मित्रों की भावनापूर्ण कविताएँ,
स्वतन्त्रता-दिवस की शुभ कामनाएँ,
और बधाइयों के बीच,
किसी ने पूछा था, -
'' वह सब ठीक है, बहुत ठीक,...
लेकिन आप देश या देशभक्ति के लिए,
क्या कर रहे हैं ?
सिर्फ बातें ?
भाषण ?
या किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल होकर,
-अपना उल्लू सीधा ! "
हाँ,
मानता हूँ मैं,
कि मेरा देशप्रेम बहुत छिछला है,
और इसीलिये,
मेरी नींद में कोई व्यवधान नहीं आया.
और सुबह-सुबह भोर के अँधेरे में मैं,
-उस समाधि पर जा पहुँचा,
जो किसी अज्ञात स्वतन्त्रता सेनानी की थी .
बस एक उजड़ी सी जगह थी,
एक ओटला,
-चबूतरा,
और पास में एक ऊँचा दरख़्त,
न जाने किस तरह,
-जैसे नींद में चलने की बीमारी से ग्रस्त,
कोई व्यक्ति,
कहीं से कहीं पहुँच जाता है !
कोई फ़कीर सा बैठा था वहाँ .
'' किससे मिलने आये हो ? ''
-उसने आँखों में आँखें डालकर पूछा .
'' आपसे !''
-मैंने साहस के साथ जवाब दिया .
''क्यों ?''
''कल सारे देश में आज़ादी की सालगिरह का
...उत्सव मनाया गया,
और मुझसे किसी ने पूछा था कि मैं देश या देशभक्ति के लिए,
क्या-कुछ कर रहा हूँ !''
''तो, क्या कहा तुमने ?''
'' बस बगलें झाँकता रहा था .''
-मैंने ईमानदारी से कहा .
''बाबा आप यहीं रहते हैं ?''
''हाँ, फिलहाल .''
उसने उत्तर दिया .
''आप क्या कहते,
इस सवाल के जवाब में ?''
-मैंने सवाल उन पर दागा .
''मैं,...?''
-वह अचकचाकर बोला .
''अभी तो मैं कैद हूँ,
लेकिन जल्दी ही रिहा हो जाऊँगा,
....''
''आप आज़ाद ही तो हैं, ...!''
अविश्वासपूर्वक मैंने कहा.
''हाँ, देह की कैद से आज़ाद ज़रूर हूँ,
लेकिन देश के लिए कुछ कर सकूँ,
इसके लिए,
इंतज़ार कर रहा हूँ,
-एक नई देह की कैद का,
तब तक भटकता रहूँगा,
क्योंकि मातृभूमि पर प्राण न्यौछावर करनेवाले,
अमर हो जाते हैं,
और उन्हें मौत से खौफ नहीं होता.
सिकंदर और गौरी ,
मुगलों और अंग्रेजों के समय से,
मैं मरता रहा हूँ,
उनसे लड़ते हुए,
अपने वतन की हिफ़ाज़त करते हुए,
और ह़र बार धरती माँ मुझे एक नई देह दे देती है .
क्या तुम्हारे सवाल का जवाब तुम्हें मिला ?''
उसने कौतूहल से मुझे देखकर पूछा.
''लेकिन मैं तो ऐसा कहाँ कर सकता हूँ ?
मैं तो बीवी-बच्चों वाला एक अदना सा इंसान हूँ !''
मैंने सहमकर कहा.
''कोई बात नहीं,
अगर तुम लालच न करो,
बेईमानी न करो,
रिश्वत लेने-देने का काम न करो,
तो क्या यह कोई कम देश-भक्ति है ?''
इतना भी काफी है .
नींद में ही चलकर अपने घर आकर,
और बिस्तर पर पुनः सो जाने के,
- कोई पंद्रह मिनट बाद,
जब आँखें खुलीं,
तो सूरज चढ़ आया था कमरे में .
सोचता हूँ ढूँढूँगा उस चबूतरे को कभी,
दर्शन करूँगा उस अमर देशभक्त की समाधि के .
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August 03, 2010
आध्यात्मिक गुरुओं की सामाजिक भूमिका
आज के आध्यात्मिक गुरुओं पर लिखे गए एक लेख
पर मेरे द्वारा लिखी गयी एक टिप्पणी -
____________
आदरणीय,
धर्म परंपरा और अध्यात्म के बारे में न तो आम आदमी
गंभीरता से सोच-समझ सकता है और न तथाकथित साधु,
महात्मा या विद्वान, तो फिर बुद्धिजीवी से ऐसी अपेक्षा करना
कठिन ही है ।
सिर्फ परंपरा की सीढ़ी चढ़कर स्वामी, आचार्य आदि का लेबल
पा लेना अधिकारी (पात्र) नहीं बनाता ।
और जिसे पात्रता ही नहीं है ऐसे ही लोग उपदेश देने लगें तो
समाज का अहित ही अधिक होगा ।
गीता में स्पष्ट किया गया है कि सात्विक बुद्धि ही धर्म क्या
है और अधर्म क्या है, -इसे समझ पाती है ।
इस कसौटी पर सभी तथाकथित विद्वान् आत्म-अवलोकन करें
तो वे ख़ुद भी दिशा पा सकेंगे, व दूसरों को भी शायद सही
राह बतला सकेंगे ।
दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अध्यात्म तो स्वयं की ही
उत्कंठा हो तो ही पाया जाता है । इसे स्पून-फ़ीड नहीं किया
जा सकता -जैसी कि अब परंपरा बन चुकी है ।
सादर,
___________________________
***************************
July 31, 2010
नाम क्या है ?
~~~~~~~~~ नाम क्या है ? ~~~~~~~~~~
_________________________________
सोचता हूँ,
अगर तुम्हारा कोई नाम न होता,
तो क्या तुम्हारा नाम न होता ?
जानता हूँ, कई लोगों को,
जिनकी आँखें बोलती हैं,
कह देती हैं,
बहुत सा अनकहा,
-अकथनीय और अवर्णनीय,
जो अनुल्लेख्य तो कदापि नहीं होता,
किन्तु उसे वैखरी नहीं कह पाती,
और कान नहीं सुन पाते ।
लेकिन आँखें कभी-कभी देख लेती है,
किन्तु कह तो वे भी नहीं पातीं,
फ़िर भी यह भी सच है कि कभी-कभी,
आँखें भी न सिर्फ़ देख लेती हैं,
बल्कि सहेजकर संजोकर भी रख लेती हैं,
-जैसे कैमरे की आँख,
जिसने संजो रखा,
तुम्हारी आँखों की भाषा को !
मैं नहीं जानता क्या नाम है तुम्हारा,
लेकिन पढ़ सकता हूँ,
वह चिट्ठी,
जो कैमरामैन कल ही मुझे दे गया है !
और आज फेसबुक में तुम्हारा चेहरा देखा,
तो यही ख़याल आया,
नाम क्या है ?
_________________________________
*********************************
_________________________________
सोचता हूँ,
अगर तुम्हारा कोई नाम न होता,
तो क्या तुम्हारा नाम न होता ?
जानता हूँ, कई लोगों को,
जिनकी आँखें बोलती हैं,
कह देती हैं,
बहुत सा अनकहा,
-अकथनीय और अवर्णनीय,
जो अनुल्लेख्य तो कदापि नहीं होता,
किन्तु उसे वैखरी नहीं कह पाती,
और कान नहीं सुन पाते ।
लेकिन आँखें कभी-कभी देख लेती है,
किन्तु कह तो वे भी नहीं पातीं,
फ़िर भी यह भी सच है कि कभी-कभी,
आँखें भी न सिर्फ़ देख लेती हैं,
बल्कि सहेजकर संजोकर भी रख लेती हैं,
-जैसे कैमरे की आँख,
जिसने संजो रखा,
तुम्हारी आँखों की भाषा को !
मैं नहीं जानता क्या नाम है तुम्हारा,
लेकिन पढ़ सकता हूँ,
वह चिट्ठी,
जो कैमरामैन कल ही मुझे दे गया है !
और आज फेसबुक में तुम्हारा चेहरा देखा,
तो यही ख़याल आया,
नाम क्या है ?
_________________________________
*********************************
July 20, 2010
अगले मौसम में
~~~~~~ अगले मौसम में ~~~~~~~~
_____________________________
*****************************
मौसम के अनुकूल होते ही,
धरती में दबा बीज,
जैसे कुनमुना कर जाग उठता है,
और एक नाजु़क कोमल अंकुर,
देखने लगता है सृष्टि को,
अपनी शिशु-दृष्टि से,
पहली-पहली बार !
होता है अपनी सुंदरता में वैसा ही परिपूर्ण,
जैसा होता है,
बाद में विकसित और पल्लवित-पुष्पित होकर,
किसी अगले मौसम में ।
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मौसम के अनुकूल होते ही,
धरती में दबा बीज,
जैसे कुनमुना कर जाग उठता है,
और एक नाजु़क कोमल अंकुर,
देखने लगता है सृष्टि को,
अपनी शिशु-दृष्टि से,
पहली-पहली बार !
होता है अपनी सुंदरता में वैसा ही परिपूर्ण,
जैसा होता है,
बाद में विकसित और पल्लवित-पुष्पित होकर,
किसी अगले मौसम में ।
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July 18, 2010
॥ रूपामुद्रा ॥
~~~~~~~~~~ रूपामुद्रा ~~~~~~~~~~~
_______________________________
*******************************
स्वागत तुम्हारा,
रूपामुद्रा !
अवतरित हो गयी तुम,
जगत-पटल पर,
अपनी नई मुद्रा लिए !
देखता हूँ मैं तुम्हें !
बस अद्भुत,
और शायद अलौकिक सी भी !
दो समानांतर आड़ी रेखाएँ,
जिन्हें काटती एक खड़ी रेखा,
नृत्य की भंगिमा में,
एक पैर पर खड़ी तुम,
सचमुच चंचल लगती हो,
लक्ष्मी की ही तरह !
फ़िर देखता हूँ एक बार पुन:,
तो पलकें झपकती हैं .
कभी लगता है कि अपनी पृष्ठभूमि पर तुम,
'र' की मुखाकृति लिए,
मुझसे दूर जा रही हो,
तो कभी लगता है कि नहीं-नहीं,
तुम मेरी ओर आ रही हो !
तुम वैसे तो प्रकट हुई हो,
-किसी रचयिता की कल्पना के साकार रूप में,
किन्तु,
निराकार रूप में तुम,
सदा से ही रही हो,
-सृष्टि की रचना के समानांतर !
कोई कहता है कि तुम्हारी आकृति में,
कौन सा श्रेष्ठ तत्त्व है,
-कला का ?
बस 'र' लिखकर,
उसे एक आड़ी रेखा से काटा ही तो है,
उस रूपांकनकार ने,
जिसकी सूझ पर सब उसकी वाहवाही कर रहे हैं !
हाँ, ठीक ही तो है,
जब पहली बार,
किसी कवि ने,
अपनी प्रेयसी के मुख की उपमा चाँद से की होगी,
तब भी जलनेवालों ने ऐसा ही कहा होगा .
और सोचा होगा,
कि इतनी सरल बात उन्हें क्यों नहीं सूझी !?
और जब न्यूटन ने,
सेब को जमीन पर गिरते देखकर,
गुरुत्त्वाकर्षण के सिद्धांत का आविष्कार किया,
तब भी कई लोगों ने ऐसा ही सोचा होगा !
किन्तु मैं तो भाव-विभोर हूँ,
-तुम्हारे इस रूप के प्राकट्य से .
रूपामुद्रा !!
यूँ ही खिलखिलाती रहो,
नृत्यरत रहो,
चंचल रहो,
छा जाओ जगत पर !!
_____________________________
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स्वागत तुम्हारा,
रूपामुद्रा !
अवतरित हो गयी तुम,
जगत-पटल पर,
अपनी नई मुद्रा लिए !
देखता हूँ मैं तुम्हें !
बस अद्भुत,
और शायद अलौकिक सी भी !
दो समानांतर आड़ी रेखाएँ,
जिन्हें काटती एक खड़ी रेखा,
नृत्य की भंगिमा में,
एक पैर पर खड़ी तुम,
सचमुच चंचल लगती हो,
लक्ष्मी की ही तरह !
फ़िर देखता हूँ एक बार पुन:,
तो पलकें झपकती हैं .
कभी लगता है कि अपनी पृष्ठभूमि पर तुम,
'र' की मुखाकृति लिए,
मुझसे दूर जा रही हो,
तो कभी लगता है कि नहीं-नहीं,
तुम मेरी ओर आ रही हो !
तुम वैसे तो प्रकट हुई हो,
-किसी रचयिता की कल्पना के साकार रूप में,
किन्तु,
निराकार रूप में तुम,
सदा से ही रही हो,
-सृष्टि की रचना के समानांतर !
कोई कहता है कि तुम्हारी आकृति में,
कौन सा श्रेष्ठ तत्त्व है,
-कला का ?
बस 'र' लिखकर,
उसे एक आड़ी रेखा से काटा ही तो है,
उस रूपांकनकार ने,
जिसकी सूझ पर सब उसकी वाहवाही कर रहे हैं !
हाँ, ठीक ही तो है,
जब पहली बार,
किसी कवि ने,
अपनी प्रेयसी के मुख की उपमा चाँद से की होगी,
तब भी जलनेवालों ने ऐसा ही कहा होगा .
और सोचा होगा,
कि इतनी सरल बात उन्हें क्यों नहीं सूझी !?
और जब न्यूटन ने,
सेब को जमीन पर गिरते देखकर,
गुरुत्त्वाकर्षण के सिद्धांत का आविष्कार किया,
तब भी कई लोगों ने ऐसा ही सोचा होगा !
किन्तु मैं तो भाव-विभोर हूँ,
-तुम्हारे इस रूप के प्राकट्य से .
रूपामुद्रा !!
यूँ ही खिलखिलाती रहो,
नृत्यरत रहो,
चंचल रहो,
छा जाओ जगत पर !!
_____________________________
*****************************
July 03, 2010
चाय का ठंडा हो जाना
~~~~ चाय का ठंडा हो जाना ~~~~
__________________________
**************************
कैसी विडम्बना है,
कितनी क्रूर यंत्रणा है,
किसी उपलब्धि तक पहुँचते-पहुँचते,
स्थितियों का एकदम बदल जाना,
-सर्वथा अप्रासंगिक हो जाना .
उपलब्धि को अर्थहीन बना देना,
बल्कि हद से परे तक,
-अवांछित बना डालना !
उपहास, व्यंग या व्यंग्य ही बना देना !
चाय का पड़े-पड़े ठंडा हो जाना भी,
उतना अप्रासंगिक नहीं होता,
जितना कि भावनाओं की ऊष्मा का,
जब बहुत ज़रूरत हो तभी,
ठीक उसी पल,
एकाएक, अनपेक्षित ढंग से ठंडा हो जाना .
आप कुछ नहीं कर सकते, महसूस करने के सिवा !
आप चाय को ज़रूर फ़िर एक बार गर्म कर सकते हैं,
-और कभी-कभी तो करते ही होंगे !
लेकिन भावनाओं के ठन्डे पड़ जाने पर,
अपने या किसी दूसरे के शब्दाडम्बर से,
भावुक तो हो सकते हैं,
और आत्म-निंदा, आत्म-गौरव और आत्म-दया की,
मिली जुली भावना से शायद अभिभूत भी !
लेकिन आप संवेदन-शीलता की बुझ चुकी लौ को,
कहाँ से प्रज्वलित कर सकेंगे पुन: ?
किस आगदार तीली से ?
और उसके अभाव में,
भावनाओं को उभारने की कोशिश,
एक दुष्टता ही होगी,
-अपने-आपके साथ !
-अपने-आपको ही यंत्रणा देना,
और अपना या दूसरों का,
भावनात्मक शोषण ही होगा वह !
लेकिन तब शायद वही एकमात्र बाध्यता,
-या औपचारिकता रह जाती है,
जिसे आप करते हैं .
-क्योंकि आप बच भी तो नहीं सकते !
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कैसी विडम्बना है,
कितनी क्रूर यंत्रणा है,
किसी उपलब्धि तक पहुँचते-पहुँचते,
स्थितियों का एकदम बदल जाना,
-सर्वथा अप्रासंगिक हो जाना .
उपलब्धि को अर्थहीन बना देना,
बल्कि हद से परे तक,
-अवांछित बना डालना !
उपहास, व्यंग या व्यंग्य ही बना देना !
चाय का पड़े-पड़े ठंडा हो जाना भी,
उतना अप्रासंगिक नहीं होता,
जितना कि भावनाओं की ऊष्मा का,
जब बहुत ज़रूरत हो तभी,
ठीक उसी पल,
एकाएक, अनपेक्षित ढंग से ठंडा हो जाना .
आप कुछ नहीं कर सकते, महसूस करने के सिवा !
आप चाय को ज़रूर फ़िर एक बार गर्म कर सकते हैं,
-और कभी-कभी तो करते ही होंगे !
लेकिन भावनाओं के ठन्डे पड़ जाने पर,
अपने या किसी दूसरे के शब्दाडम्बर से,
भावुक तो हो सकते हैं,
और आत्म-निंदा, आत्म-गौरव और आत्म-दया की,
मिली जुली भावना से शायद अभिभूत भी !
लेकिन आप संवेदन-शीलता की बुझ चुकी लौ को,
कहाँ से प्रज्वलित कर सकेंगे पुन: ?
किस आगदार तीली से ?
और उसके अभाव में,
भावनाओं को उभारने की कोशिश,
एक दुष्टता ही होगी,
-अपने-आपके साथ !
-अपने-आपको ही यंत्रणा देना,
और अपना या दूसरों का,
भावनात्मक शोषण ही होगा वह !
लेकिन तब शायद वही एकमात्र बाध्यता,
-या औपचारिकता रह जाती है,
जिसे आप करते हैं .
-क्योंकि आप बच भी तो नहीं सकते !
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