November 17, 2010

~~बेवज़ह~~

~~~~~~~~~~ बेवज़ह ~~~~~~~~~~
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अब वहाँ शब्द उभर आये हैं,
और तैर रहे हैं, 
जहाँ पहले कभी,
मौन का गुँजार था ।
जहाँ पहले शून्य था,
अब वह हमारी मिलन-स्थली है,
जहाँ पहले शून्य का फ़ैलाव था,
अस्तित्व का यह आयाम,
जहाँ मेरे खयाल तुम्हारे खयालों को छूते हैं,
क्या ईश्वर को इस टुकड़े की सचमुच कोई ज़रूरत थी भी ?
नहीं, मेरे प्रिय !
बिलकुल नहीं थी,
उसी तरह,
जैसे, कि डामरीकृत सड़क पर,
घास,
चाँद को देखकर कुत्तों का भौंकना,
अँधेरे का डर,
विक्षिप्त की मूढ हँसी,
बिलकुल ही ग़ैर-ज़रूरी होते हैं !
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( * एक मित्र की इस अंग्रेज़ी कविता  का हिन्दी 
अनुवाद, जिसे आप मेरे यहाँ पर भी देख सकते हैं । )
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Words have emerged and float
where before the silence vibrated
Where was empty 
now is the place
of our meeting,
radius of the real
where my thoughts
touch your thoughts
is this fragment needful for God?
No, my love, it is not,
as are not needed
the grass between the asphalt,
the bark of dogs at the moon,
the fear of the dark,
the foolish laugh of a madman.



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November 16, 2010

कविता "॥नाग लोक॥" की रचना-प्रक्रिया-(भूमिका)

~~~~कविता "॥नाग लोक॥" की रचना-प्रक्रिया ~~~
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कल ही मैंने उपरोक्त कविता लिखी थी ।
उस समय मुझे इस बात की कल्पना तक नहीं थी,कि मैं क्या लिखने
जा रहा हूँ ।यह अवचेतन का प्रस्फुटन था, जिसे मैं काग़ज पर रास्ता
दे रहा था । बस, वैसे ही जैसे ’अवचेतन’ के प्रस्फुटीकरण के लिये
कभी-कभी मैं एक प्रयोग किया करता हूँ ।
मैं पहले कागज रंग, और तूलिका लेकर शान्तिपूर्वक बैठ जाता हूँ, फ़िर
कुछ पल ठहरकर इधर-उधर दृष्टि दौड़ाता हूँ, फ़िर दृष्टि को रंगों और
कागज पर वापस ले आता हूँ, अन्यमनस्क सी स्थिति में जब ’विचार’
निष्क्रिय सा पड़ा होता है, मैं एक तूलिका उठा लेता हूँ, या कभी-कभी
कोई पेन्सिल । फ़िर कागज पर उसे इधर-उधर गति देता हूँ । ज़ाहिर
है, तब ’विचार’ अर्थात्‌ मेरा ’चेतन’ मन चुप होता है । निरुद्देश्य हो
रही इस प्रक्रिया में, अवचेतन धीरे-धीरे खुलने लगता है । मैं उसकी
कोई व्याख्या नहीं करता ।
"मैं" कौन ?
-मेरा चुप पडा़ ’चेतन’ मन ।
मैं / वह कागज पर उभरती आकृति पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं करते ।
उन्हें इसकी अनुमति भी नहीं होती । कुछ समय तक इस गतिविधि में 
संलग्न रहते हुए, या तो जीवन की दूसरी ज़रूरतें मुझे इससे दूर कर देती
हैं, या अनचाहे ही यह प्रक्रिया जैसे शुरू हुई थी, वैसे ही रुक भी जाती है ।
तब, या तो ’चेतन’ मन की ही भाँति, ’अवचेतन’ मन भी ’ठहर’ जाता है,
या फ़िर ’चेतन’ अपने क्रिया-कलाप शुरु कर देता है ।
तब, मैं कागज-पेन्सिल, रंग-तूलिका एक ओर रख देता हूँ, और विरले ही
अवसर पर कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है, कि ’चेतन’ और ’अवचेतन’,
दोनों ही चुप होते हैं, और मैं ’सोया’ भी नहीं होता । मुझे मेरे आसपास
के संसार और उसकी गतिविधियों का शुद्ध इन्द्रिय-गम्य बोध, ’भान’ तो
रहता है, और ’चेतन’ मन किसी भी क्षण ज़रूरत होते ही काम में जुट भी
सकता है, किंतु मैं उस शान्ति में, ’चेतन’ और ’अवचेतन’ से भी परे के
किसी तत्त्व को ’प्रस्फुटित’ होते देखने लगता हूँ ।
"मैं" कौन ?
-मेरा अवधान, ’अटेन्शन’।
क्या ’अवधान’ को ’चित्त’ कहना ठीक होगा ?
-नहीं, क्योंकि ’चित्त’ कभी ’अवधानयुक्त’ अर्थात्‌ ’सावधान’ होता है,
और कभी-कभी नहीं भी होता ।
(हालाँकि, ’अवधान’ को ’मेरा’ कहना भी त्रुटिपूर्ण है ।) 
’मन’ की उस अवस्था में यदि मैं आँखे बंद कर लेता हूँ, तो या तो नींद
मे चला जाता हूँ, या स्वप्न जैसी ’तंद्रा’ में, जिसमें मैं सारे संसार से 
एक हो जाता हूँ । लेकिन ज़रा ठहरिये । तब संसार से मैं इस दृष्टि से
एक हो जाता हूँ कि अपने को किसी वस्तु, व्यक्ति, प्राणी, या पेड़-पौधे
जैसा पाता हूँ । इस क्षण इसकी कल्पना नहीं कि जा सकती कि तब 
मैं ’क्या’ होता हूँ ! क्योंकि इस क्षण तो ’चेतन’ ही कार्यरत है । और 
उस बहुत बड़े ’अंतराल’ को, जिसे मैं ’अचेतन’ कहना चाहूँगा, यदि 
मैं पार कर सकता हूँ, तो एक और नया तत्त्व ’अवधान’ के आलोक में
प्रकट होता है । इस सब बारे में फिर कभी विस्तार से ।
अभी तो यही कहूँगा कि इसी तरह की मनःस्थिति में यह रचना, यह
कविता, कम्प्यूटर के मॉनीटर पर उभरी थी ।-एक शब्द-चित्र की भाँति ।
यह ’अज्ञात’ से आई थी ।
(क्या इसे हम 'ईश्वर' कह सकते हैं ?)
फ़िर मैंने इस पर चिंतन किया, और पाया कि ’नाग’ शब्द वस्तुतः 
’विचार’,’सूचना’, ’इन्फ़ॉर्मेशन’ के लिये प्रयुक्त किया गया है । यहाँ 
तैत्तिरीय उपनिषद्‌ की शिक्षा-वल्ली और श्री जे.कृष्णमूर्ति की वाणी के
संदर्भ में अब मैं इस रचना और इसकी ’कुंजी’ क्या है, इस बारे में इस 
लेख के अगले हिस्से में प्रकाश डालूँगा ।

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November 15, 2010

॥ नाग-लोक ॥



~~~~~~~~~~ ॥ नाग-लोक ॥~~~~~~~~~~~
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वे अनेक थे,
हर एक-दो साल में केंचुल बदल लिया करते थे ।
अकसर तब,
जब केंचुल उनकी आँखों पर चढ़ने लगती थी ।
कभी-कभी वे बाहर आ जाते थे ।
-जब उनके बिलों में गरमी या उमस बढ़ जाती थी,
या जब बारिश में पानी भरने लगता था ।
और कभी कभी अपने अन्धेरों से बाहर इसलिये भी आ जाते थे,
क्योंकि बाहर शिकार मिल सकता था ।
अकसर तो वे एक दूसरे को ही खा जाया करते थे,
और कोई नहीं जानता था कि कौन कब किसका ग्रास बन जाएगा ।
खुले में आने पर वे कभी किसी जानवर या मनुष्य के पैरों 
   तले दब जाते, 
तो बरबस उन्हें काट भी लेते थे ।
इसलिये सभी को खतरनाक समझा जाता था ।
अन्धेरों से आलोकित उनके लोक में,
उनकी अपनी-अपनी 'व्यवस्थाएँ' थीं !
उनके अपने ’दर्शन’ थे, ’नैतिकताएँ’ थीं,
’मान्यताएँ’, और ’आदर्श’ भी थे ।
’राष्ट्र’ और ’भाषाएँ’ थीं,
जिनके अपने अपने ’संस्करण’ थे ।
और इस पूरे समग्र ’प्रसंग’ को वे,
'सभ्यता', ’धर्म’ तथा ’संस्कृति’ कहते थे ।
सब अनेक समूहों में......।
अकसर तो यही होता था, कि किसी एक 
'सभ्यता, ’दर्शन’,’धर्म’, ’भाषा’, या ’सँस्कृति’ का अनुयायी,
किसी दूसरे के समूह में,
या उसके विरोधी समूह में भी होता ही था,
और अकसर नहीं,
बेशक होता ही था । 
और फ़िर अन्धेरे भी इस सबसे अछूते कैसे हो सकते थे ?
उनके अपने रंग थे, अपने स्पर्श, अपने स्वाद,
और अपनी ध्वनियाँ ।
वे वहाँ थे -
उनकी भावनाओं में,
उनके विचारों में,
उनकी संवेदनाओं में ,
उनकी संवेदनशीलताओं में ।
उन अँधेरों के अपने विन्यास थे,
’विचार’,
राजनीतिक विचार,
’प्रतिबद्धताएँ’
और यह सब उनका अपना ’लोक’ था,
-अपनी दुनिया,
जिसे वे लगातार बदलना चाहते थे,
एक ’बेहतर दुनिया’ में तब्दील करना चाहते थे ।
इसलिये उनके पास हमेशा एक ’कल’ होता था,
एक बीता हुआ,
एक आगामी ।
उनके आज में वे दोनों आलिंगनबद्ध होते ।
’विचार’ अपने रास्ते तय करते थे,
अन्धेरों से अन्धेरों तक,
अकसर वे एक से दूसरे अंधेरों में चले जाते थे,
और भूल जाते थे कि यह ’निषिद्ध’ क्षेत्र है उनके लिये,
’वर्जित’ ।
फ़िर वे केंचुल छोड़ देते थे ।
’नये’ अन्धेरे के अभ्यस्त होने तक वे लेटे रहते थे,
एक अद्भुत्‌ अहसास में ।
लाल, रेशमी, गर्म, मादक सुगंधवाले,
मीठी ध्वनिवाले अंधेरे से निकलकर,
हरे-भरे, मखमली, शीतल, कोमल सुगंधवाले अंधेरे तक
पहुँचने का सफ़र,
एक ऐसा समय होता था,
जब ’समय’ नहीं होता था ।
और वे जानते थे,
कि ऐसा भी कोई वक़्त हुआ करता है !
लेकिन उस वक़्त में अपनी मरज़ी से आना-जाना,
मुमकिन नहीं था,
उनके लिए । 

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संस्कार

~~~~~~~ "संस्कार" ~~~~~~~
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उसका चेहरा हरदम ढँका रहता था !
अक्सर वह अपनी पोशाक बदलता रहता था ।
और इसलिये लोगों को अकसर परेशानी रहती थी ।
उसे हर कोई अपने ढंग से पहचानता ज़रूर था,
-लेकिन ’जानता’ कोई नहीं था ।
अकसर उसे लेकर लोग आपस में झगड़ने लगते थे ।
और उसके जैसे भी एक नहीं, कई थे !
इसलिये बहुत अधिक अराजकता थी ।
यह अन्धेरे में रास्ता टटोलने जैसा होता था ।
पर उन्हें कभी ख़याल ही नहीं आता था कि ऐसा 
  भी हो सकता है !


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November 09, 2010

"वज़ह"

~~~~~~~~~~~~~~~वज़ह~~~~~~~~~~~~~~~~~
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( प्रेरणा :  'फेसबुक' पर लिखे सुनीता 'सुनी' के स्टेटस से )


"हर दिन के साथ यूँ बढ़ रही हूँ, जैसे बबूल का पेड़ ............"





बबूल से मैंने पूछा,
"ये काँटे किसलिये ?"
हँसकर बोला वह,
"बकरियों से बचने के लिये ।"
"और पत्तियाँ किसलिये ?"
"बकरियों के लिये ।"
"!?"
"ताकि पत्तियाँ घटती रहें,
कटती रहें,
बढ़ती रहें,
और वे मुझे खाकर बिल्कुल ही ख़त्म न कर दें,
-इसलिये काँटों का होना भी उतना ही ज़रूरी है !"


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पुनश्च  : ---------
(सुनीताजी का कहना है कि वे बबूल नहीं,
'खजूर' लिखना चाहतीं थीं ,तो मुझे पुनः 
एक नई प्रेरणा मिली,
प्रस्तुत है- )


फ़िर,
मैंने पास ही खड़े खजूर को देखा,
जो गर्व से सर उठाये,
बादलों से बतियाता जान पड़ता था,
और खजूर तुम ?
तुम्हारे बारे में तो किसी ने कहा ही है, :
"बड़ा हुआ तो क्या हुआ .....!!"
वह शायद ही मुझे सुन पाया हो .
जवाब बबूल ने ही दिया, :
"नहीं, उसका हृदय भी उतना ही उच्च है,
-जितना कि उसका कद ."
"कैसे ?"
"उसके हृदय में छिपे रस के झरने को,
उलीच लेते हैं आदिवासी मनुष्य,
और भोर होने से पहले तक उस अमृत 
का पान किया जा सकता है,
उसे कहते हैं 'नीरा',
..................."
"लेकिन ताड़ी भी तो वही हो जाता है !"
-छेड़ा मैंने पुनः .
"हाँ, लेकिन मनुष्य ही तो उसे ,
सूरज की धूप दिखाकर,
बना देता है मादक  ! ............"
खजूर तो अनुद्विग्न,
हवा में झूमता रहा ,
नहीं जानता उसने हमारी बातें,
सुनी या नहीं सुनी  !!


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November 07, 2010

देव्यापराधक्षमापनस्तोत्रम्‌ (Devyaaparaadhakshamaapana-Stotram.)

~~~ देव्यापराधक्षमापनस्तोत्रम्‌ ~~~
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न मंत्रं नो यंत्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
      परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणं      ॥१॥

    हे माते ! मन्त्र, यन्त्र, स्तुति, आवाहन, ध्यान, और
स्तुतिकथा आदि के माध्यम से उपासना कैसे की जाती
है, मैं नहीं जानता । मुद्रा तथा विलाप आदि के प्रयोग 
से तुम्हारा पूजन कैसे करूँ, यह भी मैं नहीं जानता ।
हे माता, मैं तो बस इतना ही जानता हूँ कि तुम्हारा 
अनुसरण समस्त क्लेशों का हरण करता है । ॥१॥

विधेरज्ञानेन        द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव  चरणयोर्या च्युतिरभूत्‌    ।
तदेतत्क्शन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे 
     कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति   ॥२॥

विधिपूर्वक पूजन कैसे किया जाता है, इसका ज्ञान न 
होने से, धन के अभाव से, तथा आलस्यवश, तुम्हारे
चरणों की आराधना करने में यदि मुझसे कोई त्रुटि 
हुई हो, तो हे सब का उद्धार करनेवाली शिवे ! तुम 
मुझे क्षमा करना, क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो यह  तो संभव
है, किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती ।  ॥२॥

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः 
परं तेषां मध्ये विरलतरोऽहं  तव  सुतः           ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
     कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति   ॥३॥
  
हे माँ, धरती पर विचरण करनेवाले तुम्हारे सरल 
पुत्र तो बहुत से होंगे, किन्तु मैं उनसे भिन्न प्रकृति 
का तुम्हारा पुत्र हूँ । हे शिवे ! फिर भी तुम मुझे त्याग 
दो, यह उचित न होगा, क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो यह तो 
संभव है, किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती ।  ॥३॥ 

जगन्मातस्तव  चरणसेवा  न  रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया        ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे 
     कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति   ॥४॥

हे जगज्जननि ! मैंने कभी तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं
की, और न ही हे देवि !, मैंने कभी तुम्हें धन आदि अर्पित
किया, तथापि तुम मुझ पर अत्यंत अप्रतिम स्नेह रखती
हो, क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो यह तो संभव है, किन्तु माता
कभी कुमाता नहीं हो सकती । ॥४॥ 

परित्यक्ता देवा विविधविधि सेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि        ।
इदानीं चेन्मातस्तव कृपानापि भविता
     निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणं   ॥५॥

हे गणेशजननि ! मेरी आयु के पचासी वर्ष व्यतीत
हो चुके हैं, विविध देवताओं की आराधना की विविध
विधियों से व्याकुल होकर मैंने उन सबको छोड़ दिया,
और अब यदि तुम्हारी कृपा भी मुझ पर न हुई, तो
मैं किसकी शरण जाऊँगा ?  ॥५॥

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः  ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
    जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ   ॥६॥

हे अपर्णा ! माता, तुम्हारे मन्त्राक्षर कानों में पड़ने
मात्र से चाण्डाल मधुर रस से भरी सुन्दर वाणी 
बोलने लगता है, रंक भी वैभवशाली होकर निर्भय
विचरण करने लग जाता है । यदि तुम्हारा नाम
सुनने भर से ही ऐसा हो जाता है, तो विधिपूर्वक 
जो इसका जप करता है, उसे इसका क्या फल 
प्राप्त होता है, कौन जान सकता है ?  ॥६॥
  
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी  कण्ठे  भुजगपतिहारी   पशुपतिः   ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
    भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्‌   ॥७॥



हे भवानी ! चिता की भस्म रमानेवाले, विष का 
सेवन करनेवाले दिगम्बर, सिर पर जटा, कण्ठ में
भुजंगमाला और कपालमाला धारण करनेवाले 
पशुपति (भगवान्‌ शंकर), भूतेश्वर को जगदीश्वर 
की जो पदवी प्राप्त हुई है, वह तुम्हारे साथ उनके
विवाह का ही तो फल है ! ॥७॥

न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभवाञ्छापि च न मे 
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै 
    मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः  ॥८॥


हे चन्द्रमुखि ! मुझे न तो मोक्ष-प्राप्ति की आकाँक्षा 
है, न सांसारिक वैभव की वाञ्छा, मुझे न तो विज्ञान
की अपेक्षा है, और न सुख आदि की प्राप्ति की ही 
इच्छा, हे माता ! मैं तो तुमसे केवल यही याचना 
करता हूँ कि मेरा सारा जीवन मृडानी, रुद्राणी, एवं 
शिव-शिव, भवानी आदि जपते हुए व्यतीत हो ॥८॥  

नाराधीतासि    विधिना    विविधोपचरैः
     किं   रुक्षचिन्तनपरैर्न   कृतं    वचोभिः       ।
श्यामे  त्वमेव  यदि  किञ्चन  मय्यनाथे
    धत्से      कृपामुचितमम्ब    परं  तवैव     ॥९॥


मैंने कभी तुम्हारी (एकोपचार, षोडशोपचार आदि)
शास्त्र-निर्दिष्ट विविध उपचारों से युक्त आराधना नहीं 
की, इतना ही नहीं, इसके विपरीत मैंने चिन्तनपरक,
रुक्ष बुद्धि से क्या क्या अनर्गल विचार तक नहीं किये ?
हे श्यामा ! इसलिये यदि तुम ही मुझ अनाथ पर कृपा
करो तो यह सर्वथा उपयुक्त है, क्योंकि तुम मेरी माता 
हो । ॥९॥


आपत्सु   मग्नः   स्मरणं   त्वदीयं
    करोमि   दुर्गे    करुणार्णवेशि   ।
नैतच्छठत्वं   मम   भावयेथाह् 
    क्षुधातृषार्ता जननीं  स्मरन्ति                  ॥१०॥

हे दुर्गे ! जब भी मैं विपत्तिग्रस्त होता हूँ, तो तुम्हारा
ही स्मरण करने लगता हूँ, इसे तुम मेरी शठता मत
समझना, माता तुम करुणासागर हो, क्योंकि क्षुधा 
और प्यास से आकुल बालक माता का ही तो स्मरण
करते हैं । ॥१०॥


जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृतं  न  हि  माता समुपेक्षते सुतं  ॥११॥


हे जगन्माता ! मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है, तो 
इसमें आश्चर्य क्या है ? क्योंकि माता दुष्ट प्रवृत्ति 
रखनेवाले बालक को भी नहीं त्यागती । ॥११॥



मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु ॥१२॥


हे माँ !! न तो मेरे समान कोई और पापी है, 
और न ही तुम्हारे तुल्य पापनाश करनेवाली 
कोई और । यह जानकर हे महादेवि, जो तुम्हें 
उचित प्रतीत होता हो, वही करो । ॥१२॥ 



॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं देव्यापराधक्षमापनस्तोत्रम्‌ ॥
      ____________________________________


                                     ॐ  


November 05, 2010

--"प्रारब्ध"- एक नई दृष्टि--

~~"प्रारब्ध"- एक नई दृष्टि~~
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(वेदांत की स्थापित, शास्त्र-सम्मत दृष्टि से, "प्रारब्ध",
व्यक्ति-विशेष द्वारा अतीत में किया गया वह 'कर्म' 
होता है, जिसके 'फलित' होने का समय आ गया है ,
किन्तु यहाँ पर समष्टि-प्रारब्ध को सन्दर्भ में रखकर,
उस दृष्टि से "प्रारब्ध" क्या है, क्या हो सकता है, इसे
समझने का प्रयास किया जा रहा है ."आत्म-विचार"
में इसकी भूमिका पर ध्यान देते हुए, एक अन्य दृष्टि 
से उसे रेखांकित किया जा रहा है .इस दृष्टि से शायद 
इसमें नयापन है. अतः महत्त्वपूर्ण है; "आत्म-विचार",
"प्रारब्ध" पर उसे ही केंद्र में रखते हुए, कुछ लिखने की 
चेष्टा की जा रही है,........)   

....... व्यक्ति,वस्तु, विषय, स्थान, घटना (समय/काल) के 
सन्दर्भों में गतिशील होता है . व्यक्ति के सन्दर्भ में इसे यूँ 
देखें कि मान लीजिये आप बीमार पड़ गए हैं, डॉक्टर ने
बतलाया, टॉयफ़ाइड है. हफ्ते-दस दिन में ठीक हो जाएगा .
फ़िर जाँच और चिकित्सा का दौर चला .
आप कितने स्वतंत्र हैं ?
सारी परिस्थितियाँ आपकी मानसिकता और मानसिक 
स्थितियों को प्रभावित करती हैं, और उनसे प्रभावित भी 
होती हैं .
आपकी चिन्ताएँ, इच्छाएँ, आशाएँ, भय, जोश, उत्साह,
निराशा, या विषाद, उद्वेग या विकलता आपसे पूछे बिना ही 
आपके चित्त में आते-जाते रहते हैं, और आप उनके हाथों की
कठपुतली ही तो होते हैं !
लेकिन ज़रा रुकिए .
क्या इन चिंताओं, इच्छाओं, आशाओं, भयों, उद्वेगों, विषादों,
विकलताओं, भावनाओं आदि की ही भाँति 'विचार' भी आपके
चित्त में प्रायः अनचाहे ही नहीं आया करते ?
"मैं स्वतंत्र हूँ," या "मैं स्वतंत्र नहीं हूँ," ये विचार भी तो इसी 
तरह आपके चित्त को छूते रहते हैं, और कभी-कभी आप पर 
वे हावी भी तो हो जाया करते हैं . 
......... व्यक्ति, वस्तु विषय, स्थान, घटना (समय/काल) के
सन्दर्भों में गतिमान रहा करता है, ----- : "प्रारब्ध".
"विचार" सबको परिभाषित करता चलता है और अपने द्वारा 
तय की गयी परिभाषाओं (धारणाओं) के जाल में फँस जाता 
है . 
क्या आप "विचार" हैं ?
क्या "प्रारब्ध", -"विचार" का ही नहीं होता ?
क्या "प्रारब्ध", -"विचार" ही नहीं होता ?
क्या "विचार" ही अन्य सारी चीज़ों की ही तरह, "मैं" को भी
प्रक्षेपित, परिभाषित, 'तय' नहीं करता ?
पुनः, क्या "विचार" ही इस "मैं" की प्रतिमा का शिल्पकार भी
नहीं होता ?
क्या वही अपने द्वारा स्थापित, 'सृजित', परिभाषित, प्रक्षेपित,
प्रतिमा  को पोषित और समृद्ध नहीं करता ?
क्या "विचार" द्वारा पैदा किया गया यह "मैं", "विचार" का 
ही विस्तार, उसकी ही संतति, उसका ही सातत्य, उसकी ही
निरंतरता  नहीं होता ?
क्या आप यह सब हैं ?
क्या आप यह सब हो सकते हैं ?
फ़िर आप क्या हैं, कौन हैं, क्या यह जानना/समझना ज़रूरी,
महत्त्वपूर्ण नहीं हो जाता ?
आप क्या 'नहीं' हैं यह तो स्पष्ट ही है, और इतने पर राजी 
होना भी एक उपलब्धि है, ऐसा कह सकते हैं. फ़िर आप जो
हैं, शायद एक रिक्तता, या ऐसा कुछ,जिसे आप कभी कह ही
नहीं सकते, -वह जो भी होता हो, वह तो आप बेशक हैं ही !
.....और उसे आप नाम देना चाहेंगे तो क्या पुनः "विचार" के
ही यंत्र की सहायता नहीं लेंगे ? क्या तब आप पुनः "विचार" 
के ही प्रपंच में नहीं फँस जाते हैं ?
फ़िर    "प्रारब्ध" क्या है ?

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November 02, 2010

शून्य और मेरा असमन्जस


~शून्य, 


और मेरा असमंजस~
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A glass of pure water

by Manjula Saxena on Tuesday, November 2, 2010 at 4:28pm




का हिन्दी अनुवाद .

जीवन के मिलनोत्सव  में,
बियाबान के पिछवाड़े,
अपनी ही विशिष्ट शैली में,
अवतरित हुई एक मंडली .
अनेक छद्म बुद्धिजीवी, 
-अनेक स्थापित विद्वान्,
जो अपनी भावनात्मक संवेदनशीलता का
             दंभ भरते हुए,
सीख देते रहे मासूमों को,
कर्कश वाणी में,
ऊब की हद तक.
उत्सव-मग्न उनमें से कई थे,
जिनके पास 'मौलिकता' का अपना एक,
-संकीर्ण नज़रिया / 'पैमाना' था,
कुछ 'पंडित' भी थे वहाँ, 
जो कर रहे थे भ्रमसर्जना,
-यथार्थ की सूक्ष्म तोड़-मरोड़,
अनुमानों के सहारे,
प्रपंच-जाल, क्षरणशील भावनाएँ,
जिनमें भरी थीं,
सुखाकांक्षा  को तृप्त करने की  महती लालसाएँ,
मेज पर प्रस्तुत थीं,
भाँति-भाँति की सुस्वादु विविधताएँ,
राग-ज्वर में रंगीं,
रक्तिम-माँसल मैत्रियाँ,
ईर्ष्या की किनार-जड़ी,
मरकती हरित-पीत प्रशंसा,
खिन्नता का भूरापन लिए,
लोभ की नीली कौंध,
सियाह रजत-धवल विक्षोभ,
आभिजात्य का अभिमानी रोष,
संरक्षक होने की श्रेष्ठता की भावना का,
रतनार रंग,.....
रंगों की धूम,
आह !....
सभी कलुषित,
मिली-जुली पुनरावृत्तियाँ,
विकसित, संपन्न किन्तु मायूस,
निष्प्राण और खोखले लोगों के समाज का,
एक प्रत्यक्ष उदाहरण,
स्नेह के तौर तरीकों से अनभिज्ञ,
किन्तु शिष्टाचार के सुदर्शन आवरण में,
कोरी भावनाओं का,
कुशलता से आदान-प्रदान करनेवाले !
सभ्यता,
-क्या महज़ एक प्याज है ,
जिसमें बस छिलके ही छिलके होते हैं ?
जिसे छीलकर,
परत दर परत अनावरित करते हुए,
बदले में बस तिक्त आँसू ही आँखों से टपकते हैं ?
मैं यहाँ किस असमंजस में हूँ ?
-असमंजस क्यों है ?
मैंने सिर्फ एक गिलास शुद्ध, साफ़,
स्वच्छ जल ही तो माँगा है !!

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October 31, 2010

॥ *श्रीशिवपञ्चाक्षर *स्तोत्रम्‌* ॥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षर स्तोत्रम्‌ ॥


               ॐ 
भूमिका :
सर्वस्याश्च देवताया: चत्वारि रूपाणि
भवन्ति  : 
             एकमाध्यात्मिकं .
             अन्यदाधिभौतिकं.
             इतरदाधिदैविकं.
             परं मन्त्रात्मकं .
सभी देवताओं के चार स्वरूप होते हैं .
अर्थात् उनकी उपासना इन चारों में 
से किसी भी एक या अधिक रूपों में 
इष्ट देवता की तरह से की जा सकती 
है .
ये चार रूप क्रमशः 
           आध्यात्मिक,
           आधिभौतिक,
           आधिदैविक,
और,
           मंत्रात्मक 
होते हैं.
भगवान शिव का मंत्रात्मक स्वरूप है :
"नमः शिवाय "
यह उनका पञ्च-अक्षरात्मक मन्त्र 
स्वरूप है .
ॐ संलग्न करने पर यही षडाक्षरी
हो जाता है .
'न' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक 
प्रथम श्लोक है .
'म' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक 
द्वितीय श्लोक है.
'शि' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक
तृतीय श्लोक है .
'व' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक 
चतुर्थ श्लोक है .
एवं 'य' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक,
पंचम श्लोक है .
इस प्रकार से शिव के मंत्रात्मक के अतिरिक्त
अन्य स्वरूपों का 'ध्यान' श्लोकों के माध्यम 
से किया जाता है .
प्रत्येक श्लोक के अंत में 'नमः शिवाय' के द्वारा 
इन सभी स्वरूपों की परस्पर अनन्यता ग्रहण
की जाती है .
इस प्रकार भावनायुक्त शिव-स्मरण के लिए यह
स्तोत्र शिव-भक्ति का श्रेष्ठ साधन है .   
          
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नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय ।
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय ।
तस्मै ’न’-काराय नमः शिवाय ॥१॥
मन्दाकिनीसलिलचंदनचर्चिताय ।
नन्दीश्वरप्रमथनाथ महेश्वराय ।
मंदारपुष्पसुपुष्पबहुपूजिताय ।
तस्मै ’म’-काराय नमः शिवाय ।।२॥
शिवायगौरीवदनाब्जवृन्द ।
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकंठाय वृषध्वजाय ।
तस्मै ’शि’-काराय नमः शिवाय ।।३॥
वशिष्ठकुंभोद्भवगौतमार्य ।
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय ।
तस्मै ’व’-काराय नमः शिवाय ॥४॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय ।
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्यायदेवायदिगम्बराय ।
तस्मै ’य’-काराय नमः शिवाय ॥५॥
पञ्चाक्षरं इदम् पुण्यं
यः पठेत्‌ शिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति 
शिवेन सह मोदते ॥
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                  ॐ
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October 22, 2010

’समय’ का सापेक्षता-सिद्धान्त

~~~~’समय’ का सापेक्षता-सिद्धान्त~~~~


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’समय’ का ’सापेक्षता-सिद्धान्त’
(सौजन्य : जया  श्रीनिवासन के लघु आलेख से प्रेरित) 


हमारे ’समय’ में समय रेंगता था ।
-कहते हैं दादाजी ।
पिताजी के समय में वह दौड़ने लगा था ।
और मेरे समय में,
समय उड़ने लगा है ।
मेरे बेटे के लिये समय सिमट गया है ।
वह जानता है कि ’मॉउस’ की एक ’क्लिक’
कितना ’डेटा’ ’डॉउनलोड’ कर सकती है,
-क्षणांश में !!
मेरा बेटा हो या किसी दिहाड़ी ग़रीब मज़दूर का बेटा हो,
उनका ’समय’ उन्हें लील रहा है,
’समय’ से बहुत पहले,
होते जा रहे हैं,
-परिपक्व,
जैसे कोई फल ’पक’ जाता है,
’ऑक्सीटोसिन’ की खूराक से,
’कार्बाइड’ के असर से,
एक ही रात में
-जिसे ’काल’ जल्दी ही खा लेना चाहता है,
’काल’,
-जो अपनी रफ़्तार में हर जगह पहुँच जाता है,
’डेटा’ की तरह,
बेटे समय से बहुत पहले,
-बूढ़े हो चले हैं,
-इस समय में ।  




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