November 05, 2010

--"प्रारब्ध"- एक नई दृष्टि--

~~"प्रारब्ध"- एक नई दृष्टि~~
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(वेदांत की स्थापित, शास्त्र-सम्मत दृष्टि से, "प्रारब्ध",
व्यक्ति-विशेष द्वारा अतीत में किया गया वह 'कर्म' 
होता है, जिसके 'फलित' होने का समय आ गया है ,
किन्तु यहाँ पर समष्टि-प्रारब्ध को सन्दर्भ में रखकर,
उस दृष्टि से "प्रारब्ध" क्या है, क्या हो सकता है, इसे
समझने का प्रयास किया जा रहा है ."आत्म-विचार"
में इसकी भूमिका पर ध्यान देते हुए, एक अन्य दृष्टि 
से उसे रेखांकित किया जा रहा है .इस दृष्टि से शायद 
इसमें नयापन है. अतः महत्त्वपूर्ण है; "आत्म-विचार",
"प्रारब्ध" पर उसे ही केंद्र में रखते हुए, कुछ लिखने की 
चेष्टा की जा रही है,........)   

....... व्यक्ति,वस्तु, विषय, स्थान, घटना (समय/काल) के 
सन्दर्भों में गतिशील होता है . व्यक्ति के सन्दर्भ में इसे यूँ 
देखें कि मान लीजिये आप बीमार पड़ गए हैं, डॉक्टर ने
बतलाया, टॉयफ़ाइड है. हफ्ते-दस दिन में ठीक हो जाएगा .
फ़िर जाँच और चिकित्सा का दौर चला .
आप कितने स्वतंत्र हैं ?
सारी परिस्थितियाँ आपकी मानसिकता और मानसिक 
स्थितियों को प्रभावित करती हैं, और उनसे प्रभावित भी 
होती हैं .
आपकी चिन्ताएँ, इच्छाएँ, आशाएँ, भय, जोश, उत्साह,
निराशा, या विषाद, उद्वेग या विकलता आपसे पूछे बिना ही 
आपके चित्त में आते-जाते रहते हैं, और आप उनके हाथों की
कठपुतली ही तो होते हैं !
लेकिन ज़रा रुकिए .
क्या इन चिंताओं, इच्छाओं, आशाओं, भयों, उद्वेगों, विषादों,
विकलताओं, भावनाओं आदि की ही भाँति 'विचार' भी आपके
चित्त में प्रायः अनचाहे ही नहीं आया करते ?
"मैं स्वतंत्र हूँ," या "मैं स्वतंत्र नहीं हूँ," ये विचार भी तो इसी 
तरह आपके चित्त को छूते रहते हैं, और कभी-कभी आप पर 
वे हावी भी तो हो जाया करते हैं . 
......... व्यक्ति, वस्तु विषय, स्थान, घटना (समय/काल) के
सन्दर्भों में गतिमान रहा करता है, ----- : "प्रारब्ध".
"विचार" सबको परिभाषित करता चलता है और अपने द्वारा 
तय की गयी परिभाषाओं (धारणाओं) के जाल में फँस जाता 
है . 
क्या आप "विचार" हैं ?
क्या "प्रारब्ध", -"विचार" का ही नहीं होता ?
क्या "प्रारब्ध", -"विचार" ही नहीं होता ?
क्या "विचार" ही अन्य सारी चीज़ों की ही तरह, "मैं" को भी
प्रक्षेपित, परिभाषित, 'तय' नहीं करता ?
पुनः, क्या "विचार" ही इस "मैं" की प्रतिमा का शिल्पकार भी
नहीं होता ?
क्या वही अपने द्वारा स्थापित, 'सृजित', परिभाषित, प्रक्षेपित,
प्रतिमा  को पोषित और समृद्ध नहीं करता ?
क्या "विचार" द्वारा पैदा किया गया यह "मैं", "विचार" का 
ही विस्तार, उसकी ही संतति, उसका ही सातत्य, उसकी ही
निरंतरता  नहीं होता ?
क्या आप यह सब हैं ?
क्या आप यह सब हो सकते हैं ?
फ़िर आप क्या हैं, कौन हैं, क्या यह जानना/समझना ज़रूरी,
महत्त्वपूर्ण नहीं हो जाता ?
आप क्या 'नहीं' हैं यह तो स्पष्ट ही है, और इतने पर राजी 
होना भी एक उपलब्धि है, ऐसा कह सकते हैं. फ़िर आप जो
हैं, शायद एक रिक्तता, या ऐसा कुछ,जिसे आप कभी कह ही
नहीं सकते, -वह जो भी होता हो, वह तो आप बेशक हैं ही !
.....और उसे आप नाम देना चाहेंगे तो क्या पुनः "विचार" के
ही यंत्र की सहायता नहीं लेंगे ? क्या तब आप पुनः "विचार" 
के ही प्रपंच में नहीं फँस जाते हैं ?
फ़िर    "प्रारब्ध" क्या है ?

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November 02, 2010

शून्य और मेरा असमन्जस


~शून्य, 


और मेरा असमंजस~
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A glass of pure water

by Manjula Saxena on Tuesday, November 2, 2010 at 4:28pm




का हिन्दी अनुवाद .

जीवन के मिलनोत्सव  में,
बियाबान के पिछवाड़े,
अपनी ही विशिष्ट शैली में,
अवतरित हुई एक मंडली .
अनेक छद्म बुद्धिजीवी, 
-अनेक स्थापित विद्वान्,
जो अपनी भावनात्मक संवेदनशीलता का
             दंभ भरते हुए,
सीख देते रहे मासूमों को,
कर्कश वाणी में,
ऊब की हद तक.
उत्सव-मग्न उनमें से कई थे,
जिनके पास 'मौलिकता' का अपना एक,
-संकीर्ण नज़रिया / 'पैमाना' था,
कुछ 'पंडित' भी थे वहाँ, 
जो कर रहे थे भ्रमसर्जना,
-यथार्थ की सूक्ष्म तोड़-मरोड़,
अनुमानों के सहारे,
प्रपंच-जाल, क्षरणशील भावनाएँ,
जिनमें भरी थीं,
सुखाकांक्षा  को तृप्त करने की  महती लालसाएँ,
मेज पर प्रस्तुत थीं,
भाँति-भाँति की सुस्वादु विविधताएँ,
राग-ज्वर में रंगीं,
रक्तिम-माँसल मैत्रियाँ,
ईर्ष्या की किनार-जड़ी,
मरकती हरित-पीत प्रशंसा,
खिन्नता का भूरापन लिए,
लोभ की नीली कौंध,
सियाह रजत-धवल विक्षोभ,
आभिजात्य का अभिमानी रोष,
संरक्षक होने की श्रेष्ठता की भावना का,
रतनार रंग,.....
रंगों की धूम,
आह !....
सभी कलुषित,
मिली-जुली पुनरावृत्तियाँ,
विकसित, संपन्न किन्तु मायूस,
निष्प्राण और खोखले लोगों के समाज का,
एक प्रत्यक्ष उदाहरण,
स्नेह के तौर तरीकों से अनभिज्ञ,
किन्तु शिष्टाचार के सुदर्शन आवरण में,
कोरी भावनाओं का,
कुशलता से आदान-प्रदान करनेवाले !
सभ्यता,
-क्या महज़ एक प्याज है ,
जिसमें बस छिलके ही छिलके होते हैं ?
जिसे छीलकर,
परत दर परत अनावरित करते हुए,
बदले में बस तिक्त आँसू ही आँखों से टपकते हैं ?
मैं यहाँ किस असमंजस में हूँ ?
-असमंजस क्यों है ?
मैंने सिर्फ एक गिलास शुद्ध, साफ़,
स्वच्छ जल ही तो माँगा है !!

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October 31, 2010

॥ *श्रीशिवपञ्चाक्षर *स्तोत्रम्‌* ॥

श्रीशिवपञ्चाक्षर स्तोत्रम्‌


               ॐ 
भूमिका :
सर्वस्याश्च देवताया: चत्वारि रूपाणि
भवन्ति  : 
             एकमाध्यात्मिकं .
             अन्यदाधिभौतिकं.
             इतरदाधिदैविकं.
             परं मन्त्रात्मकं .
सभी देवताओं के चार स्वरूप होते हैं .
अर्थात् उनकी उपासना इन चारों में 
से किसी भी एक या अधिक रूपों में 
इष्ट देवता की तरह से की जा सकती 
है .
ये चार रूप क्रमशः 
           आध्यात्मिक,
           आधिभौतिक,
           आधिदैविक,
और,
           मंत्रात्मक 
होते हैं.
भगवान शिव का मंत्रात्मक स्वरूप है :
"नमः शिवाय "
यह उनका पञ्च-अक्षरात्मक मन्त्र 
स्वरूप है .
ॐ संलग्न करने पर यही षडाक्षरी
हो जाता है .
'न' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक 
प्रथम श्लोक है .
'म' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक 
द्वितीय श्लोक है.
'शि' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक
तृतीय श्लोक है .
'व' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक 
चतुर्थ श्लोक है .
एवं 'य' अक्षर से प्रारम्भ होनेवाला श्लोक,
पंचम श्लोक है .
इस प्रकार से शिव के मंत्रात्मक के अतिरिक्त
अन्य स्वरूपों का 'ध्यान' श्लोकों के माध्यम 
से किया जाता है .
प्रत्येक श्लोक के अंत में 'नमः शिवाय' के द्वारा 
इन सभी स्वरूपों की परस्पर अनन्यता ग्रहण
की जाती है .
इस प्रकार भावनायुक्त शिव-स्मरण के लिए यह
स्तोत्र शिव-भक्ति का श्रेष्ठ साधन है .   
          
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नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय ।
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय ।
तस्मै ’न’-काराय नमः शिवाय ॥१॥
मन्दाकिनीसलिलचंदनचर्चिताय ।
नन्दीश्वरप्रमथनाथ महेश्वराय ।
मंदारपुष्पसुपुष्पबहुपूजिताय ।
तस्मै ’म’-काराय नमः शिवाय ।।२॥
शिवायगौरीवदनाब्जवृन्द ।
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकंठाय वृषध्वजाय ।
तस्मै ’शि’-काराय नमः शिवाय ।।३॥
वशिष्ठकुंभोद्भवगौतमार्य ।
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय ।
तस्मै ’व’-काराय नमः शिवाय ॥४॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय ।
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्यायदेवायदिगम्बराय ।
तस्मै ’य’-काराय नमः शिवाय ॥५॥
पञ्चाक्षरं इदम् पुण्यं
यः पठेत्‌ शिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति 
शिवेन सह मोदते ॥
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                  ॐ
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October 22, 2010

’समय’ का सापेक्षता-सिद्धान्त

~~~~’समय’ का सापेक्षता-सिद्धान्त~~~~


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समय’ का ’सापेक्षता-सिद्धान्त
(सौजन्य : जया  श्रीनिवासन के लघु आलेख से प्रेरित) 


हमारे ’समय’ में समय रेंगता था ।
-कहते हैं दादाजी ।
पिताजी के समय में वह दौड़ने लगा था ।
और मेरे समय में,
समय उड़ने लगा है ।
मेरे बेटे के लिये समय सिमट गया है ।
वह जानता है कि ’मॉउस’ की एक ’क्लिक’
कितना ’डेटा’ ’डॉउनलोड’ कर सकती है,
-क्षणांश में !!
मेरा बेटा हो या किसी दिहाड़ी ग़रीब मज़दूर का बेटा हो,
उनका ’समय’ उन्हें लील रहा है,
’समय’ से बहुत पहले,
होते जा रहे हैं,
-परिपक्व,
जैसे कोई फल ’पक’ जाता है,
’ऑक्सीटोसिन’ की खूराक से,
’कार्बाइड’ के असर से,
एक ही रात में
-जिसे ’काल’ जल्दी ही खा लेना चाहता है,
’काल’,
-जो अपनी रफ़्तार में हर जगह पहुँच जाता है,
’डेटा’ की तरह,
बेटे समय से बहुत पहले,
-बूढ़े हो चले हैं,
-इस समय में ।  




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October 13, 2010

प्रीति का उल्लास

~~~~~~प्रीति का उल्लास ~~~~~~
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जानता हूँ,
कि तुम जो बहती हुई निर्झरिणी थी कभी,
जीवन की सख्त शीत में ,
जमकर बर्फ हो गयी हो !
और यह बर्फ हो गयी है सख्त चट्टान .
भूल से इसे ही अपना अस्तित्त्व समझकर,
अस्मिता बना लिया है तुमने !
लोग आते रहे, और इस झूठी अस्मिता को बचाने के लिए,
तुम और भी अधिक कठोर तीक्ष्ण होती चली गयी .
सख्त से सख्त, 
-शीशे सी पैनी,
पर भंगुर भी !!
तुम्हें लगता है कि मैं भी तुम्हें तोड़ने ही आया हूँ,
तुम्हारे समीप ,
कि तुम्हारे एक छोटे से टुकड़े को,
अपने ड्रिंक में डालकर,
अपने नशे का लुत्फ़ बढ़ाऊँ !
नहीं प्रिये !
मैं तो आया हूँ तुम्हारे समीप सिर्फ इसलिए,
कि पिघला सकूँ,
तुम्हें अपनी प्रीति की ऊष्मा से,
कर दूँ तुम्हें  पानी-पानी !
शापमुक्त कर बना दूँ तुम्हें अहिल्या,
ताकि तुम बह सको,
उन्मुक्त स्वच्छंद,
और मैं बह जाऊं,
तुम्हारी प्रीति में,
देवी !

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October 01, 2010

संदर्भ :"अब्बू की बकरियाँ"/अन्यथा.

यह कविता श्री गीत चतुर्वेदीजी के ब्लॉग पर प्रकाशित 
कविता "अब्बू की बकरियाँ"पढ़ते हुए मन में उत्पन्न हुई,
और कमेन्ट के रूप में पोस्ट की थी, आज दिनांक 
०१-१०-'१० को .
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    गीतजी,


कविता वही श्रेष्ठ होती है, जो पाठक को किसी अद्भुत्‌ अनुभूति
का साक्षात्कार करा दे. यूँ तो कवि के सिरे पर कविता का जो
भाव या अर्थ होता है, वह पाठक के सिरे पर आते-आते अपना
रंग-रूप, विन्यास बदल लेता है और फ़िर भी एक अमूर्त वस्तु
ही हुआ करता है, किन्तु वह पाठक में कोई प्रतिक्रिया भी जगा
सकता है, और वह प्रतिक्रिया पुनः एक कविता का रंग-रूप ले
सकती है .
आपकी कविता पढ़ते हुए लगा :


अन्यथा.




अब्बू के पास तीन ही बकरियाँ थीं /हैं /रहेंगीं.
एक लोहित,
दूसरी श्वेत,
और तीसरी कृष्ण वर्ण की,
अब्बू अनंत काल से चरा रहा है उन्हें .
चराता रहा था, /रहेगा.
बकरियाँ चरती हैं तृण,
देती हैं दूध,
जो लोहित, कृष्ण अथवा श्वेत नहीं होता.
कुछ पीताभ सा होता है.
तृण अन्न है, बकरियोँ का,
दूध अन्न है, अब्बू का,
बकरियाँ अन्न हैं,
-भेड़ियों का.
तो इसमें गलत क्या है ?
अब्बू कहता है अपने आप से,
"अन्नं न त्यजेत्‌ ।
तद्‌ ब्रह्म ॥"
भेड़िया भी तो अन्न है,
किसी व्याघ्र का !
तीन वर्णों वाली अजा,
घूमती रहती है,
अहर्निश,
अजा एका,
लोहित कृष्ण श्वेता .
अब्बू अज है,
अज और अजा,
सनातन.

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सादर,
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September 24, 2010

अहं-ब्रह्मास्मि अर्थात्‌ I AM THAT

~~~~अहं ब्रह्मास्मि~~~~
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~~~~I AM THAT~~~~













मेरे द्वारा अनुवादित यह पुस्तक,
चेतना प्रकाशन,
मुम्बई द्वारा वर्ष २००१ में प्रकाशित
की गयी थी.


अंग्रेज़ी में प्रकाशित 
" I AM THAT "
की हिन्दी प्रस्तुति.
विश्व की १७ से अधिक प्रमुख
भाषाओं में अनुवादित एक 
महाकृति जो अपने-आप में
एक अमर आध्यात्मिक 
रचना है . 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


(यह पुस्तक चेतना प्रकाशन, मुम्बई द्वारा प्रकाशित की गयी थी .
इसके लिये,
Chetana Pvt.Ltd.
34, K.Dubash Marg, Mumbai-400 001.
पर संपर्क कर सकते हैं).
सादर, 

August 25, 2010

॥ अतिथि तुम कब आओगे ? ॥

~~~~~ ॥ अतिथि तुम कब आओगे ? ॥ ~~~~~
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(Ode to a sparrow,
sitting on the window-sill)
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अतिथि  !!
जब भी खिड़की पर आते-जाते हुए,
-मैं तुम्हें देखता हूँ,
ठिठक जाता हूँ  .
और कभी-कभी तो,
घंटों प्रतीक्षा करता हूँ,
-तुम्हारे आने की .
खिड़की बंद करते हुए,
लगातार यह ख़याल आता रहता है,
कि बस तुम आ ही रहे होगे !
और खिड़की को बंद देखकर,
कहीं लौट न जाओ .
अतिथि, मैं तुम्हारी भाषा तो नहीं समझता,
लेकिन भाव-भंगिमा शायद पढ़ लेता हूँ .
फ़िर कुछ समय के लिए सुनता रहता हूँ,
तुमसे कुछ अबूझ, भेद-भरी बातें .
शायद मेरी बातें भी तुम्हें अबूझ लगती हों !
अतिथि,
तुम फ़िर कब आओगे ? 

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इस कविता को पढ़कर मेरे एक आलोचक मित्र ने इसे 
सुंदर सरल रचना कहा .
इसे पढ़कर मेरे एक सुहृद कवि मित्र ने कहा,
लगता है इसमें अतिथि ईश्वर को कहा गया है .
और मेरी एक परिचता बोली,
प्रेम में पगी एक कविता है यह .
'अतिथि' शब्द उसने शायद प्रेमी / प्रेमिका 
के अर्थ में लिया होगा . 
 
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August 16, 2010

सपना पिछली रात का

~~~~~~~~ सपना पिछली रात का ~~~~~~~~~
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कल रात,
फेसबुक पर मित्र से चैट करते,
नींद आने लगी थी .
मित्रों की भावनापूर्ण कविताएँ,
स्वतन्त्रता-दिवस की शुभ कामनाएँ,
और बधाइयों के बीच,
किसी ने पूछा था, -
'' वह सब ठीक है, बहुत ठीक,...
लेकिन आप देश या देशभक्ति के लिए,
क्या कर रहे हैं ?
सिर्फ बातें ?
भाषण ?
या किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल होकर,
-अपना उल्लू सीधा ! "
हाँ,
मानता हूँ मैं,
कि मेरा देशप्रेम बहुत छिछला है,
और इसीलिये,
मेरी नींद में कोई व्यवधान नहीं आया.
और सुबह-सुबह भोर के अँधेरे में मैं,
-उस समाधि पर जा पहुँचा,
जो किसी अज्ञात स्वतन्त्रता सेनानी की थी .
बस एक उजड़ी सी जगह थी,
एक ओटला,
-चबूतरा,
और पास में एक ऊँचा दरख़्त,
न जाने किस तरह,
-जैसे नींद में चलने की बीमारी से ग्रस्त,
कोई व्यक्ति,
कहीं से कहीं पहुँच जाता है !
कोई फ़कीर सा बैठा था वहाँ .
'' किससे मिलने आये हो ? ''
-उसने आँखों में आँखें डालकर पूछा .
'' आपसे  !''
-मैंने साहस के साथ जवाब दिया . 
''क्यों ?''
''कल सारे देश में आज़ादी की सालगिरह का 
...उत्सव मनाया गया,
और मुझसे किसी ने पूछा था कि मैं देश या देशभक्ति के लिए,
क्या-कुछ कर रहा हूँ !''
''तो, क्या कहा तुमने ?''
'' बस बगलें झाँकता रहा था .''
-मैंने ईमानदारी से कहा .
''बाबा आप यहीं रहते हैं ?''
''हाँ, फिलहाल .''
उसने उत्तर दिया .
''आप क्या कहते,
इस सवाल के जवाब में ?''
-मैंने सवाल उन पर दागा . 
''मैं,...?''
-वह अचकचाकर बोला .
''अभी तो मैं कैद हूँ,
लेकिन जल्दी ही रिहा हो जाऊँगा,
....''
''आप आज़ाद ही तो हैं, ...!''
अविश्वासपूर्वक मैंने कहा.
''हाँ, देह की कैद से आज़ाद ज़रूर हूँ,
लेकिन देश के लिए कुछ कर सकूँ,
 इसके लिए,
इंतज़ार कर रहा हूँ,
-एक नई देह की कैद का,
तब तक भटकता रहूँगा,
क्योंकि मातृभूमि पर प्राण न्यौछावर करनेवाले,
अमर हो जाते हैं,
और उन्हें मौत से खौफ नहीं होता.
सिकंदर और गौरी ,
मुगलों और अंग्रेजों के समय से,
मैं मरता रहा हूँ,
उनसे लड़ते हुए,
अपने वतन की हिफ़ाज़त करते हुए,
और ह़र बार धरती माँ मुझे एक नई देह दे देती है .
क्या तुम्हारे सवाल का जवाब तुम्हें मिला ?''
उसने कौतूहल से मुझे देखकर पूछा.
''लेकिन मैं तो ऐसा कहाँ कर सकता हूँ ?
मैं तो बीवी-बच्चों वाला एक अदना सा इंसान हूँ !''
मैंने सहमकर कहा.
''कोई बात नहीं, 
अगर तुम लालच न करो,
बेईमानी न करो,
रिश्वत लेने-देने का काम न करो,
तो क्या यह कोई कम देश-भक्ति है ?''
इतना भी काफी है .
नींद में ही चलकर अपने घर आकर,
और बिस्तर पर पुनः सो जाने के,
- कोई पंद्रह मिनट बाद,
 जब आँखें खुलीं,
 तो सूरज चढ़ आया था कमरे में .
सोचता हूँ ढूँढूँगा उस चबूतरे को कभी, 
दर्शन करूँगा उस अमर देशभक्त की समाधि के .


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August 03, 2010

आध्यात्मिक गुरुओं की सामाजिक भूमिका





आज के आध्यात्मिक गुरुओं पर लिखे गए एक लेख
पर मेरे द्वारा लिखी गयी एक टिप्पणी -


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आदरणीय,
 धर्म परंपरा और अध्यात्म के बारे में तो आम आदमी
गंभीरता से सोच-समझ सकता है और तथाकथित साधु,
महात्मा या विद्वान, तो फिर बुद्धिजीवी से ऐसी अपेक्षा करना
कठिन ही है
सिर्फ परंपरा की सीढ़ी चढ़कर स्वामी, आचार्य आदि का लेबल
पा लेना अधिकारी (पात्र) नहीं बनाता
और जिसे पात्रता ही नहीं है ऐसे ही लोग उपदेश देने लगें तो
समाज का अहित ही अधिक होगा
गीता में स्पष्ट किया गया है कि सात्विक बुद्धि ही धर्म क्या
है और अधर्म क्या है, -इसे समझ पाती है
इस कसौटी पर सभी तथाकथित विद्वान् आत्म-अवलोकन करें
तो वे ख़ुद भी दिशा पा सकेंगे,  दूसरों को भी शायद सही
राह बतला सकेंगे
दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अध्यात्म तो स्वयं की ही
उत्कंठा हो तो ही पाया जाता है इसे स्पून-फ़ीड नहीं किया
जा सकता -जैसी कि अब परंपरा बन चुकी है
सादर

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