October 31, 2009

त्वरित टिप्पणी -१/ (कविता)

त्वरित टिप्पणी -

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"इस दश्त में इक शहर था,... ... "
आज का अखबार,
रोज़ की तरह ,
'नया' है,
-ताज़ा !
बस 'बासी होने की 'प्रक्रिया' में है,
हो जाएगा थोड़ी देर में,
-'बासी',
आँगन में झर रहे हरसिंगार के फूलों की तरह,
-जैसे कि रोज़ हो जाया करता है ।
कल भी हुआ था,
-जब 'गुलाबी नगरी' में हुए,
'इंडियन ऑइल डिपो' के टैंकों में फूट पड़ी चिंगारी से उठी लपटों ने,
लील ली थीं कई जिंदगियाँ,
और कईको छोड़ दिया था,
अंधेरी ज़िंदगी जीने के लिए ।
याद आती है तीन-चार दिसंबर '८४
(पिछली सदी?)
की वह ठिठुरती सुबह,
जब ऐसी ही एक घटना भोपाल में हुई थी,
और हजारों जिंदगियाँ, ख़त्म हो गईं थीं ।
भोपाल भी एक खूबसूरत शहर है / था ।
क्योंकि हर शहर होता है खूबसूरत,
-
जब तक उसे कोई दूसरा 'दश्त',
चाहे कंक्रीट, गरीबी, या असंवेदनशीलता का ही क्यों न हो,
-ढँक नहीं लेता ।
कभी-कभी तो ज़हर या ज़हरीले धुएँ का !
और ज़हरीला धुआँ राजनीति की तरह,
हावी हो जाता है,
हवा में मौजूद,
'ऑक्सीजन' पर !
मैं नहीं कहता कि यह ग़लत है,
-या सही है,
यह तो बस एक 'त्वरित-टिप्पणी' है,
आज के अखबार पर,
आँगन में झर रहे हरसिंगार के फूलों पर,
एक तुच्छ, महत्वहीन टिप्पणी मात्र है यह !

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