October 26, 2019

आहटें

चाहतें और राहतें 
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जैसा कि पहले लिख चुका हूँ मेरा प्रायः पूरा ब्लॉग-लेखन केवल एक स्थान पर संजो रखने record के लिए सुविधा की दृष्टि से होता है। जब लगता है कि लिखने लायक कुछ नया है, तो ही लिखने का मन होता है। इसलिए लिखना एक चाहत (इच्छा) होती है, और वह चाहत कभी जितनी तेज होती है उससे कहीं अधिक तेजी से मन / ख़याल दौड़ता है, यहाँ तक कि मन में आई कोई बहुत महत्वपूर्ण बात लिखने से पहले ही खो जाती है।
और चूँकि लिखने की पहली वजह यही होता है इसलिए इस लिखे को कौन पढ़ता है, कोई पढ़ता भी है या नहीं, यह सवाल तो मन में कभी आता ही नहीं। दस साल पहले जब 'उन दिनों' लिखना शुरू किया था तब भी यही मानसिकता थी और आज भी यही है।
अख़बार या किसी पत्रिका में प्रकाशित होने के बारे में तो सोचता तक नहीं था क्योंकि हमेशा ऐसा लगता रहा कि जिन बातों को और जिन विषयों पर, मैं लिख रहा हूँ उनमें शायद ही किसी की कोई रुचि हो सकती है। हाँ, कभी-कभी जब लगता था कि ऐसा कुछ अनायास लिख सका हूँ, तो ज़रूर लगता था कि शायद कोई इसे पढ़ना पसंद कर सकेगा।
इस तरह लिखना चाहत से अधिक एक राहत भर रहा।
लिखने का सुख बस एक राहत भर रहा, जिसे हम मज़बूरी में स्वीकार कर लेते हैं।
किसी से 'जुड़ना' तो कभी सोचा ही नहीं था।
जुड़ना क्या सचमुच होता है?
हम या तो किसी ज़रूरत के लिए किसी से जुड़ते हैं या किसी माध्यम से जुड़े होने से उस माध्यम के बहाने किसी से जुड़ते हैं।  या तो हमें जो मिला होता है उसमें जो हमें सर्वाधिक आकर्षित करता है उससे जुड़ने लगते हैं, या जिसकी हमें ज़रूरत महसूस होती है उससे। 
लेखक और पाठक का संबंध कुछ ऐसा होता है जहाँ ऐसी कोई शर्तें शायद नहीं होतीं।  और जैसे और जहाँ भी इस तरह की शर्तें होती हैं वहाँ केवल तात्कालिक जुड़ाव होता है। हमारे तमाम सामाजिक, यहाँ तक कि पारिवारिक जुड़ाव भी इसी आधार से तय होते हैं। यह दोतरफा होता है।
यह जुड़ाव न सिर्फ व्यावहारिक बल्कि अपेक्षाकृत अधिक गहरे और मानसिक धरातल तक भी होने लगता है, क्योंकि इससे हमें सुरक्षा अनुभव होने लगती है। जैसे अपने पालतू कुत्ते या बिल्ली से हमारा जुड़ाव हो जाता है। परिवार और समाज भी ऐसा ही एक तरीका है जिसमें हमें न सिर्फ वर्तमान की, बल्कि काल्पनिक भविष्य की भी सुरक्षा महसूस होने लगती है। यहाँ तक कि हम भविष्य के इतने अधिक और परस्पर असामंजस्यपूर्ण  मानसिक चित्रों का कोलॉज बना लेते हैं कि उनकी विसंगतियों पर हमारा ध्यान तक नहीं जा पाता ।
किसी व्यक्ति, समूह, समुदाय, वर्ग, जाति, राष्ट्र, भाषा, आदर्श, राजनीति, साहित्य, संगीत, मज़हब, किताब, धर्म, विचार, सिद्धांत, शौक या रुचि से जुड़ाव में सुरक्षा मिलती हो या न मिलती हो, मिलती हुई दिखाई देने पर हम उन तमाम खतरों को नज़र-अंदाज़ कर देते हैं, जो उस प्रतीत होनेवाली तथाकथित सुरक्षा में हमारी आँखों से छिपे होते हैं।
सुरक्षा और सुरक्षा की चाह जीवन की बुनियादी ज़रूरतें हैं लेकिन चाह और चाहतें हमें सच्चाई को देख पाने में बाधक होती हैं। और तात्कालिक राहतें भी अक्सर एक छल हो सकती हैं, जिनसे हम अपने आपको धोखा देते रहते हैं।  जो वास्तव में ज़रूरी और किया जाना चाहिए उससे भागने के लिए हम इन चाह, चाहतों और राहतों का सहारा लेने लगते हैं।
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October 24, 2019

इबादत / यहाँ

आज की कविता
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एकमेवोऽअद्वितीयो 
यहाँ कौन  क्या है,
किसी का किसी से,
भी रिश्ता ही क्या?1
ख़ुद से ही जब तक,
ख़ुद का नहीं है,
ख़ुदा से भी क्या?2
ख़ुदा से भी अपना,
उसका कहाँ कोई,
भी रिश्ता है क्या?3
ख़ुद से ही नहीं जब,
जहाँ से भी कोई,
भी रिश्ता है क्या?4
अलावा, ख़ुदा के,
कहाँ कोई दुनिया,
या है कोई क्या?5
क्या शै ये दुनिया,
क्या कोई खुद भी,
सोचा है क्या?6
फिर क्या ख़ुदा है,
फिर क्या ख़ुदाई,
देखा है क्या?7
कहाँ फिर जहन्नुम,
कहाँ फिर है जन्नत,
है जाना कहाँ ?8
ख़यालों की जन्नत,
ख़याली जहन्नुम,
होती है क्या?9
जब तक तू ख़ुद है,
ख़ुदा से जुदा है,
कहाँ है कहाँ ?10
जब तक ख़ुदी है,
तब तक है ख़ुद भी,
ख़ुदा है कहाँ ?11
ख़ुदी जब मिटी तो,
ख़ुद भी मिटा ही,
ख़ुदा है यहाँ।12
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October 12, 2019

जुड़ाव / बिखराव

निरपेक्ष-सापेक्ष 
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कल रात्रि जब यहाँ क़रीब 9:00 से 9:30 के बीच का वक़्त था,
स्वीडन स्थित किसी पाठक ने इस ब्लॉग का अवलोकन किया।
वहाँ तब शायद संध्या के 4:00 से 6:00  के बीच का वक़्त रहा होगा।
जब  मेरे किसी ब्लॉग पर व्यूअर्स अचानक बढ़ जाते हैं तो मेरा ध्यान
इस तरफ जाता है। कल अचानक 87 page-views स्वीडन से ही इस
ब्लॉग के हुए ऐसा गूगल का कहना है।
पिछले 2 माह से अधिक समय से मेरे स्वाध्याय ब्लॉग के प्रतिदिन
500 से 1000 तक 'व्यूज़' दिखाई देते हैं। पाठक कितने होंगे, कहना
मुश्किल है।
फेसबुक अकाउंट डिलीट हुए एक साल हो रहा है।
twitter करीब दो साल पहले डिलीट कर चुका था।
सबसे बड़ी बात यह है कि किसी व्यक्ति-विशेष से जुड़ने / जुड़ाव की
आवश्यकता महसूस ही नहीं होती। इसका यह अर्थ नहीं कि किसी से
अलगाव है।
शायद उदासीनता है।
सोशल साइट्स से पूरी तरह दूर हो जाने बाद भी लिखने का शगल इस
तरह हावी है कि ब्लॉग एक सुविधाजनक सहारा है।
मैं नहीं जानता कि मैं कितना सारार्थक, सार्थक, निरर्थक या व्यर्थ लिखता हूँ,
लेकिन जब कोई मेरे लिखे को पढ़ने लायक समझता है तो थोड़ा आश्चर्य तो
होता ही है। और कौतूहल तो हमेशा ही होता है।
शायद कोई सूत्र होता है, जो जुड़ाव की वजह होता हो।
इसीलिए अब 'labels' का उपयोग करने की भी ज़रूरत नहीं रही।
क्योंकि किसी का ध्यान आकर्षित करना मेरे लेखन का लक्ष्य भी नहीं है।
और इसलिए मेरे लेखन में किसी की अनायास दिलचस्पी हो, तो वह मेरे
पुराने पोस्ट्स भी देख ही सकता है। 'labels' का प्रयोग मुझे किसी हद तक
अनावश्यक आत्म-प्रचार जैसा लगता है।
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October 09, 2019

होशियार ! ख़बरदार !

वहाबी और सहाफी 
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वहाबी यहाँ भी हैं,
वहाबी वहाँ भी,
ख़बरदार रहना,
जहाँ हों, जहाँ भी !
सहाफ़ी यहाँ भी हैं
सहाफ़ी वहाँ भी,
ख़बरदार रहना,
जहाँ हों, जहाँ भी !
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October 01, 2019

सोच बदलिए,

....
और,
जीवन में आगे बढ़िए !
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्ते पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।।
(ईशावास्य-उपनिषद्)
--
हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दैत्य-भाई थे।
हिरण्यकशिपु का अर्थ होता है स्वर्ण का तकिया।
कश अर्थात् निकष -- कसौटी, कोष, तिजोरी, संग्रह।
कशि-पु का अर्थ हुआ स्वर्ण की लालसा।
हिरण्य का अर्थ है स्वर्ण।
हि रणं यत् हिरण्यं तत् ..
के अनुसार जिसके कारण रण (युद्ध) होता है, वह (स्वर्ण) अवश्य ही रण है। 
हिरण्याक्ष का अर्थ हुआ जिसकी आँख स्वर्ण पर है।
पूषन् सूर्य का वह रूप है जिसमें पौष मास (दिसंबर तथा जनवरी माह) के आदित्य (सूर्य), पृथ्वी को अपनी रश्मियों से पोषित करते हैं। यही सूर्य स्वरूपतः अग्नि तथा यम हैं जो क्रमशः जीवन के लिए सहायक और जीवन तथा मृत्यु के नियंता के रूप में मृत्यु भी हैं। किन्तु वे इन तीनों रूपों में प्राणिमात्र के लिए कल्याण के लिए ही कार्य करते हैं।
पूषन् के आशीर्वाद से जीवन में मनुष्य को समृद्ध तथा ऐश्वर्य (संपत्ति तथा धन का स्वामित्व) प्राप्त होता है,
तो दूसरी ओर इसी स्वामित्व के साथ मनुष्य में गर्व तथा सुख की लालसा प्रबल होने लगते हैं ।
इस प्रकार सत्य का मुख एक आवरण से ढँका होता है, जिसे सामान्य मनुष्य नहीं देख पाता, -उसे इसकी कल्पना भी नहीं उठती। केवल अपनी या किसी दूसरे की मृत्यु आने पर ही कभी-कभी मनुष्य के सोच में बदलाव आता है, और जीवन में क्या पाया-खोया या क्या पाया-खोया जा सकता है, इस ओर उसका ध्यान जाता है।
हिरण्यकशिपु स्वर्ण  के तकिए पर सर रखकर सोता या उसे मसनद की तरह सहारा बनाकर बैठता था, ताकि कोई उसे चुरा न सके।
हिरण्याक्ष संसार में यत्र-तत्र स्थित स्वर्ण की खोज में लगा रहता था।
दोनों प्रायः अपने-अपने कर्तव्य की क्रमशः अदला-बदली करते थे।
इस प्रकार वे अपनी सोच तो निरंतर बदलते रहते थे और निरंतर आगे बढ़ते जा रहे थे।
इस बीच हिरण्यकशिपु को पुत्र-प्राप्ति हुई, तो उसने उसका नाम प्रह्लाद रखा।
आह्लाद तात्कालिक होता है,
प्रह्लाद अपेक्षाकृत स्थायी होता है।
जब हिरण्यकशिपु को पुत्र प्राप्त हुआ, तो उसे आह्लाद भी हुआ।
किन्तु यह सोचकर उसे भय हुआ कि मृत्यु अंततः उससे उसकी धन-संपत्ति और ऐश्वर्य (संपत्ति तथा धन का स्वामित्व) छीन लेगी।
इसलिए उसने तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और उनसे अपने लिए अमर होने का वरदान माँगा।
तब ब्रह्माजी ने कहा :
"मैं स्वयं भी इस दृष्टि से अमर नहीं हूँ कि अनंत काल तक बना रहूँ।
मैं स्वयं भी उपाधि-मात्र हूँ और वस्तुतः अमर तो श्री नारायण हरि हैं और तुम उनसे प्रार्थना कर यदि उन्हें प्रसन्न कर सको तो अमर होने का वरदान प्राप्त कर सकते हो।"
तब हिरण्यकशिपु के मन में श्री नारायण हरि से वैरभाव उत्पन्न हुआ।
फिर हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से वरदान माँगा कि कोई मनुष्य अथवा पशु उसे न मार सके,
उसकी मृत्यु न तो दिन के समय हो और न रात्रि के समय हो।
ब्रह्माजी ने हँसकर तथास्तु कहा और अंतर्धान हो गए।
उधर हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के मन में भगवान् श्री नारायण हरि की अहैतुक कृपा होने से उनके प्रति अगाध भक्ति का उदय हुआ और हिरण्यकशिपु के मन में अपने पुत्र के प्रति इसीलिए वैरभाव बढ़ने लगा।
तब हिरण्याक्ष तो हिरण्यकशिपु की सारी धन-संपत्ति (स्वर्ण) छीनकर समुद्र में जाकर पाताल चला गया, 
किन्तु हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को मार डालने के यत्न में जुट गया।
एक दिन इसी प्रकार उसने क्रोध के आवेश में प्रह्लाद से कहा :
"आज मैं इस तलवार से तुम्हारा वध कर दूँगा, कहाँ हैं तुम्हारे भगवान् श्री नारायण हरि जो तुम्हारी रक्षा करेंगे?"
तब प्रह्लाद ने हँसकर उत्तर दिया :
"पिताजी आप मेरा वध करना चाहें तो मेरा शीश सहर्ष आपके सामने झुका हुआ है क्योंकि मेरे और त्रैलोक्य के एकमात्र परमेश्वर और स्वामी भगवान् श्री नारायण हरि सर्वत्र हैं, और आपमें तथा आपकी आज्ञा में, आपकी तलवार में भी हैं।"
तब हिरण्यकशिपु क्रोध से अंधा हो गया और महल के एक खम्भे की ओर संकेत कर प्रह्लाद से पूछा :
"क्या वे इस स्तम्भ में भी हैं ?"
तब प्रह्लाद ने सहजता से उत्तर दिया
- "अवश्य !"
तब हिरण्यकशिपु बोला :
"ठीक है, मैं इसका ही वध कर देता हूँ। "
जैसे ही उसने अपनी तलवार का एक आघात खम्भे पर किया, वैसे ही वह खम्भा बीच से टूट गया, और उसके मध्य से भगवान् श्री नारायण हरि  मनुष्य के धड़ पर सिंह के मुख और हाथ-पैरों को लेकर प्रकट हुए।
उस समय सूर्य अस्ताञ्चल को जा रहे थे। तब न दिन का समय था न रात्रि का समय था।
सिंह के मुख और हाथ-पैरों, तथा मनुष्य के धड़ के रूप में प्रकट भगवान् श्री नारायण हरि की नृसिंह आकृति न तो किसी पशु की थी, न किसी मनुष्य की।
प्रह्लाद ने देखा कि उसके पिता को उस नृसिंह-आकृति भगवान् श्री नारायण हरि ने अपनी गोद पर रखकर अपने तीक्ष्ण नखों से उसके पेट को विदीर्ण किया और उसकी आँतें बाहर निकालकर उन्हें चीर दिया।
तब प्रह्लाद ने भगवान् श्री नारायण हरि के रूप में आए यमराज की वन्दना कर अपने पिता की मृत्यु के अनन्तर उनकी आत्मा की सद्गति के लिए इस प्रकार से प्रार्थना की :
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि।।      
(ईशावास्य-उपनिषद्)
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इसे मैं अपने स्वाध्याय ब्लॉग में लिखना चाहता था, फिर सोच बदला और यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। जीवन तो स्वयं ही आगे ही आगे बढ़ता है इसलिए समय के साथ सोच बदलना तो स्वाभाविक ही है, लेकिन हमारा सोच किस प्रयोजन से प्रेरित है इस बारे में ध्यान देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि वह लोभ, भय या निरंतर सुख की कामना और किसी विशिष्ट क्षेत्र में सफलता के आकर्षण से प्रेरित है तो उससे आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि हम उन तमाम तथाकथित महान लोगों के जीवन पर गौर करें और देखेँ कि क्या केवल अत्यंत अधिक सुख, सफलता, समृद्धि आदि पा लेना ही जीवन का अंतिम और पर्याप्त एकमात्र ध्येय हो सकता है?
या हमें जीवन में कुछ और चाहिए, और वह कैसे और कहाँ से मिलेगा?  
--
(कल्पित)
  

September 23, 2019

कविता / 23.09.2019

मिलना / कविता 
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किसी भी शख़्स से कभी,
जब एक बार मिलता हूँ,
होता है वो पहला मिलना,
होता है आख़िरी मिलना।
और भूल जाता हूँ उसको,
पर कोई याद नहीं बनती,
यूँ कि पहचान नहीं बनती,
जैसे अपनी भी नहीं है मेरी।
क्या ये याद, ये पहचान भी,
सिर्फ हादसा ही नहीं होता?
जो अगर हो ही न कभी तो,
कोई पहचान भी नहीं होता।
उस अजनबी से फिर मिलना,
क्या अजीब दासताँ नहीं है ?
और, राहत है कितना सुकून,
कि उससे कोई वास्ता नहीं है।
फिर ज़रूरत कहाँ पहचान की,
कोई तय शक्ल भी इंसान की,
क्योंकि हर शक्ल उसकी सूरत है,
जो कि सूरत भी है ईमान की।
कोई दुश्मन नहीं जहाँ कोई,
ऐसा होता हो ग़र जहाँ कोई,
क्या ज़रूरत किसी ख़ुदा की,
ख़ुद की पहचान नहीं, जहाँ कोई।
--

 

September 20, 2019

Blasphemy

बलात्प्रेमी 
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अपने भाषा-अनुसंधान में मुझे यह रोचक तथ्य मिला कि कैसे 'वल्क', 'वल्यते' से अंग्रेज़ी के 'value', 'evolve', 'वलित' से 'volt' और 'volt-face' की उत्पत्ति हुई।  इसी प्रकार 'लुच्'-- 'लोचयति'-- 'लोक' से VolksWagen नामक लोक-वाहन (van), vehicle को  नाम प्राप्त हुआ।
शायद इसी प्रकार 'ब्लॉग' / 'blog' शब्द प्रचलन में आया होगा।
वैसे संस्कृत भाषा में 'बलाका' कहते हैं वकपंक्ति को।
वक / बक कहते हैं बगुले नामक पक्षी को,
इसलिए बकवाद या बकवास दोनों मूलतः संस्कृत भाषा में भी अर्थ रखते हैं।
हिंदी में इन शब्दों का अर्थ होता है अनर्गल या अमर्यादित भाषण।
इस दृष्टि से कुछ राजनीतिज्ञों को 'blogger' की श्रेणी में रखना गलत न होगा।
और कुछ ब्लॉगर ट्वीट्स में भी ऐसा करते हैं।
केवल रोचक होने से ही सफलता या लोकप्रियता पा लेने को 'येन-केन-प्रकारेण' प्रसिद्ध होने का ही एक प्रयास कहा जा सकता है।
फूहड़ या अश्लील, द्विअर्थी तात्पर्य वाले वक्तव्य देना भी ऐसा ही है :
कभी शाम को आपने आकाश में बगुलों की ऐसी पंक्तियाँ देखी ही होंगी।
भ्रमवश कोई उन्हें हंसों की पंक्ति भी समझ सकता है। 
पर्याय से, imperatively; आसमान में चमकने वाली बिजली को भी बलाका कहा जाता है।
इसी तुलना से बलात् शब्द से दो अन्य शब्दों का साम्य दृष्टव्य है :
'blast' ( विस्फोट), और 'blasphemy' में पाया जानेवाला 'blas'.
'प्रेम' से fame और phem का साम्य भी दृष्टव्य है।
fame और 'प्रेम' भी एक दूसरे के पर्याय हो सकते हैं।
प्रेम की सिद्धि हो या न हो, प्रसिद्धि / बदनामी तो प्रायः हो ही जाती है।
'blasphemy' के लिए 'ईशनिंदा' शब्द का प्रयोग कहाँ तक स्वीकार्य है, यह सोचने की बात है।
चलते चलते :
सोचता हूँ:
"भाषा-अनुसंधान में 'साम्यवाद' का महत्त्व" विषय पर क्या कोई पोस्ट लिखी जा सकती है।
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September 14, 2019

14 सितम्बर 2019 / हिन्दी-दिवस

आज का दिन 
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हिन्दी-दिवस 14, सितम्बर 2019 की शुभकामनाएँ।
पिछले किसी पोस्ट में ग्रन्थ-लिपि के बारे में लिखा था।
यह उल्लेख किया था कि किस प्रकार मराठी और संस्कृत भाषाएँ जिस लिपि में लिखी जाती हैं उसी  देवनागरी लिपि में हिन्दी भी लिखी जाती है। और इससे तीनों ही भाषाएँ अधिक समृद्ध और प्रचलित हुई हैं।
इसी प्रकार अगर हिंदी-प्रेमी दूसरी सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी-लिपि में लिखने लगें तो उनके पाठक-वर्ग की वृद्धि ही होगी और वे भाषाएँ भी और अधिक बोली और समझी जाने लगेंगी।
अंग्रेज़ी के साम्राज्य को इसी तरह समाप्त किया जा सकता है।
यह इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि अंग्रेज़ी सभी भारतीय भाषाओं के प्रचलन के धीरे-धीरे कम होने की दिशा में अग्रसर है। इसके साथ यह भी संभव है कि केवल देवनागरी लिपि में ही अंग्रेज़ी को लिखे जाने का प्रयास किया जाए।
संक्षेप में : 
इस प्रकार अंग्रेज़ी पढ़ने-लिखने-बोलनेवाले अनायास इस लिपि के अभ्यस्त होने लगेंगे। यही बात उर्दू के लिए भी सत्य है। उर्दू का प्रचार-प्रसार भी इसे देवनागरी लिपि में लिखे जाने पर अधिक होगा।
किसी भी भाषा का प्रचार-प्रसार मुख्यतः तो उनके प्रयोग की आवश्यकता के ही कारण होता है, और किसी भी भाषा को समाज पर थोपा नहीं जा सकता। कोई भी मनुष्य जितनी अधिक भाषाएँ सीखने और इस्तेमाल करने लगता है, उसका मस्तिष्क उतना ही प्रखर और मेधावी होने लगता है।
भारतीय लोगों के पूरे विश्व में सर्वाधिक सफल होने का यही कारण है कि वे अंग्रेज़ी और किसी एक भारतीय भाषा के साथ साथ अनेक भाषाएँ जानते हैं। दूसरी ओर तमाम विदेशी जैसे रूसी, चीनी, जापानी आदि भी भारतीयों के मुकाबले इसीलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि अपनी भाषा के आग्रह के कारण वे अंग्रेज़ी और दूसरी भाषाएँ सीखने में कम रूचि लेते हैं।  भारतीय भले ही बाध्यतावश अंग्रेज़ी सीखते हैं किन्तु अंग्रेज़ी के शब्द मूलतः संस्कृत से उसी प्रकार व्युत्पन्न किए जा सकते हैं जैसे कि तमाम भारतीय भाषाओं के शब्द किए जा सकते हैं। 
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September 13, 2019

खाना-ब-दोश

कविता / 13/09/2019 
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भटकता है दर-ब-दर, ख़ाना-ब-दोश,
ढूँढ़ता है अपना घर, ख़ाना-ब-दोश!
कोई घर अपनों का, और हो अपनों सा,
कोई घर सपनों का, हो ख़ाना-ब-दोश!
कहाँ से आया था, कुछ याद नहीं आता,
कहाँ मिलेगा फिर, यह भी नहीं है मालूम,
भटकता है दर-ब-दर, ख़ाना-ब-दोश,
ढूँढ़ता है अपना घर, ख़ाना-ब-दोश!
ये रूह जो भटकती है, ख़ाना-ब-दोश!
उस रूह का पता कहाँ ख़ाना-ब-दोश!
क्या वो महबूबा है किसी महबूब की?
क्या वो महबूब है किसी महबूबा का?
है ये कैसी जुदाई, है ये तनहाई कैसी?
जिसकी है ये इन्तिहा, ख़ाना-ब-दोश!
क्या ये जिस्म ही नहीं है क़ैदे-हयात? 
क्या ख़यालो-तसव्वुर भी नहीं हैं क़ैद?
क्या रिश्ते नाते सब, यहाँ के पल दो पल,
कसमें वादे मुहब्बतें, भी क्या नहीं हैं क़ैद?
ये क़ैद से क़ैद तक भटकते रहना हरदम,
भटकते रहना है कब तक यूँ ख़ाना-ब-दोश!
भटकता है दर-ब-दर, ख़ाना-ब-दोश,
ढूँढ़ता है रूह का घर, ख़ाना-ब-दोश!
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August 31, 2019

इज्यते

अरबी, उर्दू, फ़ारसी, हिब्रू, संस्कृत
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'गीता-सन्दर्भ' मेरा एक और ब्लॉग है जिसे आप मेरी profile पर देख सकते हैं।
अपने भाषा-अध्ययन के अनुभव से मैंने पाया कि जहाँ तक हो सके, किसी भी भाषा का अध्ययन किसी दूसरी भाषा के माध्यम से नहीं किया जाना चाहिए। हर भाषा का अपना एक विधान होता है जिसे तब अनायास ग्रहण कर लिया जाता है, जब हम उस भाषा को सुनकर और व्यवहार में उसके प्रयोग को देखकर धीरे-धीरे उसकी सूक्ष्मताओं पर ध्यान देने लगते हैं।
इसलिए किसी भी भाषा को बिलकुल नए सिरे से सीखना सबसे बेहतर है।  वास्तव में तो भाषा का व्याकरण सीखने की ओर बहुत बाद में, तब ध्यान देना ठीक है, जब प्रयोग में लाकर, हम भाषा को किसी हद तक सीख चुके होते हैं।
व्याकरण का इतना ही उपयोग है कि भाषा की शुद्धता की परीक्षा की जा सके।
मैंने इसी प्रकार से संस्कृत का अध्ययन किया।  मेरा दावा नहीं कि मेरा संस्कृत भाषा का ज्ञान व्याकरण के नियमों के अनुसार शुद्ध है।
संस्कृत व्याकरण के नियमों और विशेषताओं को समझने से पहले मैंने संस्कृत के ग्रंथों को उनके मौलिक रूप में पढ़ना प्रारम्भ किया। मुझे भाषा से प्रेम था, और उसका अर्थ का मेरे लिए गौण महत्त्व का था।
इसलिए संस्कृत की समझ मुझमें वैसे ही आई, जैसे अपनी मातृभाषा को सीखते समय हम उसके अर्थ पर अधिक ध्यान दिए बिना ही उसे समझने लगते हैं। यह मातृभाषा कोई भी हो, बहुत बाद में जाकर अर्थ की गूढ़ताओं पर हमारा ध्यान जाता है।
संस्कृत का यथेच्छ और पर्याप्त, संतोषप्रद ज्ञान होने के बाद ही मैंने उसकी सूक्ष्मताओं पर ध्यान दिया। यहाँ तक कि व्याकरण और छंद-शास्त्र का अध्ययन तक न करते हुए मैं श्लोकों को लिखने / रचने लगा, -और तब जाकर मुझे व्याकरण और छंद-शास्त्र को समझने की आवश्यकता अनुभव हुई।
इसी प्रकार मैंने अंग्रेज़ी का अध्ययन किया।
शायद मैं उर्दू, फ़ारसी, अरबी, हिब्रू आदि का भी अध्ययन ऐसे ही कर सकता था, किन्तु उस विषय में मेरी एक समस्या थी। मुझे बार बार अनुभव होता था कि भाषा हमारी चेतना (मानसिकता, मनोविन्यास) को प्रभावित करती है, और चेतना भी भाषा को उसी तरह प्रभावित करती है। इसमें कुछ संशय मेरे मन में इसलिए भी था कि जिन भाषाओं से मेरा थोड़ा-बहुत परिचय था, वे सभी बाईं से दाईं और लिखी जाती हैं - जैसे कि अंग्रेज़ी, हिन्दी, मराठी, बाँग्ला, यहाँ तक कि  तमिळ, मलयालम, कन्नड, तेलुगु आदि भी। रशियन, फ्रेंच, जर्मन, यहाँ तक कि ग्रीक भी।
चूँकि मानव-मस्तिष्क में तंत्रिकाएँ (nerves) क्रमशः बाएँ और दाएँ हिस्सों (lobes) से निकलकर हमारे शरीर के क्रमशः दाएँ तथा बाएँ अंगों में फैलती हैं इसलिए यह अनुमान लगाया जाना विसंगतिपूर्ण नहीं है कि बाईं से दाईं ओर लिखी जानेवाली भाषाओं को प्रयोग करनेवाले तथा दाईं से बाईं ओर लिखी जानेवाली भाषाओं को प्रयोग करनेवाले लोगों की चेतना और मानसिकता में अवश्य ही कोई विशेष फ़र्क होता होगा।
(इसे और अच्छे तरह समझने के लिए श्री V.S.Ramachadran के कार्य के बारे में जानना सहायक हो सकता है। )
सभी भाषाएँ स्वतंत्र रूप से, बिना किसी अन्य भाषा के माध्यम से सीखने के अपने अनुभव में मैंने पाया कि किसी भी भाषा की रचना (structure) को अधिक अच्छी तरह से जानने के लिए यह ज़रूरी है कि उसे सीधे ही प्रयोग में लाने का अभ्यास किया जाना अधिक उपयोगी है।
बहुत बाद में हम अवश्य ही अनुवाद के माध्यम से अपने भाषा-ज्ञान को समृद्ध और शुद्ध कर सकते हैं।
ऊपर गीता का सन्दर्भ इसी परिप्रेक्ष्य में है।
गीता पढ़ते हुए मेरा उन अनेक संस्कृत शब्दों से परिचय हुआ जिनमें सीधे ही किसी दूसरी भाषा के विभिन्न  शब्दों के स्वरूप और उसी अर्थ की झलक भी देखी जा सकती है, जो उन भाषाओं में उनका अर्थ है।
उदाहरण के लिए अस्मि, अस्मद्, युष्मत्, आदि से I am, you, आदि तथा वयं से we त्वं से Thou, du (जर्मन) उल्लेखनीय हैं। तत् से the और that, तत्र से there, ...  
इस प्रकार का विधान जर्मन और किसी हद तक फ़्रेंच में भी पाया जाता है, जहाँ मूल प्रातिपदिक पद से उसका विभक्ति रूप बनाया जाता है।
ऐसा ही अनुभव आज तब हुआ, जब मैं 'इज्यते' शब्द के बारे में अपने गीता-सन्दर्भ ब्लॉग के नए पोस्ट में लिख रहा था।  मुझे याद आया कि अरबी भाषा के इज़्ज़त और इजाज़त शब्दों का इस्तेमाल अरबी भाषा में उसी अर्थ में होता है, जैसा कि इसे संस्कृत में किया जाता है।
भाषाशास्त्र के विद्वान् कुछ भी कहें, मुझे लगता है कि एक भाषा का मूल किसी दूसरी भाषा में खोजना और सभी भाषाओं का स्रोत किसी एक प्राचीन भाषा में खोजना मूलतः भ्रामक है। भाषाओं में परस्पर कोई गहरा संबंध है, इसमें शक नहीं किन्तु ऐसी कोई भाषा खोजना जो सब भाषाओं का मूल हो, व्यर्थ का हठवाद ही अधिक है।
मेरी अपनी मातृभाषा मराठी से मुझे यह लाभ हुआ कि मैं यह समझ सका कि किसी भाषा को एक से अधिक लिपियों में लिखने पर भाषा समृद्ध ही होती है। स्पष्ट है कि देवनागरी को अपनाए जाने से मराठी का कोई नुक्सान कदापि नहीं हुआ। इसी प्रकार उर्दू को हिंदी में लिखे जाने से उर्दू अधिक समृद्ध होकर और भी पहली-फूली। उर्दू के लिए अरबी लिपि का आग्रह ऐतिहासिक दृष्टि से ठीक हो सकता है, किन्तु इससे उर्दू की लोकप्रियता में कमी भी आती है। वास्तव में तमिल की भी यही स्थिति है।  जिन्हें तमिल आती है उन्हें तमिल के लिखित रूप और उच्चारण के बारे में कोई कठिनाई नहीं आती होगी, किन्तु यदि तमिल को उसकी ग्रन्थ-लिपि में भी लिखा जाए तो तमिल और भी समृद्ध ही होगी। इस प्रकार यह तमिल के लिए लाभ का ही सौदा होगा।  हाँ जिन्हें तमिल के प्रचलित रूप से संतोष है, वे इसका इस्तेमाल भी यथावत् करते रहें तो इससे धीरे-धीरे दूसरे भी ग्रन्थ-लिपि में रुचि लेकर उस ओर आकर्षित हो सकते हैं। 
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