September 13, 2019

खाना-ब-दोश

कविता / 13/09/2019 
--
भटकता है दर-ब-दर, ख़ाना-ब-दोश,
ढूँढ़ता है अपना घर, ख़ाना-ब-दोश!
कोई घर अपनों का, और हो अपनों सा,
कोई घर सपनों का, हो ख़ाना-ब-दोश!
कहाँ से आया था, कुछ याद नहीं आता,
कहाँ मिलेगा फिर, यह भी नहीं है मालूम,
भटकता है दर-ब-दर, ख़ाना-ब-दोश,
ढूँढ़ता है अपना घर, ख़ाना-ब-दोश!
ये रूह जो भटकती है, ख़ाना-ब-दोश!
उस रूह का पता कहाँ ख़ाना-ब-दोश!
क्या वो महबूबा है किसी महबूब की?
क्या वो महबूब है किसी महबूबा का?
है ये कैसी जुदाई, है ये तनहाई कैसी?
जिसकी है ये इन्तिहा, ख़ाना-ब-दोश!
क्या ये जिस्म ही नहीं है क़ैदे-हयात? 
क्या ख़यालो-तसव्वुर भी नहीं हैं क़ैद?
क्या रिश्ते नाते सब, यहाँ के पल दो पल,
कसमें वादे मुहब्बतें, भी क्या नहीं हैं क़ैद?
ये क़ैद से क़ैद तक भटकते रहना हरदम,
भटकते रहना है कब तक यूँ ख़ाना-ब-दोश!
भटकता है दर-ब-दर, ख़ाना-ब-दोश,
ढूँढ़ता है रूह का घर, ख़ाना-ब-दोश!
--





  

No comments:

Post a Comment