October 29, 2014

आज की कविता : आहिस्ता - आहिस्ता

आज की कविता : आहिस्ता - आहिस्ता
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सरकती जाए है पाँवों तले से ज़मीं आहिस्ता-आहिस्ता,
क़यामत को नज़र आने लगे हैं हमीं आहिस्ता-आहिस्ता ।
न पत्तों में है, न अब्र में और  न रही है आँखों में भी,
हवा में भी जो थी वो उड़ गई नमी आहिस्ता-आहिस्ता ।
कुछ अपने बाज़ुओं में थी कभी, कुछ हौसले जो दिल में थे,
वक़्त गुज़रते गुज़रते आ गई उनमें कमी आहिस्ता-आहिस्ता ।
शरमो-हया के तकल्लुफ़ के लिहाज़ के गिरते ही रहे हैं परदे,
इज़हारे-मुहब्बत की मुरव्वत की रौ थमी आहिस्ता-आहिस्ता ।
दिल डूबता है, डूब जाए हौले-हौले धीरे-धीरे आहिस्ता-आहिस्ता,
हो रहा है सबसे जुदा अब ख़ुशी हो या ग़मी, आहिस्ता-आहिस्ता ।
--©   

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर। लगता है आप इसे जगजीत सिंह की तर्ज़ पर गए भी सकते हैं

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    1. Thanks P.N. Subramanian Sir, Yes, the poem is on the famous lines of an Urdu poet I think Ghalib, but later on adopted by Amir Minai and sung by Jagjeet Singh ji, ...

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