October 02, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास / 29.

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास / 29.
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पिछले साल अक्तूबर के पहले हफ़्ते में एक स्वप्न देखा था ।
उस मैदान पर जहाँ सुबह-सुबह गाँधी-जयन्ती के कार्यक्रम चल रहे थे, दोपहर तक सन्नाटा फ़ैल चुका था । हाँ उस दोपहर में भी वहाँ अन्धेरा था । मुझे कुछ अजीब लगा कि आसमान में सूरज चमक रहा था, लेकिन जमीन पर नीम-अन्धेरा था । पर मुझे अचरज नहीं हुआ, क्योंकि मैं अपने शहर में दिन में कभी-कभी ऐसा महसूस करता हूँ जब अचानक बिजली चली जाती है । लेकिन मुझे तब जरूर अचरज हुआ जब कौओं को यह कहते सुना कि गाँधी बाबा की प्रतिमाएँ जगह जगह लगी होने से उन्हें अपनी चोंच को धारदार बनाए रखने में आसानी हो गई है । वहाँ स्थित गाँधीजी की प्रतिमा के चेहरे पर स्थित स्थायी मुस्कान कौओं की बातें सुनकर तब और अधिक खिल उठी । मुझे तुरंत स्पष्ट हो गया कि मैं यह सब किसी स्वप्न में ही देख रहा हूँ । और तभी मैंने बाबा को बोलते देखा ।
’हर साल का तमाशा है यह!’
वे सारे कौए बाबा को ध्यान से देख रहे थे ।
’बाबा हैप्पी बड्डे !’
 वे कोरस में बोले !
’उसे बीते हुए सवा सौ से भी ज्यादा साल बीत चुके,  मैं तो  सवा सौ साल तक ही जीने की उम्मीद करता था ।’
’लेकिन बाबा, सारी दुनिया आपको मानती है ।’
’ऐ तुम ! इधर आओ !’ वे इशारे से मुझे बुलाते हैं ।
मैं जो उनसे सौ फ़ीट दूर था, उनके नज़दीक पहुँच जाता हूँ । उनके चरणों और मेरे सिर के बीच कोई दस फ़ीट का फ़ासला है, क्योंकि उनकी प्रतिमा ही धरती से पन्द्रह बीस फ़ीट की ऊँचाई पर स्थापित है ।
वे पूछते हैं, :
’आज का अख़बार लाए ?’
 मैं अपनी गाँधी-थैली (शोल्डर-बैग) टटोलता हूँ, उसमें से एक अख़बार निकलता है, वैसा ही जैसा मेरी एम.एस-सी की डिग्री का कवर था । मैं सोचता हूँ यह तो डिग्री है । बाहर निकालता हूँ तो देखता हूँ वह डिग्री नहीं अख़बार है । सोचता हूँ, उसे उछालकर वैसे ही बाबा के पास पहुँचा दूँ, जैसे सुबह अख़बारवाला मेरे घर की दूसरी मंजिल की बालकनी में फ़ेंक जाता है ।
’नहीं नहीं, बस तुम जरा ऊँची आवाज में सुना दो कि इसमें क्या छपा है!’
’बाबा, इसमें पहले पूरे पृष्ठ पर एक बाइक का ऐड है, वैसे ऊपर दाहिने कोने में आपका फोटो भी पास-पोर्ट साइज़ का दिख रहा है । बीच में अख़बार का नाम है, बाँयी तरफ़ किसी सौन्दर्य-प्रसाधन का विज्ञापन है ।’
बाबा शान्तभाव से मुस्कुराते रहते हैं ।
जैसी की मेरी आदत है, मैं अन्तिम दो और प्रथम दो ’पृष्टों’ पर सरसरी निगाह डालकर उन्हें एक ओर फेंक देता हूँ, वैसे ही मैं यहाँ भी किया । फिर देखता हूँ, और उन्हें तमाम हालात बयान करता हूँ, जैसा कि अख़बार में छपा है । बाबा के चेहरे से मुस्कान ग़ायब हो जाती है । जब मैं उन्हें बतलाता हूँ कि आपके बारे में भी बहुत समाचार-विचार हैं और एक न्यूज़ यह है कि गुजरात के मुख्यमन्त्री ने आपके द्वारा लिखी गई भग्वद्गीता बराक़ ओबामा को गिफ़्ट की, तो उनके चेहरे से कोई प्रतिक्रिया नहीं प्रकट होती ।
’बाबा क्या आपकी शिक्षाएँ समझने में हमसे कोई भूल हुई?’
वे अपनी धोती में कमर पर खोंसकर रखी एक पुड़िया निकलते हैं और उसे खोलकर पढ़ते हुए से कहते हैं,
’मैंने कभी सपने नहीं देखे, जब तुम सपने देखते हो तब या तो सोए हुए होते हो या बस भ्रमित ।’
वे पुड़िया मेरी तरफ़ उछाल देते हैं, जिसमें बस दो तीन शब्द लिखे होते हैं,
सादगी, सरलता, निश्छलता, संवेदनशीलता , ....
मैं उनसे पूछता हूँ,
’क्या विकास, सबके लिए सुख, शान्ति, वैज्ञानिक और भौतिक उन्नति भी उतने ही महत्वपूर्ण नहीं हैं ?’
’हैं, लेकिन इनकी क़ीमत पर नहीं !’
मैं आगे कुछ सोचूँ इससे पहले ही मेरा स्वप्न भंग हो जाता है ।
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मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता जब ऐसे विचित्र स्वप्न दिखलाई दे जाते हैं । गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री (और आज के भारत के प्रधानमन्त्री) को अमेरिका के द्वारा वीसा दिए / न दिए जाने पर उन दिनों अख़बार में और ’मीडिया’ में भी काफी कुछ चल रहा था । और इसलिए सपने में यह देख लेना कि वे अमेरिका जाकर व्हाइट-हाउस में अमेरिका के राष्ट्रपति को महात्मा गाँधी की गीता भेंट कर रहे हैं शुद्ध कल्पना-विलास नहीं तो और क्या हो सकता था, जो मेरे स्वप्न में मुझे उस रूप में दिखाई दिया । किन्तु जब वास्तव में अभी दो दिन पहले समाचारों में यह पढ़ा कि सचमुच श्री मोदी ने श्री ओबामा को महात्मा गाँधी द्वारा लिखी गई भग्वद्गीता उपहार के रूप में भेंट की, तो अचानक पिछले साल के सपने की याद ताज़ा हो उठी । हलाँकि मुझे अभी भी इस बात पर सन्देह हो रहा है कि क्या सचमुच ऐसा हुआ या यह समाचार मेरी कल्पना मात्र है ? जो भी हो,...
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मुझे मेरे बचपन में पढ़ी वह अंग्रेज़ी कविता याद आई,
If the wealth is lost,
Nothing is lost,
If the health is lost,
Something is lost,
But if the character is lost,
Everything is lost,...
मैं सोचने लगा कि गाँधीजी की शिक्षा को न समझ पाना  (और समझने की इच्छा न होना) ही हमारी सबसे बड़ी भूल थी,  सचमुच हमने अपना आचरण चरित्र खो दिया है, और इसे हमने  किसी नैतिक-शिक्षा के अभाव से उतना नहीं बल्कि  सादगी, सरलता, निश्छलता, संवेदनशीलता , .... को खोने की क़ीमत पर खोया है ।
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