October 30, 2016

आज की कविता / दीप-ज्योति

आज की कविता / दीप-ज्योति
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साकार निराकार में घुलता हुआ,
निराकार साकार में खिलता हुआ,
रंग आकृतियों में पिघलता हुआ,
आकृतियाँ स्पर्श में फिसलती हुईं ।
स्पर्श सुरभि में उड़ते-उमड़ते हुए,
सुरभियाँ सुरों में उमगती-ढलती हुईं, 
सुर संगीत की स्वर-तरंगों में बहते हुए,
अनुभूति से हृदय तक पहुँचते हुए,
शब्दों के दीप जलें,
ज्योति-रश्मियाँ चलें,
तमस् भ्रान्ति शोक हरें
हृदयों में प्रेम पले !
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शुभ दीवाली !

October 11, 2016

आज की कविता / नारी

आज की कविता / नारी
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मूर्ति बनकर खड़ी हूँ झुककर तुम्हारे सामने
चिरकाल से श्रद्धावनत प्रियतम तुम्हारे सामने
संजोकर लाई हृदय वह कर दिया अर्पित तुम्हें
दीप कर के प्रज्वलित प्रस्तुत तुम्हारे सामने ।
तुमको माना परम प्रभु किंतु न जाना कभी
शीश यह था क्यों झुकाया मैंने शिला के सामने
यदि शिला भी आज होती पिघल जाती मोम सी
पर न तुम पिघले न टूटे पुरुष मेरे सामने !!
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October 09, 2016

समसामयिक

समसामयिक / आकलन
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वह कोई छोटा-मोटा पत्रकार है । मुझसे मिलना चाहता था । मैं पत्रकारों से थोड़ा बचता ही हूँ, क्योंकि राजनीति किसी भी रूप में मेरा कार्य-क्षेत्र नहीं है, पर बहुत आग्रह करने पर उसे समय दिया तो उसने सीधे-सीधे बिना किसी औपचारिकता के मुझसे कहा :
दो प्रश्न मेरे मन हैं :
1. क्या पाकिस्तान टूट रहा है?
और यदि इसका उत्तर ’हाँ’ है तो,
2. पाकिस्तान क्यों टूट रहा है?
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वह इतना पूछकर मेरे जवाब का इन्तज़ार करने लगा ।
बहरहाल मैंने इस बारे में सोचा और अपने विचार कुछ इस प्रकार से रखे -
इन दो प्रश्नों में से पहला तो एक सामान्य प्रश्न है जिसका जवाब शायद हर वह व्यक्ति अपने ढंग से दे सकता है जो अख़बार पढ़ता है, रेडिओ सुनता है, टीवी देखता है, या किसी काम से यहाँ वहाँ आता-जाता है । कुछ की नज़र में यह प्रश्न बस पाक-विद्वेषी किसी व्यक्ति के दिमाग़ में उठी खुराफ़ात भर है ।
सामान्य मनुष्य ’धारणाओं’ को हक़ीकत (यथार्थ) की तरह ग्रहण कर लेता है । हक़ीकत क्या है इसे जान पाना तो बहुत मुश्किल है क्योंकि जिसे हम हक़ीकत समझते हैं वह अवश्य ही किसी न किसी वस्तु, व्यक्ति, विषय, स्थान, विचार, घटना या समय के परिप्रेक्ष्य में हुआ करती है । और वस्तु, व्यक्ति, विषय, स्थान, विचार, घटना या समय इन सभी की प्रामाणिकता संदिग्ध है । इसलिए हम हक़ीकत (यथार्थ) को नहीं, बल्कि इन सबके संबंध में प्राप्त जानकारी और राय को हक़ीकत समझ बैठते हैं ।
’वस्तुएँ’ शुद्धतः ऐसे इन्द्रियगम्य भौतिक तथ्य होते हैं, जिनके बारे में भिन्न-भिन्न लोगों के बीच मतभेद नहीं होते । उनका भौतिक-सत्यापन भी किया जा सकता है । वे अनुकूल, प्रतिकूल, सुखद या दुःखद भी हो सकते हैं । किंतु वह गौण है । दूसरी ओर ’व्यक्ति’, ’विषय’, ’स्थान’, ’विचार’, ’घटना’ या ’समय’ अमूर्त धारणा होते हैं जो बुद्धि के कार्यशील होने के बाद ही अर्थपूर्ण / महत्वपूर्ण होते हैं । बुद्धिहीन मनुष्य को पशु कहने पर शायद ही किसी को आपत्ति हो । किंतु बुद्धि के सक्रिय होने पर बुद्धि पूरी तरह से दोषरहित और त्रुटिरहित हो, यह न तो सबके लिए संभव है न स्वाभाविक ही है । प्रायः व्यक्ति का वातावरण, परिवार, समाज, व्यवहार करने तथा सोचने की परंपराएँ बुद्धि को उसके अपने स्वाभाविक ढंग से विकसित नहीं होने देते । बुद्धि को हम ’मन’ भी कह सकते हैं, और यह बुद्धि या मन हमारे लिए एक अमूर्त धारणा के सिवा और क्या हो सकता है? क्या इस बुद्धि या मन की प्रामाणिकता हमारे लिए किसी भौतिक तथ्य की तरह निर्विवाद और सुनिश्चित हो सकती है? 'विज्ञान' इसकी प्रामाणिकता कैसे सुनिश्चित कर सकेगा? किंतु जिसे बुद्धि / मन कहा जाता है उसके व्यावहारिक प्रयोग से इनकार भी नहीं किया जा सकता । इस रूप में वह 'तथ्य' है । संक्षेप में, जैसे ज्ञानेन्द्रियाँ संवेदन के स्थूल यन्त्र होती हैं, वैसे ही बुद्धि / मन संवेदन के सूक्ष्म तल पर कार्य करनेवाले उपकरण होते हैं । बुद्धि / मन से जुड़ी हमारी प्रतिक्रियाओं को हम भावना (इमोशन / emotion ) और अनुभूति (फ़ीलिंग / feeling ) कह सकते हैं । इनके संयोग को भावनाशीलता / sentiments . भावना और अनुभूति के बीच एक बारीक अन्तर यह किया जा सकता है कि भावना हमारे हृदय में स्वाभाविक रूप से उठती और विलीन होती रहती है, जबकि अनुभूति किसी बाह्य क्रिया का संवेदन तथा उसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया होती है । यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होनेवाली बोधजन्य प्रक्रिया भी हो सकती है, या हमारे पूर्व अनुभवों की स्मृति से जुड़ी कोई जटिल प्रक्रिया भी हो सकती है । संचित अनुभव हमारी भावनाओं को विरूपित कर सकता है, और यदि हम इस बारे में सतर्क / सावधान नहीं हैं तो प्रायः कर ही देता है । इस प्रकार हमारी भावनाओं और अनुभूतियों का पारस्परिक व्यवहार हमारे बुद्धि / मन को और भी असंतुलित / अस्वस्थ/ रूपांतरित कर देता है । जिसका हमें अनुभव न हो उसके प्रति हममें कोई अच्छी या बुरी, सही या गलत भावना नहीं हो सकती । किसी वस्तु के संपर्क में आने पर, उसकी सुखद, दुःखद, प्रिय-अप्रिय अनुभूति ही हममें कोई भावना जगाती है । फिर इस अनुभूति की स्मृति और पुनरावृत्ति हमारे बुद्धि / मन में उस वस्तु के बारे में कोई पूर्वाग्रह स्थापित कर देते हैं । ऐसे असंख्य पूर्वाग्रह हमारे बुद्धि / मन को अत्यंत अव्यवस्थित, अस्थिर और विरूपित कर देते हैं और तब प्रतिक्रियास्वरूप असुरक्षा और भय की भावना हममें जन्म लेती है । तब हम ’अपने-जैसे’ प्रतीत होनेवाले लोगों में सुरक्षा और आशा की किरण देखते हैं । किंतु इसी आधार पर मानव-समाज में क्या ऐसे अनेक समुदाय भी अस्तित्व में नहीं आ जाते जिनके कुछ हित समान, तो दूसरे कुछ अनेक हित परस्पर विपरीत और विरोधी भी होते हैं ? परंपराएँ मनुष्य को वास्तव में क्या ऐसा ही कोई सुरक्षा-कवच प्रदान करती हैं, या वे केवल एक और नया अस्थायी विभ्रम भर होती हैं ?
क्या पाकिस्तान टूट रहा है?
’पाकिस्तान’ की धारणा का आधार ऐसे ही कुछ लोगों की सामुदायिक गतिविधि है, जो स्वयं को इस्लाम (नामक परंपरा) का अनुयायी कहते हैं । इसलिए पाकिस्तान (जिसे वे एक देश / राष्ट्र / नेशन कहते हैं) नामक राजनीतिक-सत्ता, उसकी मूल-शक्तियाँ, इस्लाम की परंपरा में ही हैं । अब यदि इस्लाम की परंपरा और इतिहास को देखें तो इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता अपने-आपको इस्लाम का अनुयायी घोषित करनेवाली सभी राजनीतिक सत्ताएँ निरपवाद रूप से विखंडित ही होती चली गईं  हैं । इस्लाम धर्म है या नहीं, यहाँ यह प्रश्न गौण है, इस बारे में यहाँ न तो कोई विचार, आकलन या विश्लेषण किया जा रहा है, न कोई निष्कर्ष या मत प्रस्तुत किया जा रहा है । यह स्पष्टीकरण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि यहाँ ’परंपरा’ के बारे में कहा जा रहा है, न कि इस्लामी या हिन्दू, जैन, बौद्ध या ज्यू या पैगन    .... और इसे उसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए । मूल विचारणीय प्रश्न यह है कि परंपरा के रूप में क्या इस्लाम में ही कहीं ऐसे कारक-तत्व (फ़ैक्टर्स) तो नहीं हैं जो इसे अपनानेवालों में, इसके अनुयायियों में, असुरक्षा और भय के, परस्पर विभाजन के बीज बोते हों? यदि इस प्रश्न पर विचार किया जाए तो शायद हमें ’क्या पाकिस्तान टूट रहा है’ इस प्रश्न को समझने में सहायता मिल सकती है । क्या इस्लाम (वह फिर धर्म या परंपरा क्या है, या दोनों है, या दोनों नहीं है, ... यहाँ इस बारे में न तो कोई मत दिया जा रहा है, न ही कोई प्रश्न उठाया जा रहा है ...) की स्थापना ही अलगाववाद की एक प्रखर अभिव्यक्ति की तरह नहीं हुई थी? क्या इस प्रकार यह समुदाय स्वयं ही अपने-आपको शेष विश्व से अलग-थलग नहीं करता रहा है? और क्या यह ’समुदाय’ वस्तुतः कभी एक छतरी तले आ भी सकता है?
और, क्या पाकिस्तान (नामक राजनीतिक-सत्ता जिसे कुछ लोग एक देश / राष्ट्र / नेशन कहते हैं) उसी क्रम की अगली कड़ी नहीं है?
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पर सोचता हूँ इसे कहीं ’आपत्तिजनक’ सामग्री तो नहीं कहा जाएगा?
बस इसीलिए ब्लॉग में पोस्ट करने के बारे में थोड़ा असमंजस है ।
... ...
        नमस्ते !

September 29, 2016

आज की कविता / बाल-लीला

आज की कविता
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बाल-लीला
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विषधर पयोधर पूतना के,
विष के कलश थे छलक रहे,
भुजदण्ड सर्पिल भुजंगों से,
मिलन के लिए मचल रहे ।
दृष्टि-शर विष-बुझे तीर,
श्याम-शिशु पर जब पड़े,
वात्सल्य की तरंग से,
विष-कलुष सारे धुल गए ।
श्याम के शिशु-स्पर्श से,
विष हुआ तत्क्षण अमिय,
पूतना की मुक्ति का,
उद्धार का बस यह रहस्य ।
हर नारी तब बनी गोपिका,
हर व्रज-ललना राधा हुई,
हर प्रीति ने पाया प्रियतम,
हर प्रेम तब हुआ पवित्र ।
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(देवास, 29-09-2016)

September 26, 2016

अपने-राम

अपने-राम
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कल आकाशवाणी पर एक अद्भुत् वक्तव्य सुना :
वे कह रहे थे :
"... ’धर्म-निरपेक्षता’ की परिभाषा को बहुत तोड़ा-मरोड़ा गया है ।"
अपने-राम वैसे तो राजनीति और धर्म के मामले में दखलन्दाज़ी करने से  बचने की भरसक क़ोशिश करते हैं, किन्तु भारत से प्रेम के चलते कभी-कभी झेलना असह्य हो जाता है । बोल ही पड़े :
"किस सफ़ाई से उन्होंने इस सवाल को उठने ही नहीं दिया कि क्या धर्म की परिभाषा को ही पहले से ही तोड़ा-मरोड़ा नहीं गया था? परंपराओं पर ’धर्म’ का लेबल किसने चिपकाया? कब और क्यों चिपकाया? उन्हें ’समान’ समझे जाने का आग्रह किसका था? परंपराएँ, - जिनके आदर्श, ’विश्वास’, ’मत’, उद्देश्य और आधारभूत सिद्धान्त, प्रवृत्तियाँ परस्पर अत्यन्त अत्यन्त भिन्न, यहाँ तक कि विपरीत और विरोधी हैं, उनके परस्पर समान होने का विचार ही मूलतः क्या एक भ्रामक अवधारणा नहीं है?"
वे कह रहे थे :
’धर्म-निरपेक्षता’ की परिभाषा को बहुत तोड़ा-मरोड़ा गया है ।
"किसने और कब और क्यों तोड़ा?"
यह प्रश्न हमारे मन में उठे, इससे पहले ही वे अपना वक्तव्य पूर्ण कर चुके होते हैं ।
वे कुशल राजनीतिज्ञ हैं इससे इनकार नहीं और कुशल राजनीतिज्ञ की यही पहचान है कि वह मौलिक प्रश्नों को दबा देता है, काल्पनिक (शायद ’आदर्शवादी’) प्रश्न पैदा कर लेता है और मूल प्रश्न से लोगों का ध्यान हटाकर काल्पनिक प्रश्नों और समस्याओं पर केन्द्रित कर लेता है । सभी कुशल राजनीतिज्ञ इस कला में निष्णात होते हैं ।
क्या राजनीतिक या कोरे बुद्धिजीवी, साहित्यकार, ’विद्वान’ तथाकथित ’विचारक’ और समाज में सफल कहे जानेवाले लोग कभी मूल प्रश्नों को सीधे देखने का प्रयास करते हैं?
वे किसी आदर्श, उद्देश्य, विचार / सिद्धान्त रूढ़ि, परंपरा से ही शक्ति प्राप्त करते हैं और उसी आधार पर अपनी ऊर्जा केन्द्रित करते हैं और किसी तरह जैसे-तैसे स्थापित हो जाते हैं । यदि वे ’असफल’ भी रह जाते हैं तो कहा जाता है कि उन्होंने अपना सब-कुछ संपूर्ण जीवन ही उस महान् उद्देश्य के लिए न्यौछावर, बलिदान, होम , कुर्बान कर दिया । 'त्याग' की उनकी मिसाल की राजनीतिक-प्रवृत्ति से प्रेरित कुछ दूसरे लोग फिर उनकी ’मशाल’ को जलाये रखते हैं । इस प्रकार अनेक भिन्न-भिन्न प्रकार की राजनीतिक प्रवृत्तियों की मशालें दिन-रात सतत जलती रहती हैं, और उन्हीं से हमारी दुनिया रौशन है, ... वरना तो हम अंधेरों में भटकते रहते !
अपने-राम सोचते हैं :
इस छोटी सी जिन्दगी में भजन करते हुए उम्र को जैसे-तैसे खींच ले जाएँ तो भी बहुत है ।
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September 17, 2016

हक़ीकत

हक़ीकत
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उम्र भर अंधेरों में ही भटकते रहे,
उम्र भर आँखें हमारी बन्द ही रहीं ।
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September 13, 2016

क्या आक्रामकता ’धर्म’ है ?

क्या आक्रामकता ’धर्म’ है ?
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हमारा देश धर्मप्राण प्रवृत्ति के लोगों से भरा पड़ा है । एक पत्थर किसी भी दिशा में फेंकते ही कोई न कोई ’धर्मप्राण’ उसकी चपेट में आ जाता है । किन्तु खेल-खेल में या परम कर्तव्य समझकर पत्थर उछालना / फेंकना कुछ लोगों के लिए यही धर्म होता है । किंतु चूँकि संस्कृत भाषा के व्याकरण का लचीलापन (वर्सेटाइलिटी / फ़्लेक्सिबिलिटी) हर किसी के अपना अर्थ निकालने की स्वतंत्रता का सम्मान करती है, इसलिए कुछ लोगों के मत में ’धर्मप्राण’ होने का अर्थ है ’धर्म के प्राण लेना’ । फिर यह धर्म अपना हो या पराया इस बारे में उनका अपना मत हो सकता है ।
इन दिनों भारत की विविधता में एकता की परंपरा का उच्च स्वरों में घोष करते हुए विभिन्न ’धार्मिक’-स्थलों पर अनेक आयोजन हो रहे हैं । ऐसे ही कुछ आयोजन मेरे घर के आसपास हो रहे हैं, जिससे मुझे कोई आपत्ति नहीं है किंतु उन उच्चस्वरों में लॉउड-स्पीकर से फ़िल्मी गानों की धुनों पर गाये सुनाए जानेवाले से धर्म के प्राणों की कितनी रक्षा होती है या संगीत और कला, भक्ति के माध्यम से प्राण लेने का उपक्रम किया जाता होगा, मैं नहीं कह सकता ।
मेरी समस्या यह है कि उन ध्वनियों में मेरे अत्यंत ज़रूरी फ़ोन की रिंग-टोन भी मुझे सुनाई नहीं पड़ती, और यदि अटैंड कर भी लूँ तो बात करना / सुनना मुश्किल होता है । ऐसे ही एक आयोजन के कर्ता-धर्ता से मैंने अपनी समस्या का उल्लेख किया तो (आक्रामक होकर) बोले : आप हिंदू हैं या मुसलमान ?
मेरा जन्म जिस परिवार में हुआ, समाज में उसे हिन्दू कहा जाता है । किंतु यदि मेरा जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ होता तो भी क्या मेरी यह समस्या (फ़ोन पर किसी से संपर्क करने में कठिनाई होना) समाप्त हो जाती ? क्या मेरी इस समस्या का संबंध मेरे हिन्दू या मुसलमान होने से है? इसलिए हिन्दू हो या कोई अन्य परंपरा, ’तकनीक’ का उपयोग कहाँ तक उचित है? धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर मनमानी छूट लेकर धर्म को अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए सहारा बनाना क्या धर्म है?
मान लीजिए मैं मुसलमान होता और ऐसे किसी आयोजन के कर्ता-धर्ता से अपनी समस्या कहता और वह इसे हिन्दू-मुस्लिम के चश्मे से देखता तो वह चाहे हिन्दू होता या मुसलमान, अगर मुझसे "आप हिंदू हैं या मुसलमान ?" यही प्रश्न करता, तो भी मेरी समस्या हल नहीं हो सकती थी ।
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September 07, 2016

रिश्ते !

रिश्ते !
कुछ दर्द दोस्त होते हैं,
कुछ दर्द होते हैं दुश्मन,
कुछ दोस्त दर्द होते हैं,
कुछ दोस्त होते हैं दुश्मन ।
दर्द से दोस्ती का यह,
दोस्त से दुश्मनी का,
दर्द से दुश्मनी का भी,
कितना अजीब नाता है !
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September 04, 2016

वृक्ष की संक्षिप्त आत्मकथा

वृक्ष की संक्षिप्त आत्मकथा
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कहीं भी जाने के लिए मैं हमेशा से ही इतना लालायित था कि एक पैर पर खड़ा तैयार रहता था, लेकिन दूसरा पैर न होने से कभी कहीं न जा सका । तब मैंने ढेरों पंख उगाए, पर तब तक जड़ें धरती में इतनी गहराई तक धँस चुकी थीं कि मैं धरती से उठ तक नहीं सकता था, उड़ना तो बस स्वप्न ही था । तब से बस यहीं हूँ ।
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September 01, 2016

2 छोटी कविताएँ

2 छोटी कविताएँ
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टकराते-टकराते,
टकराहट तक़रार ।
तक़रार से बेक़रारी,
रार, इक़रार, क़रार ।
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दो दिन तेरा-मेरा जीवन,
अनंत असीम पर प्यास,
जैसे क़श्ती, दरिया, सागर,
ढूँढे चंदा धरती आकाश !
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