March 08, 2015

आज की कविता

आज की कविता
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अनकिया का किया हो जाना,
अनकिया से किया हो जाना,
किया का पुनः अनकिया हो जाना,
अनकिया से किया हो जाना ...
अकर्म में कर्म देखता हूँ मैं,
कर्म में अकर्म देखता हूँ मैं,
कृष्ण जो कह रहे हैं गीता में,
धर्म का मर्म देखता हूँ मैं .
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© Vinay Kumar Vaidya,
(vinayvaidya111@gmail.com)

March 07, 2015

आज की कविता : ' अगर प्रेम कविता है! '

© Vinay Kumar Vaidya,
(vinayvaidya111@gmail.com)
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आज की कविता : 'अगर प्रेम कविता है!'
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अगर प्रेम 'कविता' है,
तो ठीक,
मैं बहस नहीं करूँगा,
मैं सिर्फ पढूँगा, सुनूँगा, गुनूँगा,
अगर प्रेम जड़त्व है ,
और भारीपन से भर जाते हैं लोग,
तो भरूँगा खुद को,
हो जाऊँगा इतना भारी,
कि धरती को भेदकर समा जाऊँगा,
उसके गर्भ में,
और,
प्रेम अन्धकार है ,
कि पार देखते ही डर जाते हैं लोग,
तो मैं डरूँगा,
या आँखें फाड़कर देखूँगा,
कि कहाँ तक है अन्धकार,
और उसके पार क्या है,
या कुछ है भी या नहीं,
अगर प्रेम  अवसाद है,
बुझे बुझे ही मर जाते हैं लोग ,
तो अवसन्न होकर मिट जाऊँगा,
जैसे शाम को उजाला मिट जाता है,
और अगर प्रेम उम्र का दलदल है,
तो डूबते-उतरते,
गिरते-पड़ते भी,
उभर आऊँगा,
जैसे सुबह उजाला लौट आता है,
और उबार लूँगा,
तुम्हें भी!
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March 04, 2015

हेतु और प्रयोजन

हेतु और प्रयोजन
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मनुष्य के लिए चार 'पुरुषार्थ' कहे गए हैं. 'धर्म' 'अर्थ' 'काम' और 'मोक्ष'
'धर्म' का तात्पर्य है जो सहज, स्वाभाविक रूप से प्राप्त हुआ कर्तव्य है जिसके न करने से मनुष्य का जीवन नष्ट के समान है, इस धर्म / या कर्तव्य में भी विहित, प्रासंगिक, काम्य, निषिद्ध और श्रेय ये पाँच प्रकार हैं. विहित - जो विधिसम्मत वर्ण-आश्रम-धर्म हैं, प्रासंगिक, जो परिस्थितियों के अनुसार उचित या अनुचित होते हैं, काम्य - जिनकी कामना होना स्वाभाविक ही है - जैसे दुःख के दूर होने और सुख तथा सबके कल्याण की कामना होना . निषिद्ध - जिनके करने से अपनी तथा दूसरों की भी हानि (हा > हानि >हेय = त्याज्य ) होती हो, अर्थात् मूलतः जिसमें हिंसा होती हो, श्रेय - जिनसे अपना तथा संसार का कल्याण हो.
'अर्थ'  का अर्थ है 'हेतु' और 'प्रयोजन' . 'हेतु' > 'हित' > 'धा' धातु के साथ 'क्त' प्रत्यय होने पर बना शब्द है . 'धा' अर्थात् जिसे धारण किया गया, पाया गया है .
'प्रयोजन' का अर्थ है 'उद्देश्य' अर्थात् 'उत्  + देश्य' जिसे आगे चलकर पाया जा सकता है,
 इसलिए 'प्रयोजन' भी 'हेतु' का एक तात्पर्य होता है, जैसे बीज वृक्ष और वृक्ष बीज होता है, इसका एक मतलब 'कारण' तथा 'कार्य' भी होता है .
'संपत्ति' चूँकि जीवन के सुखपूर्वक निर्वाह के लिए आवश्यक होती है, इसलिए 'गौण' अर्थ में 'संपत्ति' को 'अर्थ' कहा जाता है .
'अर्थ' शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से 'पुरुषार्थ' के लिए किया जाता है, जबकि 'गौण' / secondary रूप से धन के लिए.
संपत्ति / धन जब साधन होता है तब गौण अर्थ में, और जब साध्य होता है तो 'प्रयोजन' के अर्थ में.
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March 02, 2015

एक संस्कृत शब्द : 'वृत्तिः'

एक संस्कृत शब्द : 'वृत्तिः'
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'वृ' > 'वरण करना', हमारा मन जो एक चेतन-अवस्था है, जागृति, स्वप्न और गहरी निद्रा इन तीन स्थितियों में पाया / देखा / अनुभव किया जाता है . इनमें से जागृति ही एक ऐसी स्थिति है जब हम भूत और भविष्य के बारे में अनुमान  कर सकते हैं, यह अनुमान स्वयं उस भूत और उस भविष्य से बिलकुल अलग एक तत्त्व है, जिसे चित्त कहा जाता है . चित्त भिन्न-भिन्न स्थितियों से गुज़रता रहता है . अर्थात् हमारा मन चित्त के रूप में भिन्न-भिन्न स्थितियों का 'वरण' करता और उन्हें त्यागता भी रहता है .अर्थात् इस प्रकार से चुनने और छोड़ने के पहले भी अस्तित्व में होता है . 'वृत्' > 'होना' . वह जो चुनता / छोड़ता है, जो पहले से ही विद्यमान है,  वह है हमारा मन जो एक चेतन-अवस्था है. वृत् > वृत्तिः होती है . वृत्ति परिवर्तनशील है, जबकि 'वृत्' > 'वृतम्' / 'वृतः' स्थिर आधार है . परिवर्तनशीलता में भी पुनरावृत्ति की संभावना होती ही है .  इसलिए मन की स्थिर अवस्था को चित् / चेतना (अर्थात् बोध) और परिवर्तनशील स्थिति / चंचलता को चित्त  अर्थात् 'वृत्ति' कहा जाता है . यदि इस 'वृत्ति' को शांत कर दिया जाए, तो मन  के यथार्थ स्वरूप के रह जाने से 'वह क्या है?' इसका ज्ञान / बोध हो जाता है . यह ज्ञान कोई 'वृत्ति' नहीं बल्कि 'समझ' / 'समाधान' है . सामान्यतः हमारा मन 'वृत्ति' / किसी वृत्ति के उठने या शान्त होने के बीच की, अर्थात एक 'विचार' के उठने और विलीन होने के बाद दूसरे 'विचार' के उठने के बीच की 'अपनी' स्वाभाविक सहज स्थिति को नहीं देख पाता. और इसलिए एक वृत्ति के जाने के बाद 'दूसरी' के उठने पर उससे एकात्म हो जाता है, अर्थात् मन जो वस्तुतः 'दृष्टा' है, वृत्ति से सारूप्य स्थापित कर 'अपनी' पहचान कल्पित कर लेता है. किन्तु यह 'कल्पना' वृत्ति नहीं बल्कि कोरा अज्ञान मात्र है, जिसका निराकरण करने पर वृत्ति को भी नहीं पाया जाता .
योगशास्त्र में इसी तथ्य से पारंभ किया जाता है :
अथ योगानुशासनम् |
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः |
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् |
वृत्तिसारुप्यम् इतरत्र |
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February 27, 2015

एक संस्कृत शब्द, 'समाधानम्'

एक  संस्कृत शब्द,
'समाधानम्'
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Aa good word,
सं + आ + धान >
सं उपसर्ग becoms 'con'
-prefix as is in most of the English words,
beginning with 'con' 
सं उपसर्ग becoms 'syn' prefix as is in most of the English words,
beginning with 'syn',
'धा' उभयपदी धातु / क्रियापद verb-root है, 
परस्मैपदी - when the verb supports the object (कर्म)  of action  (क्रिया)
दधामि > मैं धारण करता हूँ ; अर्थात् सहारा देता / देती  हूँ  |
अहम् सोमं त्वष्टारम् पूषणम् भगम् दधामि | 
अहम् विष्णुमुरुक्रमम् ब्रह्माणमुत प्रजापतिम् दधामि |
अहम् दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते | 
(देवी अथर्व शीर्षम् - मन्त्र 6 )
अहम्  राष्ट्री सङ्गमनी वसूनाम् चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् |
मम योनिर्महद्ब्रहम तस्मिन्गर्भम् दधामि अहम् |

आत्मनेपदी - when the verb supports the subject (कर्ता) of action (क्रिया)
धत्ते > आधत्ते - अपने लिए रखना 
दधे > मैं रखता / रखती हूँ | 
 >
 आधाय > आधार प्रदान कर ,
'आ' उपसर्ग, 'धा' आत्मनेपदी  धातु, 'क्त्वा' / 'ल्यप्' प्रत्यय > कृत्वा = करके, हत्वा = मारकर, भुक्त्वा = भोगकर विहाय = त्यागकर, विधाय > विधान कर, 
समाधाय = resolution / solution, 
समाधान (संज्ञा / noun)
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February 23, 2015

त्रासदी जीवन की!

त्रासदी जीवन की!
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© Vinay Kumar Vaidya,
(vinayvaidya111@gmail.com)
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(मेरी मूलतः अंग्रेज़ी में लिखी कविता,
"Tragedy of life"
का हिंदीरूपान्तर)
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जब हम जन्म लेते हैं,
और जी रहे होते हैं,
जब हमारे भीतर से उमगता है जीवन,
और होता है रूबरू,
हमारे बाहर के जीवन  से,
 तो हालाँकि दोनों ही,
एक ही जीवन के दो चेहरे होते हैं,
उस भीतरवाले के,
और उस बाहरवाले के बीच,
एक खेल शुरू होता है,
और परवान चढ़ता है.
आईने में उभरती,
अनेक छवियों के बीच,
वह भी जीवन ही है.
और हालाँकि,
ये सभी छवियाँ जीवन ही की होती हैं,
उनमें से हर छवि,
अपने-आपको एक व्यक्ति-विशेष,
और बाकी सबको 'एक संसार' समझती है .
जब हम जन्म लेते हैं,
यह छवि, -यह व्यक्ति,
मरने से डरता है,
जबकि वह जीवन,
जो हमारे भीतर,
हमारी अपनी छवि बनता है,
न तो कभी जन्मा होता है,
और न कभी जनता है,
-किसी मृत्यु को.
और इसकी सीधी सी वज़ह,
सिर्फ यह होती है,
कि मृत्यु हो जाने पर,
कोई मृत्यु को नहीं जान सकता,
और न ही कोई मृत्यु को,
मृत्यु होने से पहले कभी .
किन्तु फिर भी इंसान,
इंसान की तरह,
'अपने' संसार' में,
रोज़ रोज़ जागते और सोते हुए,
मृत्य को सच मान बैठता है.
अपने को एक व्यक्ति मानकर.
और हालांकि,
ऐसा कोई 'संसार' दर-असल कहीं नहीं होता,
जैसा कि भूल से,
व्यक्ति मान बैठता है,
जैसा कि अपनी कल्पनाओं और अनुभूतियों से,
उनकी स्मृतियों के धागों से,
असंख्य रूप-रंगों, और डिज़ाइनों में,
अनेक आकारों-प्रकारों में,
बुन लिया करता है,
और कर लेता है यकीन,
स्मृति से उपजी अपनी उस,
स्वरचित दुनिया को पूरा सच.
भूल जाता है,
कि ऐसी कोई दुनिया,
यक़ीनन कहीं नहीं है,
और न हो सकती है.
न तो मृत्यु, और न ही,
किसी ख्वाहिश का पूरा न हो पाना,
या अपने भीतर कुछ मर जाना,
कोई त्रासदी है जीवन की,
अगर कोई है, या हो सकती है,
तो बस यही एक त्रासदी है,
कि हम भूल जाते हैं,
और फिर याद भी नहीं कर पाते,
कि न तो हमारा कभी कोई जन्म हुआ था,
और न किसी रोज़ हम मर जाएंगे!
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© 



  








February 22, 2015

आज की कविता -- फिर भी यह तथ्य है!

© Vinay Kumar Vaidya,
vinayvaidya111@gmail.com
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आज  की कविता
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फिर भी यह तथ्य है!
(मूलतः अंग्रेजी में लिखी मेरी कविता,
"It is still a fact "
 का हिंदी रूपांतरण )
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फिर भी यह तथ्य है !
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फिर भी यह  तथ्य है,
कि हम  कभी  तथ्य  का सामना नहीं करते.
और सिर्फ़ इसलिए,
क्योंकि हम  तथ्य  को देखते  तक नहीं .
और शायद ही कभी  हम,
उसे  जानने का प्रयास करते हैं.
और, जैसे ही, जिस क्षण भी,
वह हमारे समक्ष अवतरित होता है,
सर्वथा नग्न, अनावृत,और अपरिभाषित,
तत्काल ही उस पर हम,
एक आवरण  फेंक देते  हैं,
उसे हम एक शब्द भी कहने का,
मौक़ा तक नहीं देते.
और यद्यपि वह,
शब्द का उच्चार तक नहीं करता,
और शब्दों से कुछ कहता भी नहीं,
उसके पास फिर भी छिपाने जैसा भी,
कुछ नहीं होता.
वह जो कुछ भी है,
साक्षात् होता है.
वास्तविकता का सदैव प्रकट,
उज्जवल प्रकाश-मात्र.
और यदि हम पल भर भी चुप रह सकें,
तो तथ्य के रूप में विदा हो,
लौट जाया करता है,
उसी वास्तविकता में,
वह जिसका प्रकाश है.
बहा ले जाता है अपने साथ,
अपनी रौ में, हमें भी.
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और यद्यपि,
वास्तविकता जैसे कभी नई,
या पुरानी भी नहीं  होती,
तथ्य  भी वैसे ही,
कभी पुराना नहीं होता.
सदा ही नया होता है वह भी.
- वास्तविकता की ही तरह.
उसकी ही तरह वह भी,
न तो एक होता है,
-न ही अनेक.
किन्तु हमारा तर्क,
और हमारी टिप्पणी,
अकस्मात् ही उसे खंडित कर देती है,
बहुत से, विविध और असंख्य रूप देकर,
बाँट देती  है, टुकड़े-टुकड़े !
क्या यह आश्चर्य नहीं है,
कि कल्पना कैसे तथ्य को,
फ़ौरन ही नया जामा पहना देती है!
बदल देती है उसे,
ले जाती है हमें,
अराजक संघर्षपूर्ण संसार में.
जबकि तथ्य का मौन दर्शन,
हमें वास्तविकता से जोड़ देता है.
कल्पना से परे और पूर्व की वास्तविकता से,
हम जिसके आलोक-मात्र हैं.
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February 20, 2015

~~ जे.कृष्णमूर्ति ~~ (-1.)

~~ जे.कृष्णमूर्ति ~~(-1.)
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"The number-system was invented'"
मेरी छत पर खुलनेवाले दरवाजे पर एक बच्चे ने  चॉक से सुन्दर अक्षरों में लिखा है .
मैं सोचने लगा  कि 'invented' को काट कर  'discovered' लिख दूँ .
मुझे अक्सर अनुभव  होता है कि  हमें जो शिक्षा दी जा रही  है उससे हमारा अज्ञान और जटिल, तथा घना होता  जा रहा है . हम  भले ही 'शिक्षित' हो  जाएँ, न तो हमारी संवेदनशीलता का विकास  होता है न भावनात्मक रूप से परिपक्वता आती  है . बल्कि हम  और ज्यादा व्याकुल, त्रस्त  और भ्रमित  होते जा रहे हैं . इसकी एक वज़ह
यह हो सकती  है  कि हमें जिन लोगों से शिक्षा प्राप्त हो रही है, वे भले ही किसी हद तक बुद्धिमान भी हों, उन्हें केवल 'जानकारी-आधारित' शिक्षा ही प्राप्त होती रही  है . 'सूचना' / information को 'ज्ञान' समझ लेना ही आज शिक्षा का एकमात्र अर्थ रह गया है . यद्यपि सभी शिक्षक ऐसे ही होते हैं, यह सोचना भी अनुचित होगा .
'invent' का मतलब होता है, - निर्मित करना, बनाना . 'discovery' का मतलब होता है, - 'आविष्कार करना'.
जिसका आविष्कार किया जाता है वह पहले से ही होता है, बस उसे अप्रकट से प्रकट रूप में लाया जाता है . संक्षेप में, यंत्र का निर्माण / योजना की जाती है, अस्तित्व के मूलभुत नियमों का आविष्कार किया जाता है, हालाँकि प्रचलित अर्थ में, और व्युत्पत्ति की दृष्टि से भी  'आविष्कार' शब्द का प्रयोग  'निर्माण' (devise) के अर्थ में भी किया जाता है, जो शायद गलत भी न होता हो.
इसलिए यन्त्र के निर्माण के लिए तर्क शक्ति ज़रूरी होती है, जबकि विज्ञान या अस्तित्व / प्रकृति के नियमों को उद्घाटित करने के लिए प्रज्ञा और उससे भी पहले अवलोकन ज़रूरी होता है . इसलिए तर्क अवलोकन का विकल्प नहीं होता . अवलोकन को प्रज्ञा के माध्यम से अभिव्यक्त करने के बाद ही तर्क का प्रयोग संभव और उपयोगी होता है . इसलिए तर्क स्वयं भी एक तरीका (tool) है, जिसके प्रयोग के लिए प्रज्ञा ज़रूरी होती है . 'सूचना' को ज्ञान समझ लिए जाने पर  तर्क का इस्तेमाल करने में त्रुटि होने की संभावना बढ़ जाती  है और फिर अपने 'ज्ञान' को सही / सत्य समझे जाने का भ्रम और उसे दूसरों पर थोपने का आग्रह और प्रयास .
इसलिए अवलोकन और तदनुसार विवेचन ही तर्क का उपयुक्त और त्रुटिरहित आधार हो सकता है .
विवेचन अर्थात् 'तथ्य' का विवेकयुक्त चिंतन और 'तथ्य' के बारे में हमारे 'अनुमानों' की सत्यता की परीक्षा .
'तथ्य' क्या है? यहाँ हम देखते हैं कि तथ्यों की प्रतीति से उनके विषय में जो 'निष्कर्ष' प्राप्त किए जाते है, उन्हें अनुभव और प्रयोग की कसौटी पर कसकर ही 'सत्य' स्वीकार किया जाता है . इस पूरी प्रक्रिया में तर्क का अपना योगदान होता है . किन्तु 'तथ्य' के त्रुटिरहित अवलोकन के लिए तर्क क्या एक विक्षेप (distraction) और बाधा (hurdle) ही  नहीं होता?
तर्क अर्थात् विकल्प और विचार, अवलोकन अर्थात् प्रत्यक्ष देखना, इन्द्रिय-ज्ञान, प्रत्यक्ष इन्द्रिय-ज्ञान में 'विचार' या स्मृति क्या एक विक्षेप और बाधा ही नहीं होती?
अवलोकन के साथ होनेवाले इन्द्रिय-ज्ञान से प्राप्त प्रतीतियों में दिखलाई देती विसंगतियों को दूर कर उनमें विद्यमान सुसंगाति (harmony) / एकरूपता (uniformity) खोज लेना ही तो विज्ञान का आधार है .
अवलोकन के लिए तर्क की आवश्यकता नहीं होती , जबकि उपयुक्त तर्क के लिए अवलोकन पूर्व-आवश्यकता है.
तथ्य क्या है?
जब इस प्रकार से अवलोकन द्वारा प्राप्त 'वैचारिक' निष्कर्षों को अनुभव की कसौटी पर बार बार जाँचा और सत्य पाया जाता है, तो 'निश्चयात्मक' तथ्य प्राप्त होता है . भौतिक वस्तुओं के सम्बन्ध में इसे अधिक स्पष्टता से और  सरलता से देखा और समझा / समझाया जा सकता है .
तथ्य क्या है?
'तथ्य' भी एक परिवर्तनशील वस्तु (phenomenon) ही तो है ! कुछ तथ्य पुनरावृत्ति-परक होते हैं कुछ तथ्य कभी एक रूप में ग्रहण किए जाते हैं, कभी 'होते' हैं,  कभी किसी अन्य समय 'नहीं होते' .
जैसे सूर्योदय या सूर्यास्त, आकाशीय पिंडों की गतिविधियाँ, हमारी 'भावनाएं', 'विचार', 'स्मृति' 'विश्वास', 'भय', 'आवेग', भूख-प्यास, निद्रा और जागृति . क्या  ये सभी भिन्न भिन्न स्तरों पर भिन्न भिन्न प्रकार के 'तथ्य' नहीं हैं?  विज्ञान के नियमों की तरह सुपरिभाषित भले ही न हों, किन्तु उनके अस्तित्व से कोई कैसे इनकार कर सकता है?
'स्थान' और 'काल', 'द्रव्य' और 'ऊर्जा', और  इस सब का अवलोकन करनेवाली 'चेतनता', क्या ये सब तथ्य नहीं हैं? और क्या प्रथम चार, अंतिम (चेतनता) पर ही आश्रित और अवलंबित नहीं हैं. बहुत से 'वैज्ञानिक' बुद्धिवाले भी यह दलील देते हैं कि 'चेतनता' पदार्थों के (रासायनिक प्रतिक्रियाओं, संयोग) परस्पर व्यवहार का परिणाम है, अगर ऐसा ही है, तो इस परस्पर व्यवहार के प्रमाण का क्या आधार होगा? और अगर वैसा प्रमाण नहीं है तो यह विचार, कि चेतनता पदार्थों के (रासायनिक प्रतिक्रियाओं, संयोग) परस्पर व्यवहार का परिणाम है, एक अप्रमाणित अनुमान ही तो हुआ .
स्थान और काल (दिक्काल) द्रव्य और ऊर्जा, ऐसे 'तथ्य' हैं, जिनके अध्ययन से उनकी आधारभूत, उनमें निहित, उनके रूप में व्यक्त, उन्हें संचालित करनेवाली एकमेव 'प्रज्ञा' के दर्शन अनायास हो जाते  हैं, क्या यह 'दर्शन' तर्क पर आधारित सत्य है? या यह तर्क 'दर्शन'  से उत्पन्न समझ है ?
यद्यपि उस 'प्रज्ञा' के स्वरूप के बारे में कुछ कहना कठिन है, किन्तु उसका अस्तित्व  निर्विवाद और असंदिग्ध , अकाट्य सत्य है, यह तो मानना ही होगा .
'तथ्य' परिवर्तनशील होते हैं, जबकि 'सत्य' निरंतर, सतत, अव्याहत, अजेय, अपरिवर्तनशील.
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क्या सत्य का संश्लेषण / विश्लेषण किया जा सकता है? स्पष्ट है कि सत्य न तो 'नया' हो सकता है, और न ही 'पुराना', वह तो सदा और सनातन है. जबकि 'तथ्य' नया या पुराना, या पुनरावृत्तिपरक हो सकता है, -और'असत्य' ? असत्य का अर्थ है ऐसी धारणा / विश्वास विचार / मान्यता जिसके सत्य या तथ्य होने की परीक्षा / जाँच नहीं की गई है. जब ऐसी जाँच की जाती है, तो यह मान्यता 'विचारमात्र' न रहकर या तो दूर हो जाती है, या तथ्य या सत्य के रूप में स्पष्ट हो जाती है . उदाहरण के लिए ईश्वर की धारणा या विचार. क्या ईश्वर को उसके बारे में हमारी कल्पना या विचार के अलावा किसी अन्य रूप में पाया जाता है? किसी ऐसे अनुभव-गम्य या बुद्धिगम्ये रूप में, जिसका आदान-प्रदान हो सके? सवाल यह नहीं है कि ईश्वर है या नहीं है, सवाल यह है कि ईश्वर क्या है?
(यहाँ यह उल्लेख रोचक होगा कि श्री जे. कृष्णमूर्ति की एक पुस्तक 'On God' के हिंदी में प्रकाशित अनुवाद का शीर्षक अक्षरशः यही है - ईश्वर क्या है?)
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February 17, 2015

आज की संस्कृत रचना

आज की संस्कृत रचना
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गौमेधम् यज्ञम् मुनयः
राजर्षयः अश्वमेधम् |
मेधितया मेधितव्यान्
यज्ञान् ब्राह्मणैः सर्वैः ||
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अर्थ :
कुछ मननशील मनुष्य  गौ के यथार्थ तत्व / स्वरूप पर अर्थात् 'ब्राह्मणे गवि हस्तिनी' (भगवद्गीता अध्याय 5, shloka 18 के अनुसार) ब्रह्मभावना से ब्रह्म-चिंतन और मनन करते हैं जो गौमेध-यज्ञ के समान है, कुछ राजर्षि अश्व के यथार्थ तत्व / स्वरूप पर (ऐतरेय-उपनिषद् / अध्याय 1, खण्ड 2, मंत्र 2 के अनुसार)
(ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति)
इस प्रकार से सभी ब्रह्मजिज्ञासु तथा ब्रह्मवेत्ता निरंतर यज्ञ में संलग्न रहते हैं .
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अन्याः मिश्रितकर्मिणः
अशुचयः मलिनमतयः |
नरमेध मनु युञ्ज्यन्ते
नरकाय वै ते नराः ||
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अर्थ :
(वहीँ दूसरी ओर) अन्य कुछ मलिन और अशुद्ध्बुद्धि वाले मनुष्य मनुष्यों की ह्त्या (को धर्म समझकर) मनुष्यों पर हिंसा में संलग्न रहते हुए नरकों के भागी होते हैं .
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