October 18, 2021

तीसरा और चौथा वहम

(पिछले पोस्ट से आगे) 

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आत्म-सम्मोहन 

उसे प्रत्यक्ष ही पता था कि वह है ।

फिर उसे यह वहम हुआ कि वह 'कोई' है और अपने इस 'कोई' होने की मान्यता उसमें गहरे पैठ गई। अपने आपके, फिर औरों की तरह, फिर भी उनसे कुछ अलग भी होने की दोहरी मान्यता ने उसे ग्रस लिया । उसे पता ही नहीं चला कि इस मान्यता ने उसे किन क्षणों में मोहित कर लिया। 

इसी तरह उसे यह वहम हुआ कि वह अपने आपको जानता भी है। फिर उसे यह भरोसा हुआ कि वह सुखी-दुःखी, चिन्तित होता है। उसे नींद आती है, या नहीं आती, या कि बहुत नींद आती है, या कि ठीक से सो भी नहीं पाता। उसे यह या वह कार्य करना है, या नहीं करना है, वह करना चाहता है, या नहीं करना चाहता, या कि करने के लिए बाध्य, सक्षम या अक्षम है। 

इस प्रकार से उसमें ज्ञान का भ्रम पैदा हुआ, और बहुत सी बातें  जानने का भ्रम भी। इस प्रकार, जानने का यह क्रमशः भ्रम दृढ होता चला गया, लेकिन इस तथ्य पर उसका ध्यान नहीं जा पाया कि मूलतः उसे ज्ञान नहीं, ज्ञान का भ्रम है। पर फिर जब उसका ध्यान इस पर गया तो उसे लगा कि दूसरों की ही तरह वह स्वयं भी तो अज्ञानी ही है! तब फिर ज्ञान अर्जित करने के लिए वह जी-जान से प्रयास करना प्रारम्भ हुआ। किन्तु जब उसे लगा कि ज्ञान तो अनन्त है, और इसे प्राप्त करने के लिए उसे पता नहीं कितना समय लगेगा, और कितने जन्म लेने पडे़ंगे, तो हताशा ने उसे जकड़ लिया। 

किन्तु जैसा कि कहते हैं :

"Every dark cloud had a silver ring around it... "

उसे यह भी समझ में आया और इस भ्रम पर उसका ध्यान गया कि ज्ञान, और ज्ञान का भ्रम दोनों ही अज्ञान के ही दो प्रकार हैं, तो उसमें ऐसा उल्लास उठा, जिसने इस तथाकथित ज्ञान और अज्ञान का, तथा उस भ्रम का भी ध्वंस कर दिया। यह ध्वंस का उल्लास था।

तब उस ध्यान में उसे अनायास ही यह भी स्पष्ट हुआ कि उसकी तमाम परिचय, मान्यताएँ, विश्वास और सन्देह, जन्म और मृत्यु, ईश्वर, मोक्ष, आयु, संबंध भी केवल कोरी कल्पनाएँ ही हैं, और यह कल्पनाएँ भी जिसमें उठती और मिटती रहती हैं, वैसा कुछ, या वह, 'कोई' नहीं है।

अर्थात् उसका ऐसा कोई और कुछ, कहीं नहीं है, जिससे उसका कोई संबंध हो, या हो सकता है। हाँ, पर अनेक वस्तुओं, चीजो़ं, लोगों और घटनाओं से उसका सामना अवश्य, और सतत होता रहता है, किन्तु वह स्मृति जिसमें उनका बनना-मिटना होता है, वह स्मृति तक भी, उसकी अपनी कहाँ है?

तब उसने अपनी उस आत्मा को पुनः एक बार जान लिया, जो  कि इस आत्म-सम्मोहन से मोहित और दुविधाग्रस्त हुई थी।

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