October 17, 2021

वह और वहम

मैं और अहम् / Ego and I. 

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उसे एक नहीं, दो वहम हैं,

पहला : "कोई रिअलाइज्ड है!"

दूसरा : "मैं रिअलाइज्ड नहीं हूँ!"

लेकिन उसे इस बारे में कोई वहम / शक / गलतफहमी नहीं है, कि वह है, उसका अस्तित्व है। उसे इस बारे में भी कोई वहम / शक / गलतफहमी नहीं है कि उसे अपने होने का, अस्तित्व का, भान है। 

पर उसका ध्यान कभी इस ओर नहीं गया, और न ही किसी ने उसका ध्यान इस ओर ध्यान आकर्षित किया कि अपने होने का और अपने होने के इस भान का क्या तात्पर्य है / हो सकता है !

उसने हमेशा कुछ करना चाहा, पर वास्तव में उसे क्या करना है, क्या करना चाहिए, और क्यों करना चाहिए, क्या नहीं करना है, क्या नहीं करना चाहिए, और क्यों नहीं करना चाहिए, इस पर उसका ध्यान हमेशा ही हुआ करता था। 

अपने होने के, और अपने होने के भान का तात्पर्य क्या है, इस पर उसका ध्यान न जाने से उसे यह गलतफहमी हो गई थी कि वह कुछ करता है, नहीं करता, कर सकता है, या कि वह कुछ नहीं कर सकता।

उसने हमेशा कुछ पाना चाहा, पर वास्तव में उसे क्या पाना है,  क्या पाना चाहिए, और क्यों पाना चाहिए, उसे क्या नहीं पाना है, क्या नहीं पाना चाहिए, और क्यों नहीं पाना चाहिए, इस पर भी उसका ध्यान हमेशा ही हुआ करता था। 

अपने होने के, और अपने होने के भान का तात्पर्य क्या है, इस पर उसका ध्यान न जाने से उसे यह गलतफहमी हो गई थी, कि वह कुछ चाहता है, नहीं चाहता, चाह सकता है, या कि वह कुछ नहीं चाह सकता। 

उसने हमेशा कुछ बातों / वस्तुओं / चीज़ों को 'अपना' मान लिया, या अपना बनाने का प्रयास किया, लेकिन इन बातों / वस्तुओं / चीज़ों / से उसका क्या संबंध हो सकता है, हो भी सकता है या नहीं, इस ओर कभी उसका ध्यान गया ही नहीं, न किसी ने इस ओर उसका ध्यान आकर्षित किया । इन बहुत सी बातों / वस्तुओं / चीज़ों में से कुछ तो एकदम ऐसी ठोस और  उपयोग में भी आनेवाली वास्तविकताएँ थीं, जिनकी सत्यता व्यावहारिक, इन्द्रिय-ग्राह्य और स्वतः-सिद्ध थी, जबकि कुछ दूसरी ऐसी भी थीं जिनका पता उसे बुद्धि, कल्पना और स्मृति के माध्यम से हुआ करता था। अर्थात् वे केवल बुद्धिग्राह्य थीं, वैचारिक, और शाब्दिक प्रकार की मनो-संरचनाएँ थीं, जिनकी प्रामाणिकता की परीक्षा करने की कल्पना तक उसे नहीं हो पाई थी।

लेकिन इनसे भी भिन्न कुछ ऐसी वस्तुएँ भी थीं, जो अनुभव-परक भावनाओं और भावनात्मक अनुभवों की तरह से उसे 'अपनी' प्रतीत होती थीं।

अनुभवपरक भावनाएँ तो वे थीं, जिन्हें कि फ़ीलिंग्स कह सकते हैं, जबकि भावनात्मक अनुभव वे थे, जिन्हें इमोशन कह सकते हैं। इमोशन भीतर से उठते थे, जबकि फ़ीलिंग्स बाहर के प्रभावों की प्रतिक्रियाएँ, अनुभवों के प्रत्युत्तर। 

इन्हें सम्मिलित रूप में संवेदनाएँ या सेन्टीमेन्ट्स कह सकते हैं। इस प्रकार से सेन्टीमेन्ट्स की जटिलताओं का जोड़ ही उसका कृत्रिम / आभासी व्यक्तित्व था, जो कि उसे 'अपना' प्रतीत हुआ करता था। किन्तु उसका ध्यान इस ओर कभी न जा पाया कि यदि व्यक्तित्व 'उसका' है, तो वह कौन है, जिसे अपने व्यक्तित्त्व का पता है! क्या वह व्यक्तित्व है, या कि व्यक्तित्व का स्वामी!

और शायद ही कोई दूसरा इस ओर उसका ध्यान आकर्षित कर सकता था। 

इसीलिए उसे ये दो गलतफहमियाँ थीं, दो वहम थे :

पहली यह कि दूसरा कोई और रिअलाइज्ड है, 

दूसरी यह कि वह रिअलाइज्ड नहीं है। 

इसीलिए उसने हमेशा किताबों में खोजा,  तमाम गुरुओं से पूछा कि मुझे रिअलाज़ेशन कब और कैसे होगा।

उसे यह वहम भी था कि रिअलाज़ेशन कोई नई जानकारी है,  जिसे प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु उसे यह जानकारी नहीं थी, कि जिसे प्राप्त किया जाता है वह अवश्य ही खो भी जाता है।

क्या कोई कभी अपने-आपको खोज सकता है?

क्या कोई कभी अपने-आपको प्राप्त कर सकता है? 

क्या कोई कभी अपने-आपको खो सकता है?

क्या कोई कभी अपने-आपको जान सकता है? 

क्या कोई कभी अपने-आपको भूल सकता है?

उसके पास बहुत सी जानकारियाँ थीं, जो उसे ज्ञान प्रतीत होती थी। और उसे लगता था कि आत्म-ज्ञान भी कोई विशेष प्रकार की जानकारी है, जिसे प्राप्त कर लेने पर मनुष्य रिअलाइज्ड हो जाता है।

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