September 11, 2017

आज की कविता : गेय-अगेय संप्रेषणीय

आज की कविता 
गेय-अगेय संप्रेषणीय 

उसे शिकायत थी,
’आज’ की कविता से,
मानों ’आज’ कोई ठोस,
ज्ञेय, मन-बुद्धि-इन्द्रियग्राह्य,
हस्तान्तरणीय, विज्ञानसम्मत,
और सुपरिभाषित तथ्य हो,
कविता काल के पिंजरे में क़ैद,
कोई चिड़िया हो ।
हाँ कविता अवश्य ही,
एक चैतन्य और चिरंतन सत्ता है,
आकार-निराकार होने से स्वतंत्र,
और इसलिए कितने ही रूपों में,
अभिव्यक्त होती रहती हो,
उसकी सुचारु संरचना,
सुघड़ता, कितने ही आयामों में,
स्वर-क्रमों में निबद्ध होती हो,
निश्छल, छलशून्य होती है,
जिसे आप रच सकते हैं,आज की कविता
अपनी लय में,
छन्द-मात्रा-संगीत-स्वर-ताल,
की विशिष्ट मर्यादाओं में रहते हुए,
या उन अनभिज्ञ होते हुए भी ।
वह सदा गेय हो यह ज़रूरी नहीं,
जैसे भोर में चहचहानेवाली चिड़िया,
जिसके सुर कभी कर्कश, कभी मधुर,
कभी उदास, कभी आतुर,
कभी प्रसन्न, आर्द्र या शुष्क होते हैं,
चिर नूतन, चिर श्रव्य ।
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September 10, 2017

बहस करें या बस?

बहस करें या बस?
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धी अर्थात् ध् + ई, जो विशेष प्रयोजन के लिए बुद्धि का पर्याय है ।
धी जहाँ निधि, अवधि, विधि, शेवधि (तिजोरी) के रूप में स्थिरता की द्योतक है, वहीं बुद्धि अपेक्षतया गतिशीलता की, अस्थिरता की भी ।
इसी धी से उत्पन्न हुआ ग्रीक का ’थी’, ’थियो’ theo।
जैसे ’ध’ से धर्म, धर्म से ’थर्म’ therm,
’धी’ से ही ’थी’ theo , ’थियो’ और ’धर्म’ से ’थर्म’/ therm अर्थात् ’ताप’ हुआ ।
 ’धी’ से ही ’थीसिस’,’थीसिस’ से ’ऐन्टी-थीसिस’ और ’सिन्थेसिस’ हुए ।
धी > धिष् > धिषस् से भी थीसिस दृष्टव्य है ।
बहस की व्युत्पत्ति संस्कृत के ’व-ह-स’ से की जा सकती है, वहीं यह उर्दू में अरबी या फ़ारसी से आया ऐसा भी कहा जा सकता है ।
’ऐन्टी’ anti, एक ओर तो ’आन्तरिक’ के अर्थ में प्रयुक्त ’अन्तः’ से आया है, वहीं दूसरी ओर ’अन्त’ करनेवाले अर्थात् विरोधी या विपरीत के अर्थ में भी किया जाने लगा । इसी प्रकार ’ऐन्टी’ का ’अन्ते’ / ante के रूप में भी ’पूर्व’ के अर्थ में प्रयोग होता है ।
यहाँ वद् > वाद > विवाद और संवाद के संदर्भ में ’बहस’ के औचित्य के बारे में देखें ।
वाद का अर्थ है ’मत’ ’वादे-वादे जायते तत्वबोधः’ की उक्ति के अनुसार विभिन्न वाद मिलकर तत्व के निर्णय में सहायक होते हैं ।
किंतु एक विचित्र तथ्य यह भी है कि किसी भी वाद की अपनी सीमाएँ होती हैं इसलिए भिन्न-भिन्न वाद होने पर मतभेद भी हो जाते हैं । किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न हो तो मतभेदों को पुनः मिलकर सद्भावना से सुलझाया जा सकता है, किंतु पूर्वाग्रह होने की स्थिति में यह असंभव हो जाता है । क्योंकि पूर्वाग्रह कोई मान्यता होता है । क्या बिना किसी मान्यता के कोई मत हो यह संभव है? जब हम ईश्वर या जीवन जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं तो इनके अभिप्राय के बारे में हममें उतनी ही स्पष्टता होती है जितनी हममें तब होती है जब हम धरती, आकाश, मनुष्य, भूख, प्यास, डर, नींद, और सोने-जागने आदि जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं । क्या तब इन वस्तुओं, घटनाओं या स्थितियों के बारे में हममें कोई मान्यता या मतभेद होते हैं? स्पष्ट है कि न हममें इनके बारे में कोई ’मान्यता’ होती है, (और इसलिए) न कोई पूर्वाग्रह होता है ।
किंतु जब किसी कार्य को किए जाने का प्रश्न होता है तब उसे कैसे किया जाए उसके औचित्य और अनौचित्य तथा उसके परिणाम आदि पर हममें प्रायः कोई न कोई आग्रह अवश्य होते हैं । इन आग्रहों के बारे में यदि परस्पर मिलकर विचार-विमर्श किया जाए तो संभवतः किसी एक निर्णय पर सहमत हुआ जा सकता है ।
इस प्रक्रिया को थीसिस-ऐन्टीथीसिस-सिन्थेसिस thesis-antithesis-synthesis कहा जा सकता है ।
यदि बहस इस प्रकार की गतिविधि है तो वाद-विवाद-संवाद का यह प्रकार थीसिस-ऐन्टीथीसिस-सिन्थेसिस thesis-antithesis-synthesis कहा जा सकता है । तब बहस की उपयोगिता पर प्रश्न नहीं उठाये जा सकते ।
बहस बस वहीं तक होनी चाहिए।
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भीड़ में अकेला आदमी

आज की कविता
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भीड़,
कितनी भी अनुशासित क्यों न हो,
अराजक और दिशाहीन होती है ।
भीड़ की संवेदनाएँ तो होती हैं,
भीड़ में समवेदनाएँ कम होती हैं,
भीड़ का कोई तंत्र नहीं होता,
भले ही भीड़ का नाम,
’देश’, ’राष्ट्र’ ’वाद’,’संस्कृति’,
’समाज’, ’समुदाय’ ’भाषा’,
'संस्था', 'सरकार', प्र-शासन,  
'दल', 'वर्ग' या ’धर्म’
'मज़हब' 'रिलीजन',
'रूढ़ि', 'ट्रेडिशन'  क्यों न हो।
अकेला आदमी भीड़ के लिए,
कुछ नहीं कर सकता ।
इससे भी बड़ा सच यह है;
कि भीड़ भी अपने लिए,
कुछ नहीं कर सकती ।
हाँ अपना सर्वनाश,
अवश्य कर सकती है,
लेकिन वह तो वैसे भी,
उसकी नियति है ।
इसलिए वह उससे,
बच भी नहीं सकती ।
और भीड़ है सिर्फ़,
अकेले आदमियों का समूह!
... तो हम क्या कह रहे थे?
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September 08, 2017

हाथी और चीटियाँ

आज की कविता
हाथी और चीटियाँ
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हाथी बहुत समझदार तो होते ही हैं,
उनकी याददाश्त भी तेज होती है ।
फ़ूँक-फ़ूँक डर-डर कर क़दम रखते हैं,
कहीं चीटियाँ, दबकर मर न जाएँ!
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इरमा !

आज की कविता
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इरमा !
नाम कितना सुन्दर लगता है न!
इरा और रमा का पर्याय,
इरा जो रमा है,
रमा, जो इरा है,
इरा ऐरावत सी,
इरावती सी,
ऐरावत,
जो इरा सा,
रमा जो चञ्चल,
अस्थिर,
केवल सुषुप्त हरि के चरण सहलाती,
किंतु वही इरा,
और वही रमा,
जब हो जाती है,
ऐरावत सी निरंकुश,
देती है पहले तो चेतावनी,
पर कर देती है सर्वनाश भी,
यदि उसकी संतान दुष्ट हो,
न करे उसका सम्मान,
हो उठे निरंकुश !
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September 07, 2017

Russia.

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Glad to see there are readers of this Hindi Blog-post in Russia.
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सिलसिला-ए- सियासत

आज की कविता
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सिलसिला-ए- सियासत
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अहसास फ़रेब है किसी और का, ख़ुद के लिए,
अहसास तमाशा है ख़ुद का किसी और के लिए,
क़त्ल का मातम तो है, मातम भी एक जश्न तो है,
बना लेते हैं वो, जश्न को मातम, मातम को जश्न ।
किसी का क़त्ल हुआ है, किसी ने क़त्ल किया है,
जब तलक राज़ है पोशीदा मना लेंगे जश्न या मातम,
राज़ खुलने तक तमाशा करेंगे तमाशाई तमाशबीन,
बस यूँ ही चलता रहेगा सिलसिला सियासत का ।
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September 05, 2017

पञ्च-सीलानि pañca-sīlāni

भूमिका 
फ़ेसबुक के मेरे पेज पर 23  अगस्त 2017 को मैंने भूटान-तिब्बत-भारत की सीमा पर डोकलाम में भारतीय और चीनी फ़ौज़ों के युद्ध के लिए तैयार स्थिति में होने पर लिखा था :

पंचशील के सिद्धान्त को तो चीन ने तभी दफ़ना दिया था जब उसने ल्हासा पर अधिकार कर लिया और दलाई लामा को भारत भागने पर मज़बूर कर दिया, जिन्हें भारत ने शरण दी थी ।
आज जब शी जिनपिंग (习近平, Xi Jinping), का यह वक्तव्य पढ़ा कि चीन चाहता है कि वह पंचशील के  मार्गदर्शन में भारत से संबंध सुधारे, तो मुझे याद आया और मेरा यह विश्वास और भी दृढ़ हुआ कि वास्तव में कोई ब्रह्माण्डीय ’बुद्ध-चेतना’ संसार के लिए मार्गदर्शन दे रही है ।
यदि चीन वास्तव में ईमानदारी से इस प्रेरणा पर अमल कर सकता है, तो वह वास्तव में आज भी विश्व-विजेता बन सकता है और पूरी दुनिया के लोगों के दिलों को जीत सकता है लेकिन यदि उसके दिल में कपट है (जैसा कि पिछली सदी छठे दशक में था), तो इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती ।
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पञ्च-सीलानि
pañca-sīlāni 
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पञ्चशील का सिद्धांत
(मौलिक रूप)
बुद्ध-प्रणीत  
(बौद्ध धर्म के अनुसार) 
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पाणादिपाता वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...१.
(मैं प्राणियों की हिंसा नहीं करूँगा।)
अदिन्नादाना वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...२.
(जो मुझे दिया नहीं गया है, उसे मैं (बलपूर्वक) नहीं लूँगा।)
कामेसु मिच्छाचार वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...३
(मैं व्यभिचार नहीं करूँगा। )
मूसावाद वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...४
मैं मिथ्याभाषण नहीं करूँगा।)
सुरा-मेरय-मज्जा-पमादट्ठाना वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...५
मैं ऐसे मादक-द्रव्यों का सेवन नहीं करूँगा जिनसे मेरे चित्त में विकार उत्पन्न हो। ) 
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pañca-sīla -s The Five Precepts of Buddha
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pāṇādipātā verāmaṇi
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...1.
adinnādānā verāmaṇi
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...2.
kāmesu micchācāra verāmaṇi
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...3
mūsāvāda verāmaṇi
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...4
surā-meraya-majjā-pamādaṭṭhānā
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...5
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प्रसंगवश याद आया :
ये जो शहतीर है, पलकों पे उठा लो यारों,
अब कोई ऐसा तरीका भी निकालो यारों
दर्दे-दिल वक़्त पे पैग़ाम भी पहुँचाएगा
इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारों
लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे
आज सैयाद को महफ़िल में बुला लो यारों
आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,
आज सन्दूक से वो ख़त तो निकलो यारों !
(स्व. दुष्यन्त कुमार)
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September 03, 2017

मेरा मज़हब

आज की कविता
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मेरा मज़हब
मुझे किसी से नफ़रत नहीं,
इसलिए मैं ’किसी से नफ़रत मत करो’
का उपदेश या सलाह भी किसी को नहीं देता,
लेकिन अगर मुझे किसी से मुहब्बत नहीं,
तो मैं उससे मुहब्बत होने का नाटक क्यों करूँ?
क्या ऐसी मुहब्बत धोखा देना ही नहीं हुआ?
न सिर्फ़ उसे, बल्कि ख़ुद अपने-आपको भी?
जिसने मुझे बहुत तक़लीफ़ दी,
सिर्फ़ इसलिए जिसे मैं याद भी नहीं करना चाहता,
मैं उससे मुहब्बत होने का नाटक क्यों करूँ?
वैसे तो उससे मुझे नफ़रत कभी थी भी नहीं,
लेकिन उसने मुझे बहुत तक़लीफ़ देकर,
ख़ुद ही अपना दुश्मन बना लिया ।
मुझमें उसके लिए नफ़रत पैदा कर दी,
और जो अब मुझे मुहब्बत का सबक़ सिखा रहा है,
वह यह क्यों भूल जाता है,
कि दूध का जला छाछ भी फ़ूँक-फ़ूँक कर पीता है !
पहले झाँके वह ख़ुद के गरेबान में,
और खोज ले,
कि कोई किसी से नफ़रत क्यों करता है!
तब उसे किसी को,
मुहब्बत का सबक़ सिखाना ज़रूरी न रह जाएगा ।
कोई किसी से नफ़रत न करे यही काफ़ी है,
और न पैदा होने दे, दूसरों के दिलों में नफ़रत,
अगर इतना भी कोई कर सकता है तो,
ज़रूरी नहीं रह जाता मुहब्बत का सबक़ !
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जो अपने ’मज़हब’ को लादता है किसी पर,
ताक़त से, तलवार, प्रचार या धोखे से,
उसका क्या मज़हब है यह तो ज़ाहिर है,
जो मज़हब के नाम पर पैदा करे डर, नफ़रत,
उसका मज़हब से क्या वास्ता यह भी ज़ाहिर है,
और फिर वो ही देने लगे मुहब्बत का सबक़,
मन्दिर, मस्ज़िद, गिरजों के एक होने का सबक़,
उसपे तक़लीफ़ज़दा कोई भरोसा कैसे करे?
हाँ कोई बस, सिर्फ़ तकल्लुफ़ के लिए सुन लेगा ।
इससे दिलों में जमा नफ़रत न कभी कम होगी ।
कोई ऐसा तरीक़ा हो जिससे न हो नफ़रत पैदा,
सिर्फ़ दिखावे के लिए मत दो झूठे मुहब्बत के सबक़ ।
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ये मुहब्बत भी ले लो, ये नफ़रत भी ले लो,
भले छीन लो जात-ओ-मज़हब भी मेरा,
मग़र छोड़ दो मुझको मेरे दिल के हवाले !
न ख्रीस्त, हिन्दू, सिख, न मुसलमान होना !
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September 01, 2017

लीला

आज की कविता
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लीला
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शान्त जल, प्रवाह है ठहरा हुआ,
धरा ने जिसे बाँधकर रोक रखा है,
एक बच्चा फेंकता है एक कंकर,
और वह प्रवाह हो जाता है चंचल,
हर दिशा में भागता है लहर होकर,
लौट आता है पुनः पुनः पर केन्द्र पर,
पुनः पुनः दौड़ता है जल तरंग बन,
और सुर छिड़ जाते हैं जलतरंग के,
हर तरंग का पुनः एक आवर्त अपना,
और हर आवर्त का फिर अपना कंपन,
काँपता है जल तो धरती काँपती है,
काँपता है धरा पर उभरता जीवन,
आवर्त में कितने ग्रह कितने उपग्रह,
कितने सूर्य कितने चन्द्र नक्षत्र-तारे!
खो गया ब्रह्माण्ड के विस्तार में बच्चा,
और फिर चकित सा वह आत्म-विस्मृत,
ठठाकर हँस पड़ता जल, शान्त था जो,
और बच्चा फेंकता है, - एक और कंकर!
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न अर्थ न प्रयोजन,
न समय बिताने के लिए,
क्योंकि समय स्वयं उसका विस्तार है,
जो सिमटता फैलता है,
तरंगों के साथ ।
चकित वह,
अपनी ही सृष्टि से,
खेलता रहता है,
कौतूहलवश,
समय होने तक!
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