April 05, 2010

उन दिनों -67.

~~~~~~~~~~उन दिनों -67~~~~~~~~~
_________(रचनात्मकता...)_______
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सर, चाय ! ''
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मैंने अपनी असहजता छिपाते हुए कहा ।
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हाँ, ''
वे बोले ।
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हमने पिछली बार रचनात्मकता के बारे में बातचीत की थी । आपने कहा था कि ऊब रचनात्मकता के अभाव की या उसके कुंठित होने की द्योतक होती हो, ऐसा भी तो संभव है ।''
मैंने ही आख़िर बातचीत का सिरा खोलने की कोशिश की । वे हमेशा की तरह मेरे अगले वाक्य की प्रतीक्षा करने लगे ।
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आपकी बात सचमुच हमारे चिन्तन के परिप्रेक्ष्य को ही बदलकर रख देती है । हम कभी ऊब को गंभीरता से समझने की कोशिश ही कहाँ करते हैं ? 'ऊब' क्या है, इस पर हम कभी ध्यान तक नहीं देते । लेकिन इस सिलसिले में अभी मुझे यह जानना अधिक महत्त्वपूर्ण प्रतीत हो रहा है कि 'रचनात्मकता' क्या है ? आपकी बातों से मुझे ऐसा लगा कि कला के क्षेत्र में कुछ सीखना, एक श्रेष्ठ साहित्यकार चित्रकार, शिल्पकार या वास्तुकार होना इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि 'रचनात्मकता क्या है?' -इसे समझना । क्योंकि यदि हम एक विख्यात या सफल कलाकार हों भी, लेकिन केवल शब्दों के जोड़-तोड़ से या तकनीक के घालमेल से प्रतिष्ठित हो भी जाएँ तो भी अपने भीतर का खालीपन, रचनात्मकता का मौलिक अभाव हमारे सर पर एक बोझ ही होता है । और शायद इसे ही आप एक बंधन कह रहे थे । ''
बातचीत का सिरा मेरी पकड़ में आ गया, तो मुझे बेहद तसल्ली हुई ।
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देखिये, जब हम कुछ सीखना चाहते हैं, तो सामान्यतया इसलिए नहीं कि हमें उसे सीखने से लगाव होता है, शायद कुछ हद तक लगाव भी होता होगा, लेकिन अक्सर ही क्या हमारे कुछ दूसरे ध्येय ही हमारे इस लगाव के पीछे अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं हुआ करते ? जब हम कुछ सीखना चाहते हैं तो हमारी इन्द्रियाँ अधिक संवेदनशील, प्रखर होती हैं, और तब वह सीखना रचनात्मकता की ही मौलिक स्व-स्फूर्त्त एक गतिविधि हुआ करती है । वहाँ ऊब का प्रश्न ही नहीं पैदा होता । हाँ, हम थक सकते हैं, लेकिन वह एक बिलकुल अलग चीज़ है । तब हम थकान को दूर कर सकते हैं, और कुछ समय बाद पुन: तरोताजा होकर उत्साहपूर्वक सीखने के क्रम में संलग्न हो सकते हैं । लेकिन जब सीखने के साथ-साथ कोई दूसरा उद्देश्य जुड़ जाता है, तो हमारी संवेदनशीलता मंद पड़ने लगती है । तब सीखना बोझ बनने लगता है । और जहाँ कुछ उद्देश्य तो हमें स्पष्टत: ही पता होते हैं, वहीं कुछ आनुषांगिक उद्देश्य भी हमारे सीखने की गतिविधि में शामिल हो जाते हैं । ''
वे चुप हो गए । मैंने भी जल्दी नहीं की ।
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हम जाने-अनजाने अपनी एक 'पहचान' बनाने लगते हैं । क्या इसे 'अस्मिता'की ज़द्दो-ज़हद कह सकते हैं ?
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कुछ 'होने' की ज़द्दो-ज़हद कह सकते हैं ? हम एक 'भविष्य' प्रक्षेपित करते हैं, -जाने-अनजाने । ख़ास बात यह कि हम कब इस 'भविष्य' की कल्पना से अभिभूत हो जाते हैं, इस ओर हमारा ध्यान ही नहीं होता । और हमारा यह कल्पित भविष्य ही तय करता है कि हम क्या करेंगे । वही हमें दिशा-निर्देश देने लगता है । और तब हमारी नैसर्गिक संवेदनशीलता मंद पड़ने लगती है , -रचनात्मकता क्षीण होने लगती है । क्या हम अपनी तथाकथित रचनाशीलता की रिकॉग्निशन नहीं चाहने लगते हैं ? क्या असफल होने का डर हममें नहीं होता ?और क्या, स्थापित होने पर हमें एक भराव, ग्रेटीफिकेशन नहीं महसूस होता है ? हम 'कुछ' हैं, हमारी कोई पहचान है, यह एहसास भी क्या हमें एक गहरी तसल्ली नहीं देता ? एक तरह की सुरक्षा का आश्वासन नहीं देता ? "
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अभयदान ? ''
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मैंने मन-ही-मन कहा ।
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पर कुछ कलाकार तो गुमनामी के अंधेरों में ही रहना भी तो पसंद करते हैं । ''
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मैंने पूछा ।
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हाँ, लेकिन क्या इसमें भी उन्हें एक विशेष गर्व की अनुभूति नहीं होती ? ''
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हाँ, प्राय: तो ऐसा ही होता है । ''
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मुझे स्वीकार करना पड़ा । इसमें शायद यह विचार छुपा होता है कि दुनिया मेरी महानता को समझ भी नहीं पा रही । मुझे किसी से रिकॉग्निशन नहीं चाहिए ।
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या फिर कभी-कभी कोई कलाकार वाकई ऐसा भी होता होगा जिसका इस ओर ध्यान ही नहीं होता, वह सचमुच अपनी रचनात्मकता के आनंद में ही निमग्न रहता होगा ।''
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वे बोले ।
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वह सिर्फ इसलिए सृजनरत रहता है, क्योंकि सृजन उसका स्वभाव होता है, कोई संघर्ष या श्रम नहीं होता । याने सृजन उसके लिए हँसने, बोलने, सोने, चलने-फिरने, उठने-बैठने जैसा एक स्वाभाविक कृत्य होता होगा । ''
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वे बोले ।
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और उसे न करने पर उसे कोई बेचैनी होने लगती है ?''
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हाँ । ''
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लेकिन शायद यह भी तो हो सकता है कि वह 'ऊब' से भागने या बचने के लिए सृजन का 'उपयोग' करने लगे ?''
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हाँ, अक्सर यही होता है, तब वह कला उसके लिए एक बोझ या बंधन ही तो बन जाती है । ''
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लेकिन मैं कला के क्षेत्र में कुछ सीखने के बारे में कह रहा था । ''
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मैंने अपने प्रश्न को सुधारा ।
''
हाँ, मुख्य बात यही है कि हम सीखते भी इसीलिये हैं कि उसके बहाने अपने वर्त्तमान के खालीपन को दूर करें या संभव हो तो भरें, -भविष्य में उसका इस्तेमाल कर सकें । तब 'सीखना' हमारे खालीपन को छिपाने का एक प्रतिष्ठित ज़रिया बन जाता है । लेकिन क्या उससे हम अपने खालीपन से छूट पाते हैं ? ''
''
लेकिन क्या इस तरह से हम अपने-आपको बस भ्रमित ही नहीं बनाए रखते हैं ? बस ज़िंदगी बीत जाती है, और एक तसल्ली शायद रह जाती है कि हमने जीवन से कुछ पाया, और इससे ज्यादा किसी को क्या मिल सकता है ? फिर हमारे साथ वह भी बीत जाती है । ''
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तो क्या होना चाहिए ?''
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होना यह चाहिए कि हम जीवन को, जीवन की गतिविधि को, सीधे देखें, -मेरे, आपके, या दूसरों के नहीं, इस जगत के नहीं, बल्कि चारों ओर के जीवन को, हमारे बाहर और हमारे भीतर के भी । ''
''
जीवन की गतिविधि तो हमें वैसे भी दिखलाई देती है, उसे सीधे देखने से आपका क्या मतलब है ?''
उन्हें कुछ याद आया, लेकिन उन्होंने बताया नहीं, मुझे भी कुछ याद आया कि उनके पिता द्वारा उन्हें ऐसा अक्सर कहा जाता था । और मुझे लगा वे इस बार भी पुन: उसका ज़िक्र करेंगे । लेकिन शायद मैंने गलत भी सोचा हो ।
''
देखिये, जब मैंने कहा, 'हमारे बाहर और हमारे भीतर के जीवन को भी', तो क्या उसमें हमारे 'मन', हृदय, बुद्धि, भावनाएँ, स्मृति, मनोग्रंथियाँ, अंतर्द्वंद्व, ईर्ष्या, लोभ, वासना, भय, कल्पना, पूर्वाग्रह, अंधविश्वास, मान्यताएँ, नासमझियाँ, गलतफहमियाँ, ... क्या ये सब भी नहीं शामिल हैं ? क्या हम कभी उन्हें सीधे-सीधे देखते हैं ?
हमारा मन निष्कर्षों से, अनुमानों से, इच्छाओं से, भविष्य की प्रतिमा से (जो कि वास्तविक भविष्य से शायद ही कभी मेल खाता हो, ) अतीत की स्मृतियों से (जो पुन: उन्हीं स्मृतियों का जोड़ होती हैं जिनमें किसी कारण से, भय या आशा के कारण हमारी रुचि होती है,) भरा रहता है । हम उस बोझ के माध्यम से अपने बाहर के और भीतर के भी जीवन को देखने लगते हैं ।''
''
यहाँ एक प्रश्न सामने आता है । यदि विचार, निष्कर्ष, अनुमान, भविष्य, अतीत आदि से 'मन' लदा रहता है, तो इन सबसे अलग, जिसे हम 'मन' कहें, क्या ऐसी भी कोई चीज़ होती है ? या वे सब मिलकर ही हमारा 'मन' होते हैं ? ''
''-
हाँ, यह एक बहुत , अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न है । वह क्या चीज़ है, जिसे विचार, निष्कर्ष, अनुमानों, भविष्य, अतीत आदि से रहित किया जाता है, और 'कौन' करता है यह कार्य ?''
-
उन्होंने एक और प्रश्न से प्रत्युत्तर दिया ।
''
क्या मन ही नहीं करता यह कार्य ?''
''
अच्छा, हम 'मन' को 'जानते' हैं, या मन की प्रतिमा को ?''
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उन्होंने एक और प्रश्न किया ।
यह 'जाननेवाला' 'मन' है, या 'मन' से अलग तरह की कोई चीज़ है ?
-
मैंने पूछा ।
''
तात्पर्य यह हुआ कि जिसे 'मन' कहा जाता है, वह एक अमूर्त्त वस्तु है, उसका अमूर्त्त अस्तित्त्व है, और स्मृति से उठनेवाले विचारों, निष्कर्षों, अनुमानों और भविष्य, अतीत, आदि के काल्पनिक आकलन को वह 'जानता' है । ''
''क्या वह अमूर्त्त सत्ता/तत्त्व/या अस्तित्त्व ऐसा कहता भी है ?-क्या वह 'जानने'की 'घोषणा' करता है ?''
''कहने या घोषित करने के लिए शाब्दिक अभिव्यक्ति ज़रूरी होगी, और वह 'जाननेवाला'तो निश्चय ही एक नि:शब्द सत्ता/तत्त्व/अस्तित्त्व है ।''
''क्या वह स्वत:सिद्ध है ?''
'' क्या उसे कोई दूसरा जानता है, जो उसकी सत्ता को प्रमाणित करेगा ?''
हाँ, मुझे स्पष्ट हुआ कि उसे प्रमाणित करने का ख़याल मेरी मूर्खता ही था । क्योंकि फिर तो हम एक ऐसी अनंत श्रंखला को स्वीकार कर लेंगे, जो सदैव किसी पूर्व-प्रमाण की मोहताज़ बनी रहेगी ।
''क्या वह स्व-प्रमाणित नहीं है ?''
-उन्होंने पूछा ।
''उसे कैसे समझा जाए ? क्या किसी प्रयोग या अनुभव से उसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता ?''
''तुम एक निष्कर्ष चाह रहे हो, निष्कर्ष स्मृति के अंतर्गत होता है, जबकि वह तत्त्व तो स्मृति के साथ, उससे पहले, और स्मृति के बनने-मिटने-बदलने के दौरान यथावत रहता है । प्रयोग और अनुभव भी उसके ही आधारभूत होने से तर्क-संगत हो सकते हैं । ''
''एक प्रश्न और, -क्या वह तत्त्व वैयक्तिक है ? ''
'' व्यक्ति का अस्तित्त्व स्मृति, विचार, अनुमान, तर्क, बुद्धि, आकलन और सबसे बढ़कर कल्पना पर निर्भर होता है । 'व्यक्ति' या 'व्यक्तित्त्व' इस 'पहचान' का ही एक नाम है । यह 'पहचान' मान्यता है, या सचमुच ऐसी कोई चीज़ होती भी है कहीं ? ''
मैं सुन रहा था । वे पुन: एक बार व्यक्ति को, उसके व्यक्तित्त्व को, उसकी पहचान तक को संदेह के हवाले कर रहे थे ।
''अर्थात् उसमें वैयक्तिकता जैसा कुछ नहीं है ।''
''अर्थात् वैयक्तिकता एक ख़याल है । ''
मैं उनकी भाषा बोलने लगा ।
''हाँ, ''
''फिर क्या वह निर्वैयक्तिक है ?''
''इसे कहना तो आसान है, लेकिन इसके तात्पर्य को कैसे ग्रहण करेंगे ? 'निर्वैयक्तिक' कह देने से सिर्फ यह पता चलता है कि वह कोई व्यक्तिगत चीज़ नहीं है, - क्या इसका अर्थ यह हुआ कि वह सामूहिक है, या एक ऐसा स्वतंत्र तत्त्व है, जो सबमें है, जिसमें सब हैं, जिसमें सारे व्यक्ति, समूह आदि अपना-अपना जीवन जीते हैं ? फिर यह देखना भी ज़रूरी है कि जब हम 'मन' को 'जाननेवाला' कहते हैं, तो एक ओर हम अपने विचारों, अनुमानों, भावनाओं आदि को भी 'मन' का नाम देते हैं, और हमारे भीतर ही स्थित, उन्हें 'जाननेवाले' उस निर्वैयक्तिक तत्त्व को भी 'मन' कह रहे होते हैं । -यह हमारा व्यावहारिक यथार्थ है, जो वास्तव में हमें भ्रमित बनाए रखता है । शायद ही कोई इससे उबर पाता हो ।लेकिन इस चीज़ को समझना ऐसा कठिन भी नहीं है । यदि हमारे भीतर मन को जाननेवाला ऐसा कोई तत्त्व वास्तव में है, जिसमें मन कार्य करता है, तो उस 'जाननेवाले' तत्त्व से अलग, उसे भी जाने, ऐसी कोई चीज़ कैसे हो सकती है ?
उस बारे में जिज्ञासा तो अतिप्रश्न ही होगा न ?''
उन्होंने पूछा ।

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>>>>>>> उन दिनों -68>>>>>>>

Graffiti

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#1. Face-book में एक मित्र द्वारा प्रस्तुत
'photo of the day' के अंतर्गत एक खग-शिशु की छवि परलिखी मेरी एक टिप्पणी :

_________W E L C O M E ___________

स्वागत !!

नव-खग ,
इस धरती पर,
इस जमीन पर,
बढ़ो, उड़ो !
आकाश नाप लो,
फैलाकर,
-अपने कोमल पर !
चहको, गुंजाओ आकाश,
क्योंकि तुम्हीं से वैभव जग का,
तुमसे ही उल्लास !

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#2.Face-book में ही एक दूसरे मित्र के अमूर्त-कला के चित्र की छवि पर लिखी एक टिप्पणी :

दिल से उट्ठा जो धुवां,
रक्स बन गया होगा,
और कोई अरमाँ जैसे,
नक्श बन गया होगा,
कोई रंगीन ख्वाब
जो नज़रों का था ,
एक दिलकश सा,
अक्स बन गया होगा ।

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April 03, 2010

उन दिनों -66.

~~~~~~~~~उन दिनों -66~~~~~~~~
--------------रचनात्मकता ---------------
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मेरी रिटायर्ड ज़िंदगी में उन्होंने भूचाल ला दिया था । मैंने कल्पना तक नहीं की थी कि किसी कहानी के प्लॉट के खोज की लालच में उनसे मुलाक़ात करने के बाद मेरी ज़िंदगी खुद भी एक ऐसी कहानी बन जायेगी, जिसका ओर-छोर ढूँढना मुश्किल हो जाएगा । इस 'होने-न-होने', 'कहीं-और-होने', तथा 'अपने' -'होने', 'न-होने' के बीच मैं बुरी तरह फँस गया था । उलझकर रह गया था । उधर अपने 'होने'-'न-होने' का भ्रम भी अलग से मुँह फाड़े मेरा इंतज़ार कर रहा था । और इसलिए मेरी बिटिया की शादी के करीब दो हफ़्तों बाद वे मेरे यहाँ आये, तो मैंने तय कर लिया था कि उनसे इन सारे प्रश्नों पर खुलकर चर्चा कर, इस भूलभुलैया से निकलना नितांत आवश्यक है ।
लेकिन यहाँ नहीं । वहाँ , -उनके घर ।
करीब छ:-सात माह बाद । यह एक नई शुरुआत थी । उनके ही घर पर । रोज़ की तरह दोपहर की झपकी लेने के बाद छत पर बैठे थे । जनवरी की धूप में 'बगीचे' में प्लास्टिक की चेयर्स पर बैठे चाय का इंतज़ार कर रहे थे । छत पर रखे गमलों में देख-रेख के अभाव में कचरा, सूखी पट्टियां, मुरझाए फूल, आदि जमा हो गए थे । दूर खड़ा गुलमोहर अब भी एकदम हरा था । बीच-बीच में गहरे हरे रंग के नए पत्ते हलके हरे वितान में बारीक स्थिरप्राय लहरों की भाँति बहुत धीमी गति से हिल-डुल रहे थे । पारिजात के वृक्ष पर अब भी फूल आते थे । मोगरे, गुलाब और दूसरे पौधों पर भी फूल थे । लेकिन सब मानों मौसम की मार भी झेल रहे थे । मौसम की मार से, शीत की कठोरता से सब बदरंग हो रहे थे । आधे दिल से फूल रहे ये पौधे ज़रा भी उदास न थे । और न सोए-सोए थे, जैसे कि अलस्सुबह, या शाम के समय होने लगते हैं। सुबह वे एक मौन प्रतीक्षा में सूरज का इंतज़ार करते हैं, उनींदे से । और अगर आप भोर होने से दो घंटे पहले उन्हें देखें तो वे गहरी निद्रा में डूबे दिखलाई देते हैं । आप देख सकते हैं, कि उनके बीच कोई तितली भी एक पीली पत्ती की तरह टँकी हुई निश्चल भाव से सोई हुई दिखलाई देती है । आप उसे छू सकते हैं, पकड़ सकते हैं, -एकदम किसी छोटे बच्चे की तरह, नितांत असुरक्षित होती है वह । आप नहीं जानते कि वहाँ वह प्रकृति की गोद में, पौधे से चिपटकर वैसी ही निश्चिन्त सोई होती है, जैसे एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ से चिपटकर सोया होता है ।
लेकिन सूरज के आगमन से कुछ पहले की सुरमई लालिमा में वे प्रतीक्षा करने लगते हैं । आप देख सकते हैं, वे जाग चुके होते हैं, और साँस रोककर सूरज के क्षितिज पर आने का अधीर इंतज़ार करते हैं । तब यदि आप उस तितली को पकड़ने जाएँ, तो आपको अपनी अभद्रता पर ग्लानि होने लगेगी । और यदि दो घंटे पहले आप तितली को पकड़ लेते तो आपको अपनी पशुता पर पश्चात्ताप होता । लेकिन बस सूरज की कोर क्षितिज पर दिखलाई देते ही वे चहक उठेंगे। फूल भी, तितलियाँ भी, और चिड़ियाँ भी । मानों वे सब बेसब्री से 'वन-टू-गो' के अनाउन्समेंट का बस इंतज़ार ही कर रहे थे ।
और इस समय, दोपहर के चार बजे, दिन की धूप में प्रसन्न और कुछ-कुछ अलसित भी, वे खूब जागे हुए से थे । वे उदास नहीं थे, सोए-सोए भी नहीं थे, वे जैसे थे, प्रसन्न थे, कम-से-कम उन्हें किसी कष्ट की चिंता नहीं थी । शायद खबर तक नहीं थी । धीरे-धीरे शाम हो जायेगी, रात भी, और फिर मौसम की मार से उनके कुछ साथी गिरकर बिखर जायेंगे, समाप्त हो जायेंगे । लेकिन वहाँ दु:ख नहीं था । निराशा नहीं थी । जो था, -'अभी' था । कष्ट तो सबको होते हैं, पशुओं, पौधों, लताओं, और वृक्षों को भी, लेकिन चिंता नामक व्याधि सिर्फ मनुष्य को ही व्यथित और त्रस्त करती है। क्योंकि वह भविष्य-दर्शी होता है । वह आनेवाले कष्टों को भी इसीलिये इसी समय भोगता रहता है । सबसे बुद्धिमान प्राणी सारे सुखों और सुरक्षितताओं के बीच, अनेक सुखों के बीच, भविष्य की आशंकाओं, अतीत की अपूर्ण कामनाओं, और वर्त्तमान के कष्टों को अभी ही भोगता रहता है ।
छत पर सीमेंट के एक कॉलम के तीन फीट ऊँचे स्तम्भ को चौकोर से बदलकर गोलाकार बना दिया गया था । पहले कभी वह करीब दस इंच गुणित दस इंच का वर्गाकार कॉलम रहा होगा, जिस पर और सीमेंट लगाकर उस पर गोलाई में धारियाँ डालकर, एक पाए-वाले टेबल का आधार बना दिया गया था । उस पर करीब दो फीट व्यास का एक गोलाकार एक इंच मोटा स्लैब रख दिया गया था । उसके किनारे बहुत सफाई से तराशे और चिकने किये गए थे । उस आधारभूत पाए की ही तरह । उसकी ऊँचाई छत की मुंडेर के ही बराबर थी । बीच में दो कुर्सियाँ टेबल के दोनों ओर पड़ी थीं । हम चाहते तो कुर्सियों को याने कि प्लास्टिक-चेयर्स को टेबल के इर्द-गिर्द घुमा भी सकते थे ।
उस टेबल के आधार को देखते ही पास के पार्क में खड़े उन ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़ों की याद आने लगती थी जिनके तने इस टेबल के एकमात्र पाए की ही तरह गोलाई में तराशे हुए लगते थे । यदि कोई आपसे कहता कि उस नारियल के ही एक पेड़ के तने को काटकर इस पाए को बनाया गया है, तो आपको अविश्वास नहीं होता, बल्कि आप तो चौंक उठते, और चकित भाव से बस देखते रह जाते । लेकिन ऐसा नहीं था । फिर जब उस टेबल पर पड़े पत्थर के उस स्लैब को आप देखते, जिसे लाल बारीक रेत में सफ़ेद सीमेंट मिलाकर बनाया गया था, तो आप तय नहीं कर पाते, कि वह सीमेंट-रेत से बना स्लैब है, या सचमुच एक तराशा हुआ मोटा पत्थर है । उस पर बनी धारियाँ प्लायवुड डिजाइन में थीं, जैसे कि लकड़ी के बने फर्नीचर में दिखलाई देती हैं। लेकिन उनमें दोहराव नहीं था । पूरे स्लैब पर मानों लहरों का एक लैंडस्केप बिछा था ।
वहाँ सुघड़ता थी, रूखा सौन्दर्य था, एक निर्मलता थी, स्वच्छता थी । उसे बड़ी लगन और प्रेम से बनाया गया था । शायद जिसने उसे बनाया होगा, उसके लिए एक आराधना रही होगी वह कृति ।
मैं सोचने लगा कि जब पिछली बार उनके यहाँ आया था तब मेरा ध्यान इस टेबल की ओर क्यों नहीं जा सका था ?
उस इकलौते पीस ऑफ़ आर्ट को देखकर मुझे वह सफ़र याद हो आया, जिसमें मैं ट्रेन से बाहर की बंजर जमीन के सौन्दर्य को देखकर अभिभूत हो उठा था । क्या था वहाँ ? दूर-दूर फैले इने-गिने थोड़े से खजूर के पेड़, ज़्यादातर बौने, और बहुत दूर कोई चरवाहा, कोई गाय-भैंस, या बकरियाँ, एकदम सूखी जमीन जिस पर घास भी बहुत कम रही होगी, धूल ही अधिक थी । कहीं-कहीं पीली घास, और धरती में दरारें और पपड़ियाँ ।
क्या सौन्दर्य किसी उत्तेजना में होता है ?या फिर मुग्धता में होता है ? क्या मुग्धता और उत्तेजना एक ही चीज होते हैं ? क्या उत्तेजना और खुशी एक ही चीज़ होती है ? फिर हम क्या खोजते रहते हैं ? मुग्धता या सुख ? क्या हम उत्तेजना को ही सुख नहीं समझते ? मैं तय नहीं कर पा रहा था कि बात कहाँ से शुरू करूँ ! मैं मानता था कि पुराना तो ख़त्म हो चुका है । वहाँ से नई शुरुआत कैसे हो सकती है ? ऐसे ही खालीपन में मैंने थर्मस का ढक्कन खोला, दो मग्ज़ में चाय भरी ।
''सर, चाय !''
उनकी निगाहें दूर खड़े गुलमोहर से फिसलकर सीधे मेरे चेहरे पर आकर टिक गयीं । वे 'वहाँ' से 'यहाँ' नहीं आये थे, वे बस मेरे सामने थे । 'वहाँ' से 'यहाँ' तो अविज्नान आया-जाया करता था । -मैंने सोचा ।
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>>>>>>>उन दिनों -67 >>>>>>