January 13, 2026

THE BRAHMAN

ब्रह्मन्-अब्रह्मन्

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ब्रह्म और अब्रह्म 

किसी भी संवाद का प्रारंभ होने के लिए आधार की तरह द्वैत, अस्तित्व पूर्व-मान्यता, अरिहार्य॓ता और अनिवार्यता की तरह आवश्यक तो होता ही है, किन्तु अस्तित्व अपना प्रमाण स्वयं ही होता है, और चूँकि द्वैत का अस्तित्व भी अस्तित्व पर ही आश्रित है, उसे किसी दूूसरे प्रमाण की आवश्यकता तथा अपेक्षा भी नहीं हो सकती। तात्पर्य यह कि अस्तित्व द्वैत और अद्वैत की सीमा से स्वतंत्र है।

विचार और विचारक युगपत और विकारशील अस्तित्व (changing phenomenal existence) ग्रहण करते हैं और युगपत ही विलीन भी होते हैं। दोनों एक ही घटना (phenomenon) के दो दृश्य पक्ष हैं। अस्तित्व, घटना न होकर अविकारी (Immutable) सत्य है।

अवधारणा का अस्तित्व,

और

अस्तित्व की अवधारणा -

अस्तित्व अपरिभाषेय है क्योंकि अस्तित्व अवधारणा नहीं बल्कि वह वास्तविकता है जिसे द्वैत और / या अद्वैत की अवधारणा के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसी तरह उस पर उसके 'एक' या 'अनेक' होने का विशेषण भी प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है।

'एक' और 'अनेक' का विचार भी अवधारणा का ही कोई शाब्दिक या व्यक्त प्रकार-मात्र होता है।

"ख्" आख्यायते यया असौ आख्या इति धात्वर्थः।

'सं' उपसर्गेण युक्त्या 'संख्या', 'सांख्य' इति भवति।

इस प्रकार सांख्य दर्शन में ब्रह्म को 'एक' और 'अनेक' से विलक्षण अपरिभाषेय वास्तविकता की तरह से निरूपित किया जाता है। सांख्य दर्शन में निरूपित यह ब्रह्म कोई अवधारणा या विचार नहीं बल्कि वह सत्य है जिसे वह सत्य, उस 'एक' और 'अनेक' से विलक्षण वह ब्रह्म ही जानता है और यह 'जानना' उसका गुण नहीं, स्वरूप है। जबकि 'एक' और 'अनेक' गुण हैं। ब्रह्म के अस्तित्व को इसीलिए सगुण या निर्गुण की तरह सोपाधिक और / या निरुपाधिक इन दोनों प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है और ब्रह्म में जब स्वयं अपने आपके दृक्-दृश्य के रूप में विभक्त होने की प्रतीति उत्पन्न होती है तो उसे चेतन ब्रह्म कहा जाता है। इसलिए ब्रह्म नित्य चेतन सत्य अस्तित्व है और इस सत्य का उद्घोष 'अहं-प्रत्यय' की तरह सर्वत्र ही प्रकट और व्यक्त भी है। इस अहं प्रत्यय को अर्थात् इस 'अहं-पद' से कौन अनभिज्ञ हो सकता है?

अत्ता और अनत्ता

संस्कृत भाषा में 'अद्' / 'अश्' धातु का प्रयोग 'खाने' की क्रिया के अर्थ में होता है। 'अदनम्' / 'अशनम्' इसी के वाचक पद हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा पाँच तन्मात्राओं के  रूप में पाँच महाभूतों को खाया जाता है, जबकि दूसरी ओर यही पञ्च-महाभूत आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि क्रमशः एक दूसरे को खा जाते है अर्थात् वे परस्पर एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं। और इस प्रकार संपूर्ण व्यक्त अव्यक्त में विलीन होता है, फिर पुनः पुनः व्यक्त रूप ग्रहण करता है - गीता के अनुसार-

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।

अव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

इन्हीं पाँच स्थूल महाभूतों से रचित और इसी तरह से पाँच सूक्ष्म महाभूतों से व्याप्त देह में चेतना और पाँचों प्राणों का संयोग होने पर इस चेतना और प्राणयुक्त देह का उपभोग करनेवाला ज्ञान "मैं" अहं-प्रत्यय के रूप में व्यक्त रूप ग्रहण करता है। इसलिए इसे "अत्ता" कहा जाता है। बौद्ध दर्शन के मत में इस 'अत्ता' का अस्तित्व संदिग्ध है। इसलिए ''अनत्ता" नामक आधारभूत तत्व को ही अंतिम और वह एकमात्र अवस्था कहा जाता है जिसे "निर्वाण" की संज्ञा दी गई है। ब्रह्म में कर्तृत्व की भावना का अत्यंत अभाव होने से उसे सृष्टिकर्ता (ईश्वर) कहना भी ठीक नहीं है।

गीता अध्याय 5, श्लोक 14 के अनुसार भी :

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४॥

इति अलं - किं विस्तरेण! 

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